संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished506 पृष्ठ
पृष्ठ 194, कुल 506 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 194
१८४
- कूर्मपुराण *
उनतीसवाँ अध्याय
व्यासजीका वाराणसी-गमन, व्याससे जैमिनि आदि ऋषियोंका धर्मसम्बन्धी प्रश्न, व्यासका उन्हें शिव-पार्वती-संवाद बताना, अविमुक्तक्षेत्र वाराणसीका माहात्म्य, वाराणसी-सेवनका विशेष फल
| ऋषय ऊचुः | ऋषियोंने कहा—(सूतजी!) महाबुद्धिमान् कृष्णद्वैपायन (व्यास) मुनिने दिव्य वाराणसीपुरीमें पहुँचकर क्या किया? इस विषयको सुननेके लिये हम लोगोंको कौतूहल है॥ १॥ |
|---|---|
| प्राप्य वाराणसीं दिव्यां कृष्णद्वैपायनो मुनिः।<br>किंमकार्षीन्महाबुद्धिः श्रोतुं कौतूहलं हि नः॥ १ ॥ | |
| सूत उवाच | **सूतजी बोले—**दिव्य वाराणसीमें पहुँचकर महामुनिने गङ्गामें आचमनकर (स्नानकर) विश्वेश्वर देव शिवका पूजन किया। उन मुनि (व्यासजी)-को आया देखकर वहाँ निवास करनेवाले मुनियोंने मुनिश्रेष्ठ व्यासकी पूजा की। उन सभीने महादेवसे सम्बद्ध पापोंका नाश करनेवाली पुण्यदायिनी कथा तथा सनातन मोक्षधर्मोंको विनयपूर्वक पूछा। सर्वज्ञ उन भगवान् (व्यास) ऋषिने भी देवाधिदेव (शिव)-का माहात्म्य तथा वेदमें निर्दिष्ट धर्मोंका वर्णन किया। उन मुनियोंके मध्य व्यासके शिष्य महामुनि जैमिनिने व्यासजीसे सनातन गूढ़ अर्थ पूछा॥ २—६॥ |
| प्राप्य वाराणसीं दिव्यामुपस्पृश्य महामुनिः।<br>पूजयामास जाह्नव्यां देवं विश्वेश्वरं शिवम्॥ २ ॥<br>तमागतं मुनिं दृष्ट्वा तत्र ये निवसन्ति वै।<br>पूजयाञ्चक्रिरे व्यासं मुनयो मुनिपुङ्गवम्॥ ३ ॥<br>पप्रच्छुः प्रणताः सर्वे कथाः पापविनाशिनीः।<br>महादेवाश्रयाः पुण्या मोक्षधर्मान् सनातनान्॥ ४ ॥<br>स चापि कथयामास सर्वज्ञो भगवानृषिः।<br>माहात्म्यं देवदेवस्य धर्मान् वेदनिदर्शितान्॥ ५ ॥<br>तेषां मध्ये मुनीन्द्राणां व्यासशिष्यो महामुनिः।<br>पृष्टवान् जैमिनिर्व्यासं गूढमर्थं सनातनम्॥ ६ ॥ | |
| जैमिनिरुवाच | **जैमिनिने कहा—**भगवन्! एक संशयको आप यथार्थरूपसे दूर करें, क्योंकि आप परम ऋषिको कुछ भी अविदित नहीं है। कुछ लोग ध्यानकी प्रशंसा करते हैं, कुछ दूसरे धर्मकी ही प्रशंसा करते हैं। अन्य लोग सांख्य तथा योगको, कुछ महर्षि तपको, कोई ब्रह्मचर्यको और दूसरे महर्षि मौन धारणको, कुछ अहिंसा एवं सत्यको तथा कुछ विद्वान् संन्यासको श्रेष्ठ बताते हैं। कुछ लोग दयाकी प्रशंसा करते हैं तो कुछ दान तथा अध्ययनकी। इसी प्रकार कुछ तीर्थयात्राको तथा दूसरे लोग इन्द्रियनिग्रहको महत्त्व देते हैं। मुनिश्रेष्ठ! इनमेंसे बतलायें कि कौन सर्वाधिक श्रेष्ठ है अथवा अन्य भी यदि कोई गुह्य साधन हो तो उसे आप बतलायें॥ ७—११॥ |
| भगवन् संशयं त्वेकं छेत्तुमर्हसि तत्त्वतः।<br>न विद्यते ह्यविदितं भवता परमर्षिणा॥ ७ ॥<br>केचिद् ध्यानं प्रशंसन्ति धर्ममेवापरे जनाः।<br>अन्ये सांख्यं तथा योगं तपस्त्वन्ये महर्षयः॥ ८ ॥<br>ब्रह्मचर्यमथो मौनमन्ये प्राहुर्महर्षयः।<br>अहिंसां सत्यमप्यन्ये संन्यासमपरे विदुः॥ ९ ॥<br>केचिद् दयां प्रशंसन्ति दानमध्ययनं तथा।<br>तीर्थयात्रां तथा केचिदन्ये चेन्द्रियनिग्रहम्॥ १०॥<br>किमेतेषां भवेज्ज्यायः प्रब्रूहि मुनिपुङ्गव।<br>यदि वा विद्यतेऽप्यन्यद् गुह्यं तद्वक्तुमर्हसि॥ ११॥ | |
| श्रुत्वा स जैमिनेर्वाक्यं कृष्णद्वैपायनो मुनिः।<br>प्राह गम्भीरया वाचा प्रणम्य वृषकेतनम्॥ १२॥ | जैमिनिकी बात सुनकर वे कृष्णद्वैपायन मुनि वृषभध्वज (शंकर)-को प्रणाम करते हुए गम्भीर वाणीमें बोले—॥ १२॥ |
| भगवानुवाच | **भगवान् (व्यास)-ने कहा—**महाभाग्यशाली मुने! आप धन्य हैं, धन्य हैं। आपने जो पूछा है, मैं उस गुह्यतमसे भी गुह्य (तत्त्व)-को कहता हूँ, अन्य सभी महर्षि भी सुनें—॥ १३॥ |
| साधु साधु महाभाग यत्पृष्टं भवता मुने।<br>वक्ष्ये गुह्यतमाद् गुह्यं शृण्वन्त्वन्ये महर्षयः॥ १३॥ |