संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished506 पृष्ठ
पृष्ठ 227, कुल 506 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 227
- अध्याय ३९ * २१७
| दक्षिणायनमार्गस्थो यदा चरति रश्मिमान्।<br>तदा सर्वग्रहाणां स सूर्योऽधस्तात् प्रसर्पति॥ २३॥<br><br>विस्तीर्णं मण्डलं कृत्वा तस्योर्ध्वं चरते शशी।<br>नक्षत्रमण्डलं कृत्स्नं सोमादूर्ध्वं प्रसर्पति॥ २४॥<br>नक्षत्रेभ्यो बुधश्चोर्ध्वं बुधादूर्ध्वं तु भार्गवः।<br>वक्रस्तु भार्गवादूर्ध्वं वक्रादूर्ध्वं बृहस्पतिः॥ २५॥<br>तस्माच्छनैश्चरोऽप्यूर्ध्वं तस्मात् सप्तर्षिमण्डलम्।<br>ऋषीणां चैव सप्तानां ध्रुवश्चोर्ध्वं व्यवस्थितः॥ २६॥<br>योजनानां सहस्राणि भास्करस्य रथो नव।<br>ईषादण्डस्तथैव स्याद् द्विगुणो द्विजसत्तमाः॥ २७॥<br>सार्धकोटिस्तथा सप्त नियुतान्यधिकानि तु।<br>योजनानां तु तस्याक्षस्तत्र चक्रं प्रतिष्ठितम्॥ २८॥<br>त्रिनाभिमति पञ्चारे षण्णेमिन्यक्षयात्मके।<br>संवत्सरमये कृत्स्नं कालचक्रं प्रतिष्ठितम्॥ २९॥<br>चत्वारिंशत् सहस्राणि द्वितीयोऽक्षो विवस्वतः।<br>पञ्चान्यानि तु सार्धानि स्यन्दनस्य द्विजोत्तमाः॥ ३०॥<br>अक्षप्रमाणमुभयोः प्रमाणं तद् युगार्धयोः।<br>ह्रस्वोऽक्षस्तद्युगार्धेन ध्रुवाधारे रथस्य तु॥ ३१॥<br><br>द्वितीयोऽक्षे तु तच्चक्रं संस्थितं मानसाचले।<br>हयाश्च सप्त छन्दांसि तन्नामानि निबोधत॥ ३२॥<br>गायत्री च बृहत्युष्णिग् जगती पङ्क्तिरेव च।<br>अनुष्टुप् त्रिष्टुबित्युक्ताश्छन्दांसि हरयो हरेः॥ ३३॥<br>मानसोपरि माहेन्द्री प्राच्यां दिशि महापुरी।<br>दक्षिणेन यमस्याथ वरुणस्य तु पश्चिमे॥ ३४॥<br>उत्तरेण तु सोमस्य तन्नामानि निबोधत।<br>अमरावती संयमनी सुखा चैव विभा क्रमात्॥ ३५॥<br>काष्ठां गतो दक्षिणतः क्षिप्तेषुरिव सर्पति।<br>ज्योतिषां चक्रमादाय देवदेवः प्रजापतिः॥ ३६॥ | जब सूर्य दक्षिणायनके मार्गमें विचरण करता है, तब वह (सूर्य) सभी ग्रहोंके निम्न भागोंमें भ्रमण करता है। उसके ऊपर विस्तृत मण्डल बनाकर चन्द्रमा विचरण करता है। सम्पूर्ण नक्षत्र-मण्डल चन्द्रमासे ऊपर भ्रमण करता है॥ २३-२४॥<br><br>नक्षत्रोंसे ऊपर बुध, बुधसे ऊपर शुक्र, शुक्रसे ऊपर मंगल और मंगलसे ऊपर बृहस्पति है। उस बृहस्पतिसे भी ऊपर शनैश्चर, उससे ऊपर सप्तर्षि-मण्डल तथा सप्तर्षि-मण्डलके ऊपर ध्रुव स्थित है॥ २५-२६॥<br><br>हे श्रेष्ठ द्विजो! भास्करका रथ नौ हजार योजनका है। उसका ईषादण्ड¹ उसी प्रकार दो गुना (अर्थात् अठारह हजार योजनका) है। उसका धुरा डेढ़ करोड़ सत्तर लाख योजनका है और उसीमें चक्र (रथका पहिया) प्रतिष्ठित है। तीन नाभि,² पाँच अरे³ और छः नेमियोंवाले⁴ संवत्सरमय उस अक्षय चक्रमें यह सम्पूर्ण कालचक्र प्रतिष्ठित है। द्विजोत्तमो! सूर्यके रथका दूसरा अक्ष (चक्र या धुरा) चालीस तथा साढ़े पाँच हजार योजनका है॥ २७-३०॥<br><br>दोनों ओरके युगार्ध (जूआ)-का प्रमाण उस अक्ष (धुरे)-के परिमाणके बराबर है। धुरेके आधारमें स्थित ह्रस्व अक्ष उस युगार्ध (जूआ)-के बराबर है। द्वितीय अक्षमें स्थित उस (रथ)-का चक्र मानसाचलपर स्थित है। सात छन्द (उस रथके) अश्व हैं। उनके नाम सुनो—॥ ३१-३२॥<br><br>गायत्री, बृहती, उष्णिक्, जगती, पंक्ति, अनुष्टुप् तथा त्रिष्टुप्—ये (सात) छन्द सूर्यके (सात) अश्व कहे गये हैं। मानसाचलपर पूर्व दिशामें महेन्द्रकी महापुरी है। दक्षिणमें यमकी, पश्चिममें वरुणकी, उत्तरमें सोमकी नगरी है, उनके (भी)नाम सुनो—अमरावती, संयमनी, सुखा तथा विभा—ये क्रमसे इन्द्रादिकी महापुरियाँ हैं। दक्षिण दिशामें स्थित देवोंके भी देव प्रजापति (सूर्य) ज्योतिश्चक्रको ग्रहणकर प्रक्षिप्त बाणके समान भ्रमण करते हैं॥ ३३-३६॥ |
१-ईषादण्ड—यह रथका अवयव-विशेष है। यह अवयव-विशेष उन दो लम्बे दण्डोंको समझना चाहिये जो रथके आगे होते हैं। इन्हींके मध्य एक या अपेक्षानुसार एकसे अधिक अश्व जोड़े जाते हैं।
२-नाभि—रथके चक्रके बीचका भाग, जिसमें चारों ओरसे काष्ठ जुड़े रहते हैं।
३-नाभिके चारों ओर जो काष्ठ जुड़े रहते हैं, वे ही 'अर' या 'आर' कहे जाते हैं।
४-नेमि—रथके चक्रके ऊपरवाली लोहेकी परिधि (हाल)।