संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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- अध्याय २८ * | १८३ ---|---
| धन्योऽस्यनुगृहीतोऽसि त्वादृशोऽन्यो न विद्यते।<br>त्रैलोक्ये शंकरे नूनं भक्तः परपुरञ्जय॥ ५७॥<br><br>दृष्टवानसि तं देवं विश्वाक्षं विश्वतोमुखम्।<br>प्रत्यक्षमेव सर्वेशं रुद्रं सर्वजगद्गुरुम्॥ ५८॥<br><br>ज्ञानं तदैश्वरं दिव्यं यथावद् विदितं त्वया।<br>स्वयमेव हृषीकेशः प्रीत्योवाच सनातनः॥ ५९॥<br><br>गच्छ गच्छ स्वकं स्थानं न शोकं कर्तुमर्हसि।<br>व्रजस्व परया भक्त्या शरण्यं शरणं शिवम्॥ ६०॥<br><br>एवमुक्त्वा स भगवाननुगृह्यार्जुनं प्रभुः।<br>जगाम शंकरपुरीं समाराधयितुं भवम्॥ ६१॥<br><br>पाण्डवेयोऽपि तद्वाक्यात् सम्प्राप्य शरणं शिवम्।<br>संत्यज्य सर्वकर्माणि तद्भक्तिपरमोऽभवत्॥ ६२॥<br><br>नार्जुनेन समः शम्भोर्भक्त्या भूतो भविष्यति।<br>मुक्त्वा सत्यवतीसूनुं कृष्णं वा देवकीसूतम्॥ ६३॥<br><br>तस्मै भगवते नित्यं नमः सत्याय धीमते।<br>पाराशर्याय मुनये व्यासायामिततेजसे॥ ६४॥<br><br>कृष्णद्वैपायनः साक्षाद् विष्णुरेव सनातनः।<br>को ह्यन्यस्तत्त्वतो रुद्रं वेत्ति तं परमेश्वरम्॥ ६५॥<br><br>नमः कुरुध्वं तमृषिं कृष्णं सत्यवतीसुतम्।<br>पाराशर्यं महात्मानं योगिनं विष्णुमव्ययम्॥ ६६॥<br><br>एवमुक्तास्तु मुनयः सर्व एव समाहिताः।<br>प्रणेमुस्तं महात्मानं व्यासं सत्यवतीसुतम्॥ ६७॥ | शत्रुके नगरको जीतनेवाले (अर्जुन!) निश्चय ही तीनों लोकोंमें तुम्हारे समान शंकरका भक्त कोई दूसरा नहीं है, तुम धन्य हो, अनुगृहीत (भगवान् शंकरके अनुग्रहके भाजन) हो। तुमने सभी ओर नेत्र तथा सभी ओर मुखवाले, सारे संसारके गुरु, सर्वेश, रुद्रदेवका प्रत्यक्ष ही दर्शन किया है। ईश्वर (शंकर)-सम्बन्धी दिव्य ज्ञान तुम्हें यथार्थरूपसे विदित है। स्वयं सनातन हृषीकेशने प्रीतिपूर्वक तुम्हें सब बतलाया था। शीघ्र अपने स्थानको जाओ, तुम शोक करने योग्य नहीं हो। शरणागतवत्सल शिवकी परा भक्तिकी शरण ग्रहण करो॥ ५७–६०॥<br><br>ऐसा कहकर वे भगवान् प्रभु (व्यास) अर्जुनपर कृपा करके शंकरकी आराधना करनेके लिये शंकरकी पुरीको गये। पाण्डुपुत्र अर्जुन भी उनके कहनेसे शिवकी शरणमें पहुँचे और सभी कर्मोंका परित्यागकर उनकी भक्तिमें ही दत्तचित्त हो गये॥ ६१–६२॥<br><br>सत्यवतीके पुत्र व्यास या देवकीके पुत्र कृष्णको छोड़कर अन्य कोई भी अर्जुनके समान शंकरकी भक्ति करनेवाला न तो हुआ और न होगा। उन सत्यस्वरूप, धीमान् पराशरके पुत्र अमित तेजस्वी भगवान् व्यासमुनिको नित्य नमस्कार है। कृष्णद्वैपायन (व्यास) साक्षात् सनातन विष्णु ही हैं, इनके अतिरिक्त उन परमेश्वर रुद्रको यथार्थरूपसे अन्य कौन जानता है। इन सत्यवतीनन्दन, पराशरपुत्र, महात्मा योगी, अव्यय विष्णुस्वरूप कृष्णद्वैपायन (व्यास) ऋषिको आपलोग नमस्कार करें। इस प्रकारसे कहे जानेपर सभी मुनियोंने एकाग्रचित्त होकर सत्यवतीके पुत्र उन महात्मा व्यासको नमस्कार किया॥ ६३–६७॥ |
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे अष्टाविंशोऽध्यायः॥ २८॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें अट्ठाईसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ २८॥