संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished506 पृष्ठ
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| * अध्याय ३६ * | २०९ |
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| अकामो वा सकामो वा गङ्गायां यो विपद्यते ।<br>स मृतो जायते स्वर्गे नरकं च न पश्यति ॥ ३८ ॥ | इच्छा अथवा अनिच्छापूर्वक जो गङ्गामें मृत्यु प्राप्त करता है, वह मृत व्यक्ति स्वर्ग जाता है और नरकका दर्शन नहीं करता ॥ ३८ ॥ |
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे पञ्चत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३५ ॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें पैंतीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ३५ ॥
छत्तीसवॉँ अध्याय
प्रयाग-माहात्म्य, माघमासमें संगमस्नानका फल, त्रिमाघीकी महिमा, प्रयागमें प्राण-त्याग करनेका फल
| मार्कण्डेय उवाच | मार्कण्डेयने कहा— |
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| षष्टितीर्थसहस्राणि षष्टितीर्थशतानि च।<br>माघमासे गमिष्यन्ति गङ्गायमुनसंगमम् ॥ १ ॥<br><br>गवां शतसहस्रस्य सम्यग् दत्तस्य यत् फलम्।<br>प्रयागे माघमासे तु त्र्यहं स्नातस्य तत् फलम् ॥ २ ॥<br><br>गङ्गायमुनयोर्मध्ये कार्षाग्निं यस्तु साधयेत्।<br>अहीनाङ्गोऽप्यरोगश्च पञ्चेन्द्रियसमन्वितः ॥ ३ ॥ | (युधिष्ठिर !) गङ्गा और यमुनाके संगमपर माघ महीनेमें साठ हजार साठ सौ तीर्थ जाते हैं। सौ हजार गौओंका भलीभाँति दान करनेका जो फल होता है, वही फल प्रयागमें माघमासमें तीन दिन स्नान करनेका होता है। गङ्गा और यमुनाके संगमपर जो करीषाग्निका* सेवन करता है, वह अहीनाङ्ग (हीन अङ्गसे रहित) अर्थात् सम्पूर्ण अवयवोंसे सम्पन्न, रोगरहित तथा पाँचों इन्द्रियोंसे युक्त होता है ॥ १—३ ॥ |
| यावन्ति रोमकूपाणि तस्य गात्रेषु मानद।<br>तावद्वर्षसहस्राणि स्वर्गलोके महीयते ॥ ४ ॥<br><br>ततः स्वर्गात् परिभ्रष्टो जम्बूद्वीपपतिर्भवेत्।<br>स भुक्त्वा विपुलान् भोगॉंस्तत् तीर्थं भजते पुनः॥ ५ ॥ | मान देनेवाले (युधिष्ठिर) ! उस मनुष्यके शरीरमें जितने रोमकूप होते हैं, उतने हजार वर्षोंतक वह स्वर्गलोकमें पूजित होता है। तदनन्तर स्वर्गसे भ्रष्ट होनेपर वह जम्बूद्वीपका स्वामी होता है और विपुल भोगोंका उपभोग करनेके अनन्तर वह पुनः इस तीर्थ (प्रयाग)-को प्राप्त करता है ॥ ४-५ ॥ |
| जलप्रवेशं यः कुर्यात् संगमे लोकविश्रुते।<br>राहुग्रस्तो यथा सोमो विमुक्तः सर्वपातकैः॥ ६ ॥<br><br>सोमलोकमवाप्नोति सोमेन सह मोदते।<br>षष्टिं वर्षसहस्राणि षष्टिं वर्षशतानि च॥ ७ ॥<br><br>स्वर्गतः शक्रलोकेऽसौ मुनिगन्धर्वसेवितः।<br>ततो भ्रष्टस्तु राजेन्द्र समृद्धे जायते कुले ॥ ८ ॥<br><br>अधःशिरास्त्वयोधारामूर्ध्वपादः पिबेन्नरः।<br>शतं वर्षसहस्राणि स्वर्गलोके महीयते ॥ ९ ॥ | (गङ्गा-यमुनाके) लोक-प्रसिद्ध संगमपर जो जलमें प्रवेश करता है, वह जिस प्रकार राहुसे ग्रस्त चन्द्रमा मुक्त हो जाता है, वैसे ही सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है। वह चन्द्रलोकमें जाता है और साठ हजार साठ सौ वर्षोंतक चन्द्रमाके साथ आनन्दोपभोग करता है। हे राजेन्द्र ! तदुपरान्त मुनियों एवं गन्धर्वोंसे सेवित वह स्वर्गलोकसे इन्द्रलोकमें जाता है और वहाँसे भ्रष्ट होनेपर इस लोकमें आकर धनवानोंके कुलमें जन्म लेता है। जो मनुष्य (यहाँ प्रयागमें) पैर ऊपर और सिर नीचे करके लोहेकी धाराका पान (तपस्या-विशेष) करता है, वह सौ हजार वर्षोंतक स्वर्गलोकमें पूजित होता है ॥ ६—९ ॥ |
* करीष—सूखा गोमय। इससे अग्नि बनाकर उसके मध्य तपस्या करना।