संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२०० * कूर्मपुराण *
| प्राजापत्यं तथा तीर्थं स्वर्गद्वारं तथैव च।<br>जम्बुकेश्वरमित्युक्तं धर्माख्यं तीर्थमुत्तमम्॥ ४ ॥<br>गयातीर्थं महातीर्थं तीर्थं चैव महानदी।<br>नारायणं परं तीर्थं वायुतीर्थमनुत्तमम्॥ ५ ॥<br>ज्ञानतीर्थं परं गुह्यं वाराहं तीर्थमुत्तमम्।<br>यमतीर्थं महापुण्यं तीर्थं संवर्तकं शुभम्॥ ६ ॥<br>अग्नितीर्थं द्विजश्रेष्ठाः कलशेश्वरमुत्तमम्।<br>नागतीर्थं सोमतीर्थं सूर्यतीर्थं तथैव च॥ ७ ॥<br>पर्वताख्यं महागुह्यं मणिकर्णमनुत्तमम्।<br>घटोत्कचं तीर्थवरं श्रीतीर्थं च पितामहम्॥ ८ ॥<br>गङ्गातीर्थं तु देवेशं ययातेस्तीर्थमुत्तमम्।<br>कापिलं चैव सोमेशं ब्रह्मतीर्थमनुत्तमम्॥ ९ ॥<br>अत्र लिङ्गं पुरानीय ब्रह्मा स्नातुं यदा गतः।<br>तदानीं स्थापयामास विष्णुस्तल्लिङ्गमेश्वरम्॥ १०॥<br>ततः स्नात्वा समागत्य ब्रह्मा प्रोवाच तं हरिम्।<br>मयानीतंमिदं लिङ्गं कस्मात् स्थापितवानसि॥ ११॥ | प्राजापत्य तीर्थ, स्वर्गद्वार, जम्बुकेश्वर, धर्म (धर्मारण्य) नामवाले उत्तम तीर्थ, गया तीर्थ, महातीर्थ, महानदीतीर्थ, परम नारायण तीर्थ, श्रेष्ठ वायु तीर्थ, परम गुह्य ज्ञानतीर्थ, श्रेष्ठ वाराह तीर्थ, महान् पवित्र यमतीर्थ, शुभ संवर्तक तीर्थ, अग्नितीर्थ, उत्तम कलशेश्वर, नागतीर्थ, सोमतीर्थ, सूर्यतीर्थ, महागुह्य पर्वत नामक तीर्थ, अनुत्तम मणिकर्ण, तीर्थश्रेष्ठ घटोत्कच तीर्थ, श्रीतीर्थ, पितामह तीर्थ, गङ्गातीर्थ, देवेश तीर्थ, उत्तम ययातितीर्थ, कपिल तीर्थ, सोमेश तीर्थ तथा अनुत्तम ब्रह्मतीर्थमें गये॥१-९॥<br>प्राचीन कालमें जब ब्रह्मा यहाँ (ब्रह्मतीर्थमें) लिङ्ग लाकर स्नान करने चले गये, तब विष्णुने उस ईश्वरके लिङ्गको यहाँ स्थापित कर दिया। जब स्नान करके ब्रह्मा आये तो उन्होंने विष्णुसे पूछा—मेरे द्वारा लाये गये इस लिङ्गको आपने क्यों स्थापित कर दिया। इसपर विष्णुने उनसे कहा—मेरी रुद्रमें आपसे भी अधिक दृढ़ भक्ति है, इसलिये मैंने लिङ्गको यहाँ प्रतिष्ठित कर दिया, यह आपके नामसे ही प्रसिद्ध होगा॥ १०-१२॥ | | तमाह विष्णुस्त्वत्तोऽपि रुद्रे भक्तिर्दृढा मम।<br>तस्मात् प्रतिष्ठितं लिङ्गं नाम्ना तव भविष्यति॥ १२॥<br>भूतेश्वरं तथा तीर्थं तीर्थं धर्मसमुद्भवम्।<br>गन्धर्वतीर्थं परमं वाह्येयं तीर्थमुत्तमम्॥ १३॥<br>दौर्वासिकं व्योमतीर्थं चन्द्रतीर्थं द्विजोत्तमाः।<br>चित्राङ्गदेश्वरं पुण्यं पुण्यं विद्याधरेश्वरम्॥ १४॥<br>केदारतीर्थमुग्राख्यं कालञ्जरमनुत्तमम्।<br>सारस्वतं प्रभासं च भद्रकर्णं हृदं शुभम्॥ १५॥<br>लौकिकाख्यं महीतीर्थं तीर्थं चैव महालयम्।<br>हिरण्यगर्भं गोप्रेक्ष्यं तीर्थं चैव वृषध्वजम्॥ १६॥<br>उपशान्तं शिवं चैव व्याघ्रेश्वरमनुत्तमम्।<br>त्रिलोचनं महातीर्थं लोलार्कं चोत्तराह्वयम्॥ १७॥<br>कपालमोचनं तीर्थं ब्रह्महत्याविनाशकम्।<br>शुक्रेश्वरं महापुण्यमानन्दपुरमुत्तमम्॥ १८॥<br>एवमादीनि तीर्थानि प्राधान्यात् कथितानि तु।<br>न शक्यं विस्तराद् वक्तुं तीर्थसंख्या द्विजोत्तमाः॥ १९॥<br>तेषु सर्वेषु तीर्थेषु स्नात्वाभ्यर्च्य पिनाकिनम्।<br>उपोष्य तत्र तत्रासौ पाराशर्यो महामुनिः॥ २०॥ | द्विजोत्तमो! (व्यासजी पुनः आगे कहे जानेवाले तीर्थोंमें गये) भूतेश्वर तीर्थ, धर्मसमुद्भव तीर्थ, परम गन्धर्वतीर्थ, उत्तम वाह्येयतीर्थ, दौर्वासिक तीर्थ, व्योमतीर्थ, चन्द्रतीर्थ, पवित्र चित्राङ्गदेश्वरतीर्थ, पवित्र विद्याधरेश्वर तीर्थ, केदारतीर्थ, उग्र नामक तीर्थ, अनुत्तम कालञ्जर तीर्थ, सारस्वत तीर्थ, प्रभासतीर्थ, भद्रकर्णह्रद नामक शुभ तीर्थ, लौकिक नामक महातीर्थ, महालयतीर्थ, हिरण्यगर्भ तीर्थ, गोप्रेक्ष्य तीर्थ, वृषध्वजतीर्थ, उपशान्त तीर्थ, शिवतीर्थ, अनुत्तम व्याघ्रेश्वरतीर्थ, त्रिलोचनतीर्थ, महातीर्थ, लोलार्क तीर्थ, उत्तर नामक तीर्थ, ब्रह्महत्या-विनाशक कपालमोचन तीर्थ, महापवित्र शुक्रेश्वर तीर्थ और उत्तम आनन्दपुर तीर्थ आदि मुख्य-मुख्य तीर्थोंका वर्णन किया गया है, तीर्थोंकी संख्याका विस्तार नहीं बताया जा सकता। पराशरके पुत्र महामुनि (व्यास) इन सभी तीर्थोंमें स्नानकर पिनाकी (भगवान् शंकर)-की पूजाकर, वहाँ-वहाँ उपवासकर |