भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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१९८* कूर्मपुराण *
को भवान् कुत आयातः सह शिष्यैर्महामुने ।<br>प्रोचुः पैलादयः शिष्यास्तानृषीन् ब्रह्मभावितान् ॥ १० ॥<br>अयं सत्यवतीसूनुः कृष्णद्वैपायनो मुनिः ।<br>व्यासः स्वयं हृषीकेशो येन वेदाः पृथक् कृताः ॥ ११ ॥<br>यस्य देवो महादेवः साक्षादेव पिनाकधृक् ।<br>अंशांशेनाभवत् पुत्रो नाम्ना शुक इति प्रभुः ॥ १२ ॥<br>यः स साक्षान्महादेवं सर्वभावेन शंकरम् ।<br>प्रपन्नः परया भक्त्या यस्य तज्ज्ञानमैश्वरम् ॥ १३ ॥<br>ततः पाशुपताः सर्वे हृष्टसर्वतनूरुहाः ।<br>नेमुरव्यग्रमनसः प्रोचुः सत्यवतीसुतम् ॥ १४ ॥<br>भगवन् भवता ज्ञातं विज्ञानं परमेष्ठिनः ।<br>प्रसादाद् देवदेवस्य यत् तन्माहेश्वरं परम् ॥ १५ ॥<br>तद्वदास्माकमव्यक्तं रहस्यं गुह्यमुत्तमम् ।<br>क्षिप्रं पश्येम तं देवं श्रुत्वा भगवतो मुखात् ॥ १६ ॥<br>विसर्जयित्वा ताञ्छिष्यान् सुमन्तुप्रमुखांस्ततः ।<br>प्रोवाच तत्परं ज्ञानं योगिभ्यो योगवित्तमः ॥ १७ ॥महामुने ! आप कौन हैं ? शिष्योंके साथ कहाँसे आये हैं। तब पैल आदि व्यास-शिष्योंने उन ब्रह्मभावको प्राप्त ऋषियोंसे कहा—ये सत्यवतीके पुत्र कृष्णद्वैपायन व्यास मुनि हैं। ये स्वयं हृषीकेश हैं, जिन्होंने वेदोंका विभाजन किया। पिनाकको धारण करनेवाले साक्षात् प्रभु महादेव ही अपने अंशांशसे इनके शुक नामक पुत्र हुए। वे सभी भावोंसे, परम भक्तिके द्वारा साक्षात् महादेव शंकरके शरणागत हुए हैं और जिन्हें ईश्वर-सम्बन्धी परम ज्ञान उपलब्ध है ॥ १०—१३ ॥<br><br>तब वे सभी पशुपतिके भक्त प्रसन्न हो गये, उन्हें रोमाञ्च हो आया। एकाग्रमनसे उन्होंने सत्यवतीके पुत्र व्यासको प्रणाम किया और कहा—भगवन् ! देवदेवकी कृपासे जो परमेष्ठीका श्रेष्ठ माहेश्वर विज्ञान है, वह आपको ज्ञात है। अतः आप हमें वह श्रेष्ठ अव्यक्त, गोपनीय रहस्य बतलायें, ताकि आपके मुखसे उसे सुनकर हम शीघ्र ही उन देवका दर्शन कर सकें ॥ १४—१६ ॥<br><br>तदनन्तर सुमन्तु आदि उन प्रमुख शिष्योंको विदाकर योगविदोंमें श्रेष्ठ व्यासने उन योगियोंको श्रेष्ठ ज्ञान बतलाया। विप्रो ! उसी क्षण एक निर्मल उत्तम ज्योति प्रकट हुई और क्षणभरमें ही वे पाशुपत भक्तगण उसीमें लीन हो गये और अन्तर्धान हो गये ॥ १७-१८ ॥
तत्क्षणादेव विमलं सम्भूतं ज्योतिरुत्तमम् ।<br>लीनास्तत्रैव ते विप्राः क्षणादन्तरधीयत ॥ १८ ॥<br>ततः शिष्यान् समाहूय भगवान् ब्रह्मवित्तमः ।<br>प्रोवाच मध्यमेशस्य माहात्म्यं पैलपूर्वकान् ॥ १९ ॥<br><br>अस्मिन् स्थाने स्वयं देवो देव्या सह महेश्वरः ।<br>रमते भगवान् नित्यं रुद्रैश्च परिवारितः ॥ २० ॥<br>अत्र पूर्वं हृषीकेशो विश्वात्मा देवकीसुतः ।<br>उवास वत्सरं कृष्णः सदा पाशुपतैर्वृतः ॥ २१ ॥<br>भस्मोद्धूलितसर्वाङ्गो रुद्राध्ययनतत्परः ।<br>आराधयन् हरिः शम्भुं कृत्वा पाशुपतं व्रतम् ॥ २२ ॥<br>तस्य ते बहवः शिष्या ब्रह्मचर्यपरायणाः ।<br>लब्ध्वा तद्वचनाज्ज्ञानं दृष्टवन्तो महेश्वरम् ॥ २३ ॥<br>तस्य देवो महादेवः प्रत्यक्षं नीललोहितः ।<br>ददौ कृष्णस्य भगवान् वरदो वरमुत्तमम् ॥ २४ ॥<br>येऽर्चयिष्यन्ति गोविन्दं मद्भक्ता विधिपूर्वकम् ।<br>तेषां तदैश्वरं ज्ञानमुत्पत्स्यति जगन्मय ॥ २५ ॥तदनन्तर पैल आदि प्रमुख शिष्योंको बुलाकर श्रेष्ठ ब्रह्मज्ञानी भगवान् (व्यास)-ने मध्यमेशका माहात्म्य उन्हें बतलाया। स्वयं भगवान् महेश्वर देव देवीके साथ तथा रुद्रगणोंसे घिरे नित्य इस स्थानपर रमण करते हैं ॥ १९-२० ॥<br><br>यहींपर पूर्वकालमें देवकीके पुत्र विश्वात्मा हृषीकेश कृष्ण हरि पाशुपतोंसे आवृत रहते हुए, समस्त शरीरमें भस्म धारणकर रुद्र-तत्त्वके अनुसंधानमें तत्पर हुए थे तथा पाशुपत व्रत धारणकर शम्भुकी आराधना करते हुए एक वर्षतक निवास किये थे। उनके (व्यासके) ब्रह्मचर्य-परायण बहुतसे विज्ञ शिष्योंने उनके वचनसे ज्ञान प्राप्तकर महेश्वरका दर्शन किया। वर प्रदान करनेवाले नीललोहित देव साक्षात् भगवान् 'महादेवने' उन कृष्णको उत्तम वर प्रदान किया। जगन्मय ! जो मेरे भक्त विधिपूर्वक आप गोविन्दकी अर्चना करेंगे, उन्हें ईश्वर-सम्बन्धी परम ज्ञान प्राप्त होगा ॥ २१—२५ ॥