भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२०४ * कूर्मपुराण *


षष्टिर्धनुःसहस्राणि यानि रक्षन्ति जाह्नवीम्।<br>यमुनां रक्षति सदा सविता सप्तवाहनः॥ २३॥<br><br>प्रयागे तु विशेषेण स्वयं वसति वासवः।<br>मण्डलं रक्षति हरिः सर्वदेवैश्च सम्मितम्॥ २४॥<br>न्यग्रोधं रक्षते नित्यं शूलपाणिर्महेश्वरः।<br>स्थानं रक्षन्ति वै देवाः सर्वपापहरं शुभम्॥ २५॥साठ हजार धनुष जाह्नवी (गङ्गा)-की रक्षा करते हैं और सात अश्वोंको वाहन बनानेवाले सवितादेव सदा यमुनाकी रक्षा करते हैं। प्रयागमें विशेषरूपसे इन्द्र स्वयं निवास करते हैं। समस्त देवोंसे युक्त विष्णु प्रयागमण्डलकी रक्षा करते हैं॥ २३-२४॥<br>(प्रयागके विशाल) वटवृक्षकी रक्षा हाथमें त्रिशूल धारण करनेवाले महेश्वर नित्य करते हैं और सभी पापोंको हरनेवाले इस शुभ स्थानकी रक्षा सभी देवता करते हैं। हे नराधिप! जो लोग अपने कर्मोंसे घिरे हैं तथा जिनका छोटेसे भी छोटा पाप बचा रहता है, वे लोग उस मोक्ष-पदको प्राप्त नहीं करते, किंतु प्रयागका स्मरण करनेवालेका यह सभी कुछ (पाप एवं कर्म) नष्ट हो जाता है॥ २५-२६॥
स्वकर्मणावृतो लोको नैव गच्छति तत्पदम्।<br>स्वल्पं स्वल्पतरं पापं यदा तस्य नराधिप।<br>प्रयागं स्मरमाणस्य सर्वमायाति संक्षयम्॥ २६॥<br>दर्शनात् तस्य तीर्थस्य नाम संकीर्तनादपि।<br>मृत्तिकालम्भनाद् वापि नरः पापात् प्रमुच्यते॥ २७॥<br><br>पञ्च कुण्डानि राजेन्द्र येषां मध्ये तु जाह्नवी।<br>प्रयागं विशतः पुंसः पापं नश्यति तत्क्षणात्॥ २८॥<br><br>योजनानां सहस्रेषु गङ्गां यः स्मरते नरः।<br>अपि दुष्कृतकर्मासौ लभते परमां गतिम्॥ २९॥इस (प्रयाग) तीर्थके दर्शन करनेसे, नामका संकीर्तन करनेसे अथवा यहाँकी मिट्टीका स्पर्श करनेसे भी मनुष्य पापसे मुक्त हो जाता है। राजेन्द्र! यहाँ (प्रयागमें) पाँच कुण्ड हैं, जिनके बीचमें जाह्नवी (गङ्गा) स्थित है। प्रयागमें प्रवेश करनेवालेका पाप तत्क्षण ही नष्ट हो जाता है। सहस्रों योजन दूरसे भी जो मनुष्य गङ्गाका स्मरण करता है, वह दुष्कृत करनेवाला होनेपर भी परम गतिको प्राप्त करता है॥ २७—२९॥
कीर्तनान्मुच्यते पापाद् दृष्ट्वा भद्राणि पश्यति।<br>तथोपस्पृश्य राजेन्द्र स्वर्गलोके महीयते॥ ३०॥हे राजेन्द्र! (प्रयागका नाम-) कीर्तन करनेसे (मनुष्य) पापसे मुक्त हो जाता है और इसका दर्शन करनेसे (उसे सर्वत्र) मङ्गल-ही-मङ्गल दिखलायी पड़ता है तथा यहाँ आचमन (इसके जलसे स्नान) करनेसे स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त होती है॥ ३०॥
व्याधितो यदि वा दीनः क्रुद्धो वापि भवेन्नरः।<br>गङ्गायमुनमासाद्य त्यजेत् प्राणान् प्रयत्नतः॥ ३१॥<br><br>दीप्तकाञ्चनवर्णाभैर्विमानैर्भानुवर्णिभिः ।<br>ईप्सिताँल्लभते कामान् वदन्ति मुनिपुंगवाः॥ ३२॥<br>सर्वरत्नमयैर्दिव्यैर्नानाध्वजसमाकुलैः ।<br>वराङ्गनासमाकीर्णैर्मोदते शुभलक्षणः॥ ३३॥<br><br>गीतवादित्रनिर्घोषैः प्रसुप्तः प्रतिबुध्यते।<br>यावन्न स्मरते जन्म तावत् स्वर्गे महीयते॥ ३४॥कोई मनुष्य व्याधिग्रस्त हो, दीन हो अथवा क्रुद्ध हो, यदि वह प्रयत्नपूर्वक गङ्गा-यमुनाके समीप पहुँचकर प्राण-त्याग करता है तो वह सूर्यके समान उद्दीप्त, स्वर्णिम आभावाले विमानोंसे युक्त होकर अभीष्ट पदार्थोंको प्राप्त करता है—ऐसा श्रेष्ठ मुनिजनोंका कहना है॥ ३१-३२॥<br>वह शुभ लक्षणोंवाला (मनुष्य) सभी रत्नोंसे युक्त अनेक प्रकारकी दिव्य ध्वजाओंसे परिपूर्ण और वराङ्गनाओंसे समन्वित होकर आनन्दित होता है। शयन करनेपर वह गीत और वाद्यकी ध्वनिसे जगाया जाता है, जबतक वह जन्मका स्मरण नहीं करता, तबतक स्वर्गमें प्रतिष्ठित रहता है॥ ३३-३४॥