संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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- अध्याय ३४ * | २०३ ---|---
| सिंहासनमुपस्थाप्य पादशौचार्चनादिभिः।<br>युधिष्ठिरो महात्मेति पूजयामास तं मुनिम्॥ १०॥ | महात्मा युधिष्ठिरने उन मुनिको सिंहासनपर बैठाकर पादप्रक्षालन, पूजन इत्यादिके द्वारा उनका सम्मान किया॥ १०॥ |
| मार्कण्डेयस्ततस्तुष्टः प्रोवाच स युधिष्ठिरम्।<br>किमर्थं मुह्यसे विद्वन् सर्वं ज्ञात्वाहमागतः॥ ११॥ | तब प्रसन्न होकर मार्कण्डेयने युधिष्ठिरसे कहा—विद्वन्! आप मोह क्यों कर रहे हैं? सभी कुछ जानकर ही मैं यहाँ आया हूँ। तदनन्तर राजा युधिष्ठिरने प्रणामकर महामुनिसे कहा—आप संक्षेपमें (कोई उपाय) बतलायें, जिससे मैं पापोंसे मुक्त हो सकूँ॥ ११-१२॥ |
| ततो युधिष्ठिरो राजा प्रणम्याह महामुनिम्।<br>कथय त्वं समासेन येन मुच्येत किल्बिषैः॥ १२॥ | |
| निहता बहवो युद्धे पुंसो निरपराधिनः।<br>अस्माभिः कौरवैः सार्धं प्रसङ्गान्मुनिपुंगव॥ १३॥ | हे मुनिश्रेष्ठ! हमने (युद्धके) प्रसंगवश कौरवोंके साथ अनेक निरपराध मनुष्योंको युद्धमें मारा है, अतः आप वह (कोई उपाय) बतलायें, जिससे हिंसाजनित दोष एवं जन्मान्तरमें किये गये पापों तथा इस पापसे भी मुक्ति मिले॥ १३-१४॥ |
| येन हिंसासमुद्भूताज्जन्मान्तरकृतादपि।<br>मुच्यते पातकादस्मात् तद् भवान् वक्तुमर्हति॥ १४॥ | |
| मार्कण्डेय उवाच<br>शृणु राजन् महाभाग यन्मां पृच्छसि भारत।<br>प्रयागगमनं श्रेष्ठं नराणां पापनाशनम्॥ १५॥ | मार्कण्डेयने कहा—हे राजन् ! भारत! महाभाग! आप जो मुझसे पूछते हैं उसे सुनें—मनुष्योंके लिये पापको नष्ट करने-हेतु प्रयागकी यात्रा करना श्रेष्ठ (उपाय) है। वहाँ सभी देवताओंके ईश्वर महादेव रुद्रदेव और स्वयम्भू भगवान् ब्रह्मा देवताओंके साथ विराजमान हैं॥ १५-१६॥ |
| तत्र देवो महादेवो रुद्रो विश्वामरेश्वरः।<br>समास्ते भगवान् ब्रह्मा स्वयम्भूरपि दैवतैः॥ १६॥ | |
| युधिष्ठिर उवाच<br>भगवञ्छ्रोतुमिच्छामि प्रयागगमने फलम्।<br>मृतानां का गतिस्तत्र स्नातानामपि किं फलम्॥ १७॥ | युधिष्ठिर बोले—भगवन्! मैं सुनना चाहता हूँ कि प्रयाग जानेका क्या फल है? वहाँ मरनेवालोंकी कौन गति होती है और वहाँ स्नान करनेवालोंको क्या फल मिलता है? जो प्रयागमें निवास करते हैं, उन्हें क्या फल मिलता है, आपको यह सब कुछ ज्ञात है, अतः मुझे वह सब बतायें, आपको नमस्कार है॥ १७-१८॥ |
| ये वसन्ति प्रयागे तु ब्रूहि तेषां तु किं फलम्।<br>भवता विदितं ह्येतत् तन्मे ब्रूहि नमोऽस्तु ते॥ १८॥ | |
| मार्कण्डेय उवाच<br>कथयिष्यामि ते वत्स या चेष्टा यच्च तत्फलम्।<br>पुरा महर्षिभिः सम्यक् कथ्यमानं मया श्रुतम्॥ १९॥ | मार्कण्डेयने कहा—वत्स! प्राचीन कालमें महर्षियोंद्वारा कही गयी (प्रयागकी महिमा) एवं प्रयाग-निवासका फल आदि जो कुछ मैंने सुना है, उसे मैं भलीभाँति आपको बतलाऊँगा। यह प्रजापति-क्षेत्र तीनों लोकोंमें विख्यात है। यहाँपर स्नान करनेवाले स्वर्गलोकमें जाते हैं और जो यहाँ मृत्युको प्राप्त होते हैं, उनका पुनर्जन्म नहीं होता। यहाँ ब्रह्मा आदि देवता मिलकर (प्रयाग-निवासियोंकी) रक्षा करते हैं और सभी पापोंको दूर करनेवाले अन्य भी अनेक तीर्थ यहाँ हैं। मैं सैकड़ों वर्षोंमें भी उनका वर्णन नहीं कर सकता तथापि संक्षेपमें ही प्रयाग (-की महिमा)-का कीर्तन करता हूँ॥ १९–२२॥ |
| एतत् प्रजापतिक्षेत्रं त्रिषु लोकेषु विश्रुतम्।<br>अत्र स्नात्वा दिवं यान्ति ये मृतास्तेऽपुनर्भवाः॥ २०॥ | |
| तत्र ब्रह्मादयो देवा रक्षां कुर्वन्ति संगताः।<br>बहून्यन्यानि तीर्थानि सर्वपापापहानि तु॥ २१॥ | |
| कथितुं नेह शक्नोमि बहुवर्षशतैरपि।<br>संक्षेपेण प्रवक्ष्यामि प्रयागस्येह कीर्तनम्॥ २२॥ |