संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
२०६ * कूर्मपुराण *
पैंतीसवाँ अध्याय
प्रयाग-माहात्म्य, प्रयागके विभिन्न तीर्थोंकी महिमा, त्रिपथगा गङ्गाका माहात्म्य, गङ्गास्नानका फल
| मार्कण्डेय उवाच<br>कथयिष्यामि ते वत्स तीर्थयात्राविधिक्रमम्।<br>आर्षेण तु विधानेन यथा दृष्टं यथा श्रुतम्॥ १ ॥<br>प्रयागतीर्थयात्रार्थी यः प्रयाति नरः क्वचित्।<br>बलीवर्दं समारूढः शृणु तस्यापि यत्फलम्॥ २ ॥<br><br>नरके वसते घोरे समाः कल्पशतायुतम्।<br>ततो निवर्तते घोरो गवां क्रोधो हि दारुणः।<br>सलिलं च न गृह्णन्ति पितरस्तस्य देहिनः॥ ३ ॥<br><br>यस्तु पुत्रांस्तथा बालान् स्नापयेत् पाययेत् तथा।<br>यथात्मना तथा सर्वान् दानं विप्रेषु दापयेत्॥ ४ ॥<br><br>ऐश्वर्याल्लोभमोहाद् वा गच्छेद् यानेन यो नरः।<br>निष्फलं तस्य तत् तीर्थं तस्माद् यानं विवर्जयेत्॥ ५ ॥<br>गङ्गायमुनयोर्मध्ये यस्तु कन्यां प्रयच्छति।<br>आर्षेण तु विवाहेन यथाविभवविस्तरम्॥ ६ ॥<br><br>न स पश्यति तं घोरं नरकं तेन कर्मणा।<br>उत्तरान् स कुरून् गत्वा मोदते कालमक्षयम्॥ ७ ॥<br>वटमूलं समाश्रित्य यस्तु प्राणान् परित्यजेत्।<br>सर्वलोकानतिक्रम्य रुद्रलोकं स गच्छति॥ ८ ॥<br>तत्र ब्रह्मादयो देवा दिशश्च सदिगीश्वराः।<br>लोकपालाश्च सिद्धाश्च पितरो लोकसम्मताः॥ ९ ॥<br>सनत्कुमारप्रमुखास्तथा ब्रह्मर्षयोऽपरे।<br>नागाः सुपर्णाः सिद्धाश्च तथा नित्यं समासते।<br>हरिश्च भगवानास्ते प्रजापतिपुरस्कृतः॥ १०॥<br><br>गङ्गायमुनयोर्मध्ये पृथिव्या जघनं स्मृतम्।<br>प्रयागं राजशार्दूल त्रिषु लोकेषु विश्रुतम्॥ ११॥ | मार्कण्डेयने कहा—वत्स! ऋषियोंके द्वारा प्रतिपादित विधानके अनुसार तीर्थयात्राकी विधिके क्रमको मैंने जैसे देखा और सुना, वह तुमसे कहता हूँ॥ १ ॥<br>प्रयागतीर्थकी यात्रा करनेवाला कोई मनुष्य यदि कहीं बैलपर आरूढ़ होकर गमन करता है तो उसका भी फल सुनो— वह व्यक्ति दस हजार कल्पोंतक घोर नरकमें वास करता है, क्योंकि गौका भयंकर दारुण क्रोध इसके बाद ही दूर होता है। बैलको सवारी बनानेवाले मनुष्यके पितर उसका (तर्पण आदिमें दिया) जल ग्रहण नहीं करते हैं। जो अपने सभी पुत्रों एवं बालकोंको अपने ही समान यहाँ (प्रयागमें) स्नान कराता है तथा उन्हें (गङ्गा-यमुनाका) जल पिलाता है और उनके हाथों ब्राह्मणोंको दान कराता है (उसे उत्तम गति प्राप्त होती है)। जो मनुष्य ऐश्वर्य, लोभ या मोहवश यानद्वारा (तीर्थमें) जाता है, उसकी वह तीर्थयात्रा निष्फल होती है, इसलिये (तीर्थयात्रामें) यानका परित्याग करना चाहिये॥ २–५॥<br>जो व्यक्ति गङ्गा-यमुनाके मध्य आर्ष विवाहपद्धतिसे अपने ऐश्वर्यके अनुकूल धनका व्ययकर कन्याका दान करता है, वह उस कर्मके कारण घोर नरकका दर्शन नहीं करता और उत्तर कुरुमें जाकर अनन्त कालतक आनन्दोपभोग करता है॥ ६-७॥<br>(प्रयागमें अक्षय) वटवृक्षके नीचे जाकर जो प्राणोंका परित्याग करता है, वह सभी लोकोंका अतिक्रमण कर रुद्रलोकको जाता है। वहाँ ब्रह्मा आदि देवता, दिक्पालोंसहित दिशाएँ, लोकपाल, सिद्ध, लोकमें मान्य पितर, सनत्कुमार आदि प्रमुख तथा दूसरे ब्रह्मर्षि, नाग, सुपर्ण एवं सिद्धगण तथा भगवान् हरि और प्रजापति प्रभृति नित्य निवास करते हैं॥ ८–१०॥<br>गङ्गा-यमुनाके मध्यको पृथिवीका जघन* कहा गया है। हे राजशार्दूल! प्रयाग तीनों लोकोंमें विख्यात है॥ ११॥ |
* नाभिके नीचेका स्त्रियोंका कोमल भाग जघन है।
| * अध्याय ३५ * | २०७ |
|---|---|
| तत्राभिषेकं यः कुर्यात् संगमे संशितव्रतः।<br>तुल्यं फलमवाप्नोति राजसूयाश्वमेधयोः॥ १२॥ | वहाँ (गङ्गा-यमुनाके) संगमपर जो कठोर व्रत धारणकर अभिषेक—स्नान करता है, वह अश्वमेध तथा राजसूय-यज्ञोंके समान फल प्राप्त करता है॥ १२॥ |
| न मातृवचनात् तात न लोकवचनादपि।<br>मतिरुत्क्रमणीया ते प्रयागगमनं प्रति॥ १३॥ | हे तात! माताके कहने अथवा अन्य लोगोंके कहनेपर भी प्रयाग जानेकी बुद्धिका उत्क्रमण (परित्याग) नहीं करना चाहिये*। हे कुरुनन्दन! यहाँपर प्रमुख दस हजार तीर्थ तथा साठ करोड़ दूसरे तीर्थोंका सांनिध्य है। योगयुक्त सत्त्वगुणी मनीषीकी जो गति होती है, वही गति गङ्गा-यमुनाके संगमपर प्राण त्याग करनेवालेकी होती है। हे युधिष्ठिर! तीनों लोकोंमें विख्यात प्रयागमें जो नहीं पहुँचते, जहाँ-कहीं भी निवास करनेवाले वे लोग इस संसारमें जीवित रहते हुए भी मृतकके तुल्य हैं॥ १३—१६॥ |
| दश तीर्थसहस्त्राणि षष्टिकोट्यस्तथापरे।<br>तेषां सांनिध्यमत्रैव तीर्थानां कुरुनन्दन॥ १४॥ | |
| या गतिर्योगयुक्तस्य सत्त्वस्थस्य मनीषिणः।<br>सा गतिस्त्यजतः प्राणान् गङ्गायमुनसंगमे॥ १५॥ | |
| न ते जीवन्ति लोकेऽस्मिन् यत्र तत्र युधिष्ठिर।<br>ये प्रयागं न सम्प्राप्तास्त्रिषु लोकेषु विश्रुतम्॥ १६॥ | |
| एवं दृष्ट्वा तु तत् तीर्थं प्रयागं परमं पदम्।<br>मुच्यते सर्वपापेभ्यः शशाङ्क इव राहुणा॥ १७॥ | इस प्रकार परम पदरूप इस प्रयागतीर्थका दर्शनकर मनुष्य सभी पापोंसे उसी प्रकार मुक्त हो जाता है, जैसे चन्द्रमा राहुसे मुक्त हो जाता है। यमुनाके दक्षिण किनारेपर कम्बल और अश्वतर नामक दो नाग स्थित हैं। वहाँ स्नान करने और जल पीनेसे सभी पापोंसे मुक्ति हो जाती है॥ १७-१८॥ |
| कम्बलाश्वतरौ नागौ यमुनादक्षिणे तटे।<br>तत्र स्नात्वा च पीत्वा च मुच्यते सर्वपातकैः॥ १८॥ | |
| तत्र गत्वा नरः स्थानं महादेवस्य धीमतः।<br>आत्मानं तारयेत् पूर्वं दशातीतान् दशापरान्॥ १९॥ | धीमान् महादेवके उस स्थानपर जाकर मनुष्य अपनेको तथा दस पूर्वकी और दस बादकी सभी पीढ़ियोंको तार देता है। वहाँ स्नान करनेसे मनुष्य अश्वमेधका फल प्राप्त करता है तथा महाप्रलयपर्यन्त स्वर्गलोक प्राप्त करता है॥ १९-२०॥ |
| कृत्वाभिषेकं तु नरः सोऽश्वमेधफलं लभेत्।<br>स्वर्गलोकमवाप्नोति यावदाहूतसम्प्लवम्॥ २०॥ | |
| पूर्वपार्श्वे तु गङ्गायास्त्रैलोक्ये ख्यातिमान् नृप।<br>अवटः सर्वसामुद्रः प्रतिष्ठानं च विश्रुतम्॥ २१॥ | हे राजन्! गङ्गाके पूर्वी तटपर तीनों लोकोंमें विख्यात सर्वसामुद्र नामक गहर तथा प्रतिष्ठान प्रसिद्ध है। वहाँ ब्रह्मचर्यपूर्वक तथा क्रोधजयी होकर तीन रात्रि निवास करनेवाला (मनुष्य) सभी पापोंसे निर्मुक्त होकर अश्वमेधका फल प्राप्त करता है। प्रतिष्ठान नामक स्थानके उत्तर तथा भागीरथीकी बायीं ओर तीनों लोकोंमें विख्यात हंसप्रपतन नामक तीर्थ है। उसके स्मरणमात्रसे अश्वमेधका फल प्राप्त होता है और (वहाँ जानेवाला व्यक्ति) जबतक सूर्य एवं चन्द्रमा हैं, तबतक स्वर्गमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है॥ २१—२४॥ |
| ब्रह्मचारी जितक्रोधस्त्रिरात्रं यदि तिष्ठति।<br>सर्वपापविशुद्धात्मा सोऽश्वमेधफलं लभेत्॥ २२॥ | |
| उत्तरेण प्रतिष्ठानं भागीरथ्यास्तु सव्यतः।<br>हंसप्रपतनं नाम तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम्॥ २३॥ | |
| अश्वमेधफलं तत्र स्मृतमात्रात् तु जायते।<br>यावच्चन्द्रश्च सूर्यश्च तावत् स्वर्गे महीयते॥ २४॥ |
* इसका तात्पर्य प्रयागमें निवास करनेसे है न कि माता आदि गुरुजनोंके वचनका उल्लंघन करनेमें।
| २०८ | * कूर्मपुराण * |
|---|
| उर्वशीपुलिने रम्ये विपुले हंसपाण्डुरे।<br>परित्यजति यः प्राणान् शृणु तस्यापि यत् फलम् ॥ २५ ॥<br><br>षष्टिवर्षसहस्त्राणि षष्टिवर्षशतानि च।<br>आस्ते स पितृभिः सार्धं स्वर्गलोके नराधिप ॥ २६ ॥<br><br>अथ संध्यावटे रम्ये ब्रह्मचारी जितेन्द्रियः।<br>नरः शुचिरुपासीत ब्रह्मलोकमवाप्नुयात् ॥ २७ ॥<br><br>कोटितीर्थं समाश्रित्य यस्तु प्राणान् परित्यजेत्।<br>कोटिवर्षसहस्त्राणि स्वर्गलोके महीयते ॥ २८ ॥<br><br>यत्र गङ्गा महाभागा बहुतीर्थतपोवना।<br>सिद्धक्षेत्रं हि तज्ज्ञेयं नात्र कार्या विचारणा ॥ २९ ॥<br><br>क्षितौ तारयते मर्त्यान् नागांस्तारयतेऽप्यधः।<br>दिवि तारयते देवांस्तेन त्रिपथगा स्मृता ॥ ३० ॥ | जो व्यक्ति उर्वशीके* हंसके समान अति धवल रम्य, विस्तृत तटपर प्राणोंका परित्याग करता है, उसका भी जो फल है, वह सुनो—हे नराधिप! वह व्यक्ति साठ हजार साठ सौ वर्षोंतक पितरोंके साथ स्वर्गलोकमें निवास करता है। रमणीय संध्यावट (प्रयागके वट-विशेष)-के नीचे जो मनुष्य जितेन्द्रिय होकर ब्रह्मचर्यपूर्वक पवित्रतासे उपासना करता है, वह ब्रह्मलोक प्राप्त करता है। जो कोटितीर्थ (प्रयागमें स्थित तीर्थ)-में पहुँचकर प्राणोंका परित्याग करता है, वह हजार करोड़ वर्षोंतक स्वर्गलोकमें पूजित होता है। जहाँ बहुतसे तीर्थों एवं तपोवनोंसे युक्त महाभागा गङ्गा विद्यमान हैं, उस क्षेत्रको सिद्धक्षेत्र जानना चाहिये, इसमें किसी भी प्रकारका विचार (संशय) करना उचित नहीं है। गङ्गा पृथ्वीपर मनुष्योंको तारती है, नीचे पाताल लोकमें नागोंको तारती है और द्युलोकमें देवताओंको तारती है, इसलिये यह त्रिपथगा कही जाती है॥ २५–३०॥ |
