भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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  • अध्याय २९ * १८५
ईश्वरेण पुरा प्रोक्तं ज्ञानमेतत् सनातनम्।<br>गूढमप्राज्ञविद्विष्टं सेवितं सूक्ष्मदर्शिभिः॥ १४॥अज्ञानी लोग जिससे द्वेष करते हैं और सूक्ष्मदर्शी जिसका सेवन करते हैं, वह गूढ़ सनातन ज्ञान प्राचीन कालमें ईश्वर (शंकर)-के द्वारा कहा गया है।
नाश्रद्दधाने दातव्यं नाभक्ते परमेष्ठिनः।<br>न वेदविद्विषि शुभं ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम्॥ १५॥जो श्रद्धारहित हो, परमेष्ठी (शंकर)-का भक्त न हो और वेदसे द्वेष रखता हो, ऐसे व्यक्तिको सभी ज्ञानोंमें उत्तम इस शुभ ज्ञानको नहीं प्रदान करना चाहिये।
मेरुशृङ्गे पुरा देवमीशानं त्रिपुरद्विषम्।<br>देवासनगता देवी महादेवमपृच्छत॥ १६॥प्राचीन कालमें मेरु-शिखरपर भगवान् शंकरके साथ एक ही आसनपर स्थित देवी पार्वती ने त्रिपुरारि देव, ईशान महादेवसे पूछा— ॥ १४-१६ ॥
देव्युवाच<br>देवदेव महादेव भक्तानामार्तिनाशन।<br>कथं त्वां पुरुषो देवमचिरादेव पश्यति॥ १७॥<br>सांख्ययोगस्तथा ध्यानं कर्मयोगोऽथ वैदिकः।<br>आयासबहुला लोके यानि चान्यानि शंकर॥ १८॥<br>येन विभ्रान्तचित्तानां योगिनां कर्मणामपि।<br>दृश्यो हि भगवान् सूक्ष्मः सर्वेषामथ देहिनाम्॥ १९॥<br>एतद् गुह्यतमं ज्ञानं गूढं ब्रह्मादिसेवितम्।<br>हिताय सर्वभक्तानां ब्रूहि कामाङ्गनाशन॥ २०॥देवीने कहा—देवाधिदेव महादेव! आप भक्तोंके कष्टको दूर करनेवाले हैं। पुरुष किस प्रकार शीघ्र ही आप देवका दर्शन कर सकता है? कामदेवका विनाश करनेवाले शंकर! लोकमें सांख्ययोग, ध्यान, वैदिक कर्मयोग और अन्य भी अनेक अधिक परिश्रमसाध्य (उपाय) बतलाये गये हैं। (उनमें) जो ब्रह्मा आदिद्वारा सेवित उपाय या अत्यन्त गुह्य एवं गूढ़ ज्ञान हो, उसे आप हम सभी भक्तोंके कल्याणके लिये बतलायें, जिससे भ्रान्तचित्तवालों अथवा कर्मयोगी मनुष्यों एवं समस्त देहधारियोंको सूक्ष्म भगवान्‌का दर्शन हो सके॥ १७-२०॥
ईश्वर उवाच<br>अवाच्यमेतद् विज्ञानं ज्ञानमज्ञैर्बहिष्कृतम्।<br>वक्ष्ये तव यथातत्त्वं यदुक्तं परमर्षिभिः॥ २१॥<br>परं गुह्यतमं क्षेत्रं मम वाराणसी पुरी।<br>सर्वेषामेव भूतानां संसारार्णवतारिणी॥ २२॥<br>तत्र भक्ता महादेवि मदीयं व्रतमास्थिताः।<br>निवसन्ति महात्मानः परं नियममास्थिताः॥ २३॥<br>उत्तमं सर्वतीर्थानां स्थानानामुत्तमं च तत्।<br>ज्ञानानामुत्तमं ज्ञानमविमुक्तं परं मम॥ २४॥ईश्वर बोले—परम ऋषियोंने जिस विज्ञानको कहा है, अज्ञानियोंने जिस ज्ञानका विरोध किया है और जो अकथनीय है, उसे मैं तत्त्वतः तुमसे कहता हूँ। पुरी वाराणसी मेरा परम गुह्यतम क्षेत्र है। यह सभी प्राणियोंको संसारसागरसे पार उतारनेवाली है। महादेवि! यहाँ मेरे व्रतको धारण करनेवाले भक्त तथा श्रेष्ठ नियमका आश्रय ग्रहण करनेवाले महात्मा निवास करते हैं। यह मेरा अविमुक्त (काशीक्षेत्र) सभी तीर्थोंमें उत्तम, सभी स्थानोंमें श्रेष्ठ और सभी ज्ञानोंमें उत्तम ज्ञानरूप है॥ २१-२४॥
स्थानान्तरं पवित्राणि तीर्थान्यायतनौनि च।<br>श्मशानसंस्थितान्येव दिव्यभूमिगतानि च॥ २५॥<br>भूलोके नैव संलग्नमन्तरिक्षे ममालयम्।<br>अयुक्तास्तन्न पश्यन्ति युक्ताः पश्यन्ति चेतसा॥ २६॥<br>श्मशानमेतद् विख्यातमविमुक्तमिति श्रुतम्।<br>कालो भूत्वा जगदिदं संहराम्यत्र सुन्दरि॥ २७॥इस दिव्य भूमिमें महाश्मशानरूपी* काशीमें अन्य अनेक पवित्र स्थान, तीर्थ तथा मन्दिर प्रतिष्ठित हैं। मेरा गृहस्वरूप (यह वाराणसी क्षेत्र) भूलोकसे सम्बद्ध नहीं है, अपितु अन्तरिक्षमें (अवस्थित) है, अयोगियोंको इसके दर्शन नहीं होते। जो योगी हैं वे ध्यानमें इसका दर्शन करते हैं। सुन्दरी! यह महाश्मशानके नामसे विख्यात है और इसे अविमुक्त (क्षेत्र) भी कहा जाता है। मैं कालरूप होकर यहाँ इस संसारका संहार करता हूँ॥ २५-२७॥

* काशीमें मरण होनेपर स्थूल, सूक्ष्म एवं कारण—इन तीनों शरीरोंका सदाके लिये नाश हो जाता है, इसीलिये काशीको महाश्मशान कहते हैं।