संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२१० * कूर्मपुराण *
तस्माद् भ्रष्टस्तु राजेन्द्र अग्निहोत्री भवेन्नरः।
भुक्त्वा तु विपुलान् भोगांस्तत् तीर्थं भजते पुनः॥ १०॥
यः स्वदेहं विकर्तेद् वा शकुनिभ्यः प्रयच्छति।
विहगैरुपभुक्तस्य शृणु तस्यापि यत्फलम्॥ ११॥
शतं वर्षसहस्राणि सोमलोके महीयते।
ततस्तस्मात् परिभ्रष्टो राजा भवति धार्मिकः॥ १२॥
गुणवान् रूपसम्पन्नो विद्वान् सुप्रियवाक्यवान्।
भुक्त्वा तु विपुलान् भोगांस्तत् तीर्थं भजते पुनः॥ १३॥
उत्तरे यमुनातीरे प्रयागस्य तु दक्षिणे।
ऋणप्रमोचनं नाम तीर्थं तु परमं स्मृतम्॥ १४॥
एकरात्रोषितः स्नात्वा ऋणैस्तत्र प्रमुच्यते।
सूर्यलोकमवाप्नोति अनृणश्च सदा भवेत्॥ १५॥
राजेन्द्र! वहाँसे भ्रष्ट होनेपर वह मनुष्य अग्निहोत्री होता है और विपुल भोगोंका उपभोग करके पुनः इस (प्रयाग) तीर्थका सेवन करता है। जो अपना शरीर काटता^१ है अथवा पक्षियोंको देता है, ऐसे पक्षियोंद्वारा खाये गये (मांसवाले) उस पुरुषको भी जो फल प्राप्त होता है, उसे सुनो— ॥ १०-११॥
वह सौ हजार वर्षोंतक चन्द्रलोकमें पूजित होता है, तदनन्तर वहाँसे च्युत होनेपर धार्मिक, गुणवान्, रूपसम्पन्न, विद्वान् और सुन्दर तथा प्रिय वचन बोलनेवाला राजा होता है एवं विपुल भोगोंको भोगकर पुनः इस तीर्थका सेवन करता है। प्रयागके दक्षिणमें यमुनाके उत्तरी तटपर ऋणप्रमोचन नामका एक श्रेष्ठ तीर्थ कहा गया है। वहाँ स्नानकर एकरात्रिपर्यन्त निवास करनेवाला पुरुष ऋणोंसे मुक्त हो जाता है, सूर्यलोक प्राप्त करता है तथा सदाके लिये ऋणमुक्त हो जाता है॥ १२-१५॥
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे षट्त्रिंशोऽध्यायः॥ ३६॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें छत्तीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ३६॥
सैंतीसवाँ अध्याय
प्रयाग-माहात्म्य, यमुनाकी महिमा, यमुनाके तटवर्ती तीर्थोंका वर्णन, गङ्गामें सभी तीर्थोंकी स्थिति, मार्कण्डेय-युधिष्ठिर-संवादकी समाप्ति
मार्कण्डेय उवाच
तपनस्य सुता देवी त्रिषु लोकेषु विश्रुता।
समागता महाभागा यमुना यत्र निम्नगा॥ १॥
येनैव निःसृता गङ्गा तेनैव यमुना गता।
योजनानां सहस्रेषु कीर्तनात् पापनाशिनी॥ २॥
तत्र स्नात्वा च पीत्वा च यमुनायां युधिष्ठिर।
सर्वपापविनिर्मुक्तः पुनात्यासप्तमं कुलम्।
प्राणांस्त्यजति यस्तत्र स याति परमां गतिम्॥ ३॥
अग्नितीर्थमिति ख्यातं यमुनादक्षिणे तटे।
पश्चिमे धर्मराजस्य तीर्थं त्वनरकं स्मृतम्।
तत्र स्नात्वा दिवं यान्ति ये मृतास्तेऽपुनर्भवाः॥ ४॥
मार्कण्डेयने कहा— (राजन् युधिष्ठिर!) सूर्यकी तीनों लोकोंमें विख्यात पुत्री महाभागा देवी यमुना नदी यहाँपर मिली हैं। जिस मार्गसे गङ्गा प्रवाहित हुई हैं, उस मार्गसे यमुना भी गयी हैं। सहस्रों योजन दूरपर भी (यमुना) नाम लेनेसे पापोंको नष्ट कर देनेवाली है। युधिष्ठिर! इस यमुनामें स्नान करने तथा इसका जल पीनेसे मनुष्य सभी पापोंसे मुक्त होकर अपने सात पीढ़ियोंके कुलोंको पवित्र कर देता है। जो यहाँ प्राणोंका परित्याग करता है, वह परम गतिको प्राप्त करता है। यमुनाके दक्षिणी तटपर अग्नितीर्थ नामका एक विख्यात तीर्थ है। यमुनाके पश्चिमी भागमें धर्मराजका 'अनरक'^२ नामक तीर्थ कहा गया है। यहाँ स्नान करनेवाले स्वर्ग जाते हैं और जो यहाँ मृत्युको प्राप्त होते हैं, उनका पुनर्जन्म नहीं होता॥ १-४॥
१-ज्ञानकी पराकाष्ठामें शरीरके प्रति ममताका सर्वथा अभाव हो जाता है। ऐसी स्थितिमें शरीरका काटना या अपने शरीरका मांस पक्षियोंको समर्पित करना (प्राणि-कल्याण-बुद्धिमात्रसे) विशेष तप है। दधीचि, शिवि, जीमूतवाहन आदिके दृष्टान्त द्रष्टव्य हैं।
२-न नरक = अनरक इस तीर्थमें स्नान आदि करनेसे नरकमें नहीं जाना पड़ता, इसलिये इसका नाम 'अनरक' है।