संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२१८ * कूर्मपुराण *
| दिवसस्य रविर्मध्ये सर्वकालं व्यवस्थितः।<br>सप्तद्वीपेषु विप्रेन्द्रा निशामध्यस्य सम्मुखम्॥ ३७॥<br><br>उदयास्तमने चैव सर्वकालं तु सम्मुखे।<br>अशेषासु दिशास्वेव तथैव विदिशासु च॥ ३८॥<br><br>कुलालचक्रपर्यन्तो भ्रमनेष यथेश्वरः।<br>करोत्यहस्तथा रात्रिं विमुञ्चन् मेदिनीं द्विजाः॥ ३९॥<br><br>दिवाकरकरैरेतत् पूरितं भुवनत्रयम्।<br>त्रैलोक्यं कथितं सद्भिर्लोकानां मुनिपुंगवाः॥ ४०॥<br><br>आदित्यमूलमखिलं त्रिलोकं नात्र संशयः।<br>भवत्यस्मात् जगत् कृत्स्नं सदेवासुरमानुषम्॥ ४१॥<br><br>रुद्रेन्द्रोपेन्द्रचन्द्राणां विप्रेन्द्राणां दिवौकसाम्।<br>द्युतिर्द्युतिमतां कृत्स्नं यत्तेजः सार्वलौकिकम्॥ ४२॥<br><br>सर्वात्मा सर्वलोकेशो महादेवः प्रजापतिः।<br>सूर्य एव त्रिलोकस्य मूलं परमदैवतम्॥ ४३॥<br><br>द्वादशान्ये तथादित्या देवास्ते येऽधिकारिणः।<br>निर्वहन्ति पदं तस्य तदंशा विष्णुमूर्तयः॥ ४४॥<br><br>सर्वे नमस्यन्ति सहस्त्रभानुं<br>गन्धर्वदेवोरगकिन्नराद्याः ।<br>यजन्ति यज्ञैर्विविधैर्द्विजेन्द्रा-<br>श्छन्दोमयं ब्रह्ममयं पुराणम्॥ ४५॥ | विप्रेन्द्रो! सात द्वीपोंमें दिनके मध्य एवं रात्रिके अर्धभागमें सूर्य सदा सम्मुख रहता है, उदय और अस्तके समय भी सदा सम्मुख रहता है। ये ईश्वर (सूर्य) कुम्हारके चक्रके समान सभी दिशाओं तथा विदिशाओंमें भ्रमण करते हैं। हे द्विजो! पृथ्वीका त्याग करते हुए ये दिन और रात्रिका निर्माण करते हैं। ये तीनों भुवन सूर्यकी किरणोंसे व्याप्त हैं। हे मुनिश्रेष्ठो! विद्वानोंने (समस्त) लोकोंको त्रैलोक्यके नामसे कहा है॥ ३७–४०॥<br><br>सम्पूर्ण त्रिलोकीके मूल सूर्य ही हैं, इसमें संशय नहीं। देवता, असुर तथा मनुष्योंसे युक्त सम्पूर्ण जगत् इन्हींसे उत्पन्न होता है। रुद्र, इन्द्र, उपेन्द्र, चन्द्रमा एवं श्रेष्ठ विप्रों तथा समस्त देवताओंका जो तेज है, द्युतिमानोंका जो प्रकाश है और समस्त लोकोंका जो सम्पूर्ण तेज है, (वह सूर्यका ही तेज है)। सूर्य ही सभी लोकोंके स्वामी, सर्वात्मा, प्रजापति, महान् देव, तीनों लोकोंके मूल और परम देवता हैं। इसी प्रकार अधिकारी-रूपमें जो अन्य बारह आदित्य देवता हैं, वे उन्हीं सूर्यके अंश हैं और विष्णुके मूर्तिरूप हैं। वे उन्हींके पद (कार्य)-को सम्पन्न करते हैं॥ ४१–४४॥<br><br>गन्धर्व, देवता, नाग तथा किन्नर आदि सभी हजारों किरणोंवाले सूर्यको नमस्कार करते हैं। श्रेष्ठ द्विज विविध यज्ञोंके द्वारा छन्दोमय एवं ब्रह्मस्वरूप पुरातन सूर्यदेवका यजन करते हैं॥ ४५॥ |
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः॥ ३९॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें उनतालीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ३९॥