भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२०८* कूर्मपुराण *
उर्वशीपुलिने रम्ये विपुले हंसपाण्डुरे।<br>परित्यजति यः प्राणान् शृणु तस्यापि यत् फलम् ॥ २५ ॥<br><br>षष्टिवर्षसहस्त्राणि षष्टिवर्षशतानि च।<br>आस्ते स पितृभिः सार्धं स्वर्गलोके नराधिप ॥ २६ ॥<br><br>अथ संध्यावटे रम्ये ब्रह्मचारी जितेन्द्रियः।<br>नरः शुचिरुपासीत ब्रह्मलोकमवाप्नुयात् ॥ २७ ॥<br><br>कोटितीर्थं समाश्रित्य यस्तु प्राणान् परित्यजेत्।<br>कोटिवर्षसहस्त्राणि स्वर्गलोके महीयते ॥ २८ ॥<br><br>यत्र गङ्गा महाभागा बहुतीर्थतपोवना।<br>सिद्धक्षेत्रं हि तज्ज्ञेयं नात्र कार्या विचारणा ॥ २९ ॥<br><br>क्षितौ तारयते मर्त्यान् नागांस्तारयतेऽप्यधः।<br>दिवि तारयते देवांस्तेन त्रिपथगा स्मृता ॥ ३० ॥जो व्यक्ति उर्वशीके* हंसके समान अति धवल रम्य, विस्तृत तटपर प्राणोंका परित्याग करता है, उसका भी जो फल है, वह सुनो—हे नराधिप! वह व्यक्ति साठ हजार साठ सौ वर्षोंतक पितरोंके साथ स्वर्गलोकमें निवास करता है। रमणीय संध्यावट (प्रयागके वट-विशेष)-के नीचे जो मनुष्य जितेन्द्रिय होकर ब्रह्मचर्यपूर्वक पवित्रतासे उपासना करता है, वह ब्रह्मलोक प्राप्त करता है। जो कोटितीर्थ (प्रयागमें स्थित तीर्थ)-में पहुँचकर प्राणोंका परित्याग करता है, वह हजार करोड़ वर्षोंतक स्वर्गलोकमें पूजित होता है। जहाँ बहुतसे तीर्थों एवं तपोवनोंसे युक्त महाभागा गङ्गा विद्यमान हैं, उस क्षेत्रको सिद्धक्षेत्र जानना चाहिये, इसमें किसी भी प्रकारका विचार (संशय) करना उचित नहीं है। गङ्गा पृथ्वीपर मनुष्योंको तारती है, नीचे पाताल लोकमें नागोंको तारती है और द्युलोकमें देवताओंको तारती है, इसलिये यह त्रिपथगा कही जाती है॥ २५–३०॥
यावदस्थीनि गङ्गायां तिष्ठन्ति पुरुषस्य तु।<br>तावद्वर्षसहस्त्राणि स्वर्गलोके महीयते ॥ ३१ ॥<br><br>तीर्थानां परमं तीर्थं नदीनां परमा नदी।<br>मोक्षदा सर्वभूतानां महापातकिनामपि ॥ ३२ ॥<br><br>सर्वत्र सुलभा गङ्गा त्रिषु स्थानेषु दुर्लभा।<br>गङ्गाद्वारे प्रयागे च गङ्गासागरसंगमे ॥ ३३ ॥<br><br>सर्वेषामेव भूतानां पापोपहतचेतसाम्।<br>गतिमन्वेषमाणानां नास्ति गङ्गासमा गतिः ॥ ३४ ॥जितने वर्षतक पुरुषकी अस्थियाँ गङ्गामें रहती हैं, उतने हजार वर्षोंतक वह स्वर्गलोकमें पूजित होता है। (गङ्गा) सभी तीर्थोंमें परम तीर्थ और नदियोंमें श्रेष्ठ नदी है, वह सभी प्राणियों, यहाँतक कि महापातकियोंको भी मोक्ष प्रदान करनेवाली है। गङ्गा (स्नान) सर्वत्र सुलभ होनेपर भी गङ्गाद्वार (हरिद्वार), प्रयाग एवं गङ्गासागर—इन तीन स्थानोंमें दुर्लभ होती है। (उत्तम) गतिकी इच्छा करनेवाले तथा पापसे उपहत चित्तवाले सभी प्राणियोंके लिये गङ्गाके समान और कोई दूसरी गति नहीं है॥ ३१–३४॥
पवित्राणां पवित्रं च मङ्गलानां च मङ्गलम्।<br>माहेश्वरात् परिभ्रष्टा सर्वपापहरा शुभा ॥ ३५ ॥<br><br>कृते युगे तु तीर्थानि त्रेतायां पुष्करं परम्।<br>द्वापरे तु कुरुक्षेत्रं कलौ गङ्गा विशिष्यते ॥ ३६ ॥<br><br>गङ्गामेव निषेवेत प्रयागे तु विशेषतः।<br>नान्यत् कलियुगोद्भूतं मलं हन्तुं सुदुष्कृतम् ॥ ३७ ॥यह सभी पवित्र वस्तुओंसे अधिक पवित्र और सभी मङ्गलकारी पदार्थोंसे अधिक माङ्गलिक है। महेश्वर (-के मस्तक)-से होकर इस लोकमें आनेके कारण यह सभी पापोंका हरण करनेवाली और शुभ है। सत्ययुगमें अनेक तीर्थ होते हैं, त्रेताका श्रेष्ठ तीर्थ पुष्कर है, द्वापरका कुरुक्षेत्र है और कलियुगमें गङ्गाकी ही विशेषता है। गङ्गाकी ही सेवा करनी चाहिये, विशेष-रूपसे प्रयागमें गङ्गाकी सेवा करनी चाहिये। कलियुगमें उत्पन्न अत्यन्त कठिन पापको दूर करनेमें कोई अन्य तीर्थ समर्थ नहीं है॥ ३५–३७॥

* प्रयाग-संगमके समीप कोई तट-विशेष।