| यावदस्थीनि गङ्गायां तिष्ठन्ति पुरुषस्य तु।<br>तावद्वर्षसहस्त्राणि स्वर्गलोके महीयते ॥ ३१ ॥<br><br>तीर्थानां परमं तीर्थं नदीनां परमा नदी।<br>मोक्षदा सर्वभूतानां महापातकिनामपि ॥ ३२ ॥<br><br>सर्वत्र सुलभा गङ्गा त्रिषु स्थानेषु दुर्लभा।<br>गङ्गाद्वारे प्रयागे च गङ्गासागरसंगमे ॥ ३३ ॥<br><br>सर्वेषामेव भूतानां पापोपहतचेतसाम्।<br>गतिमन्वेषमाणानां नास्ति गङ्गासमा गतिः ॥ ३४ ॥ | जितने वर्षतक पुरुषकी अस्थियाँ गङ्गामें रहती हैं, उतने हजार वर्षोंतक वह स्वर्गलोकमें पूजित होता है। (गङ्गा) सभी तीर्थोंमें परम तीर्थ और नदियोंमें श्रेष्ठ नदी है, वह सभी प्राणियों, यहाँतक कि महापातकियोंको भी मोक्ष प्रदान करनेवाली है। गङ्गा (स्नान) सर्वत्र सुलभ होनेपर भी गङ्गाद्वार (हरिद्वार), प्रयाग एवं गङ्गासागर—इन तीन स्थानोंमें दुर्लभ होती है। (उत्तम) गतिकी इच्छा करनेवाले तथा पापसे उपहत चित्तवाले सभी प्राणियोंके लिये गङ्गाके समान और कोई दूसरी गति नहीं है॥ ३१–३४॥ |
| पवित्राणां पवित्रं च मङ्गलानां च मङ्गलम्।<br>माहेश्वरात् परिभ्रष्टा सर्वपापहरा शुभा ॥ ३५ ॥<br><br>कृते युगे तु तीर्थानि त्रेतायां पुष्करं परम्।<br>द्वापरे तु कुरुक्षेत्रं कलौ गङ्गा विशिष्यते ॥ ३६ ॥<br><br>गङ्गामेव निषेवेत प्रयागे तु विशेषतः।<br>नान्यत् कलियुगोद्भूतं मलं हन्तुं सुदुष्कृतम् ॥ ३७ ॥ | यह सभी पवित्र वस्तुओंसे अधिक पवित्र और सभी मङ्गलकारी पदार्थोंसे अधिक माङ्गलिक है। महेश्वर (-के मस्तक)-से होकर इस लोकमें आनेके कारण यह सभी पापोंका हरण करनेवाली और शुभ है। सत्ययुगमें अनेक तीर्थ होते हैं, त्रेताका श्रेष्ठ तीर्थ पुष्कर है, द्वापरका कुरुक्षेत्र है और कलियुगमें गङ्गाकी ही विशेषता है। गङ्गाकी ही सेवा करनी चाहिये, विशेष-रूपसे प्रयागमें गङ्गाकी सेवा करनी चाहिये। कलियुगमें उत्पन्न अत्यन्त कठिन पापको दूर करनेमें कोई अन्य तीर्थ समर्थ नहीं है॥ ३५–३७॥ |
* प्रयाग-संगमके समीप कोई तट-विशेष।
| * अध्याय ३६ * | २०९ |
|---|
| अकामो वा सकामो वा गङ्गायां यो विपद्यते ।<br>स मृतो जायते स्वर्गे नरकं च न पश्यति ॥ ३८ ॥ | इच्छा अथवा अनिच्छापूर्वक जो गङ्गामें मृत्यु प्राप्त करता है, वह मृत व्यक्ति स्वर्ग जाता है और नरकका दर्शन नहीं करता ॥ ३८ ॥ |
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे पञ्चत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३५ ॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें पैंतीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ३५ ॥
छत्तीसवॉँ अध्याय
प्रयाग-माहात्म्य, माघमासमें संगमस्नानका फल, त्रिमाघीकी महिमा, प्रयागमें प्राण-त्याग करनेका फल
| मार्कण्डेय उवाच | मार्कण्डेयने कहा— |
|---|---|
| षष्टितीर्थसहस्राणि षष्टितीर्थशतानि च।<br>माघमासे गमिष्यन्ति गङ्गायमुनसंगमम् ॥ १ ॥<br><br>गवां शतसहस्रस्य सम्यग् दत्तस्य यत् फलम्।<br>प्रयागे माघमासे तु त्र्यहं स्नातस्य तत् फलम् ॥ २ ॥<br><br>गङ्गायमुनयोर्मध्ये कार्षाग्निं यस्तु साधयेत्।<br>अहीनाङ्गोऽप्यरोगश्च पञ्चेन्द्रियसमन्वितः ॥ ३ ॥ | (युधिष्ठिर !) गङ्गा और यमुनाके संगमपर माघ महीनेमें साठ हजार साठ सौ तीर्थ जाते हैं। सौ हजार गौओंका भलीभाँति दान करनेका जो फल होता है, वही फल प्रयागमें माघमासमें तीन दिन स्नान करनेका होता है। गङ्गा और यमुनाके संगमपर जो करीषाग्निका* सेवन करता है, वह अहीनाङ्ग (हीन अङ्गसे रहित) अर्थात् सम्पूर्ण अवयवोंसे सम्पन्न, रोगरहित तथा पाँचों इन्द्रियोंसे युक्त होता है ॥ १—३ ॥ |
| यावन्ति रोमकूपाणि तस्य गात्रेषु मानद।<br>तावद्वर्षसहस्राणि स्वर्गलोके महीयते ॥ ४ ॥<br><br>ततः स्वर्गात् परिभ्रष्टो जम्बूद्वीपपतिर्भवेत्।<br>स भुक्त्वा विपुलान् भोगॉंस्तत् तीर्थं भजते पुनः॥ ५ ॥ | मान देनेवाले (युधिष्ठिर) ! उस मनुष्यके शरीरमें जितने रोमकूप होते हैं, उतने हजार वर्षोंतक वह स्वर्गलोकमें पूजित होता है। तदनन्तर स्वर्गसे भ्रष्ट होनेपर वह जम्बूद्वीपका स्वामी होता है और विपुल भोगोंका उपभोग करनेके अनन्तर वह पुनः इस तीर्थ (प्रयाग)-को प्राप्त करता है ॥ ४-५ ॥ |
| जलप्रवेशं यः कुर्यात् संगमे लोकविश्रुते।<br>राहुग्रस्तो यथा सोमो विमुक्तः सर्वपातकैः॥ ६ ॥<br><br>सोमलोकमवाप्नोति सोमेन सह मोदते।<br>षष्टिं वर्षसहस्राणि षष्टिं वर्षशतानि च॥ ७ ॥<br><br>स्वर्गतः शक्रलोकेऽसौ मुनिगन्धर्वसेवितः।<br>ततो भ्रष्टस्तु राजेन्द्र समृद्धे जायते कुले ॥ ८ ॥<br><br>अधःशिरास्त्वयोधारामूर्ध्वपादः पिबेन्नरः।<br>शतं वर्षसहस्राणि स्वर्गलोके महीयते ॥ ९ ॥ | (गङ्गा-यमुनाके) लोक-प्रसिद्ध संगमपर जो जलमें प्रवेश करता है, वह जिस प्रकार राहुसे ग्रस्त चन्द्रमा मुक्त हो जाता है, वैसे ही सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है। वह चन्द्रलोकमें जाता है और साठ हजार साठ सौ वर्षोंतक चन्द्रमाके साथ आनन्दोपभोग करता है। हे राजेन्द्र ! तदुपरान्त मुनियों एवं गन्धर्वोंसे सेवित वह स्वर्गलोकसे इन्द्रलोकमें जाता है और वहाँसे भ्रष्ट होनेपर इस लोकमें आकर धनवानोंके कुलमें जन्म लेता है। जो मनुष्य (यहाँ प्रयागमें) पैर ऊपर और सिर नीचे करके लोहेकी धाराका पान (तपस्या-विशेष) करता है, वह सौ हजार वर्षोंतक स्वर्गलोकमें पूजित होता है ॥ ६—९ ॥ |
* करीष—सूखा गोमय। इससे अग्नि बनाकर उसके मध्य तपस्या करना।
२१० * कूर्मपुराण *
तस्माद् भ्रष्टस्तु राजेन्द्र अग्निहोत्री भवेन्नरः।
भुक्त्वा तु विपुलान् भोगांस्तत् तीर्थं भजते पुनः॥ १०॥
यः स्वदेहं विकर्तेद् वा शकुनिभ्यः प्रयच्छति।
विहगैरुपभुक्तस्य शृणु तस्यापि यत्फलम्॥ ११॥
शतं वर्षसहस्राणि सोमलोके महीयते।
ततस्तस्मात् परिभ्रष्टो राजा भवति धार्मिकः॥ १२॥
गुणवान् रूपसम्पन्नो विद्वान् सुप्रियवाक्यवान्।
भुक्त्वा तु विपुलान् भोगांस्तत् तीर्थं भजते पुनः॥ १३॥
उत्तरे यमुनातीरे प्रयागस्य तु दक्षिणे।
ऋणप्रमोचनं नाम तीर्थं तु परमं स्मृतम्॥ १४॥
एकरात्रोषितः स्नात्वा ऋणैस्तत्र प्रमुच्यते।
सूर्यलोकमवाप्नोति अनृणश्च सदा भवेत्॥ १५॥
राजेन्द्र! वहाँसे भ्रष्ट होनेपर वह मनुष्य अग्निहोत्री होता है और विपुल भोगोंका उपभोग करके पुनः इस (प्रयाग) तीर्थका सेवन करता है। जो अपना शरीर काटता^१ है अथवा पक्षियोंको देता है, ऐसे पक्षियोंद्वारा खाये गये (मांसवाले) उस पुरुषको भी जो फल प्राप्त होता है, उसे सुनो— ॥ १०-११॥
वह सौ हजार वर्षोंतक चन्द्रलोकमें पूजित होता है, तदनन्तर वहाँसे च्युत होनेपर धार्मिक, गुणवान्, रूपसम्पन्न, विद्वान् और सुन्दर तथा प्रिय वचन बोलनेवाला राजा होता है एवं विपुल भोगोंको भोगकर पुनः इस तीर्थका सेवन करता है। प्रयागके दक्षिणमें यमुनाके उत्तरी तटपर ऋणप्रमोचन नामका एक श्रेष्ठ तीर्थ कहा गया है। वहाँ स्नानकर एकरात्रिपर्यन्त निवास करनेवाला पुरुष ऋणोंसे मुक्त हो जाता है, सूर्यलोक प्राप्त करता है तथा सदाके लिये ऋणमुक्त हो जाता है॥ १२-१५॥
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे षट्त्रिंशोऽध्यायः॥ ३६॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें छत्तीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ३६॥
सैंतीसवाँ अध्याय
प्रयाग-माहात्म्य, यमुनाकी महिमा, यमुनाके तटवर्ती तीर्थोंका वर्णन, गङ्गामें सभी तीर्थोंकी स्थिति, मार्कण्डेय-युधिष्ठिर-संवादकी समाप्ति
मार्कण्डेय उवाच
तपनस्य सुता देवी त्रिषु लोकेषु विश्रुता।
समागता महाभागा यमुना यत्र निम्नगा॥ १॥
येनैव निःसृता गङ्गा तेनैव यमुना गता।
योजनानां सहस्रेषु कीर्तनात् पापनाशिनी॥ २॥
तत्र स्नात्वा च पीत्वा च यमुनायां युधिष्ठिर।
सर्वपापविनिर्मुक्तः पुनात्यासप्तमं कुलम्।
प्राणांस्त्यजति यस्तत्र स याति परमां गतिम्॥ ३॥
अग्नितीर्थमिति ख्यातं यमुनादक्षिणे तटे।
पश्चिमे धर्मराजस्य तीर्थं त्वनरकं स्मृतम्।
तत्र स्नात्वा दिवं यान्ति ये मृतास्तेऽपुनर्भवाः॥ ४॥
मार्कण्डेयने कहा— (राजन् युधिष्ठिर!) सूर्यकी तीनों लोकोंमें विख्यात पुत्री महाभागा देवी यमुना नदी यहाँपर मिली हैं। जिस मार्गसे गङ्गा प्रवाहित हुई हैं, उस मार्गसे यमुना भी गयी हैं। सहस्रों योजन दूरपर भी (यमुना) नाम लेनेसे पापोंको नष्ट कर देनेवाली है। युधिष्ठिर! इस यमुनामें स्नान करने तथा इसका जल पीनेसे मनुष्य सभी पापोंसे मुक्त होकर अपने सात पीढ़ियोंके कुलोंको पवित्र कर देता है। जो यहाँ प्राणोंका परित्याग करता है, वह परम गतिको प्राप्त करता है। यमुनाके दक्षिणी तटपर अग्नितीर्थ नामका एक विख्यात तीर्थ है। यमुनाके पश्चिमी भागमें धर्मराजका 'अनरक'^२ नामक तीर्थ कहा गया है। यहाँ स्नान करनेवाले स्वर्ग जाते हैं और जो यहाँ मृत्युको प्राप्त होते हैं, उनका पुनर्जन्म नहीं होता॥ १-४॥
१-ज्ञानकी पराकाष्ठामें शरीरके प्रति ममताका सर्वथा अभाव हो जाता है। ऐसी स्थितिमें शरीरका काटना या अपने शरीरका मांस पक्षियोंको समर्पित करना (प्राणि-कल्याण-बुद्धिमात्रसे) विशेष तप है। दधीचि, शिवि, जीमूतवाहन आदिके दृष्टान्त द्रष्टव्य हैं।
२-न नरक = अनरक इस तीर्थमें स्नान आदि करनेसे नरकमें नहीं जाना पड़ता, इसलिये इसका नाम 'अनरक' है।
- अध्याय ३७ * | २११ ---|---:
| कृष्णपक्षे चतुर्दश्यां स्नात्वा संतर्पयेच्छुचिः ।<br>धर्मराजं महापापैर्मुच्यते नात्र संशयः ॥ ५ ॥<br><br>दश तीर्थसहस्राणि त्रिंशत्कोट्यस्तथापराः ।<br>प्रयागे संस्थितानि स्युरेवमाहुर्मनीषिणः ॥ ६ ॥ | यहाँ (अनर्क तीर्थमें) कृष्णपक्षकी चतुर्दशीको स्नान करके पवित्रतापूर्वक जो धर्मराजका तर्पण करता है, वह निस्संदेह महापापोंसे मुक्त हो जाता है। मनीषी लोगोंका यह कहना है कि प्रयागमें दस हजार (प्रधान) तीर्थ और तीस करोड़ दूसरे (अप्रधान) तीर्थ स्थित हैं॥ ५-६॥ |
