संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished506 पृष्ठ
पृष्ठ 217, कुल 506 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 217
| * अध्याय ३५ * | २०७ |
|---|---|
| तत्राभिषेकं यः कुर्यात् संगमे संशितव्रतः।<br>तुल्यं फलमवाप्नोति राजसूयाश्वमेधयोः॥ १२॥ | वहाँ (गङ्गा-यमुनाके) संगमपर जो कठोर व्रत धारणकर अभिषेक—स्नान करता है, वह अश्वमेध तथा राजसूय-यज्ञोंके समान फल प्राप्त करता है॥ १२॥ |
| न मातृवचनात् तात न लोकवचनादपि।<br>मतिरुत्क्रमणीया ते प्रयागगमनं प्रति॥ १३॥ | हे तात! माताके कहने अथवा अन्य लोगोंके कहनेपर भी प्रयाग जानेकी बुद्धिका उत्क्रमण (परित्याग) नहीं करना चाहिये*। हे कुरुनन्दन! यहाँपर प्रमुख दस हजार तीर्थ तथा साठ करोड़ दूसरे तीर्थोंका सांनिध्य है। योगयुक्त सत्त्वगुणी मनीषीकी जो गति होती है, वही गति गङ्गा-यमुनाके संगमपर प्राण त्याग करनेवालेकी होती है। हे युधिष्ठिर! तीनों लोकोंमें विख्यात प्रयागमें जो नहीं पहुँचते, जहाँ-कहीं भी निवास करनेवाले वे लोग इस संसारमें जीवित रहते हुए भी मृतकके तुल्य हैं॥ १३—१६॥ |
| दश तीर्थसहस्त्राणि षष्टिकोट्यस्तथापरे।<br>तेषां सांनिध्यमत्रैव तीर्थानां कुरुनन्दन॥ १४॥ | |
| या गतिर्योगयुक्तस्य सत्त्वस्थस्य मनीषिणः।<br>सा गतिस्त्यजतः प्राणान् गङ्गायमुनसंगमे॥ १५॥ | |
| न ते जीवन्ति लोकेऽस्मिन् यत्र तत्र युधिष्ठिर।<br>ये प्रयागं न सम्प्राप्तास्त्रिषु लोकेषु विश्रुतम्॥ १६॥ | |
| एवं दृष्ट्वा तु तत् तीर्थं प्रयागं परमं पदम्।<br>मुच्यते सर्वपापेभ्यः शशाङ्क इव राहुणा॥ १७॥ | इस प्रकार परम पदरूप इस प्रयागतीर्थका दर्शनकर मनुष्य सभी पापोंसे उसी प्रकार मुक्त हो जाता है, जैसे चन्द्रमा राहुसे मुक्त हो जाता है। यमुनाके दक्षिण किनारेपर कम्बल और अश्वतर नामक दो नाग स्थित हैं। वहाँ स्नान करने और जल पीनेसे सभी पापोंसे मुक्ति हो जाती है॥ १७-१८॥ |
| कम्बलाश्वतरौ नागौ यमुनादक्षिणे तटे।<br>तत्र स्नात्वा च पीत्वा च मुच्यते सर्वपातकैः॥ १८॥ | |
| तत्र गत्वा नरः स्थानं महादेवस्य धीमतः।<br>आत्मानं तारयेत् पूर्वं दशातीतान् दशापरान्॥ १९॥ | धीमान् महादेवके उस स्थानपर जाकर मनुष्य अपनेको तथा दस पूर्वकी और दस बादकी सभी पीढ़ियोंको तार देता है। वहाँ स्नान करनेसे मनुष्य अश्वमेधका फल प्राप्त करता है तथा महाप्रलयपर्यन्त स्वर्गलोक प्राप्त करता है॥ १९-२०॥ |
| कृत्वाभिषेकं तु नरः सोऽश्वमेधफलं लभेत्।<br>स्वर्गलोकमवाप्नोति यावदाहूतसम्प्लवम्॥ २०॥ | |
| पूर्वपार्श्वे तु गङ्गायास्त्रैलोक्ये ख्यातिमान् नृप।<br>अवटः सर्वसामुद्रः प्रतिष्ठानं च विश्रुतम्॥ २१॥ | हे राजन्! गङ्गाके पूर्वी तटपर तीनों लोकोंमें विख्यात सर्वसामुद्र नामक गहर तथा प्रतिष्ठान प्रसिद्ध है। वहाँ ब्रह्मचर्यपूर्वक तथा क्रोधजयी होकर तीन रात्रि निवास करनेवाला (मनुष्य) सभी पापोंसे निर्मुक्त होकर अश्वमेधका फल प्राप्त करता है। प्रतिष्ठान नामक स्थानके उत्तर तथा भागीरथीकी बायीं ओर तीनों लोकोंमें विख्यात हंसप्रपतन नामक तीर्थ है। उसके स्मरणमात्रसे अश्वमेधका फल प्राप्त होता है और (वहाँ जानेवाला व्यक्ति) जबतक सूर्य एवं चन्द्रमा हैं, तबतक स्वर्गमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है॥ २१—२४॥ |
| ब्रह्मचारी जितक्रोधस्त्रिरात्रं यदि तिष्ठति।<br>सर्वपापविशुद्धात्मा सोऽश्वमेधफलं लभेत्॥ २२॥ | |
| उत्तरेण प्रतिष्ठानं भागीरथ्यास्तु सव्यतः।<br>हंसप्रपतनं नाम तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम्॥ २३॥ | |
| अश्वमेधफलं तत्र स्मृतमात्रात् तु जायते।<br>यावच्चन्द्रश्च सूर्यश्च तावत् स्वर्गे महीयते॥ २४॥ |
* इसका तात्पर्य प्रयागमें निवास करनेसे है न कि माता आदि गुरुजनोंके वचनका उल्लंघन करनेमें।