संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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२१६ * कूर्मपुराण *
| लक्षे दिवाकरस्यापि मण्डलं शशिनः स्मृतम्।<br>नक्षत्रमण्डलं कृत्स्नं तल्लक्षेण प्रकाशते॥ ८ ॥ | सूर्यसे भी एक लाख (योजन) ऊपरके भागमें चन्द्रमाका मण्डल कहा गया है। उससे एक लाख योजनपर स्थित सम्पूर्ण नक्षत्र-मण्डल प्रकाशित होता है॥ ८॥ |
| द्वे लक्षे ह्युत्तरे विप्रा बुधो नक्षत्रमण्डलात्।<br>तावत्प्रमाणभागे तु बुधस्याप्युशना स्थितः॥ ९ ॥ | हे विप्रो! नक्षत्रमण्डलसे उत्तर दो लाख योजनकी दूरीपर बुध है। बुधसे उतने प्रमाणकी दूरीपर शुक्र स्थित है। शुक्रसे उतने ही प्रमाणपर मंगलकी स्थिति है। |
| अङ्गारकोऽपि शुक्रस्य तत्प्रमाणे व्यवस्थितः।<br>लक्षद्वयेन भौमस्य स्थितो देवपुरोहितः॥ १०॥ | मंगलसे दो लाख योजनकी दूरीपर देवताओंके पुरोहित बृहस्पति स्थित हैं। बृहस्पतिसे दो लाख योजन दूर |
| सौरिर्द्विलक्षेण गुरोर्ग्रहाणामथ मण्डलम्।<br>सप्तर्षिमण्डलं तस्माल्लक्षमात्रे प्रकाशते॥ ११॥ | सूर्यपुत्र शनैश्चर स्थित है। यह ग्रहोंका मण्डल है। ग्रहोंके उस मण्डलसे लाख योजनकी दूरीपर सप्तर्षि-मण्डल प्रकाशित होता है। ऋषियोंके मण्डल (सप्तर्षि- |
| ऋषीणां मण्डलादूर्ध्वं लक्षमात्रे स्थितो ध्रुवः।<br>मेढीभूतः समस्तस्य ज्योतिष्चक्रस्य वै ध्रुवः।<br>तत्र धर्मः स भगवान् विष्णुर्नारायणः स्थितः॥ १२॥ | मण्डल)-से एक लाख योजन ऊपर ध्रुव स्थित है। ध्रुव सम्पूर्ण ज्योतिश्चक्रका केन्द्र-रूप है। वहाँ धर्मरूप नारायण भगवान् विष्णु स्थित हैं॥ ९—१२॥ |
| नवयोजनसाहस्रो विष्कम्भः सवितुः स्मृतः।<br>त्रिगुणस्तस्य विस्तारो मण्डलस्य प्रमाणतः॥ १३॥ | सूर्यका व्यास नौ हजार योजन कहा गया है। उसका तीन गुना सूर्यमण्डलका विस्तार है। सूर्यके विस्तारका |
| द्विगुणस्तस्य विस्ताराद् विस्तारः शशिनः स्मृतः।<br>तुल्यस्तयोस्तु स्वर्भानुर्भूत्वाऽधस्तात् प्रसर्पति॥ १४॥ | दो गुना चन्द्रमाका विस्तार कहा गया है। उन दोनोंके तुल्य राहु उन दोनोंके नीचे भ्रमण करता है। पृथ्वीकी |
| उद्धृत्य पृथिवीच्छायां निर्मितो मण्डलाकृतिः।<br>स्वर्भानोस्तु बृहत् स्थानं तृतीयं यत् तमोमयम्॥ १५॥ | छायाको लेकर मण्डलाकारनिर्मित राहुका जो तीसरा बृहत् स्थान है, वह तमोमय है। चन्द्रमाका सोलहवाँ |
| चन्द्रस्य षोडशो भागो भार्गवस्य विधीयते।<br>भार्गवात् पादहीनस्तु विज्ञेयो वै बृहस्पतिः॥ १६॥ | भाग शुक्रका है। शुक्रसे चतुर्थांश कम बृहस्पति (-का विस्तार) जानना चाहिये। बृहस्पतिसे चतुर्थांश कम |
| बृहस्पतेः पादहीनौ वक्रसौरौवुभौ स्मृतौ।<br>विस्तारान्मण्डलाच्चैव पादहीनस्तयोर्बुधः॥ १७॥ | मंगल एवं शनि—इन दोनोंका मण्डल कहा गया है। इन दोनोंके मण्डल तथा विस्तारसे चतुर्थांश कम बुधका |
| तारानक्षत्ररूपाणि वपुष्मन्तीह यानि वै।<br>बुधेन तानि तुल्यानि विस्ताराम्मण्डलात् तथा॥ १८॥ | मण्डल है। तारा और नक्षत्ररूपी* जो शरीरधारी हैं, वे सभी मण्डल एवं विस्तारसे बुधके तुल्य हैं॥ १३—१८॥ |
| तारानक्षत्ररूपाणि हीनानि तु परस्परात्।<br>शतानि पञ्च चत्वारि त्रीणि द्वे चैव योजने॥ १९॥ | जो तारा एवं नक्षत्र-रूप हैं, वे एक-दूसरेसे पाँच, चार, तीन या दो सौ योजन कम विस्तारवाले हैं। सभी |
| सर्वावरनिकृष्टानि तारकामण्डलानि तु।<br>योजनान्यर्धमात्राणि तेभ्यो ह्रस्वं न विद्यते॥ २०॥ | छोटे-बड़े ताराओंका मण्डल (ग्रह-पिण्डोंसे छोटे और एक) योजन या आधे योजन परिमाणवाले हैं, उनसे छोटा कोई विद्यमान नहीं है। उनसे ऊपर दूरगामी जो |
| उपरिष्टात् त्रयस्तेषां ग्रहा ये दूरसर्पिणः।<br>सौरोग्ङ्गिराश्च वक्रश्च ज्ञेया मन्दविचारिणः॥ २१॥ | शनि, बृहस्पति तथा मंगल हैं, उन्हें मन्दगतिसे विचरण करनेवाला समझना चाहिये। उनसे नीचे जो दूसरे सूर्य, |
| तेभ्योऽधस्ताच्च चत्वारः पुनरन्ये महाग्रहाः।<br>सूर्यः सोमो बुधश्चैव भार्गवश्चैव शीघ्रगाः॥ २२॥ | चन्द्रमा, बुध तथा शुक्र—चार महाग्रह हैं, ये शीघ्र गतिवाले हैं॥ १९—२२॥ |
* ज्योतिषमें अश्विनी आदि २७ अथवा 'अभिजत्' नामके नक्षत्रको लेकर २८ नक्षत्र प्रसिद्ध हैं—ये ही आकाशमें नक्षत्र नामसे विद्यमान हैं। इनके अतिरिक्त आकाशमें अगणित ज्योतिष्पिण्ड हैं, वे ही 'तारा' कहे जाते हैं।