| तिस्रः कोट्योऽर्धकोटी च तीर्थानां वायुरब्रवीत् ।<br>दिवि भूम्यन्तरिक्षे च तत्सर्वं जाह्नवी स्मृता ॥ ७ ॥<br><br>यत्र गङ्गा महाभागा स देशस्तत् तपोवनम् ।<br>सिद्धिक्षेत्रं तु तज्ज्ञेयं गङ्गातीरसमाश्रितम् ॥ ८ ॥<br><br>यत्र देवो महादेवो देव्या सह महेश्वरः ।<br>आस्ते वटेश्वरो नित्यं तत् तीर्थं तत् तपोवनम् ॥ ९ ॥<br><br>इदं सत्यं द्विजातीनां साधूनामात्मजस्य च ।<br>सुहृदां च जपेत् कर्णे शिष्यस्यानुगतस्य तु ॥ १० ॥ | वायुने कहा है कि द्युलोक, भूलोक और अन्तरिक्षमें साढ़े तीन करोड़ तीर्थ हैं और जाह्नवी उन सभी तीर्थोंसे युक्त कही गयी है। जहाँ महाभागा गङ्गा होती हैं, वही (पवित्र) देश है और वही तपोवन होता है। गङ्गाके तटपर स्थित उस स्थानको सिद्धिक्षेत्र समझना चाहिये। जहाँ देवीके साथ महादेव महेश्वरदेव वटेश्वर* स्थित हैं, वह स्थान नित्य तीर्थ है और वह तपोवन है। इस सत्यको द्विजातियों, साधुओं, मित्रों, अपने पुत्र तथा अनुगामी शिष्यके कानमें कहना चाहिये॥ ७—१०॥ |
| इदं धन्यमिदं स्वर्ग्यमिदं मेध्यमिदं सुखम् ।<br>इदं पुण्यमिदं रम्यं पावनं धर्म्यमुत्तमम् ॥ ११ ॥<br><br>महर्षीणामिदं गुह्यं सर्वपापप्रमोचनम् ।<br>अत्राधीत्य द्विजोऽध्यायं निर्मलत्वमवाप्नुयात् ॥ १२ ॥<br><br>यश्चेदं शृणुयान्नित्यं तीर्थं पुण्यं सदा शुचिः ।<br>जातिस्मरत्वं लभते नाकपृष्ठे च मोदते ॥ १३ ॥<br><br>प्राप्यन्ते तानि तीर्थानि सद्भिः शिष्टानुदर्शिभिः ।<br>स्नाहि तीर्थेषु कौरव्य न च वक्रमतिर्भव ॥ १४ ॥ | यह (प्रयाग) धन्य है, स्वर्गफलप्रद (स्वर्गरूप फलको देनेवाला) है, यह पवित्र, सुख, पुण्य, रमणीय, पावन और उत्तम धर्मयुक्त है। यह महर्षियोंके लिये गोपनीय रहस्य है। सभी पापोंको नष्ट करनेवाला है। यहाँ द्विज वेदका स्वाध्याय कर निर्मल हो जाता है। जो व्यक्ति नित्य पवित्रतापूर्वक इस पुण्यप्रद तीर्थका वर्णन सुनता है, वह जन्मान्तरकी बातोंको स्मरण करनेवाला हो जाता है और स्वर्गलोकमें आनन्द प्राप्त करता है। शिष्ट मार्गका अनुसरण करनेवाले सज्जन पुरुष ऐसे तीर्थोंमें जाते हैं। कुरुके वंशधर (युधिष्ठिर)! तीर्थोंमें स्नान करो। इस विषयमें विपरीत बुद्धिवाले मत होओ॥ ११—१४॥ |
| एवमुक्त्वा स भगवान् मार्कण्डेयो महामुनिः ।<br>तीर्थानि कथयामास पृथिव्यां यानि कानिचित् ॥ १५ ॥<br><br>भूसमुद्रादिसंस्थानं प्रमाणं ज्योतिषां स्थितम् ।<br>पृष्टः प्रोवाच सकलमुक्त्वाथ प्रययौ मुनिः ॥ १६ ॥ | ऐसा कहकर उन भगवान् मार्कण्डेय महामुनिने (युधिष्ठिरके द्वारा) पूछे जानेपर पृथ्वीमें जो कोई भी तीर्थ थे उन्हें बतलाया और पृथ्वी तथा समुद्र आदिकी स्थिति एवं नक्षत्रोंकी स्थितिका सम्पूर्ण वर्णन कर वे मुनि चले गये॥ १५-१६॥ |
| य इदं कल्यमुत्थाय पठतेऽथ शृणोति वा ।<br>मुच्यते सर्वपापेभ्यो रुद्रलोकं स गच्छति ॥ १७ ॥ | प्रातःकाल उठकर जो इस (प्रयाग-माहात्म्य)-का पाठ करता है अथवा इसे सुनता है, वह सभी पापोंसे मुक्त होकर रुद्रलोकमें जाता है॥ १७॥ |
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे सप्तत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३७ ॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें सैंतीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ३७॥
* प्रयागमें स्थित विशाल वटवृक्षके नीचे प्रतिष्ठित लिङ्ग वटेश्वर लिङ्ग है।
२१२ * कूर्मपुराण *
अड़तीसवाँ अध्याय
भुवनकोश-वर्णनमें राजा प्रियव्रतके वंशका वर्णन, प्रियव्रतके पुत्र राजा अग्नीध्रके वंशका वर्णन, जम्बू आदि सात द्वीपोंका तथा वर्षोंका वर्णन, जम्बूद्वीपके नौ वर्षोंमें राजा अग्नीध्रके नाभि, किंपुरुष आदि नौ पुत्रोंका आधिपत्य
| श्रीकूर्म उवाच | श्रीकूर्मने कहा— |
|---|---|
| एवमुक्तास्तु मुनयो नैमिषीया महामतिम्।<br>पप्रच्छुरुत्तरं सूतं पृथिव्यादिविनिर्णयम् ॥ १ ॥ | ऐसा कहे जानेपर नैमिषारण्यमें निवास करनेवाले मुनियोंने महाबुद्धिमान् सूतजीसे पृथ्वी आदिके सम्बन्धमें निर्णय पूछा—॥ १ ॥ |
| ऋषय ऊचुः | ऋषियोंने कहा— |
| कथितो भवता सूत सर्गः स्वायम्भुवः शुभः।<br>इदानीं श्रोतुमिच्छामस्त्रैलोक्यस्यास्य मण्डलम् ॥ २ ॥<br>यावन्तः सागरा द्वीपास्तथा वर्षाणि पर्वताः।<br>वनानि सरितः सूर्यग्रहाणां स्थितिरैव च ॥ ३ ॥<br>यदाधारमिदं कृत्स्नं येषां पृथ्वी पुरा त्वियम्।<br>नृपाणां तत्समासेन सूत वक्तुमिहार्हसि ॥ ४ ॥ | हे सूतजी! आपने स्वायम्भुव मन्वन्तरकी शुभ सृष्टिको बतलाया, अब इस समय हम लोग त्रैलोक्य-मण्डलका वर्णन सुनना चाहते हैं। जितने सागर, द्वीप, वर्ष, पर्वत, वन तथा नदियाँ हैं और सूर्य आदि ग्रहोंकी जो स्थिति है, इन सभीका वर्णन करें। हे सूतजी! यह सब कुछ जिसके आधारपर टिका है और प्राचीन कालमें यह पृथ्वी जिन राजाओंके अधिकारमें रही है, उन सभी विषयोंका संक्षेपमें आप वर्णन करें ॥ २–४ ॥ |
| सूत उवाच | सूतजीने कहा— |
| वक्ष्ये देवादिदेवाय विष्णवे प्रभविष्णवे।<br>नमस्कृत्याप्रमेयाय यदुक्तं तेन धीमता ॥ ५ ॥ | देवोंके आदिदेव, अप्रमेय, प्रभविष्णु विष्णुको नमस्कार कर मैं उन धीमान्द्वारा जो कुछ कहा गया है, उसे बताता हूँ—॥ ५ ॥ |
| स्वायम्भुवस्य तु मनोः प्रागुक्तो यः प्रियव्रतः।<br>पुत्रस्तस्याभवन् पुत्राः प्रजापतिसमा दश ॥ ६ ॥<br>अग्नीध्रश्चाग्निबाहुश्च वपुष्मान् द्युतिमांस्तथा।<br>मेधा मेधातिथिर्हव्यः सवनः पुत्र एव च ॥ ७ ॥<br>ज्योतिष्मान् दशमस्तेषां महाबलपराक्रमः।<br>धार्मिको दाननिरतः सर्वभूतानुकम्पकः ॥ ८ ॥<br>मेधाग्निबाहुपुत्रास्तु त्रयो योगपरायणाः।<br>जातिस्मरा महाभागा न राज्ये दधिरे मतिम् ॥ ९ ॥<br>प्रियव्रतोऽभ्यषिञ्चद् वै सप्तद्वीपेषु सप्त तान्।<br>जम्बूद्वीपेश्वरं पुत्रमग्नीध्रमकरोन्नृपः ॥ १० ॥<br>प्लक्षद्वीपेश्वरश्चैव तेन मेधातिथिः कृतः।<br>शाल्मलेशं वपुष्मन्तं नरेन्द्रमभिषिक्तवान् ॥ ११ ॥ | पूर्वमें स्वायम्भुव मनुके जिस प्रियव्रत नामक पुत्रका वर्णन किया गया है उस (प्रियव्रत)-को प्रजापतिके समान दस पुत्र हुए। अग्नीध्र, अग्निबाहु, वपुष्मान्, द्युतिमान्, मेधा, मेधातिथि, हव्य, सवन और पुत्र तथा महान् बलशाली एवं पराक्रमी, धार्मिक, दानपरायण और सभी प्राणियोंपर दया करनेवाला ज्योतिष्मान् नामक दसवाँ पुत्र था। मेधा, अग्निबाहु तथा पुत्र—ये तीनों योगपरायण थे। पूर्वजन्मोंका स्मरण करनेवाले इन महाभाग्यशालियों (विरक्तों)-का मन राज्यकार्यमें नहीं लगा। (अतः) प्रियव्रतने (अपने अन्य) उन सात पुत्रोंको सात द्वीपोंमें अभिषिक्त कर दिया। राजाने अग्नीध्र नामक पुत्रको जम्बूद्वीपका स्वामी बनाया। उन्होंने मेधातिथिको प्लक्षद्वीपका राजा बनाया और वपुष्मान्को शाल्मलि-द्वीपमें राजाके रूपमें अभिषिक्त किया ॥ ६–११ ॥ |
| ज्योतिष्मन्तं कुशद्वीपे राजानं कृतवान् प्रभुः।<br>द्युतिमन्तं च राजानं क्रौञ्चद्वीपे समादिशत् ॥ १२ ॥<br>शाकद्वीपेश्वरं चापि हव्यं चक्रे प्रियव्रतः।<br>पुष्कराधिपतिं चक्रे सवनं च प्रजापतिः ॥ १३ ॥ | प्रभु (प्रियव्रत)-ने ज्योतिष्मान्को कुशद्वीपका राजा बनाया और द्युतिमान्को क्रौञ्चद्वीपका राजा बननेका आदेश दिया। प्रजापति प्रियव्रतने हव्यको शाकद्वीपका स्वामी बनाया और सवनको पुष्करद्वीपका अधिपति बनाया ॥ १२–१३ ॥ |
- अध्याय ३८ * २१३
पुष्करे सवनस्यापि महावीतः सुतोऽभवत्। धातकिश्चैव द्वावेतौ पुत्रौ पुत्रवतां वरौ ॥ १४॥ महावीतं स्मृतं वर्षं तस्य नाम्ना महात्मनः। नाम्ना तु धातकेश्चापि धातकीखण्डमुच्यते ॥ १५॥ शाकद्वीपेश्वरस्याथ हव्यस्याप्यभवन् सुताः। जलदश्च कुमारश्च सुकुमारो मणीचकः। कुसुमोत्तरोऽथ मोदाकिः सप्तमः स्यान्महाद्रुमः ॥ १६॥ जलदं जलदस्याथ वर्षं प्रथममुच्यते। कुमारस्य तु कौमारं तृतीयं सुकुमारकम् ॥ १७॥ मणीचकं चतुर्थं तु पञ्चमं कुसुमोत्तरम्। मोदाकं षष्ठमित्युक्तं सप्तमं तु महाद्रुमम् ॥ १८॥ क्रौञ्चद्वीपेश्वरस्यापि सुता द्युतिमतोऽभवन्। कुशलः प्रथमस्तेषां द्वितीयस्तु मनोहरः ॥ १९॥ उष्णास्तृतीयः सम्प्रोक्तश्चतुर्थः प्रवरः स्मृतः। अन्धकारो मुनिश्चैव दुन्दुभिश्चैव सप्तमः। तेषां स्वनामभिर्देशाः क्रौञ्चद्वीपाश्रयाः शुभाः ॥ २०॥ ज्योतिष्मतः कुशद्वीपे सप्तैवासन् महौजसः। उद्भेदो वेणुमांश्चैवाश्वरथो लम्बनो धृतिः। षष्ठः प्रभाकरश्चापि सप्तमः कपिलः स्मृतः ॥ २१॥ स्वनामचिह्नितान् यत्र तथा वर्षाणि सुव्रताः। ज्ञेयानि सप्त तान्येषु द्वीपेष्वेवं नयो मतः ॥ २२॥ शाल्मलद्वीपनाथस्य सुताश्चासन् वपुष्मतः। श्वेतश्च हरितश्चैव जीमूतो रोहितस्तथा। वैद्युतो मानसश्चैव सप्तमः सुप्रभो मतः ॥ २३॥ प्लक्षद्वीपेश्वरस्यापि सप्त मेधातिथेः सुताः। ज्येष्ठः शान्तभयस्तेषां शिशिरश्च सुखोदयः। आनन्दश्च शिवश्चैव क्षेमकश्च ध्रुवस्तथा ॥ २४॥ प्लक्षद्वीपादिषु ज्ञेयः शाकद्वीपान्तिकेषु वै। वर्णाश्रमविभागेन स्वधर्मो मुक्तये द्विजाः ॥ २५॥ जम्बूद्वीपेश्वरस्यापि पुत्रास्त्वासन् महाबलाः। अग्नीध्रस्य द्विजश्रेष्ठास्तन्नामानि निबोधत ॥ २६॥ नाभिः किंपुरुषश्चैव तथा हरिरिलावृतः। रम्यो हिरणवांश्च कुरुर्भद्राश्वः केतुमालकः ॥ २७॥ जम्बूद्वीपेश्वरो राजा स चाग्नीध्रो महामतिः। विभज्य नवधा तेभ्यो यथान्यायं ददौ पुनः ॥ २८॥
पुष्करमें सवनको भी महावीत तथा धातकि नामक दो पुत्र हुए। पुत्रवानोंके पुत्रोंमें ये दोनों ही पुत्र श्रेष्ठ थे। उन महात्मा (महावीत)-के नामसे उस वर्षको महावीतवर्ष कहा गया है और धातकिके भी नामसे धातकिखण्ड कहा जाता है। शाकद्वीपके राजा हव्यको जलद, कुमार, सुकुमार, मणीचक, कुसुमोत्तर तथा मोदाकि एवं सातवाँ महाद्रुम नामक पुत्र हुआ॥ १४—१६॥
