भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 221, कुल 506 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 221
  • अध्याय ३७ * | २११ ---|---:
कृष्णपक्षे चतुर्दश्यां स्नात्वा संतर्पयेच्छुचिः ।<br>धर्मराजं महापापैर्मुच्यते नात्र संशयः ॥ ५ ॥<br><br>दश तीर्थसहस्राणि त्रिंशत्कोट्यस्तथापराः ।<br>प्रयागे संस्थितानि स्युरेवमाहुर्मनीषिणः ॥ ६ ॥यहाँ (अनर्क तीर्थमें) कृष्णपक्षकी चतुर्दशीको स्नान करके पवित्रतापूर्वक जो धर्मराजका तर्पण करता है, वह निस्संदेह महापापोंसे मुक्त हो जाता है। मनीषी लोगोंका यह कहना है कि प्रयागमें दस हजार (प्रधान) तीर्थ और तीस करोड़ दूसरे (अप्रधान) तीर्थ स्थित हैं॥ ५-६॥
तिस्रः कोट्योऽर्धकोटी च तीर्थानां वायुरब्रवीत् ।<br>दिवि भूम्यन्तरिक्षे च तत्सर्वं जाह्नवी स्मृता ॥ ७ ॥<br><br>यत्र गङ्गा महाभागा स देशस्तत् तपोवनम् ।<br>सिद्धिक्षेत्रं तु तज्ज्ञेयं गङ्गातीरसमाश्रितम् ॥ ८ ॥<br><br>यत्र देवो महादेवो देव्या सह महेश्वरः ।<br>आस्ते वटेश्वरो नित्यं तत् तीर्थं तत् तपोवनम् ॥ ९ ॥<br><br>इदं सत्यं द्विजातीनां साधूनामात्मजस्य च ।<br>सुहृदां च जपेत् कर्णे शिष्यस्यानुगतस्य तु ॥ १० ॥वायुने कहा है कि द्युलोक, भूलोक और अन्तरिक्षमें साढ़े तीन करोड़ तीर्थ हैं और जाह्नवी उन सभी तीर्थोंसे युक्त कही गयी है। जहाँ महाभागा गङ्गा होती हैं, वही (पवित्र) देश है और वही तपोवन होता है। गङ्गाके तटपर स्थित उस स्थानको सिद्धिक्षेत्र समझना चाहिये। जहाँ देवीके साथ महादेव महेश्वरदेव वटेश्वर* स्थित हैं, वह स्थान नित्य तीर्थ है और वह तपोवन है। इस सत्यको द्विजातियों, साधुओं, मित्रों, अपने पुत्र तथा अनुगामी शिष्यके कानमें कहना चाहिये॥ ७—१०॥
इदं धन्यमिदं स्वर्ग्यमिदं मेध्यमिदं सुखम् ।<br>इदं पुण्यमिदं रम्यं पावनं धर्म्यमुत्तमम् ॥ ११ ॥<br><br>महर्षीणामिदं गुह्यं सर्वपापप्रमोचनम् ।<br>अत्राधीत्य द्विजोऽध्यायं निर्मलत्वमवाप्नुयात् ॥ १२ ॥<br><br>यश्चेदं शृणुयान्नित्यं तीर्थं पुण्यं सदा शुचिः ।<br>जातिस्मरत्वं लभते नाकपृष्ठे च मोदते ॥ १३ ॥<br><br>प्राप्यन्ते तानि तीर्थानि सद्भिः शिष्टानुदर्शिभिः ।<br>स्नाहि तीर्थेषु कौरव्य न च वक्रमतिर्भव ॥ १४ ॥यह (प्रयाग) धन्य है, स्वर्गफलप्रद (स्वर्गरूप फलको देनेवाला) है, यह पवित्र, सुख, पुण्य, रमणीय, पावन और उत्तम धर्मयुक्त है। यह महर्षियोंके लिये गोपनीय रहस्य है। सभी पापोंको नष्ट करनेवाला है। यहाँ द्विज वेदका स्वाध्याय कर निर्मल हो जाता है। जो व्यक्ति नित्य पवित्रतापूर्वक इस पुण्यप्रद तीर्थका वर्णन सुनता है, वह जन्मान्तरकी बातोंको स्मरण करनेवाला हो जाता है और स्वर्गलोकमें आनन्द प्राप्त करता है। शिष्ट मार्गका अनुसरण करनेवाले सज्जन पुरुष ऐसे तीर्थोंमें जाते हैं। कुरुके वंशधर (युधिष्ठिर)! तीर्थोंमें स्नान करो। इस विषयमें विपरीत बुद्धिवाले मत होओ॥ ११—१४॥
एवमुक्त्वा स भगवान् मार्कण्डेयो महामुनिः ।<br>तीर्थानि कथयामास पृथिव्यां यानि कानिचित् ॥ १५ ॥<br><br>भूसमुद्रादिसंस्थानं प्रमाणं ज्योतिषां स्थितम् ।<br>पृष्टः प्रोवाच सकलमुक्त्वाथ प्रययौ मुनिः ॥ १६ ॥ऐसा कहकर उन भगवान् मार्कण्डेय महामुनिने (युधिष्ठिरके द्वारा) पूछे जानेपर पृथ्वीमें जो कोई भी तीर्थ थे उन्हें बतलाया और पृथ्वी तथा समुद्र आदिकी स्थिति एवं नक्षत्रोंकी स्थितिका सम्पूर्ण वर्णन कर वे मुनि चले गये॥ १५-१६॥
य इदं कल्यमुत्थाय पठतेऽथ शृणोति वा ।<br>मुच्यते सर्वपापेभ्यो रुद्रलोकं स गच्छति ॥ १७ ॥प्रातःकाल उठकर जो इस (प्रयाग-माहात्म्य)-का पाठ करता है अथवा इसे सुनता है, वह सभी पापोंसे मुक्त होकर रुद्रलोकमें जाता है॥ १७॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे सप्तत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३७ ॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें सैंतीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ३७॥


* प्रयागमें स्थित विशाल वटवृक्षके नीचे प्रतिष्ठित लिङ्ग वटेश्वर लिङ्ग है।