संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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२१२ * कूर्मपुराण *
अड़तीसवाँ अध्याय
भुवनकोश-वर्णनमें राजा प्रियव्रतके वंशका वर्णन, प्रियव्रतके पुत्र राजा अग्नीध्रके वंशका वर्णन, जम्बू आदि सात द्वीपोंका तथा वर्षोंका वर्णन, जम्बूद्वीपके नौ वर्षोंमें राजा अग्नीध्रके नाभि, किंपुरुष आदि नौ पुत्रोंका आधिपत्य
| श्रीकूर्म उवाच | श्रीकूर्मने कहा— |
|---|---|
| एवमुक्तास्तु मुनयो नैमिषीया महामतिम्।<br>पप्रच्छुरुत्तरं सूतं पृथिव्यादिविनिर्णयम् ॥ १ ॥ | ऐसा कहे जानेपर नैमिषारण्यमें निवास करनेवाले मुनियोंने महाबुद्धिमान् सूतजीसे पृथ्वी आदिके सम्बन्धमें निर्णय पूछा—॥ १ ॥ |
| ऋषय ऊचुः | ऋषियोंने कहा— |
| कथितो भवता सूत सर्गः स्वायम्भुवः शुभः।<br>इदानीं श्रोतुमिच्छामस्त्रैलोक्यस्यास्य मण्डलम् ॥ २ ॥<br>यावन्तः सागरा द्वीपास्तथा वर्षाणि पर्वताः।<br>वनानि सरितः सूर्यग्रहाणां स्थितिरैव च ॥ ३ ॥<br>यदाधारमिदं कृत्स्नं येषां पृथ्वी पुरा त्वियम्।<br>नृपाणां तत्समासेन सूत वक्तुमिहार्हसि ॥ ४ ॥ | हे सूतजी! आपने स्वायम्भुव मन्वन्तरकी शुभ सृष्टिको बतलाया, अब इस समय हम लोग त्रैलोक्य-मण्डलका वर्णन सुनना चाहते हैं। जितने सागर, द्वीप, वर्ष, पर्वत, वन तथा नदियाँ हैं और सूर्य आदि ग्रहोंकी जो स्थिति है, इन सभीका वर्णन करें। हे सूतजी! यह सब कुछ जिसके आधारपर टिका है और प्राचीन कालमें यह पृथ्वी जिन राजाओंके अधिकारमें रही है, उन सभी विषयोंका संक्षेपमें आप वर्णन करें ॥ २–४ ॥ |
| सूत उवाच | सूतजीने कहा— |
| वक्ष्ये देवादिदेवाय विष्णवे प्रभविष्णवे।<br>नमस्कृत्याप्रमेयाय यदुक्तं तेन धीमता ॥ ५ ॥ | देवोंके आदिदेव, अप्रमेय, प्रभविष्णु विष्णुको नमस्कार कर मैं उन धीमान्द्वारा जो कुछ कहा गया है, उसे बताता हूँ—॥ ५ ॥ |
| स्वायम्भुवस्य तु मनोः प्रागुक्तो यः प्रियव्रतः।<br>पुत्रस्तस्याभवन् पुत्राः प्रजापतिसमा दश ॥ ६ ॥<br>अग्नीध्रश्चाग्निबाहुश्च वपुष्मान् द्युतिमांस्तथा।<br>मेधा मेधातिथिर्हव्यः सवनः पुत्र एव च ॥ ७ ॥<br>ज्योतिष्मान् दशमस्तेषां महाबलपराक्रमः।<br>धार्मिको दाननिरतः सर्वभूतानुकम्पकः ॥ ८ ॥<br>मेधाग्निबाहुपुत्रास्तु त्रयो योगपरायणाः।<br>जातिस्मरा महाभागा न राज्ये दधिरे मतिम् ॥ ९ ॥<br>प्रियव्रतोऽभ्यषिञ्चद् वै सप्तद्वीपेषु सप्त तान्।<br>जम्बूद्वीपेश्वरं पुत्रमग्नीध्रमकरोन्नृपः ॥ १० ॥<br>प्लक्षद्वीपेश्वरश्चैव तेन मेधातिथिः कृतः।<br>शाल्मलेशं वपुष्मन्तं नरेन्द्रमभिषिक्तवान् ॥ ११ ॥ | पूर्वमें स्वायम्भुव मनुके जिस प्रियव्रत नामक पुत्रका वर्णन किया गया है उस (प्रियव्रत)-को प्रजापतिके समान दस पुत्र हुए। अग्नीध्र, अग्निबाहु, वपुष्मान्, द्युतिमान्, मेधा, मेधातिथि, हव्य, सवन और पुत्र तथा महान् बलशाली एवं पराक्रमी, धार्मिक, दानपरायण और सभी प्राणियोंपर दया करनेवाला ज्योतिष्मान् नामक दसवाँ पुत्र था। मेधा, अग्निबाहु तथा पुत्र—ये तीनों योगपरायण थे। पूर्वजन्मोंका स्मरण करनेवाले इन महाभाग्यशालियों (विरक्तों)-का मन राज्यकार्यमें नहीं लगा। (अतः) प्रियव्रतने (अपने अन्य) उन सात पुत्रोंको सात द्वीपोंमें अभिषिक्त कर दिया। राजाने अग्नीध्र नामक पुत्रको जम्बूद्वीपका स्वामी बनाया। उन्होंने मेधातिथिको प्लक्षद्वीपका राजा बनाया और वपुष्मान्को शाल्मलि-द्वीपमें राजाके रूपमें अभिषिक्त किया ॥ ६–११ ॥ |
| ज्योतिष्मन्तं कुशद्वीपे राजानं कृतवान् प्रभुः।<br>द्युतिमन्तं च राजानं क्रौञ्चद्वीपे समादिशत् ॥ १२ ॥<br>शाकद्वीपेश्वरं चापि हव्यं चक्रे प्रियव्रतः।<br>पुष्कराधिपतिं चक्रे सवनं च प्रजापतिः ॥ १३ ॥ | प्रभु (प्रियव्रत)-ने ज्योतिष्मान्को कुशद्वीपका राजा बनाया और द्युतिमान्को क्रौञ्चद्वीपका राजा बननेका आदेश दिया। प्रजापति प्रियव्रतने हव्यको शाकद्वीपका स्वामी बनाया और सवनको पुष्करद्वीपका अधिपति बनाया ॥ १२–१३ ॥ |