(इन सातों पुत्रोंके राज्यक्षेत्र इनके नामसे एक-एक वर्ष कहलाये—इसीलिये) जलदका जलद नामक प्रथम वर्ष कहा जाता है। कुमारका कौमार नामक वर्ष, इसी प्रकार तीसरा सुकुमारक (वर्ष), चौथा मणीचक, पाँचवाँ कुसुमोत्तर, छठा मोदाक और सातवाँ महाद्रुम नामक वर्ष है। क्रौञ्चद्वीपके राजा द्युतिमान्को भी पुत्र हुए। उनमें कुशल पहला, मनोहर दूसरा, उष्ण तीसरा पुत्र कहा गया है और चौथा पुत्र प्रवर नामसे जाना जाता है। इसी प्रकार अन्धकार (पाँचवाँ), मुनि (छठा) तथा दुन्दुभि सातवाँ पुत्र था। उनके (अपने ही) नामसे प्रसिद्ध सुन्दर देश क्रौञ्चद्वीपमें स्थित हैं। कुशद्वीपमें ज्योतिष्मान्को महान् ओजस्वी सात पुत्र हुए। उद्भेद, वेणुमान्, अश्वरथ, लम्बन, धृति तथा छठा प्रभाकर और सातवाँ कपिल कहा गया है॥ १७—२१॥
हे सुव्रतो! इस (कुशद्वीप)-में उनके नामसे युक्त वर्ष हैं। इसी प्रकार उन अन्य द्वीपोंमें भी स्थिति समझनी चाहिये। शाल्मलद्वीपके स्वामी वपुष्मान्के श्वेत, हरित, जीमूत, रोहित, वैद्युत और मानस तथा सातवें सुप्रभ नामक पुत्र थे। प्लक्षद्वीपके राजा मेधातिथिके भी सात पुत्र हुए। उनमें ज्येष्ठ पुत्र शान्तभय था। इसके अतिरिक्त शिशिर, सुखोदय, आनन्द, शिव, क्षेमक तथा ध्रुव नामक पुत्र थे॥ २२—२४॥
द्विजो! प्लक्षद्वीप आदिसे लेकर शाकद्वीपतक वर्ण और आश्रमके भेदसे स्वधर्म (पालन)-को मुक्तिका साधन समझना चाहिये। हे श्रेष्ठ द्विजो! जम्बूद्वीपके अधिपति अग्नीध्रके भी महान् बलशाली पुत्र थे, उनके नाम सुनो—नाभि, किंपुरुष, हरि, इलावृत, रम्य, हिरण्वान्, कुरु, भद्राश्व तथा केतुमालक नामक नौ पुत्र थे॥ २५—२७॥
जम्बूद्वीपेश्वर महामति उन राजा अग्नीध्रने (जम्बूद्वीपको) नौ भागोंमें बाँटकर न्यायानुसार उन (पुत्रों)-को दे दिया॥ २८॥
२१४ * कूर्मपुराण *
नाभेस्तु दक्षिणं वर्षं हिमाह्वं प्रददौ पुनः।
हेमकूटं ततो वर्षं ददौ किंपुरुषाय तु॥ २९॥
तृतीयं नैषधं वर्षं हरये दत्तवान् पिता।
इलावृताय प्रददौ मेरुमध्यमिलावृतम्॥ ३०॥
नीलाचलाश्रितं वर्षं रम्याय प्रददौ पिता।
श्वेतं यदुत्तरं वर्षं पित्रा दत्तं हिरण्वते॥ ३१॥
यदुत्तरं शृङ्गवतो वर्षं तत् कुरवे ददौ।
मेरोः पूर्वेण यद् वर्षं भद्राश्वाय न्यवेदयत्।
गन्धमादनवर्षं तु केतुमालाय दत्तवान्॥ ३२॥
वर्षेष्वेतेषु तान् पुत्रानभिषिच्य नराधिपः।
संसारकष्टतां ज्ञात्वा तपस्तेपे वनं गतः॥ ३३॥
हिमाह्वयं तु यस्यैतन्नाभेरासीन्महात्मनः।
तस्यार्षभोऽभवत् पुत्रो मरुदेव्यां महाद्युतिः॥ ३४॥
ऋषभाद् भरतो जज्ञे वीरः पुत्रशताग्रजः।
सोऽभिषिच्यर्षभः पुत्रं भरतं पृथिवीपतिः।
वानप्रस्थाश्रमं गत्वा तपस्तेपे यथाविधि॥ ३५॥
तपसा कर्षितोऽत्यर्थं कृशो धमनिसंततः।
ज्ञानयोगरतो भूत्वा महापाशुपतोऽभवत्॥ ३६॥
सुमतिर्भरतस्याभूत् पुत्रः परमधार्मिकः।
सुमतेस्तैजसस्तस्मादिन्द्रद्युम्नो व्यजायत॥ ३७॥
परमेष्ठी सुतस्तस्मात् प्रतीहारस्तदन्वयः।
प्रतिहर्तेति विख्यात उत्पन्नस्तस्य चात्मजः॥ ३८॥
भवस्तस्मादथोग्दीथः प्रस्तावस्तत्सुतोऽभवत्।
पृथुस्ततस्ततो रक्तो रक्तस्यापि गयः सुतः॥ ३९॥
नरो गयस्य तनयस्तस्य पुत्रो विराडभूत्।
तस्य पुत्रो महावीर्यो धीमांस्तस्मादजायत॥ ४०॥
महान्तोऽपि ततश्चाभूद् भौवनस्तत्सुतोऽभवत्।
त्वष्टा त्वष्टुश्च विरजो रजस्तस्याप्यभूत् सुतः॥ ४१॥
(अग्नीध्रने) नाभिको दक्षिण दिशामें स्थित हिम नामक वर्ष प्रदान किया। तदनन्तर किंपुरुषको हेमकूट नामक वर्ष दिया। पिता (अग्नीध्र)-ने हरिको तृतीय नैषध नामक वर्ष प्रदान किया और इलावृतको मेरुके मध्यमें स्थित इलावृत (नामक वर्ष) दिया। पिताने रम्यको नीलाचलयुक्त वर्ष प्रदान किया और जो उत्तरमें स्थित श्वेतवर्ष है, उसे हिरण्वान्को दिया। शृंगवान् पर्वतके उत्तरमें स्थित (उत्तरकुरु नामक) वर्ष कुरुको दिया और मेरुके पूर्वमें स्थित (भद्राश्व नामक) वर्ष भद्राश्वको दिया तथा गन्धमादन नामक वर्ष केतुमालको प्रदान किया॥ २९-३२॥
इन वर्षोंमें अपने पुत्रोंको अभिषिक्त कर राजा (अग्नीध्र) संसारके कष्टको जानकर तपस्या करनेके लिये वनमें चले गये। जिन महात्मा नाभिके पास हिम नामक वर्ष था, उन्हें मरुदेवीसे महान् द्युतिमान् ऋषभ नामक पुत्र हुआ। ऋषभको सौ पुत्रोंमें सबसे ज्येष्ठ भरत नामक वीर पुत्र उत्पन्न हुआ। भरत नामक पुत्रको पृथ्वीके अधिपति के रूपमें अभिषिक्त कर राजा ऋषभ वानप्रस्थाश्रमका आश्रय लेकर यथाविधि तप करने लगे। तपस्यासे अत्यन्त क्षीण होनेके कारण वे इतने कृश हो गये कि उनके शरीरकी नाड़ियाँ दीखती थीं। (तपःपूत वे) ज्ञानयोगपरायण होकर महापाशुपत* हो गये॥ ३३-३६॥
(उन) भरतको भी सुमति नामक परम धार्मिक पुत्र हुआ। सुमतिका पुत्र तैजस और उस (तैजस)-से इन्द्रद्युम्न उत्पन्न हुआ। उस इन्द्रद्युम्नका पुत्र परमेष्ठी हुआ और उस (परमेष्ठी)-का पुत्र प्रतीहार हुआ। उस प्रतीहारका जो पुत्र उत्पन्न हुआ, वह प्रतिहर्ताके नामसे विख्यात हुआ। उससे भव, भवसे उद्गीथ तथा उस (उद्गीथ)-से प्रस्ताव नामक पुत्रकी उत्पत्ति हुई। उस (प्रस्ताव)-से पृथु एवं पृथुसे रक्त उत्पन्न हुआ और रक्तको भी गय नामक पुत्र हुआ। गयका पुत्र नर और उसका पुत्र विराट् हुआ। उस (विराट्)-का पुत्र महावीर्य और उससे धीमान् (नामक पुत्र) उत्पन्न हुआ॥ ३७-४०॥
उस (धीमान्)-से महान्त नामक पुत्र हुआ और उसका पुत्र भौवन हुआ। उस (भौवन)-का त्वष्टा हुआ। उस (त्वष्टा)-से विरज तथा विरजसे रज नामक पुत्र उत्पन्न हुआ॥ ४१॥
* पाशुपत (पशुपति-महादेवको परम ध्येय माननेवाला) व्रत है। इसमें पूर्ण परिनिष्ठित परम विरक्त मनुष्य महापाशुपत कहा जाता है।
- अध्याय ३९ * २१५
| शतजिद् रजसस्तस्य जज्ञे पुत्रशतं द्विजाः।<br>तेषां प्रधानो बलवान् विश्वज्योतिरिति स्मृतः॥ ४२॥ | द्विजो! उस रजस्को शतजित् नामक पुत्र हुआ और उसके सौ पुत्र हुए। उनमें जो प्रधान और बलवान् था, वह विश्वज्योति नामसे प्रसिद्ध हुआ। देव ब्रह्माकी आराधना कर (विश्वज्योतिने) क्षेमक नामके महाबाहु और शत्रुमर्दन तथा धर्मज्ञ राजाको पुत्ररूपमें उत्पन्न किया॥ ४२-४३॥ |
| आराध्य देवं ब्रह्माणं क्षेमकं नाम पार्थिवम्।<br>असूत पुत्रं धर्मज्ञं महाबाहुमरिंदमम्॥ ४३॥ | |
| एते पुरस्ताद् राजानो महासत्त्वा महौजसः।<br>एषां वंशप्रसूतैश्च भुक्तेयं पृथिवी पुरा॥ ४४॥ | पूर्वकालमें ये महासत्त्वसम्पन्न और महान् ओजस्वी राजा थे। इनके वंशमें उत्पन्न लोगोंने प्राचीन कालमें इस पृथिवीका उपभोग किया॥ ४४॥ |
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे अष्टात्रिंशोऽध्यायः॥ ३८॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें अड़तीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ३८॥
उनतालीसवाँ अध्याय
'भू' आदि सात लोकोंका वर्णन, ग्रह-नक्षत्रोंकी स्थितिका वर्णन तथा उनका परिमाप, सूर्यरथका वर्णन, पूर्व आदि दिशाओंमें स्थित इन्द्रादि देवोंकी अमरावती आदि पुरियोंका नाम-निर्देश, सूर्यकी महिमा
| सूत उवाच | सूतजीने कहा— |
|---|---|
| अतः परं प्रवक्ष्यामि संक्षेपेण द्विजोत्तमाः।<br>त्रैलोक्यस्यास्य मानं वो न शक्यं विस्तरेण तु॥ १॥ | हे द्विजोत्तमो! अब मैं आप लोगोंसे संक्षेपमें इस त्रैलोक्यके परिमाणका वर्णन करूँगा, क्योंकि इसका विस्तारसे वर्णन नहीं किया जा सकता। (सृष्टिके आदिमें) भूलोक, भुवर्लोक, स्वर्लोक, महर्लोक, जनलोक, तपोलोक तथा सत्यलोक—ये (सातों) लोक अण्डसे उत्पन्न बताये गये हैं॥ १-२॥ |
| भूर्लोकोऽथ भुवर्लोकः स्वर्लोकोऽथ महस्ततः।<br>जनस्तपश्च सत्यं च लोकास्त्वण्डोद्भवा मताः॥ २॥ | |
| सूर्याचन्द्रमसोर्यावत् किरणैरवभासते।<br>तावद् भूर्लोक आख्यातः पुराणे द्विजपुंगवाः॥ ३॥ | द्विजश्रेष्ठो! सूर्य और चन्द्रमाकी किरणोंसे जहाँतकका भाग प्रकाशित होता है, उतने भागको पुराणमें भूलोक कहा गया है। सूर्यके परिमण्डलसे भूलोकका जितना परिमाण है, उतना ही विस्तार भुवर्लोकका भी सूर्यके मण्डलसे है। आकाशमें ऊपरकी ओर जहाँ ध्रुव (तारा) स्थित है, वहाँतकके मण्डलको स्वर्लोक कहा जाता है। वहाँ वायुकी नेमियाँ* हैं। आवह, प्रवह, अनुवह, संवह, विवह तथा उसके ऊपर परावह और उसके ऊपर परिवह नामक वायुकी सात नेमियाँ हैं। भूमिसे एक लाख योजन ऊपर सूर्यका मण्डल स्थित है॥ ३-७॥ |
| यावत्प्रमाणो भूर्लोको विस्तरात् परिमण्डलात्।<br>भुवर्लोकोऽपि तावान् स्यान्मण्डलाद् भास्करस्य तु॥ ४॥ | |
| ऊर्ध्वं यन्मण्डलाद् व्योम ध्रुवो यावद् व्यवस्थितः।<br>स्वर्लोकः स समाख्यातस्तत्र वायोस्तु नेमयः॥ ५॥ | |
| आवहः प्रवहश्चैव तथैवानुवहः परः।<br>संवहो विवहश्चाथ तदूर्ध्वं स्यात् परावहः॥ ६॥ | |
| तथा परिवहश्चोर्ध्वं वायोर्वै सप्त नेमयः।<br>भूमेर्योजनलक्षे तु भानोर्वै मण्डलं स्थितम्॥ ७॥ |
* चक्र (रथके पहिया)-के ऊपर लोहेकी गोलाकार हाल (परिधि) लगी होती है, इसीके कारण चक्र बिखरता नहीं है। इसी गोलाकार हाल (परिधि)-को नेमि कहते हैं।
२१६ * कूर्मपुराण *
| लक्षे दिवाकरस्यापि मण्डलं शशिनः स्मृतम्।<br>नक्षत्रमण्डलं कृत्स्नं तल्लक्षेण प्रकाशते॥ ८ ॥ | सूर्यसे भी एक लाख (योजन) ऊपरके भागमें चन्द्रमाका मण्डल कहा गया है। उससे एक लाख योजनपर स्थित सम्पूर्ण नक्षत्र-मण्डल प्रकाशित होता है॥ ८॥ |
