संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished506 पृष्ठ
पृष्ठ 211, कुल 506 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 211
| * अध्याय ३३ * | २०१ |
|---|---|
| तर्पयित्वा पितॄन् देवान् कृत्वा पिण्डप्रदानकम्।<br>जगाम पुनरेवापि यत्र विश्वेश्वरः शिवः॥ २१॥ | देवताओं तथा पितरोंका तर्पणकर और उन्हें पिण्ड-दान कर पुनः वहीं गये, जहाँ विश्वेश्वर शिव स्थित हैं॥ १३—२१॥ |
| स्नात्वाभ्यर्च्य परं लिङ्गं शिष्यैः सह महामुनिः।<br>उवाच शिष्यान् धर्मात्मा स्वान् देशान् गन्तुमर्हथ॥ २२॥ | शिष्योंके साथ धर्मात्मा महामुनिने स्नानकर उस परम (विश्वेश्वर) लिङ्गकी पूजा की और शिष्योंसे कहा—अब आप अपने-अपने स्थानोंको जा सकते हैं। |
| ते प्रणम्य महात्मानं जग्मुः पैलादयो द्विजाः।<br>वासं च तत्र नियतो वाराणस्यां चकार सः॥ २३॥ | द्विजो! महात्मा (व्यास)-को प्रणाम कर वे पैल आदि (शिष्य) चले गये और उन व्यासजीने नियमित-रूपसे वाराणसीमें वास किया। वे शान्त, जितेन्द्रिय, विशुद्धात्मा एवं ब्रह्मचर्य-परायण होकर तीनों संध्याओंमें स्नान करते थे तथा भिक्षाद्वारा प्राप्त आहार करते हुए पिनाकीकी आराधनामें लगे रहते थे॥ २२—२४॥ |
| शान्तो दान्तस्त्रिषवणं स्नात्वाभ्यर्च्य पिनाकिनम्।<br>भैक्षाहारो विशुद्धात्मा ब्रह्मचर्यपरायणः॥ २४॥ | |
| कदाचिद् वसता तत्र व्यासेनामिततेजसा।<br>भ्रममाणेण भिक्षा तु नैव लब्धा द्विजोत्तमाः॥ २५॥ | द्विजोत्तमो! वहाँ रहते हुए एक दिन अमित तेजस्वी व्यासजीको भ्रमण करते रहनेपर भी भिक्षा नहीं प्राप्त हुई। तब उनका शरीर क्रोधाविष्ट हो गया, (उन्होंने विचार किया कि) यहाँ रहनेवाले मनुष्योंके लिये ऐसे विघ्नकी सृष्टि करूँ, जिससे उनकी सिद्धि नष्ट हो जाय, पर तत्क्षण ही शंकरकी अर्धाङ्गिनी साक्षात् महादेवी (पार्वती) मानुष-वेष धारणकर प्रसन्न-मुद्रामें प्रकट हो गयीं। (और बोलीं—)॥ २५—२७॥ |
| ततः क्रोधावृततनुर्नराणामिह वासिनाम्।<br>विघ्नं सृजामि सर्वेषां येन सिद्धिर्विहीयते॥ २६॥ | |
| तत्क्षणे सा महादेवी शंकरार्धशरीरिणी।<br>प्रादुरासीत् स्वयं प्रीत्या वेषं कृत्वा तु मानुषम्॥ २७॥ | |
| भो भो व्यास महाबुद्धे शप्तव्या भवता न हि।<br>गृहाण भिक्षां मत्तस्त्वमुक्तवैवं प्रददौ शिवा॥ २८॥ | हे महाबुद्धिमान् व्यास! आप शाप न दें। आप मुझसे भिक्षा ग्रहण करें। ऐसा कहकर पार्वतींने (उन्हें) भिक्षा दीं॥ २८॥ |
| उवाच च महादेवी क्रोधनस्त्वं भवान् यतः।<br>इह क्षेत्रे न वस्तव्यं कृतघ्नोऽसि त्वया सदा॥ २९॥ | महादेवीने कहा—मुने! आप क्रोधी तथा कृतघ्न हैं, अतः आपको सदा इस क्षेत्रमें नहीं रहना चाहिये। ऐसा कहे जानेपर व्यासजीने ध्यानद्वारा 'ये श्रेष्ठ पार्वती हैं'—ऐसा समझकर प्रणाम किया और श्रेष्ठ स्तुतियोंसे स्तुति कर उनसे कहा—हे शंकरवल्लभे! चतुर्दशी तथा अष्टमीको यहाँ (वाराणसीमें) प्रवेश करने दें। 'ऐसा ही हो' ऐसी आज्ञा देकर देवी अन्तर्धान हो गयीं॥ २९—३१॥ |
| एवमुक्तः स भगवान् ध्यानाज्ज्ञात्वा परां शिवाम्।<br>उवाच प्रणतो भूत्वा स्तुत्वा च प्रवरैः स्तवैः॥ ३०॥ | |
| चतुर्दश्यामथाष्टम्यां प्रवेशं देहि शांकरि।<br>एवमस्त्वित्यनुज्ञाय देवी चान्तरधीयत॥ ३१॥ | |
| एवं स भगवान् व्यासो महायोगी पुरातनः।<br>ज्ञात्वा क्षेत्रगुणान् सर्वान् स्थितस्तस्याथ पार्श्वतः॥ ३२॥ | इस प्रकार महायोगी भगवान् व्यासजी क्षेत्र (वाराणसी)-के सभी गुणों (विशेषताओं)-को समझते हुए उस (वाराणसी)-के पार्श्वभागमें रहने लगे। इस प्रकार व्यासजीको स्थित हुआ जानकर विद्वान् लोग (उस) क्षेत्रका सेवन करते हैं। अतः मनुष्यको सभी प्रयत्नकर वाराणसीमें निवास करना चाहिये॥ ३२-३३॥ |
| एवं व्यासं स्थितं ज्ञात्वा क्षेत्रं सेवन्ति पण्डिताः।<br>तस्मात् सर्वप्रयत्नेन वाराणस्यां वसेन्नरः॥ ३३॥ |