भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२०२ | * कूर्मपुराण *


सूत उवाचसूतजी बोले— जो अविमुक्त (क्षेत्र वाराणसी)-का माहात्म्य पढ़ता है, सुनता है अथवा शान्त द्विजोंको सुनाता है, वह भी परम गतिको प्राप्त करता है। द्विजो! जो स्नान करनेके अनन्तर श्राद्धमें, देवकार्यमें, रात अथवा दिनमें, नदियोंके किनारोंपर अथवा देवमन्दिरोंमें मनको एकाग्र कर दम्भ तथा मात्सर्यसे रहित होकर नमस्कारपूर्वक ईश (शिव)-का जप करता है, उसे परमगति प्राप्त होती है॥ ३४—३६॥
यः पठेविमुक्तस्य माहात्म्यं शृणुयादपि।<br>श्रावयेद् वा द्विजान् शान्तान् सोऽपि याति परां गतिम्॥ ३४॥
श्राद्धे वा दैविके कार्ये रात्रावहनि वा द्विजाः।<br>नदीनां चैव तीरेषु देवतायतनेषु च॥ ३५॥
स्नात्वा समाहितमना दम्भमात्सर्यवर्जितः।<br>जपेदीशं नमस्कृत्य स याति परमां गतिम्॥ ३६॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षट्साहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः॥ ३३॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें तैंतीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ३३॥


चौंतीसवाँ अध्याय

प्रयागका माहात्म्य, मार्कण्डेय-युधिष्ठिर-संवाद, प्रयागमें संगम-स्नानका फल

ऋषय ऊचुःऋषियोंने कहा— सुव्रत! अविमुक्त (क्षेत्र वाराणसी)-के माहात्म्यका आपने भलीभाँति वर्णन किया। अब इस समय प्रयागका माहात्म्य बतलायें। सूतजी! आप समस्त अर्थोंको जाननेवाले हैं, अब आप वहाँ (प्रयाग)-के जो महान् प्रसिद्ध तीर्थ हैं, उन्हें हमें बताइये॥ १-२॥
माहात्म्यमविमुक्तस्य यथावत् तदुदीरितम्।<br>इदानीं तु प्रयागस्य माहात्म्यं ब्रूहि सुव्रत॥ १॥
यानि तीर्थानि तत्रैव विश्रुतानि महान्ति वै।<br>इदानीं कथयास्माकं सूत सर्वार्थविद् भवान्॥ २॥
सूत उवाचसूतजी बोले— ऋषियो! आप सभी सुनें। मैं विस्तारसे आप लोगोंको प्रयागका माहात्म्य बतलाता हूँ, जहाँ पितामह देव स्थित हैं। (महर्षि) मार्कण्डेयने कुन्तीके पुत्र महात्मा युधिष्ठिरसे जो कुछ कहा था, वही मैं आपलोगोंको बताता हूँ॥ ३-४॥
शृणुध्वमृषयः सर्वे विस्तरेण ब्रवीमि वः।<br>प्रयागस्य च माहात्म्यं यत्र देवः पितामहः॥ ३॥
मार्कण्डेयेन कथितं कौन्तेयाय महात्मने।<br>यथा युधिष्ठिरायैतत् तद्वक्ष्ये भवतामहम्॥ ४॥
निहत्य कौरवान् सर्वान् भ्रातृभिः सह पार्थिवः।<br>शोकेन महताविष्टो मुमोह स युधिष्ठिरः॥ ५॥भाइयोंके साथ सभी कौरवोंको मारनेके उपरान्त राजा युधिष्ठिर महान् शोकसे आविष्ट होकर मोहसे ग्रस्त हो गये। तदनन्तर थोड़े ही समय बाद महान् तपस्वी मार्कण्डेय मुनि हस्तिनापुरमें आये और राजमहलके द्वारपर खड़े हो गये॥ ५-६॥
अचिरेणाथ कालेन मार्कण्डेयो महातपाः।<br>सम्प्राप्तो हास्तिनपुरं राजद्वारे स तिष्ठति॥ ६॥
द्वारपालोऽपि तं दृष्ट्वा राज्ञः कथितवान् द्रुतम्।<br>मार्कण्डेयो द्रष्टुमिच्छंस्त्वामास्ते द्वार्यसौ मुनिः॥ ७॥उन्हें देखकर द्वारपालने भी शीघ्र जाकर राजा (युधिष्ठिर)-से कहा—आपके दर्शनकी इच्छासे मुनि मार्कण्डेय द्वारपर खड़े हैं। धर्मपुत्र युधिष्ठिर शीघ्र ही तत्परतापूर्वक द्वारपर गये और कहने लगे—महाप्राज्ञ! महामुने! आपका स्वागत है, स्वागत है। आज मेरा जन्म सफल हो गया, आज मेरा कुल तर गया। महामुने! आपके प्रसन्न होनेपर आज मेरे पितृगण संतुष्ट हो गये॥ ७-९॥
त्वरितो धर्मपुत्रस्तु द्वारमेत्याह तत्परम्।<br>स्वागतं ते महाप्राज्ञ स्वागतं ते महामुने॥ ८॥
अद्य मे सफलं जन्म अद्य मे तारितं कुलम्।<br>अद्य मे पितरस्तुष्टास्त्वयि तुष्टे महामुने॥ ९॥