| द्वे लक्षे ह्युत्तरे विप्रा बुधो नक्षत्रमण्डलात्।<br>तावत्प्रमाणभागे तु बुधस्याप्युशना स्थितः॥ ९ ॥ | हे विप्रो! नक्षत्रमण्डलसे उत्तर दो लाख योजनकी दूरीपर बुध है। बुधसे उतने प्रमाणकी दूरीपर शुक्र स्थित है। शुक्रसे उतने ही प्रमाणपर मंगलकी स्थिति है। |
| अङ्गारकोऽपि शुक्रस्य तत्प्रमाणे व्यवस्थितः।<br>लक्षद्वयेन भौमस्य स्थितो देवपुरोहितः॥ १०॥ | मंगलसे दो लाख योजनकी दूरीपर देवताओंके पुरोहित बृहस्पति स्थित हैं। बृहस्पतिसे दो लाख योजन दूर |
| सौरिर्द्विलक्षेण गुरोर्ग्रहाणामथ मण्डलम्।<br>सप्तर्षिमण्डलं तस्माल्लक्षमात्रे प्रकाशते॥ ११॥ | सूर्यपुत्र शनैश्चर स्थित है। यह ग्रहोंका मण्डल है। ग्रहोंके उस मण्डलसे लाख योजनकी दूरीपर सप्तर्षि-मण्डल प्रकाशित होता है। ऋषियोंके मण्डल (सप्तर्षि- |
| ऋषीणां मण्डलादूर्ध्वं लक्षमात्रे स्थितो ध्रुवः।<br>मेढीभूतः समस्तस्य ज्योतिष्चक्रस्य वै ध्रुवः।<br>तत्र धर्मः स भगवान् विष्णुर्नारायणः स्थितः॥ १२॥ | मण्डल)-से एक लाख योजन ऊपर ध्रुव स्थित है। ध्रुव सम्पूर्ण ज्योतिश्चक्रका केन्द्र-रूप है। वहाँ धर्मरूप नारायण भगवान् विष्णु स्थित हैं॥ ९—१२॥ |
| नवयोजनसाहस्रो विष्कम्भः सवितुः स्मृतः।<br>त्रिगुणस्तस्य विस्तारो मण्डलस्य प्रमाणतः॥ १३॥ | सूर्यका व्यास नौ हजार योजन कहा गया है। उसका तीन गुना सूर्यमण्डलका विस्तार है। सूर्यके विस्तारका |
| द्विगुणस्तस्य विस्ताराद् विस्तारः शशिनः स्मृतः।<br>तुल्यस्तयोस्तु स्वर्भानुर्भूत्वाऽधस्तात् प्रसर्पति॥ १४॥ | दो गुना चन्द्रमाका विस्तार कहा गया है। उन दोनोंके तुल्य राहु उन दोनोंके नीचे भ्रमण करता है। पृथ्वीकी |
| उद्धृत्य पृथिवीच्छायां निर्मितो मण्डलाकृतिः।<br>स्वर्भानोस्तु बृहत् स्थानं तृतीयं यत् तमोमयम्॥ १५॥ | छायाको लेकर मण्डलाकारनिर्मित राहुका जो तीसरा बृहत् स्थान है, वह तमोमय है। चन्द्रमाका सोलहवाँ |
| चन्द्रस्य षोडशो भागो भार्गवस्य विधीयते।<br>भार्गवात् पादहीनस्तु विज्ञेयो वै बृहस्पतिः॥ १६॥ | भाग शुक्रका है। शुक्रसे चतुर्थांश कम बृहस्पति (-का विस्तार) जानना चाहिये। बृहस्पतिसे चतुर्थांश कम |
| बृहस्पतेः पादहीनौ वक्रसौरौवुभौ स्मृतौ।<br>विस्तारान्मण्डलाच्चैव पादहीनस्तयोर्बुधः॥ १७॥ | मंगल एवं शनि—इन दोनोंका मण्डल कहा गया है। इन दोनोंके मण्डल तथा विस्तारसे चतुर्थांश कम बुधका |
| तारानक्षत्ररूपाणि वपुष्मन्तीह यानि वै।<br>बुधेन तानि तुल्यानि विस्ताराम्मण्डलात् तथा॥ १८॥ | मण्डल है। तारा और नक्षत्ररूपी* जो शरीरधारी हैं, वे सभी मण्डल एवं विस्तारसे बुधके तुल्य हैं॥ १३—१८॥ |
| तारानक्षत्ररूपाणि हीनानि तु परस्परात्।<br>शतानि पञ्च चत्वारि त्रीणि द्वे चैव योजने॥ १९॥ | जो तारा एवं नक्षत्र-रूप हैं, वे एक-दूसरेसे पाँच, चार, तीन या दो सौ योजन कम विस्तारवाले हैं। सभी |
| सर्वावरनिकृष्टानि तारकामण्डलानि तु।<br>योजनान्यर्धमात्राणि तेभ्यो ह्रस्वं न विद्यते॥ २०॥ | छोटे-बड़े ताराओंका मण्डल (ग्रह-पिण्डोंसे छोटे और एक) योजन या आधे योजन परिमाणवाले हैं, उनसे छोटा कोई विद्यमान नहीं है। उनसे ऊपर दूरगामी जो |
| उपरिष्टात् त्रयस्तेषां ग्रहा ये दूरसर्पिणः।<br>सौरोग्ङ्गिराश्च वक्रश्च ज्ञेया मन्दविचारिणः॥ २१॥ | शनि, बृहस्पति तथा मंगल हैं, उन्हें मन्दगतिसे विचरण करनेवाला समझना चाहिये। उनसे नीचे जो दूसरे सूर्य, |
| तेभ्योऽधस्ताच्च चत्वारः पुनरन्ये महाग्रहाः।<br>सूर्यः सोमो बुधश्चैव भार्गवश्चैव शीघ्रगाः॥ २२॥ | चन्द्रमा, बुध तथा शुक्र—चार महाग्रह हैं, ये शीघ्र गतिवाले हैं॥ १९—२२॥ |
* ज्योतिषमें अश्विनी आदि २७ अथवा 'अभिजत्' नामके नक्षत्रको लेकर २८ नक्षत्र प्रसिद्ध हैं—ये ही आकाशमें नक्षत्र नामसे विद्यमान हैं। इनके अतिरिक्त आकाशमें अगणित ज्योतिष्पिण्ड हैं, वे ही 'तारा' कहे जाते हैं।
- अध्याय ३९ * २१७
| दक्षिणायनमार्गस्थो यदा चरति रश्मिमान्।<br>तदा सर्वग्रहाणां स सूर्योऽधस्तात् प्रसर्पति॥ २३॥<br><br>विस्तीर्णं मण्डलं कृत्वा तस्योर्ध्वं चरते शशी।<br>नक्षत्रमण्डलं कृत्स्नं सोमादूर्ध्वं प्रसर्पति॥ २४॥<br>नक्षत्रेभ्यो बुधश्चोर्ध्वं बुधादूर्ध्वं तु भार्गवः।<br>वक्रस्तु भार्गवादूर्ध्वं वक्रादूर्ध्वं बृहस्पतिः॥ २५॥<br>तस्माच्छनैश्चरोऽप्यूर्ध्वं तस्मात् सप्तर्षिमण्डलम्।<br>ऋषीणां चैव सप्तानां ध्रुवश्चोर्ध्वं व्यवस्थितः॥ २६॥<br>योजनानां सहस्राणि भास्करस्य रथो नव।<br>ईषादण्डस्तथैव स्याद् द्विगुणो द्विजसत्तमाः॥ २७॥<br>सार्धकोटिस्तथा सप्त नियुतान्यधिकानि तु।<br>योजनानां तु तस्याक्षस्तत्र चक्रं प्रतिष्ठितम्॥ २८॥<br>त्रिनाभिमति पञ्चारे षण्णेमिन्यक्षयात्मके।<br>संवत्सरमये कृत्स्नं कालचक्रं प्रतिष्ठितम्॥ २९॥<br>चत्वारिंशत् सहस्राणि द्वितीयोऽक्षो विवस्वतः।<br>पञ्चान्यानि तु सार्धानि स्यन्दनस्य द्विजोत्तमाः॥ ३०॥<br>अक्षप्रमाणमुभयोः प्रमाणं तद् युगार्धयोः।<br>ह्रस्वोऽक्षस्तद्युगार्धेन ध्रुवाधारे रथस्य तु॥ ३१॥<br><br>द्वितीयोऽक्षे तु तच्चक्रं संस्थितं मानसाचले।<br>हयाश्च सप्त छन्दांसि तन्नामानि निबोधत॥ ३२॥<br>गायत्री च बृहत्युष्णिग् जगती पङ्क्तिरेव च।<br>अनुष्टुप् त्रिष्टुबित्युक्ताश्छन्दांसि हरयो हरेः॥ ३३॥<br>मानसोपरि माहेन्द्री प्राच्यां दिशि महापुरी।<br>दक्षिणेन यमस्याथ वरुणस्य तु पश्चिमे॥ ३४॥<br>उत्तरेण तु सोमस्य तन्नामानि निबोधत।<br>अमरावती संयमनी सुखा चैव विभा क्रमात्॥ ३५॥<br>काष्ठां गतो दक्षिणतः क्षिप्तेषुरिव सर्पति।<br>ज्योतिषां चक्रमादाय देवदेवः प्रजापतिः॥ ३६॥ | जब सूर्य दक्षिणायनके मार्गमें विचरण करता है, तब वह (सूर्य) सभी ग्रहोंके निम्न भागोंमें भ्रमण करता है। उसके ऊपर विस्तृत मण्डल बनाकर चन्द्रमा विचरण करता है। सम्पूर्ण नक्षत्र-मण्डल चन्द्रमासे ऊपर भ्रमण करता है॥ २३-२४॥<br><br>नक्षत्रोंसे ऊपर बुध, बुधसे ऊपर शुक्र, शुक्रसे ऊपर मंगल और मंगलसे ऊपर बृहस्पति है। उस बृहस्पतिसे भी ऊपर शनैश्चर, उससे ऊपर सप्तर्षि-मण्डल तथा सप्तर्षि-मण्डलके ऊपर ध्रुव स्थित है॥ २५-२६॥<br><br>हे श्रेष्ठ द्विजो! भास्करका रथ नौ हजार योजनका है। उसका ईषादण्ड¹ उसी प्रकार दो गुना (अर्थात् अठारह हजार योजनका) है। उसका धुरा डेढ़ करोड़ सत्तर लाख योजनका है और उसीमें चक्र (रथका पहिया) प्रतिष्ठित है। तीन नाभि,² पाँच अरे³ और छः नेमियोंवाले⁴ संवत्सरमय उस अक्षय चक्रमें यह सम्पूर्ण कालचक्र प्रतिष्ठित है। द्विजोत्तमो! सूर्यके रथका दूसरा अक्ष (चक्र या धुरा) चालीस तथा साढ़े पाँच हजार योजनका है॥ २७-३०॥<br><br>दोनों ओरके युगार्ध (जूआ)-का प्रमाण उस अक्ष (धुरे)-के परिमाणके बराबर है। धुरेके आधारमें स्थित ह्रस्व अक्ष उस युगार्ध (जूआ)-के बराबर है। द्वितीय अक्षमें स्थित उस (रथ)-का चक्र मानसाचलपर स्थित है। सात छन्द (उस रथके) अश्व हैं। उनके नाम सुनो—॥ ३१-३२॥<br><br>गायत्री, बृहती, उष्णिक्, जगती, पंक्ति, अनुष्टुप् तथा त्रिष्टुप्—ये (सात) छन्द सूर्यके (सात) अश्व कहे गये हैं। मानसाचलपर पूर्व दिशामें महेन्द्रकी महापुरी है। दक्षिणमें यमकी, पश्चिममें वरुणकी, उत्तरमें सोमकी नगरी है, उनके (भी)नाम सुनो—अमरावती, संयमनी, सुखा तथा विभा—ये क्रमसे इन्द्रादिकी महापुरियाँ हैं। दक्षिण दिशामें स्थित देवोंके भी देव प्रजापति (सूर्य) ज्योतिश्चक्रको ग्रहणकर प्रक्षिप्त बाणके समान भ्रमण करते हैं॥ ३३-३६॥ |
१-ईषादण्ड—यह रथका अवयव-विशेष है। यह अवयव-विशेष उन दो लम्बे दण्डोंको समझना चाहिये जो रथके आगे होते हैं। इन्हींके मध्य एक या अपेक्षानुसार एकसे अधिक अश्व जोड़े जाते हैं।
२-नाभि—रथके चक्रके बीचका भाग, जिसमें चारों ओरसे काष्ठ जुड़े रहते हैं।
३-नाभिके चारों ओर जो काष्ठ जुड़े रहते हैं, वे ही 'अर' या 'आर' कहे जाते हैं।
४-नेमि—रथके चक्रके ऊपरवाली लोहेकी परिधि (हाल)।
२१८ * कूर्मपुराण *
| दिवसस्य रविर्मध्ये सर्वकालं व्यवस्थितः।<br>सप्तद्वीपेषु विप्रेन्द्रा निशामध्यस्य सम्मुखम्॥ ३७॥<br><br>उदयास्तमने चैव सर्वकालं तु सम्मुखे।<br>अशेषासु दिशास्वेव तथैव विदिशासु च॥ ३८॥<br><br>कुलालचक्रपर्यन्तो भ्रमनेष यथेश्वरः।<br>करोत्यहस्तथा रात्रिं विमुञ्चन् मेदिनीं द्विजाः॥ ३९॥<br><br>दिवाकरकरैरेतत् पूरितं भुवनत्रयम्।<br>त्रैलोक्यं कथितं सद्भिर्लोकानां मुनिपुंगवाः॥ ४०॥<br><br>आदित्यमूलमखिलं त्रिलोकं नात्र संशयः।<br>भवत्यस्मात् जगत् कृत्स्नं सदेवासुरमानुषम्॥ ४१॥<br><br>रुद्रेन्द्रोपेन्द्रचन्द्राणां विप्रेन्द्राणां दिवौकसाम्।<br>द्युतिर्द्युतिमतां कृत्स्नं यत्तेजः सार्वलौकिकम्॥ ४२॥<br><br>सर्वात्मा सर्वलोकेशो महादेवः प्रजापतिः।<br>सूर्य एव त्रिलोकस्य मूलं परमदैवतम्॥ ४३॥<br><br>द्वादशान्ये तथादित्या देवास्ते येऽधिकारिणः।<br>निर्वहन्ति पदं तस्य तदंशा विष्णुमूर्तयः॥ ४४॥<br><br>सर्वे नमस्यन्ति सहस्त्रभानुं<br>गन्धर्वदेवोरगकिन्नराद्याः ।<br>यजन्ति यज्ञैर्विविधैर्द्विजेन्द्रा-<br>श्छन्दोमयं ब्रह्ममयं पुराणम्॥ ४५॥ | विप्रेन्द्रो! सात द्वीपोंमें दिनके मध्य एवं रात्रिके अर्धभागमें सूर्य सदा सम्मुख रहता है, उदय और अस्तके समय भी सदा सम्मुख रहता है। ये ईश्वर (सूर्य) कुम्हारके चक्रके समान सभी दिशाओं तथा विदिशाओंमें भ्रमण करते हैं। हे द्विजो! पृथ्वीका त्याग करते हुए ये दिन और रात्रिका निर्माण करते हैं। ये तीनों भुवन सूर्यकी किरणोंसे व्याप्त हैं। हे मुनिश्रेष्ठो! विद्वानोंने (समस्त) लोकोंको त्रैलोक्यके नामसे कहा है॥ ३७–४०॥<br><br>सम्पूर्ण त्रिलोकीके मूल सूर्य ही हैं, इसमें संशय नहीं। देवता, असुर तथा मनुष्योंसे युक्त सम्पूर्ण जगत् इन्हींसे उत्पन्न होता है। रुद्र, इन्द्र, उपेन्द्र, चन्द्रमा एवं श्रेष्ठ विप्रों तथा समस्त देवताओंका जो तेज है, द्युतिमानोंका जो प्रकाश है और समस्त लोकोंका जो सम्पूर्ण तेज है, (वह सूर्यका ही तेज है)। सूर्य ही सभी लोकोंके स्वामी, सर्वात्मा, प्रजापति, महान् देव, तीनों लोकोंके मूल और परम देवता हैं। इसी प्रकार अधिकारी-रूपमें जो अन्य बारह आदित्य देवता हैं, वे उन्हीं सूर्यके अंश हैं और विष्णुके मूर्तिरूप हैं। वे उन्हींके पद (कार्य)-को सम्पन्न करते हैं॥ ४१–४४॥<br><br>गन्धर्व, देवता, नाग तथा किन्नर आदि सभी हजारों किरणोंवाले सूर्यको नमस्कार करते हैं। श्रेष्ठ द्विज विविध यज्ञोंके द्वारा छन्दोमय एवं ब्रह्मस्वरूप पुरातन सूर्यदेवका यजन करते हैं॥ ४५॥ |
