भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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  • अध्याय ३९ * २१५

शतजिद् रजसस्तस्य जज्ञे पुत्रशतं द्विजाः।<br>तेषां प्रधानो बलवान् विश्वज्योतिरिति स्मृतः॥ ४२॥द्विजो! उस रजस्को शतजित् नामक पुत्र हुआ और उसके सौ पुत्र हुए। उनमें जो प्रधान और बलवान् था, वह विश्वज्योति नामसे प्रसिद्ध हुआ। देव ब्रह्माकी आराधना कर (विश्वज्योतिने) क्षेमक नामके महाबाहु और शत्रुमर्दन तथा धर्मज्ञ राजाको पुत्ररूपमें उत्पन्न किया॥ ४२-४३॥
आराध्य देवं ब्रह्माणं क्षेमकं नाम पार्थिवम्।<br>असूत पुत्रं धर्मज्ञं महाबाहुमरिंदमम्॥ ४३॥
एते पुरस्ताद् राजानो महासत्त्वा महौजसः।<br>एषां वंशप्रसूतैश्च भुक्तेयं पृथिवी पुरा॥ ४४॥पूर्वकालमें ये महासत्त्वसम्पन्न और महान् ओजस्वी राजा थे। इनके वंशमें उत्पन्न लोगोंने प्राचीन कालमें इस पृथिवीका उपभोग किया॥ ४४॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे अष्टात्रिंशोऽध्यायः॥ ३८॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें अड़तीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ३८॥


उनतालीसवाँ अध्याय

'भू' आदि सात लोकोंका वर्णन, ग्रह-नक्षत्रोंकी स्थितिका वर्णन तथा उनका परिमाप, सूर्यरथका वर्णन, पूर्व आदि दिशाओंमें स्थित इन्द्रादि देवोंकी अमरावती आदि पुरियोंका नाम-निर्देश, सूर्यकी महिमा

सूत उवाचसूतजीने कहा—
अतः परं प्रवक्ष्यामि संक्षेपेण द्विजोत्तमाः।<br>त्रैलोक्यस्यास्य मानं वो न शक्यं विस्तरेण तु॥ १॥हे द्विजोत्तमो! अब मैं आप लोगोंसे संक्षेपमें इस त्रैलोक्यके परिमाणका वर्णन करूँगा, क्योंकि इसका विस्तारसे वर्णन नहीं किया जा सकता। (सृष्टिके आदिमें) भूलोक, भुवर्लोक, स्वर्लोक, महर्लोक, जनलोक, तपोलोक तथा सत्यलोक—ये (सातों) लोक अण्डसे उत्पन्न बताये गये हैं॥ १-२॥
भूर्लोकोऽथ भुवर्लोकः स्वर्लोकोऽथ महस्ततः।<br>जनस्तपश्च सत्यं च लोकास्त्वण्डोद्भवा मताः॥ २॥
सूर्याचन्द्रमसोर्यावत् किरणैरवभासते।<br>तावद् भूर्लोक आख्यातः पुराणे द्विजपुंगवाः॥ ३॥द्विजश्रेष्ठो! सूर्य और चन्द्रमाकी किरणोंसे जहाँतकका भाग प्रकाशित होता है, उतने भागको पुराणमें भूलोक कहा गया है। सूर्यके परिमण्डलसे भूलोकका जितना परिमाण है, उतना ही विस्तार भुवर्लोकका भी सूर्यके मण्डलसे है। आकाशमें ऊपरकी ओर जहाँ ध्रुव (तारा) स्थित है, वहाँतकके मण्डलको स्वर्लोक कहा जाता है। वहाँ वायुकी नेमियाँ* हैं। आवह, प्रवह, अनुवह, संवह, विवह तथा उसके ऊपर परावह और उसके ऊपर परिवह नामक वायुकी सात नेमियाँ हैं। भूमिसे एक लाख योजन ऊपर सूर्यका मण्डल स्थित है॥ ३-७॥
यावत्प्रमाणो भूर्लोको विस्तरात् परिमण्डलात्।<br>भुवर्लोकोऽपि तावान् स्यान्मण्डलाद् भास्करस्य तु॥ ४॥
ऊर्ध्वं यन्मण्डलाद् व्योम ध्रुवो यावद् व्यवस्थितः।<br>स्वर्लोकः स समाख्यातस्तत्र वायोस्तु नेमयः॥ ५॥
आवहः प्रवहश्चैव तथैवानुवहः परः।<br>संवहो विवहश्चाथ तदूर्ध्वं स्यात् परावहः॥ ६॥
तथा परिवहश्चोर्ध्वं वायोर्वै सप्त नेमयः।<br>भूमेर्योजनलक्षे तु भानोर्वै मण्डलं स्थितम्॥ ७॥

* चक्र (रथके पहिया)-के ऊपर लोहेकी गोलाकार हाल (परिधि) लगी होती है, इसीके कारण चक्र बिखरता नहीं है। इसी गोलाकार हाल (परिधि)-को नेमि कहते हैं।