भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished506 पृष्ठ

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पृष्ठ 215
* अध्याय ३४ *२०५
श्लोक (संस्कृत)अनुवाद (हिन्दी)
तस्मात् स्वर्गात् परिभ्रष्टः क्षीणकर्मा नरोत्तम।<br>हिरण्यरत्नसम्पूर्णे समृद्धे जायते कुले॥ ३५ ॥<br><br>तदेव स्मरते तीर्थं स्मरणात् तत्र गच्छति।<br>देशस्थो यदि वारण्ये विदेशे यदि वा गृहे॥ ३६ ॥<br><br>प्रयागं स्मरमाणस्तु यस्तु प्राणान् परित्यजेत्।<br>ब्रह्मलोकमवाप्नोति वदन्ति मुनिपुंगवाः॥ ३७ ॥<br><br>सर्वकामफला वृक्षा मही यत्र हिरण्मयी।<br>ऋषयो मुनयः सिद्धास्तत्र लोके स गच्छति॥ ३८ ॥नरोत्तम! (पुण्य) कर्मोंके क्षीण होनेपर स्वर्गसे च्युत होकर वह स्वर्ण तथा रत्नोंसे परिपूर्ण समृद्ध कुलमें जन्म लेता है और इसी तीर्थ (प्रयाग)-का स्मरण करता है। स्मरण होनेपर पुनः वहाँ जाता है। अपने देश, विदेश, अरण्य अथवा घरमें जो प्रयागका स्मरण करते हुए प्राणोंका परित्याग करता है, वह ब्रह्मलोक प्राप्त करता है, ऐसा श्रेष्ठ मुनि कहते हैं। वह उस लोकमें जाता है, जहाँकि सभी वृक्ष इच्छानुसार फल देते हैं, जहाँकी भूमि स्वर्णमयी है और जहाँ ऋषि, मुनि तथा सिद्धजन रहते हैं॥ ३५-३८॥
स्त्रीसहस्राकुले रम्ये मन्दाकिन्यास्तटे शुभे।<br>मोदते मुनिभिः सार्धं स्वकृतेनेह कर्मणा॥ ३९ ॥<br><br>सिद्धचारणगन्धर्वैः पूज्यते दिवि दैवतैः।<br>ततः स्वर्गात् परिभ्रष्टो जम्बूद्वीपपतिर्भवेत्॥ ४० ॥<br><br>ततः शुभानि कर्माणि चिन्तयानः पुनः पुनः।<br>गुणवान् वित्तसम्पन्नो भवतीह न संशयः।<br>कर्मणा मनसा वाचा सत्यधर्मप्रतिष्ठितः॥ ४१ ॥अपने किये कर्मोंके कारण वह सहस्रों स्त्रियोंसे रमणीय मन्दाकिनीके शुभ तटपर मुनियोंके साथ आनन्द प्राप्त करता है। वह स्वर्गमें सिद्ध, चारण, गन्धर्व तथा देवताओंसे पूजित होता है, तदनन्तर स्वर्गसे च्युत होनेपर वह (पुरुष) जम्बूद्वीपका स्वामी होता है। तदुपरान्त वह बार-बार शुभ कर्मोंका चिन्तन करता हुआ गुणवान् तथा धनसम्पन्न हो जाता है और मन, वाणी तथा कर्मसे सत्यधर्मपर प्रतिष्ठित रहता है, इसमें कोई संशय नहीं है॥ ३९-४१॥
गङ्गायमुनयोर्मध्ये यस्तु ग्रामं प्रतीच्छति।<br>सुवर्णमथ मुक्तां वा तथैवान्यान् प्रतिग्रहान्॥ ४२ ॥<br><br>स्वकार्यं पितृकार्यं वा देवताभ्यर्चनेऽपि वा।<br>निष्फलं तस्य तत् तीर्थं यावत् तत्फलमश्नुते॥ ४३ ॥<br><br>अतस्तीर्थे न गृह्णीयात् पुण्येष्वायतनेषु च।<br>निमित्तेषु च सर्वेषु अप्रमत्तो द्विजो भवेत्॥ ४४ ॥जो व्यक्ति स्वकार्य, पितृकार्य अथवा देवताकी पूजा करते समय गङ्गा और यमुनाके मध्यमें ग्राम, सुवर्ण, मोती या अन्य कोई पदार्थ प्रतिग्रह (दान)-में लेता है, उसे तीर्थका पुण्य उस समयतक नहीं मिलता है, जबतक वह दानमें लिये हुए पदार्थका भोग करता रहता है*। अतः तीर्थों तथा पवित्र मन्दिरोंमें दान नहीं लेना चाहिये। द्विजको सभी प्रकारके प्रयोजनोंमें सावधान रहना चाहिये॥ ४२-४४॥
कपिलां पाटलावर्णां यस्तु धेनुं प्रयच्छति।<br>स्वर्णशृङ्गीं रौप्यखुरां चैलकण्ठां पयस्विनीम्॥ ४५ ॥<br><br>यावद्रोमाणि तस्या वै सन्ति गात्रेषु सत्तम।<br>तावद्वर्षसहस्राणि रुद्रलोके महीयते॥ ४६ ॥श्रेष्ठ (युधिष्ठिर)! जो व्यक्ति (प्रयागमें) कपिल अथवा पाटलवर्णकी, सुवर्णमण्डित सींगवाली, रजतमण्डित खुरोंवाली, वस्त्रसे आच्छादित कण्ठवाली पयस्विनी गायका दान करता है, वह उतने हजार वर्षोंतक रुद्रलोकमें पूजित होता है, जितने उस गायके शरीरमें रोम होते हैं॥ ४५-४६॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे चतुस्त्रिंशोऽध्यायः॥ ३४॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें चौंतीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ३४॥


* इसका तात्पर्य यह है कि तीर्थमें निवास अन्तःकरणकी शुद्धिके लिये ही होता है, अतः लोभरहित होकर अनासक्त-भावसे तीर्थमें निवास करना चाहिये। इसीलिये तीर्थमें यदि कोई लोभवश या आसक्तिवश दान लेता है तो यह प्रतिग्रह लोभको बढ़ायेगा तथा अन्तःकरणकी शुद्धिमें बाधक होगा। अतः दाताके कल्याणमात्रके लिये भले ही दान लिया जाय, पर लोभवश दान नहीं लेना चाहिये। साथ ही जप-तप आदि प्रायश्चित्तद्वारा इसका निराकरण भी करना चाहिये।