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः॥ ३९॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें उनतालीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ३९॥
- अध्याय ४० * | २१९ ---|---
चालीसवाँ अध्याय
सूर्य-रथ तथा द्वादश आदित्योंके नाम, सूर्य-रथके अधिष्ठातृ देवता आदिका वर्णन, सूर्यकी महिमा
| सूत उवाच | सूतजीने कहा—वे (सूर्यदेव) (सभी) देवों, (द्वादश) आदित्यों, (अष्ट) वसुओं, गन्धर्वों, अप्सराओं, ग्रामणी*, सर्पों तथा राक्षसोंसहित उस रथपर अधिष्ठित रहते हैं। धाता, अर्यमा, मित्र, वरुण, इन्द्र, विवस्वान्, पूषा, पर्जन्य, अंशु, भग, त्वष्टा तथा विष्णु—ये बारह आदित्य हैं। ये क्रमशः वसन्त आदि ऋतुओंमें भानुको आप्यायित करते हैं। पुलस्त्य, पुलह, अत्रि, वसिष्ठ, अंगिरा, भृगु, भरद्वाज, गौतम, कश्यप, क्रतु, जमदग्नि तथा कौशिक—ये ब्रह्मवादी मुनि अनेक प्रकारके छन्दों (वैदिक मन्त्रों)-के द्वारा क्रमशः सूर्यदेवकी स्तुति करते हैं॥ १-५॥ |
|---|---|
| स रथोऽधिष्ठितो देवैरादित्यैर्वसुभिस्तथा।<br>गन्धर्वैरप्सरोभिश्च ग्रामणीसर्पराक्षसैः॥ १ ॥<br>धातार्यमाथ मित्रश्च वरुणः शक्र एव च।<br>विवस्वानथ पूषा च पर्जन्यश्चांशुरेव च॥ २ ॥<br>भगस्त्वष्टा च विष्णुश्च द्वादशैते दिवाकराः।<br>आप्याययन्ति वै भानुं वसन्तादिषु वै क्रमात्॥ ३ ॥<br>पुलस्त्यः पुलहश्चात्रिर्वसिष्ठश्चाङ्गिरा भृगुः।<br>भरद्वाजो गौतमश्च कश्यपः क्रतुरेव च॥ ४ ॥<br>जमदग्निः कौशिकश्च मुनयो ब्रह्मवादिनः।<br>स्तुवन्ति देवं विविधैश्छन्दोभिस्ते यथाक्रमम्॥ ५ ॥ | |
| रथकृच्च रथौजाश्च रथचित्रः सुबाहुकः।<br>रथस्वनोऽथ वरुणः सुषेणः सेनजित् तथा॥ ६ ॥<br>तार्क्ष्यश्चारिष्टनेमिश्च रथजित् सत्यजित् तथा।<br>ग्रामण्यो देवदेवस्य कुर्वतेऽभीशुसंग्रहम्॥ ७ ॥<br>अथ हेतिः प्रहेतिश्च पौरुषेयो वधस्तथा।<br>सर्पो व्याघ्रस्तथापश्च वातो विद्युद् दिवाकरः॥ ८ ॥<br>ब्रह्मोपेतश्च विप्रेन्द्रा यज्ञोपेतस्तथैव च।<br>राक्षसप्रवरा ह्येते प्रयान्ति पुरतः क्रमात्॥ ९ ॥<br>वासुकिः कङ्कनीरश्च तक्षकः सर्पपुंगवः।<br>एलापत्रः शङ्खपालस्तथैरावतसंज्ञितः॥ १०॥<br>धनंजयो महापद्मस्तथा कर्कोटको द्विजाः।<br>कम्बलाश्वतरश्चैव वहन्त्येनं यथाक्रमम्॥ ११॥ | रथकृत्, रथौजा, रथचित्र, सुबाहुक, रथस्वन, वरुण, सुषेण, सेनजित्, तार्क्ष्य, अरिष्टनेमि, रथजित् और सत्यजित्—ये (बारह) ग्रामणी देवोंके देव सूर्यकी रश्मियोंका संग्रह करते हैं। हे विप्रेन्द्रो! हेति, प्रहेति, पौरुषेय, वध, सर्प, व्याघ्र, आप, वात, विद्युत्, दिवाकर, ब्रह्मोपेत और यज्ञोपेत—ये (बारह) श्रेष्ठ राक्षस क्रमसे सूर्यके आगे-आगे चलते हैं। हे द्विजो! वासुकि, कङ्कनीर, तक्षक, सर्पपुङ्गव, एलापत्र, शंखपाल, ऐरावत, धनंजय, महापद्म, कर्कोटक, कम्बल तथा अश्वतर—ये (बारह) नाग क्रमशः इन सूर्यदेवको वहन करते हैं॥ ६-११॥ |
| तुम्बुरुर्नारदो हाहा हूहूर्विश्वावसुस्तथा।<br>उग्रसेनो वसुरुचिर्वावसुस्तथापरः॥ १२॥<br><br>चित्रसेनस्तथोर्णायुर्धृतराष्ट्रो द्विजोत्तमाः।<br>सूर्यवर्चा द्वादशैते गन्धर्वा गायतां वराः।<br>गायन्ति विविधैर्गानैर्भानुं षड्जादिभिः क्रमात्॥ १३॥<br><br>क्रतुस्थलाप्सरोवर्या तथान्या पुञ्जिकस्थला।<br>मेनका सहजन्या च प्रम्लोचा च द्विजोत्तमाः॥ १४॥ | द्विजोत्तमो! तुम्बुरु, नारद, हाहा, हूहू, विश्वावसु, उग्रसेन, वसुरुचि, अर्वावसु, चित्रसेन, ऊर्णायु, धृतराष्ट्र और सूर्यवर्चा—ये (बारह) श्रेष्ठ गायन करनेवाले गन्धर्व क्रमशः षड्ज आदि स्वरोंके द्वारा विविध प्रकारके गीतोंसे सूर्यके समीप गान करते रहते हैं। हे द्विजोत्तमो! अप्सराओंमें श्रेष्ठ अप्सरा—क्रतुस्थला, पुञ्जिक-स्थला, मेनका, सहजन्या, प्रम्लोचा, |
* अग्रणी (नेता)।
| २२० | * कूर्मपुराण * |
|---|
| अनुम्लोचा घृताची च विश्वाची चोर्वशी तथा।<br>अन्या च पूर्वचित्तिः स्यादन्या चैव तिलोत्तमा॥ १५॥<br><br>ताण्डवैर्विविधैरेनं वसन्तादिषु वै क्रमात्।<br>तोषयन्ति महादेवं भानुमात्मानमव्ययम्॥ १६॥<br>एवं देवा वसन्त्यर्के द्वौ द्वौ मासौ क्रमेण तु।<br>सूर्यमाप्याययन्त्येते तेजसा तेजसां निधिम्॥ १७॥<br><br>ग्रथितैः स्वैर्वचोभिस्तु स्तुवन्ति मुनयो रविम्।<br>गन्धर्वाप्सरसश्चैनं नृत्यगेयैरुपासते॥ १८॥<br>ग्रामणीयक्षभूतानि कुर्वतेऽभीषुसंग्रहम्।<br>सर्पा वहन्ति देवेशं यातुधानाः प्रयान्ति च॥ १९॥<br><br>बालखिल्या नयन्त्यस्तं परिवार्योदयाद् रविम्।<br>एते तपन्ति वर्षन्ति भान्ति वान्ति सृजन्ति च।<br>भूतानामशुभं कर्म व्यपोहन्तीह कीर्तिताः॥ २०॥<br><br>एते सहैव सूर्येण भ्रमन्ति दिवि सानुगाः।<br>विमाने च स्थिता नित्यं कामगे वातरंहसि॥ २१॥<br><br>वर्षन्तश्च तपन्तश्च ह्लादयन्तश्च वै प्रजाः।<br>गोपयन्तीह भूतानि सर्वाणीवायुगक्षयात्॥ २२॥<br><br>एतेषामेव देवानां यथावीर्यं यथातपः।<br>यथायोगं यथासत्त्वं स एष तपति प्रभुः॥ २३॥<br>अहोरात्रव्यवस्थानकारणं स प्रजापतिः।<br>पितृदेवमनुष्यादीन् स सदाप्याययेद् रविः॥ २४॥<br><br>तत्र देवो महादेवो भास्वान् साक्षान्महेश्वरः।<br>भासते वेदविदुषां नीलग्रीवः सनातनः॥ २५॥<br><br>स एष देवो भगवान् परमेष्ठी प्रजापतिः।<br>स्थानं तद् विदुरादित्यं वेदज्ञा वेदविग्रहम्॥ २६॥ | अनुम्लोचा, घृताची, विश्वाची, उर्वशी, पूर्वचित्ति, अन्या और तिलोत्तमा—ये (बारह) अप्सराएँ क्रमशः वसन्त आदि ऋतुओंमें विविध ताण्डव आदि (नृत्यों)-के द्वारा इन अव्यय, आत्मस्वरूप महान् देवता भानुको संतुष्ट करती हैं॥ १२—१६॥<br><br>इस प्रकार ये देवता क्रमशः दो-दो महीनोंमें (वसन्त आदि ६ ऋतुओंमें) सूर्यमें प्रतिष्ठित रहते हुए तेजोनिधि सूर्यको अपने तेजसे आप्यायित करते हैं। मुनिगण स्वयंरचित स्तुतियोंसे सूर्यकी स्तुति करते रहते हैं और अप्सराएँ एवं गन्धर्व नृत्य तथा गीतोंके द्वारा इनकी उपासना करते हैं॥ १७-१८॥<br><br>ग्रामणी, यक्ष और भूतगण (सूर्यदेवसे) रश्मियोंका संग्रह करते हैं, सर्प देवताओंके ईश (सूर्य)-को वहन करते हैं और राक्षस (उनके आगे-आगे) चलते हैं। बालखिल्य नामक मुनिगण सूर्यको आवृतकर उदयाचलसे अस्ताचलतक ले जाते हैं। (पूर्वमें कहे गये) ये (द्वादश आदित्य) तपते, बरसते, प्रकाश करते, बहते एवं सृष्टि करते हैं। इनका कीर्तन करनेपर ये प्राणियोंके अशुभ कर्मोंको दूर करते हैं। ये नित्य कामचारी तथा वायुके समान गतिवाले विमानपर सूर्यके साथ अपने अनुचरोंसहित आकाशमें भ्रमण करते हैं। ये क्रमशः वर्षा, ताप एवं प्रजाको आनन्द प्रदान करते हुए प्रलयपर्यन्त सभी प्राणियोंकी रक्षा करते हैं। ये प्रभु सूर्य इन्हीं देवोंके वीर्य, तप, योग और सत्त्वके अनुसार (प्राणिमात्रको) ताप देते हैं॥ १९—२३॥<br><br>वे प्रजापति (सूर्य) दिन और रात्रिकी व्यवस्थाके कारण हैं। ये सूर्य पितरों, देवों तथा मनुष्य आदि सभीको सदा आप्यायित करते हैं। वेदज्ञोंके (आराध्य) सनातन, नीलग्रीव, महादेव साक्षात् देव महादेव महेश्वर ही सूर्यके रूपमें प्रकाशित होते हैं। वेदज्ञ लोग आदित्य (सूर्य)-को वेदका विग्रह (शरीर ही) मानते हैं और यही वेदविग्रह आदित्य, देव भगवान् परमेष्ठी प्रजापति हैं॥ २४—२६॥ |
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे चत्वारिंशोऽध्यायः॥ ४०॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें चालीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ४०॥
- अध्याय ४१ * | २२१ ---|---
एकतालीसवाँ अध्याय
सूर्यकी प्रधान सात रश्मियोंके नाम, इनके द्वारा ग्रहोंका आप्यायन, सूर्यकी अन्य हजारों नाडियोंका वर्णन तथा उनका कार्य, बारह महीनोंके बारह सूर्योंके नाम तथा छः ऋतुओंमें उनका वर्ण, आठ ग्रहोंका वर्णन, सोमके रथका वर्णन, देवोंद्वारा चन्द्रकलाओंका पान करना, पितरोंद्वारा अमावस्याको चन्द्रमाकी कलाका पान, बुध आदि ग्रहोंके रथका वर्णन
| सूत उवाच | सूतजी बोले— इस प्रकार ये महादेव कालात्मा |
|---|---|
| एवमेष महादेवो देवदेवः पितामहः।<br>करोति नियतं कालं कालात्मा ह्यैश्वरी तनुः॥ १ ॥ | ऐश्वर्यमय विग्रहवाले देवाधिदेव पितामह (सूर्य) कालका नियमन करते हैं। विप्रो! सभी लोकोंको प्रकाशित |
| तस्य ये रश्मयो विप्राः सर्वलोकप्रदीपकाः।<br>तेषां श्रेष्ठाः पुनः सप्त रश्मयो ग्रहयोनयः॥ २ ॥ | करनेवाली उनकी जो रश्मियाँ हैं, उनमें भी ग्रहोंकी योनिरूप सात रश्मियाँ अत्यन्त श्रेष्ठ हैं॥ १-२॥ |
