भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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* अध्याय ३३ *१९९

नमस्योऽर्चयितव्यश्च ध्यातव्यो मत्परैर्जनैः।
भविष्यसि न संदेहो मत्प्रसादाद् द्विजातिभिः॥ २६॥
येऽत्र द्रक्ष्यन्ति देवेशं स्नात्वा रुद्रं पिनाकिनम्।
ब्रह्महत्यादिकं पापं तेषामाशु विनश्यति॥ २७॥
प्राणांस्त्यजन्ति ये मर्त्याः पापकर्मरता अपि।
ते यान्ति तत् परं स्थानं नात्र कार्या विचारणा॥ २८॥
धन्यास्तु खलु ते विप्रा मन्दाकिन्यां कृतोदकाः।
अर्चयन्ति महादेवं मध्यमेश्वरमीश्वरम्॥ २९॥
स्नानं दानं तपः श्राद्धं पिण्डनिर्वपणं त्विह।
एकैकशः कृतं विप्राः पुनात्यासप्तमं कुलम्॥ ३०॥
संनिहत्यामुपस्पृश्य राहुग्रस्ते दिवाकरे।
यत् फलं लभते मर्त्यस्तस्माद् दशगुणं त्विह॥ ३१॥
एवमुक्त्वा महायोगी मध्यमेशान्तिके प्रभुः।
उवास सुचिरं कालं पूजयन् वै महेश्वरम्॥ ३२॥ | निस्संदेह मेरी कृपासे आप मेरे भक्त द्विजातियोंके प्रणम्य, आराध्य और ध्येय होंगे। जो यहाँ स्नानकर पिनाकी रुद्र देवेश्वरका दर्शन करेंगे, उनके ब्रह्महत्या आदि सभी पाप शीघ्र ही नष्ट हो जायँगे। जो पापकर्मपरायण भी मनुष्य यहाँ प्राणोंका त्याग करेंगे, वे परम स्थानको प्राप्त करेंगे, इसमें कोई विचार नहीं करना चाहिये॥ २६–२८॥ <br><br>विप्रो! वे निश्चय ही धन्य हैं जो मन्दाकिनीमें स्नानकर ईश्वर महादेव मध्यमेश्वरकी पूजा करते हैं। ब्राह्मणो! यहाँपर एक बार भी किया गया स्नान, दान, तप, श्राद्ध तथा पिण्डदान सात पीढ़ियोंतक कुलको पवित्र कर देता है॥ २९–३०॥ <br><br>सूर्यके राहुसे ग्रस्त किये जानेपर अर्थात् ग्रहणकालमें संनिहती (कुरुक्षेत्र तीर्थ)-में स्नान करनेसे जो फल मनुष्यको प्राप्त होता है, उससे दस गुना अधिक फल यहाँ मन्दाकिनीमें स्नानसे प्राप्त होता है। ऐसा कहकर महायोगी प्रभु (व्यास)-ने महेश्वरकी पूजा करते हुए मध्यमेश्वरके समीपमें ही बहुत समयतक निवास किया॥ ३१–३२॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षट्साहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे द्वात्रिंशोऽध्यायः॥ ३२॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें बत्तीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ३२॥


तैंतीसवाँ अध्याय

वाराणसी-माहात्म्यके प्रसंगमें व्यासजीका शिष्योंके साथ विभिन्न तीर्थोंमें गमन, ब्रह्मतीर्थका आख्यान, व्यासजीद्वारा विश्वेश्वर लिङ्गका पूजन तथा वहाँ रहते हुए शिवाराधना, एक दिन भिक्षा न मिलनेपर क्रोधाविष्ट व्यासजीका वाराणसीके निवासियोंको शाप देनेके लिये उद्यत होना, उसी समय देवी पार्वतीका प्रकट होना, देवीका व्यासको वाराणसी त्यागनेकी आज्ञा, पुनः स्तुतिसे प्रसन्न देवीके द्वारा चतुर्दशी तथा अष्टमीको वहाँ (वाराणसीमें) रहनेकी अनुमति देना

सूत उवाच
ततः सर्वाणि गुह्यानि तीर्थान्यायतननि च।
जगाम भगवान् व्यासो जैमिनिप्रमुखैर्वृतः॥ १॥
प्रयागं परमं तीर्थं प्रयागादधिकं शुभम्।
विश्वरूपं तथा तीर्थं तालतीर्थमनुत्तमम्॥ २॥
आकाशाख्यं महातीर्थं तीर्थं चैवार्षभं परम्।

स्वर्णीलं च महातीर्थं गौरीतीर्थमनुत्तमम्॥ ३॥**सूतजी बोले—**तदनन्तर जैमिनि आदि प्रमुख शिष्योंसे आवृत भगवान् व्यास सभी गुह्य तीर्थों और देवमन्दिरोंमें गये। द्विजश्रेष्ठो! वे परम तीर्थ प्रयाग, प्रयागसे भी अधिक शुभ तीर्थ विश्वरूप, श्रेष्ठ तालतीर्थ, आकाश नामक महातीर्थ, श्रेष्ठ आर्षभ तीर्थ, स्वर्णील नामक महातीर्थ, श्रेष्ठ गौरीतीर्थ,