संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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१८६ | * कूर्मपुराण *
| देवीदं सर्वगुह्यानां स्थानं प्रियतमं मम।<br>मद्भक्तास्तत्र गच्छन्ति मामेव विशन्ति ते ॥ २८ ॥<br><br>दत्तं जप्तं हुतं चेष्टं तपस्तप्तं कृतं च यत्।<br>ध्यानमध्ययनं ज्ञानं सर्वं तत्राक्षयं भवेत् ॥ २९ ॥<br><br>जन्मान्तरसहस्रेषु यत्पापं पूर्वसंचितम्।<br>अविमुक्तं प्रविष्टस्य तत्सर्वं व्रजति क्षयम् ॥ ३० ॥ | देवि! सभी गुह्य स्थानोंमें यह मेरा सर्वाधिक प्रिय स्थान है। मेरे भक्त यहाँ आते ही मुझमें ही प्रविष्ट हो जाते हैं। यहाँ किया हुआ दान, जप, होम, यज्ञ, तप, कर्म, ध्यान, अध्ययन और ज्ञानार्जन—सब कुछ अक्षय हो जाता है। अविमुक्त क्षेत्रमें प्रविष्ट होनेवालेका हजारों जन्मान्तरोंमें किया हुआ जो पूर्वसंचित पाप है, वह सब नष्ट हो जाता है॥ २८-३०॥ |
| ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्रा ये वर्णसंकराः।<br>स्त्रियो म्लेच्छाश्च ये चान्ये संकीर्णाः पापयोनयः ॥ ३१ ॥<br><br>कीटाः पिपीलिकाश्चैव ये चान्ये मृगपक्षिणः।<br>कालेन निधनं प्राप्ता अविमुक्ते वरानने ॥ ३२ ॥<br><br>चन्द्रार्धमौल्यस्त्र्यक्षा महावृषभवाहनाः।<br>शिवे मम पुरे देवि जायन्ते तत्र मानवाः ॥ ३३ ॥<br><br>नाविमुक्ते मृतः कश्चिन्नरकं याति किल्बिषी।<br>ईश्वरानुगृहीता हि सर्वे यान्ति परां गतिम् ॥ ३४ ॥<br><br>मोक्षं सुदुर्लभं मत्वा संसारं चातिभीषणम्।<br>अश्मना चरणौ हत्वा वाराणस्यां वसेन्नरः ॥ ३५ ॥ | वरानने! अविमुक्त (वाराणसी) क्षेत्रमें कालवश मृत्युको प्राप्त—ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, वर्णसंकर, स्त्री, म्लेच्छ, अन्य संकीर्ण पाप योनिवाले सभी मानव प्राणी, कीड़े, चींटी तथा जो भी अन्य मृग-पक्षी आदि हैं—ये सभी सिरपर अर्धचन्द्र धारण करनेवाले, त्रिनेत्र तथा महावृषभ (नन्दी)- को वाहन बनानेवाले (शिव-स्वरूप) मानव बनकर मेरे कल्याणमय पुरमें उत्पन्न होते हैं। अविमुक्त क्षेत्रमें मरा हुआ कोई पापी नरकमें नहीं जाता है, ईश्वर (शंकर)-से कृपा-प्राप्त वे सभी परम गति प्राप्त करते हैं। मोक्षको अत्यन्त दुर्लभ और संसारको अत्यन्त भीषण समझकर पत्थरद्वारा पैरोंको तोड़कर मनुष्यको वाराणसीमें निवास करना चाहिये॥ ३१-३५॥ |
| दुर्लभा तपसा चापि पूतस्य परमेश्वरि।<br>यत्र तत्र विपन्नस्य गतिः संसारमोक्षिणी ॥ ३६ ॥<br><br>प्रसादाज्जायते ह्येतन्मम शैलेन्द्रनन्दिनि।<br>अप्रबुद्धा न पश्यन्ति मम मायाविमोहिताः ॥ ३७ ॥<br><br>अविमुक्तं न सेवन्ते मूढा ये तमसावृताः।<br>विण्मूत्ररेतसां मध्ये ते वसन्ति पुनः पुनः ॥ ३८ ॥<br><br>हन्यमानोऽपि यो विद्वान् वसेद् विघ्नशतैरपि।<br>स याति परमं स्थानं यत्र गत्वा न शोचति ॥ ३९ ॥ | परमेश्वरी! तपस्याद्वारा पवित्र हुए प्राणीके लिये भी जहाँ-कहीं मरनेपर संसारसे मुक्त करनेवाली गति दुर्लभ होती है। शैलपुत्री! मेरे अनुग्रहसे (वह गति) यहाँ प्राप्त हो जाती है। मेरी मायासे विमोहित अज्ञानी लोग इस तत्त्वको नहीं समझते हैं। अज्ञानसे आवृत मूढ़ लोग अविमुक्त क्षेत्रका सेवन नहीं करते, वे मल-मूत्र और रजोवीर्य (-से युक्त नरक)-के बीच बार-बार निवास करते हैं। सैकड़ों विघ्नोंसे आहत होनेपर भी जो विद्वान् (वाराणसीमें) निवास करते हैं, वे उस परम स्थानको प्राप्त करते हैं, जहाँ जानेपर शोक नहीं करना पड़ता ॥ ३६-३९॥ |
| जन्ममृत्युजरामुक्तं परं यान्ति शिवालयम्।<br>अपुनर्मरणानां हि सा गतिर्मोक्षकाङ्क्षिणाम्।<br>यां प्राप्य कृतकृत्यः स्यादिति मन्यन्ति पण्डिताः ॥ ४० ॥<br><br>न दानैर्न तपोभिश्च न यज्ञैर्नापि विद्यया।<br>प्राप्यते गतिरुत्कृष्टा याविमुक्ते तु लभ्यते ॥ ४१ ॥ | (वे) जन्म, मृत्यु और जरारहित होकर शिवके श्रेष्ठ निवासस्थानको प्राप्त करते हैं। पुनः मरणको न प्राप्त करनेवाले मोक्षार्थिंयोंकी वह सद्गति होती है, जिसे प्राप्तकर पण्डित लोग (स्वयंको) कृतकृत्य मानते हैं। अविमुक्त क्षेत्रमें जो उत्कृष्ट गति प्राप्त होती है, वह न दानोंसे, न विविध तपोंसे, न यज्ञोंसे और न विद्याद्वारा ही प्राप्त की जा सकती है॥ ४०-४१॥ |