| सुषुम्नो हरिकेशश्च विश्वकर्मा तथैव च।<br>विश्वव्यचाः पुनश्चान्यः संयद्वसुरतः परः॥ ३ ॥ | सुषुम्न, हरिकेश, विश्वकर्मा, विश्वव्यचा, संयद्वसु, अर्वावसु तथा स्वराट्—ये सात रश्मियाँ कही गयी हैं। |
| अर्वावसुरीति ख्यातः स्वराडन्यः प्रकीर्तितः।<br>सुषुम्नः सूर्यरश्मिस्तु पुष्णाति शिशिरद्युतिम्॥ ४ ॥ | सुषुम्न नामक सूर्यकी रश्मि चन्द्रमाकी चाँदनीको पुष्ट करती है। यह सुषुम्न रश्मि तिरछे रूपसे ऊपरको जानेवाली |
| तिर्यगूर्ध्वप्रचारोऽसौ सुषुम्नः परिपठ्यते।<br>हरिकेशस्तु यः प्रोक्तो रश्मिर्नक्षत्रपोषकः॥ ५ ॥ | कही गयी है। हरिकेश नामक जो रश्मि कही गयी है, वह नक्षत्रोंका पोषण करनेवाली है। विश्वकर्मा नामक |
| विश्वकर्मा तथा रश्मिर्बुधं पुष्णाति सर्वदा।<br>विश्वव्यचास्तु यो रश्मिः शुक्रं पुष्णाति नित्यदा॥ ६ ॥ | रश्मि सदा बुध (ग्रह)-का पोषण करती है। विश्वव्यचा नामकी जो रश्मि है, वह नित्य शुक्र (ग्रह)-का पोषण |
| संयद्वसुरिति ख्यातः स पुष्णाति च लोहितम्।<br>बृहस्पतिं प्रपुष्णाति रश्मिरर्वावसुः प्रभोः।<br>शनैश्चरं प्रपुष्णाति सप्तमस्तु सुराट् तथा॥ ७ ॥ | करती है। संयद्वसु नामसे प्रसिद्ध रश्मि मंगलका पोषण करती है और प्रभु सूर्यकी अर्वावसु नामक रश्मि बृहस्पतिका पोषण करती है तथा सातवीं सुराट् (स्वराट्) नामक रश्मि शनैश्चरका पोषण करती है॥ ३—७॥ |
| एवं सूर्यप्रभावेण सर्वा नक्षत्रतारकाः।<br>वर्धन्ते वर्धिता नित्यं नित्यमाप्याययन्ति च॥ ८ ॥ | इस प्रकार सूर्यके प्रभावसे सभी नक्षत्र एवं तारे नित्य बढ़ते हैं तथा वृद्धि प्राप्तकर नित्य दूसरोंको आप्यायित करते हैं। द्युलोक एवं पृथ्वीसे सम्बद्ध समस्त |
| दिव्यानां पार्थिवानां च नैशानां चैव सर्वशः।<br>आदानान्नित्यमादित्यस्तेजसां तमसां प्रभुः॥ ९ ॥ | तेज-समूह और निशा-सम्बन्धी तम—अन्धकारका नित्य आदान अर्थात् ग्रहण करनेके कारण प्रभु (सूर्य)-को आदित्य कहा जाता है। हजारों नेत्रवाले वे अपनी हजारों |
| आदत्ते स तु नाडीनां सहस्रेण समंततः।<br>नादेयांश्चैव सामुद्रान् कूप्यांश्चैव सहस्रदृक्।<br>स्थावराज्जङ्गमांश्चैव यच्च कुल्यादिकं पयः॥ १०॥ | नाडियों (किरणों)-द्वारा चारों ओरके नदियों, समुद्रों, कूपों, स्थावर तथा जङ्गम और नहरों आदिके जलका ग्रहण करते हैं। उनकी हजारों रश्मियाँ शीत, वर्षा एवं |
| तस्य रश्मिसहस्रं तच्छीतवर्षोष्णनिस्स्रवम्।<br>तासां चतुःशतं नाड्यो वर्षन्ते चित्रमूर्तयः॥ ११॥ | उष्णताकी सृष्टि करनेवाली हैं और उनमें चार सौ विचित्र मूर्तिस्वरूपा रश्मियाँ वर्षा करती हैं वन्दना, |
| वन्दनाश्चैव याज्याश्च केतना भूतनास्तथा।<br>अमृता नाम ताः सर्वा रश्मयो वृष्टिसर्जनाः॥ १२॥ | याज्या, केतना और भूतना—ये अमृता नामवाली सभी रश्मियाँ वर्षा करनेवाली हैं॥ ८-१२॥ |
| २२२ | * कूर्मपुराण * |
|---|---|
| हिमोद्वाहाश्च ता नाड्यो रश्मयस्त्रिशतं पुनः ।<br>रश्म्यो मेष्यश्च पौष्यश्च ह्लादिन्यो हिमसर्जनाः ।<br>चन्द्रास्ता नामतः सर्वा पीताभाः स्युर्गभस्तयः ॥ १३ ॥<br><br>शुक्राश्च ककुभश्चैव गावो विश्वभृतस्तथा ।<br>शुक्रास्ता नामतः सर्वास्त्रिविधा घर्मसर्जनाः ॥ १४ ॥ | नाडीस्वरूपिणी तीन सौ रश्मियाँ हिमकी सृष्टि करती हैं। मेषी, पौषी तथा ह्लादिनी नामकी रश्मियाँ हिमकी सृष्टि करनेवाली हैं। ये सभी रश्मियाँ पीत वर्णकी और चन्द्र नामवाली हैं। शुक्रा, ककुभ् और विश्वभृत् नामक सभी रश्मियोंका नाम शुक्रा है। ये तीनों प्रकारकी रश्मियाँ धूपकी सृष्टि करनेवाली हैं॥ १३-१४॥ |
| समं बिभर्ति ताभिः स मनुष्यपितृदेवताः ।<br>मनुष्यानौषधेनेह स्वधया च पितॄनपि ।<br>अमृतेन सुरान् सर्वांस्त्रिभिस्त्रींस्तर्पयत्यसौ ॥ १५ ॥ | उनके द्वारा वे (सूर्य) समान-रूपसे मनुष्यों, पितरों तथा देवताओंका पोषण करते हैं। वे (इन किरणोंके माध्यमसे) मनुष्योंको औषधके द्वारा, पितरोंको स्वधाके द्वारा और देवताओंको अमृतके द्वारा—इस प्रकार तीनोंको तीन पदार्थोंद्वारा संतृप्त करते हैं॥ १५॥ |
| वसन्ते ग्रैष्मिके चैव शतैः स तपति त्रिभिः ।<br>शरद्यपि च वर्षासु चतुर्भिः सम्प्रवर्षति ।<br>हेमन्ते शिशिरे चैव हिममुत्सृजति त्रिभिः ॥ १६ ॥<br><br>वरुणो माघमासे तु सूर्यः पूषा तु फाल्गुने ।<br>चैत्रे मासि भवेदंशो धाता वैशाखतापनः ॥ १७ ॥<br><br>ज्येष्ठामूले भवेदिन्द्रः आषाढे सविता रविः ।<br>विवस्वान् श्रावणे मासि प्रौष्ठपद्यां भगः स्मृतः ॥ १८ ॥<br><br>पर्जन्योऽश्वयुजि त्वष्टा कार्तिके मासि भास्करः ।<br>मार्गशीर्षे भवेन्मित्रः पौषे विष्णुः सनातनः ॥ १९ ॥ | वे (सूर्य) वसन्त एवं ग्रीष्म ऋतुमें तीन सौ किरणोंसे तपते हैं। शरद् और वर्षा ऋतुमें चार सौ रश्मियोंके द्वारा वर्षा करते हैं तथा हेमन्त एवं शिशिर ऋतुमें तीन सौ रश्मियोंसे हिम प्रदान करते हैं। माघमासमें सूर्यका नाम वरुण होता है, फाल्गुनमें वे पूषा कहलाते हैं। सूर्य चैत्र-मासमें अंश, वैशाखमें धाता, ज्येष्ठा-मूल अर्थात् ज्येष्ठ-मासमें इन्द्र, आषाढ़में सविता, श्रावणमें विवस्वान् तथा भाद्रपदमासमें भग कहे जाते हैं। (ये ही) सूर्य आश्विनमें पर्जन्य, कार्तिकमें त्वष्टा, मार्गशीर्षमें मित्र और पौषमें सनातन विष्णु कहलाते हैं॥ १६-१९॥ |
| पञ्चरश्मिसहस्राणि वरुणस्यार्ककर्मणि ।<br>षड्भिः सहस्रैः पूषा तु देवोंऽशः सप्तभिस्तथा ॥ २० ॥<br><br>धाताष्टभिः सहस्रैस्तु नवभिस्तु शतक्रतुः ।<br>विवस्वान् दशभिः पाति पात्येकादशभिर्भगः ॥ २१ ॥<br><br>सप्तभिस्तपते मित्रस्त्वष्टा चैवाष्टभिस्तपेत् ।<br>अर्यमा दशभिः पाति पर्जन्यो नवभिस्तपेत् ।<br>षड्भी रश्मिसहस्रैस्तु विष्णुस्तपति विश्वसृक् ॥ २२ ॥ | वरुण (नामक सूर्य)-की पाँच हजार रश्मियाँ सूर्यका कार्य सम्पादित करती हैं। इसी प्रकार पूषा छः हजार, अंश देव सात हजार, धाता आठ हजार, शतक्रतु इन्द्र नौ हजार, विवस्वान् दस हजार और भग ग्यारह हजार रश्मियोंसे पालन करते हैं। मित्र नामक सूर्य सात हजार और त्वष्टा आठ हजार रश्मियोंसे तपते हैं। अर्यमा दस हजार रश्मियोंसे पालन करते हैं और पर्जन्य नौ हजार रश्मियोंसे ताप प्रदान करते हैं। विश्वकी सृष्टि करनेवाले विष्णु (नामक सूर्य) छः हजार रश्मियोंसे तपते हैं॥ २०-२२॥ |
| वसन्ते कपिलः सूर्यो ग्रीष्मे काञ्चनसप्रभः ।<br>श्वेतो वर्षासु वर्णेन पाण्डुरः शरदि प्रभुः ।<br>हेमन्ते ताम्रवर्णः स्याच्छिशिरे लोहितो रविः ॥ २३ ॥<br><br>ओषधीषु बलं धत्ते स्वधामपि पितृष्वथ ।<br>सूर्योऽमरत्वममृते त्रयं त्रिषु नियच्छति ॥ २४ ॥ | प्रभु सूर्य वसन्त ऋतुमें कपिल (भूरे) वर्णके, ग्रीष्ममें स्वर्णके समान, वर्षांमें श्वेत, शरद्में पाण्डुर (सफेद-मिश्रित पीले) रंगके, हेमन्तमें ताँबेके समान वर्णवाले और शिशिरमें सूर्य लोहित (लाल) वर्णके होते हैं। सूर्य ओषधियोंमें बलका आधान करते हैं, पितरोंको स्वधा और देवताओंको अमरत्व—इस प्रकार तीनोंको तीन पदार्थ प्रदान करते हैं॥ २३-२४॥ |
- अध्याय ४१ * २२३
| अन्ये चाष्टौ ग्रहा ज्ञेयाः सूर्येणाधिष्ठिता द्विजाः।<br>चन्द्रमाः सोमपुत्रश्च शुक्रश्चैव बृहस्पतिः।<br>भौमो मन्दस्तथा राहुः केतुमानपि चाष्टमः॥ २५॥ | हे द्विजो! अन्य आठ ग्रहोंको सूर्यसे अधिष्ठित जानना चाहिये। चन्द्रमा, चन्द्रमाका पुत्र बुध, शुक्र, बृहस्पति, मंगल, शनि, राहु तथा केतु नामक आठवाँ ग्रह है। वातरश्मियोंके द्वारा ध्रुवमें आबद्ध वे सभी ग्रह (अपनी कक्षामें) भ्रमण करते हुए यथास्थान सूर्यकी परिक्रमा करते हैं। द्विजो! वायुचक्रसे प्रेरित (ग्रहगण) अलातचक्रके समान भ्रमण करते हैं। चूँकि वायु उनका वहन करती है, इसलिये उसे 'प्रवह' कहा जाता है। सोमका रथ तीन चक्रोंवाला है। उसके वाम और दक्षिण भागमें कुन्द पुष्पके समान वर्णवाले दस अश्व जुते हैं, इसी रथसे निशाकर चन्द्रमा सूर्यके समान (अपनी) कक्षामें स्थित होकर नक्षत्रोंके मध्य परिभ्रमण करता है। हे विप्रेन्द्रो! चन्द्रमाकी रश्मियोंकी क्रमशः ह्रास और वृद्धि होती रहती है। दिनके क्रमानुसार शुक्लपक्षमें चन्द्रमाके परभागमें स्थित सूर्य सोम (चन्द्र)-को निरन्तर आपूरित करता है॥ २५–३०॥ |
| सर्वे ध्रुवे निबद्धा वै ग्रहास्ते वातरश्मिभिः।<br>भ्राम्यमाणा यथायोगं भ्रमन्त्यनुदिवाकरम्॥ २६॥ | |
| अलातचक्रवद् यान्ति वातचक्रेरिता द्विजाः।<br>यस्माद् वहति तान् वायुः प्रवहस्तेन स स्मृतः॥ २७॥ | |
| रथस्त्रिचक्रः सोमस्य कुन्दाभास्तस्य वाजिनः।<br>वामदक्षिणतो युक्ता दश तेन निशाकरः॥ २८॥ | |
| वीथ्याश्रयाणि चरति नक्षत्राणि रविर्यथा।<br>ह्रासवृद्धी च विप्रेन्द्रा ध्रुवाधाराणि सर्वदा॥ २९॥ | |
| स सोमः शुक्लपक्षे तु भास्करे परतः स्थिते।<br>आपूर्यते परस्यान्तः सततं दिवसक्रमात्॥ ३०॥ | |
| क्षीणायितं सुरैः सोममाप्याययति नित्यदा।<br>एकेन रश्मिना विप्राः सुषुम्नाख्येन भास्करः॥ ३१॥ | हे विप्रो! देवताओं द्वारा (अमृत) पान किये जानेके कारण क्षीण हुए चन्द्रमाको सूर्य सुषुम्न नामक एक रश्मि (किरण)-से नित्य आप्यायित करते हैं। सूर्यके तेजसे चन्द्रमाका यह (क्षीण) शरीर पुष्ट होता है, अतएव दिनके क्रमानुसार पूर्णिमाको वह चन्द्रमा सम्पूर्ण रूपसे दिखायी देता है। हे विप्रो! देवता उस अमृतस्वरूप सम्पूर्ण सोमका आधे महीनेतक पान करते हैं, क्योंकि वे (देवता) अमृतका भोजन करनेवाले होते हैं। तदनन्तर पंद्रहवें भागके किंचित् कलात्मक भाग शेष बचनेपर अपराह्नमें पितृगण उस अन्तिम भागका सेवन करते हैं। पितृगण चन्द्रमाकी अवशिष्ट अमृतस्वरूपिणी अमृतमयी तथा पवित्र सुधा नामक कलाका दो लव (कालविशेष)-तक पान करते हैं॥ ३१–३५॥ |
