भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२०६ * कूर्मपुराण *


पैंतीसवाँ अध्याय

प्रयाग-माहात्म्य, प्रयागके विभिन्न तीर्थोंकी महिमा, त्रिपथगा गङ्गाका माहात्म्य, गङ्गास्नानका फल

मार्कण्डेय उवाच<br>कथयिष्यामि ते वत्स तीर्थयात्राविधिक्रमम्।<br>आर्षेण तु विधानेन यथा दृष्टं यथा श्रुतम्॥ १ ॥<br>प्रयागतीर्थयात्रार्थी यः प्रयाति नरः क्वचित्।<br>बलीवर्दं समारूढः शृणु तस्यापि यत्फलम्॥ २ ॥<br><br>नरके वसते घोरे समाः कल्पशतायुतम्।<br>ततो निवर्तते घोरो गवां क्रोधो हि दारुणः।<br>सलिलं च न गृह्णन्ति पितरस्तस्य देहिनः॥ ३ ॥<br><br>यस्तु पुत्रांस्तथा बालान् स्नापयेत् पाययेत् तथा।<br>यथात्मना तथा सर्वान् दानं विप्रेषु दापयेत्॥ ४ ॥<br><br>ऐश्वर्याल्लोभमोहाद् वा गच्छेद् यानेन यो नरः।<br>निष्फलं तस्य तत् तीर्थं तस्माद् यानं विवर्जयेत्॥ ५ ॥<br>गङ्गायमुनयोर्मध्ये यस्तु कन्यां प्रयच्छति।<br>आर्षेण तु विवाहेन यथाविभवविस्तरम्॥ ६ ॥<br><br>न स पश्यति तं घोरं नरकं तेन कर्मणा।<br>उत्तरान् स कुरून् गत्वा मोदते कालमक्षयम्॥ ७ ॥<br>वटमूलं समाश्रित्य यस्तु प्राणान् परित्यजेत्।<br>सर्वलोकानतिक्रम्य रुद्रलोकं स गच्छति॥ ८ ॥<br>तत्र ब्रह्मादयो देवा दिशश्च सदिगीश्वराः।<br>लोकपालाश्च सिद्धाश्च पितरो लोकसम्मताः॥ ९ ॥<br>सनत्कुमारप्रमुखास्तथा ब्रह्मर्षयोऽपरे।<br>नागाः सुपर्णाः सिद्धाश्च तथा नित्यं समासते।<br>हरिश्च भगवानास्ते प्रजापतिपुरस्कृतः॥ १०॥<br><br>गङ्गायमुनयोर्मध्ये पृथिव्या जघनं स्मृतम्।<br>प्रयागं राजशार्दूल त्रिषु लोकेषु विश्रुतम्॥ ११॥मार्कण्डेयने कहा—वत्स! ऋषियोंके द्वारा प्रतिपादित विधानके अनुसार तीर्थयात्राकी विधिके क्रमको मैंने जैसे देखा और सुना, वह तुमसे कहता हूँ॥ १ ॥<br>प्रयागतीर्थकी यात्रा करनेवाला कोई मनुष्य यदि कहीं बैलपर आरूढ़ होकर गमन करता है तो उसका भी फल सुनो— वह व्यक्ति दस हजार कल्पोंतक घोर नरकमें वास करता है, क्योंकि गौका भयंकर दारुण क्रोध इसके बाद ही दूर होता है। बैलको सवारी बनानेवाले मनुष्यके पितर उसका (तर्पण आदिमें दिया) जल ग्रहण नहीं करते हैं। जो अपने सभी पुत्रों एवं बालकोंको अपने ही समान यहाँ (प्रयागमें) स्नान कराता है तथा उन्हें (गङ्गा-यमुनाका) जल पिलाता है और उनके हाथों ब्राह्मणोंको दान कराता है (उसे उत्तम गति प्राप्त होती है)। जो मनुष्य ऐश्वर्य, लोभ या मोहवश यानद्वारा (तीर्थमें) जाता है, उसकी वह तीर्थयात्रा निष्फल होती है, इसलिये (तीर्थयात्रामें) यानका परित्याग करना चाहिये॥ २–५॥<br>जो व्यक्ति गङ्गा-यमुनाके मध्य आर्ष विवाहपद्धतिसे अपने ऐश्वर्यके अनुकूल धनका व्ययकर कन्याका दान करता है, वह उस कर्मके कारण घोर नरकका दर्शन नहीं करता और उत्तर कुरुमें जाकर अनन्त कालतक आनन्दोपभोग करता है॥ ६-७॥<br>(प्रयागमें अक्षय) वटवृक्षके नीचे जाकर जो प्राणोंका परित्याग करता है, वह सभी लोकोंका अतिक्रमण कर रुद्रलोकको जाता है। वहाँ ब्रह्मा आदि देवता, दिक्पालोंसहित दिशाएँ, लोकपाल, सिद्ध, लोकमें मान्य पितर, सनत्कुमार आदि प्रमुख तथा दूसरे ब्रह्मर्षि, नाग, सुपर्ण एवं सिद्धगण तथा भगवान् हरि और प्रजापति प्रभृति नित्य निवास करते हैं॥ ८–१०॥<br>गङ्गा-यमुनाके मध्यको पृथिवीका जघन* कहा गया है। हे राजशार्दूल! प्रयाग तीनों लोकोंमें विख्यात है॥ ११॥

* नाभिके नीचेका स्त्रियोंका कोमल भाग जघन है।