भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 197, कुल 506 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 197
  • अध्याय २९ * | १८७ ---|---
नानावर्णा विवर्णांश्च चण्डालाद्या जुगुप्सिताः।<br>किल्बिषैः पूर्णदेहा ये विशिष्टैः पातकैस्तथा।<br>भेषजं परमं तेषामविमुक्तं विदुर्बुधाः॥ ४२॥<br><br>अविमुक्तं परं ज्ञानमविमुक्तं परं पदम्।<br>अविमुक्तं परं तत्त्वमविमुक्तं परं शिवम्॥ ४३॥<br><br>कृत्वा वै नैष्ठिकीं दीक्षामविमुक्ते वसन्ति ये।<br>तेषां तत्परमं ज्ञानं ददाम्यन्ते परं पदम्॥ ४४॥<br>प्रयागं नैमिषं पुण्यं श्रीशैलोऽथ महालयः।<br>केदारं भद्रकर्णं च गया पुष्करमेव च॥ ४५॥<br>कुरुक्षेत्रं रुद्रकोटिर्नर्मदाम्रातकेश्वरम्।<br>शालिग्रामं च कुब्जाम्रं कोकामुखमनुत्तमम्।<br>प्रभासं विजयेशानं गोकर्णं भद्रकर्णकम्॥ ४६॥<br>एतानि पुण्यस्थानानि त्रैलोक्ये विश्रुतानि ह।<br>न यास्यन्ति परं मोक्षं वाराणस्यां यथा मृताः॥ ४७॥<br>वाराणस्यां विशेषेण गङ्गा त्रिपथगामिनी।<br>प्रविष्टा नाशयेत् पापं जन्मान्तरशतैः कृतम्॥ ४८॥<br>अन्यत्र सुलभा गङ्गा श्राद्धं दानं तपो जपः।<br>व्रतानि सर्वमेवैतद् वाराणस्यां सुदुर्लभम्॥ ४९॥<br>यजेत जुहुयान्नित्यं ददात्यर्चयतेऽमरान्।<br>वायुभक्षश्च सततं वाराणस्यां स्थितो नरः॥ ५०॥<br>यदि पापो यदि शठो यदि वाऽधार्मिको नरः।<br>वाराणसीं समासाद्य पुनाति सकलं नरः॥ ५१॥<br>वाराणस्यां महादेवं येऽर्चयन्ति स्तुवन्ति वै।<br>सर्वपापविनिर्मुक्तास्ते विज्ञेया गणेश्वराः॥ ५२॥<br>अन्यत्र योगज्ञानाभ्यां संन्यासादथवान्यतः।<br>प्राप्यते तत् परं स्थानं सहस्रेणैव जन्मना॥ ५३॥<br>ये भक्ता देवदेवेशे वाराणस्यां वसन्ति वै।<br>ते विन्दन्ति परं मोक्षमेकेनैव तु जन्मना॥ ५४॥<br>यत्र योगस्तथा ज्ञानं मुक्तिरेकेन जन्मना।<br>अविमुक्तं समासाद्य नान्यद् गच्छेत् तपोवनम्॥ ५५॥विद्वानोंका यह कहना है कि अनेक (ब्राह्मणादि) वर्णवाले मनुष्यों, वर्णरहित चण्डालादिकों, घृणित व्यक्तियों तथा जो पापों तथा विशिष्ट पापों (महापापों)-से युक्त देहवाले हैं, उनके लिये अविमुक्त क्षेत्र (वाराणसीका सेवन ही) परम ओषधि है। अविमुक्त (क्षेत्र) परम ज्ञान है। अविमुक्त (क्षेत्र) परम पद है। अविमुक्त (क्षेत्र) परम तत्त्व है और अविमुक्त (क्षेत्र) परम कल्याण है। नैष्ठिकी दीक्षा ग्रहण कर जो अविमुक्त (क्षेत्र)-में निवास करते हैं, उन्हें मैं श्रेष्ठ ज्ञान और अन्तमें परम पद प्रदान करता हूँ॥ ४२-४४॥<br><br>प्रयाग, पुण्यदायी नैमिषारण्य, महालय श्रीशैल, केदार, भद्रकर्ण, गया, पुष्कर, कुरुक्षेत्र, रुद्रकोटि, नर्मदा, आम्रातकेश्वर, शालिग्राम, कुब्जाम्र, श्रेष्ठ कोकामुख, प्रभास, विजयेशान, गोकर्ण तथा भद्रकर्ण—ये सभी पवित्र तीर्थ तीनों लोकोंमें विख्यात हैं, किंतु जिस प्रकार वाराणसीमें मरे हुए व्यक्तियोंको परम मोक्ष प्राप्त होता है, वैसा अन्यत्र प्राप्त नहीं होता। वाराणसीमें प्रविष्ट त्रिपथगामिनी (स्वर्ग, पाताल एवं भूलोक इस प्रकार तीन पथोंमें प्रवाहित होनेवाली) गङ्गा सैकड़ों जन्मोंमें किये हुए पापोंको नष्ट करनेमें अपना विशिष्ट स्थान रखती है॥ ४५-४८॥<br><br>गङ्गा, श्राद्ध, दान, तप, जप तथा व्रत वाराणसीमें सभी सुलभ हैं, परंतु अन्यत्र दुर्लभ हैं। वाराणसीमें स्थित मनुष्य ऐसा ज्ञान अत्यल्प परिश्रमसे प्राप्त कर लेता है, जिसके सहारे वायुभक्षी होकर नित्य हवन करता है, यज्ञ करता है, दान देता है तथा देवताओंकी पूजा करता है। मनुष्य पापी हो, शठ हो अथवा अधार्मिक हो, तब भी वाराणसीमें पहुँचकर अपने संसर्गमें रहनेवाले सबको पवित्र कर देता है। वाराणसीमें जो महादेवकी स्तुति करते हैं, अर्चना करते हैं, उन्हें सभी पापोंसे मुक्त (शंकरके) गणेश्वर समझना चाहिये॥ ४९-५२॥<br><br>दूसरे स्थानमें योग, ज्ञान, संन्यास अथवा अन्य उपायोंसे हजारों जन्मोंमें वह परमपद—मोक्ष प्राप्त होता है, किंतु देवदेवेश शंकरके जो भक्त वाराणसीमें निवास करते हैं, वे एक ही जन्ममें परमपद—मोक्षको प्राप्त कर लेते हैं। जहाँ एक ही जन्ममें योग, ज्ञान अथवा मुक्ति मिल जाती है, उस अविमुक्त (वाराणसी) क्षेत्रमें पहुँचकर फिर किसी दूसरे तपोवनमें नहीं जाना चाहिये॥ ५३-५५॥