| एषा सूर्यस्य वीर्येण सोमस्याप्यायिता तनुः।<br>पौर्णमास्यां स दृश्येत सम्पूर्णो दिवसक्रमात्॥ ३२॥ | |
| सम्पूर्णमर्धमासेन तं सोमममृतात्मकम्।<br>पिबन्ति देवता विप्रा यतस्तेऽमृतभोजनाः॥ ३३॥ | |
| ततः पञ्चदशे भागे किंचिच्छिष्टे कलात्मके।<br>अपराह्ने पितृगणा जघन्यं पर्युपासते॥ ३४॥ | |
| पिबन्ति द्विकलं कालं शिष्टा तस्य कला तु या।<br>सुधामृतमयीं पुण्यां तामिन्दोरमृतात्मिकाम्॥ ३५॥ | |
| निःसृतं तदमावास्यां गभस्तिभ्यः स्वधामृतम्।<br>मासतृप्तिमवाप्याग्र्यां पितरः सन्ति निर्वृताः॥ ३६॥ | अमावस्याके दिन (चन्द्रमाकी) किरणोंसे निकलनेवाले स्वधा नामक अमृतका पान करनेसे पितर महीनेभरके लिये तृप्ति प्राप्त कर स्वस्थ हो जाते हैं। देवताओंके द्वारा (चन्द्रमाके) अमृतका पान किये जानेपर सोमका विनाश नहीं होता। श्रेष्ठ जनो! इस प्रकार सूर्यके कारण चन्द्रमाके क्षय एवं वृद्धिका क्रम चलता है। सोमके पुत्र (बुध)-के रथमें वायुके समान वेगवाले जलसे उत्पन्न आठ घोड़े जुते रहते हैं। वह बुध उसी रथसे सर्वत्र गमन करता है॥ ३६–३८॥ |
| न सोमस्य विनाशः स्यात् सुधा देवैस्तु पीयते।<br>एवं सूर्यनिमित्तस्य क्षयो वृद्धिश्च सत्तमाः॥ ३७॥ | |
| सोमपुत्रस्य चाष्टाभिर्वाजिभिर्वायुवेगिभिः।<br>वारिजैः स्यन्दनो युक्तस्तेनासौ याति सर्वतः॥ ३८॥ |
२२४ * कूर्मपुराण *
| शुक्रस्य भूमिजैरश्वैः स्यन्दनो दशभिर्वृतः ।<br>अष्टाभिश्चाथ भौमस्य रथो हैमः सुशोभनः ॥ ३९ ॥<br><br>बृहस्पतेरथाष्टाश्वः स्यन्दनो हेमनिर्मितः ।<br>रथस्तमोमयोऽष्टाश्वो मन्दस्यायसनिर्मितः ।<br>स्वर्भानोर्भास्करारेश्च तथा षड्भिर्हयैर्वृतः ॥ ४० ॥ | शुक्रका रथ भूमिसे उत्पन्न दस घोड़ोंसे और मंगलका स्वर्णमय अत्यन्त सुन्दर रथ आठ घोड़ोंसे युक्त रहता है। बृहस्पतिका भी आठ घोड़ोंवाला रथ स्वर्णसे निर्मित है। शनिका लोहेसे बना हुआ रथ तमोमय है और आठ घोड़ोंवाला है। सूर्यके शत्रु राहु और केतुके रथ छः-छः अश्वोंसे युक्त हैं ॥ ३९-४० ॥ | | एते महाग्रहाणां वै समाख्याता रथा नव ।<br>सर्वे ध्रुवे महाभागा निबद्धा वातरश्मिभिः ॥ ४१ ॥<br><br>ग्रहर्क्षताराधिष्ण्यानि ध्रुवे बद्धान्यशेषतः ।<br>भ्रमन्ति भ्रामयन्त्येनं सर्वाण्यनिलरश्मिभिः ॥ ४२ ॥ | इस प्रकार महाग्रहोंके नौ रथोंका वर्णन किया गया। ये सभी महाभाग (ग्रह) वायुकी रश्मियोंके द्वारा ध्रुवमें आबद्ध हैं। सभी ग्रह, नक्षत्र और तारागण भी ध्रुवमें पूर्णतः निबद्ध हैं। वायुकी रश्मियोंद्वारा परिचालित होकर ये सभी परिभ्रमण करते रहते हैं ॥ ४१-४२ ॥ |
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्साहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे एकचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४१ ॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें एकतालीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ४१ ॥
बयालीसवाँ अध्याय
महः आदि सात लोकों तथा सात पातालोंका और वहाँके निवासियोंका वर्णन, वैष्णवी तथा शाम्भवी शक्तियोंका वर्णन
| सूत उवाच | सूतजी बोले— |
|---|---|
| ध्रुवादूर्ध्वं महर्लोकः कोटियोजनविस्तृतः ।<br>कल्पाधिकारिणस्तत्र संस्थिता द्विजपुंगवाः ॥ १ ॥<br><br>जनलोको महर्लोकात् तथा कोटिद्वयात्मकः ।<br>सनन्दनादयस्तत्र संस्थिता ब्रह्मणः सुताः ॥ २ ॥<br><br>जनलोकात् तपोलोकः कोटित्रयसमन्वितः ।<br>वैराजास्तत्र वै देवाः स्थिता दाहविवर्जिताः ॥ ३ ॥<br><br>प्राजापत्यात् सत्यलोकः कोटिषट्केन संयुतः ।<br>अपुनर्मारकास्तत्र ब्रह्मलोकस्तु स स्मृतः ॥ ४ ॥<br><br>अत्र लोकगुरुर्ब्रह्मा विश्वात्मा विश्वतोमुखः ।<br>आस्ते स योगिभिर्नित्यं पीत्वा योगामृतं परम् ॥ ५ ॥ | हे द्विजश्रेष्ठो! ध्रुवके ऊपर एक करोड़ योजन विस्तारवाला महर्लोक है। वहाँ कल्पके अधिकारीगण निवास करते हैं। इसी प्रकार महर्लोकसे ऊपर दो करोड़ योजनवाला जनलोक है। वहाँ ब्रह्माके (मानस) पुत्र सनन्दन आदि रहते हैं। जनलोकसे ऊपर तपोलोक तीन करोड़ योजनका है। वहाँ दाहरहित* वैराज नामक देवता रहते हैं। प्रजापत्यलोक अर्थात् तपोलोकके ऊपर छः करोड़ योजनका सत्यलोक है। वहाँ अपुनर्मारक (जन्म-मरणसे रहित जन) रहते हैं। वह ब्रह्मलोक कहा गया है। यहाँ परम योगामृतका पान कर विश्वतोमुख विश्वात्मा लोकगुरु ब्रह्मा योगियोंके साथ नित्य निवास करते हैं ॥ १-५ ॥ |
| विशन्ति यतयः शान्ता नैष्ठिका ब्रह्मचारिणः ।<br>योगिनस्तापसाः सिद्धा जापकाः परमेष्ठिनम् ॥ ६ ॥<br><br>द्वारं तद्योगिनामेकं गच्छतां परमं पदम् ।<br>तत्र गत्वा न शोचन्ति स विष्णुः स च शंकरः ॥ ७ ॥ | शान्त स्वभाववाले यतिगण, नैष्ठिक ब्रह्मचारी, योगी, तपस्वी, सिद्ध तथा परमेष्ठीका जप करनेवाले यहाँ प्रवेश करते हैं। परमपदको प्राप्त करनेवाले योगियोंका वह एकमात्र द्वार है। वहाँ पहुँचकर (लोग) शोक नहीं करते। वही (यहाँ निवास करनेवाला) विष्णु है, शंकर है ॥ ६-७ ॥ |
* दाह-तापसे रहित (दैहिक, दैविक, भौतिक तापोंसे सर्वथा मुक्त)।
- अध्याय ४२ * | २२५ ---|---
सूर्यकोटिप्रतीकाशं पुरं तस्य दुरासदम्।
न मे वर्णयितुं शक्यं ज्वालामालासमाकुलम्॥ ८ ॥
तत्र नारायणस्यापि भवनं ब्रह्मणः पुरे।
शेते तत्र हरिः श्रीमान् मायी मायामयः परः॥ ९ ॥
स विष्णुलोकः कथितः पुनरावृत्तिवर्जितः।
यान्ति तत्र महात्मानो ये प्रपन्ना जनार्दनम्॥ १० ॥
ऊर्ध्वं तद् ब्रह्मसदनात् पुरं ज्योतिर्मयं शुभम्।
वह्निना च परिक्षिप्तं तत्रास्ते भगवान् भवः॥ ११ ॥
देव्या सह महादेवश्चिन्त्यमानो मनीषिभिः।
योगिभिः शतसाहस्रैर्भूतै रुद्रैश्च संवृतः॥ १२ ॥
तत्र ते यान्ति नियता द्विजा वै ब्रह्मचारिणः।
महादेवपराः शान्तास्तापसा ब्रह्मवादिनः॥ १३ ॥
निर्ममा निरहंकाराः कामक्रोधविवर्जिताः।
द्रक्ष्यन्ति ब्रह्मणा युक्ता रुद्रलोकः स वै स्मृतः॥ १४॥
एते सप्त महालोकाः पृथिव्याः परिकीर्तिताः।
महातलादयश्चाधः पातालाः सन्ति वै द्विजाः॥ १५ ॥
महातलं च पातालं सर्वरत्नोपशोभितम्।
प्रासादैर्विविधैः शुभ्रैर्देवतायतनैर्युतम्॥ १६॥
अनन्तेन च संयुक्तं मुचुकुन्देन धीमता।
नृपेण बलिना चैव पातालस्वर्गवासिना॥ १७ ॥
शैलं रसातलं विप्राः शर्करं हि तलातलम्।
पीतं सुतलमित्युक्तं नितलं विद्रुमप्रभम्।
सितं हि वितलं प्रोक्तं तलं चैव सितेतरम्॥ १८॥
सुपर्णेन मुनिश्रेष्ठास्तथा वासुकिना शुभम्।
रसातलमिति ख्यातं तथान्यैश्च निषेवितम्॥ १९ ॥
विरोचनहिरण्याक्षतक्षकाद्यैश्च सेवितम्।
तलातलमिति ख्यातं सर्वशोभासमन्वितम्॥ २०॥
वैनतेयादिभिश्चैव कालनेमिपुरोगमैः।
पूर्वदेवैः समाकीर्णं सुतलं च तथापरैः॥ २१॥
नितलं यवनाद्यैश्च तारकाग्निमुखैस्तथा।
महान्तकाद्यैर्नागैश्च प्रह्लादेनासुरेण च॥ २२॥
वितलं चैव विख्यातं कम्बलाहीन्द्रसेवितम्।
महाजम्भेन वीरेण हयग्रीवेण वै तथा॥ २३॥
शंकुकर्णेन सम्भिन्नं तथा नमुचिपूर्वकैः।
तथान्यैर्विविधैर्नागैस्तलं चैव सुशोभनम्॥ २४॥
करोड़ों सूर्यके समान उन (ब्रह्मा)-का वह पुर अत्यन्त दुर्गम है। अग्निशिखाकी मालाओंसे समन्वित उस पुरका मैं वर्णन नहीं कर सकता। ब्रह्माके उस पुरमें नारायणका भी भवन है। वहाँ मायामय परम मायावान् श्रीमान् हरि शयन करते हैं। पुनरागमनसे रहित वह विष्णुलोक कहा गया है। जो जनार्दनके शरणागत हैं, वे महात्मा वहाँ जाते हैं। उस ब्रह्म-सदनसे ऊपर ज्योतिर्मय, अग्निसे व्याप्त कल्याणकारी पुर है। वहाँ सैकड़ों-हजारों योगियों, भूतों तथा रुद्रोंसे परिवृत, मनीषियोंके द्वारा ध्यान किये जाते हुए वे भगवान् भव महादेव देवी पार्वतीके साथ निवास करते हैं॥ ८-१२॥
वहाँ वे ही जाते हैं जो संयमी ब्राह्मण हैं, ब्रह्मचारी हैं, महादेवपरायण हैं, शान्त, तपस्वी और ब्रह्मवादी हैं, ममत्वरहित, अहंकारशून्य तथा काम-क्रोधसे रहित हैं। ब्रह्मज्ञानसम्पन्न ये (व्यक्ति इस लोकका) दर्शन करते हैं। उस लोकको रुद्रलोक कहा गया है॥ १३-१४॥
हे द्विजो! पृथ्वीके ये सात महालोक कहे गये हैं। (पृथ्वीके) अधोभागमें महातल आदि (सात) पाताल हैं। महातल नामक पाताल सभी रत्नोंसे सुशोभित और अनेक प्रकारके महलों और शुभ्र देवमन्दिरोंसे सम्पन्न है। वह (महातल) अनन्त (नाग), धीमान् मुचुकुन्द एवं पाताल-स्वर्गवासी राजा बलिसे युक्त है। हे विप्रो! रसातल शैलमय है, तलातल शर्करामय है। सुतल पीत वर्णका कहा गया है। नितल विद्रुम (मूँगे)-के समान वर्णवाला, वितल श्वेत वर्णका और तल कृष्ण वर्णका कहा गया है॥ १५-१८॥
हे मुनिश्रेष्ठो! शुभ रसातल गरुड, वासुकि (नाग) तथा अन्य (महात्माओं)-से सेवित कहा गया है। सभी शोभाओंसे युक्त तलातल विरोचन, हिरण्याक्ष तथा तक्षक आदिके द्वारा सेवित कहा गया है। सुतल वैनतेय आदि पक्षी, कालनेमि प्रभृति दूसरे श्रेष्ठ असुरोंसे समाकीर्ण है। तारक, अग्निमुख आदि यवन और महान् अन्तक आदि नागों तथा असुर प्रह्लादसे नितल नामक पाताल सेवित है। वितल नामक प्रसिद्ध पाताल कम्बल नामक नागराज, महाजम्भ और वीर हयग्रीवसे सेवित है। तल नामक पाताल शंकुकर्णसे युक्त तथा प्रधान नमुचि आदि दैत्यों और अन्य विविध प्रकारके नागोंसे सुशोभित है॥ १९-२४॥