भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२१४ * कूर्मपुराण *


नाभेस्तु दक्षिणं वर्षं हिमाह्वं प्रददौ पुनः।
हेमकूटं ततो वर्षं ददौ किंपुरुषाय तु॥ २९॥
तृतीयं नैषधं वर्षं हरये दत्तवान् पिता।
इलावृताय प्रददौ मेरुमध्यमिलावृतम्॥ ३०॥
नीलाचलाश्रितं वर्षं रम्याय प्रददौ पिता।
श्वेतं यदुत्तरं वर्षं पित्रा दत्तं हिरण्वते॥ ३१॥
यदुत्तरं शृङ्गवतो वर्षं तत् कुरवे ददौ।
मेरोः पूर्वेण यद् वर्षं भद्राश्वाय न्यवेदयत्।
गन्धमादनवर्षं तु केतुमालाय दत्तवान्॥ ३२॥
वर्षेष्वेतेषु तान् पुत्रानभिषिच्य नराधिपः।
संसारकष्टतां ज्ञात्वा तपस्तेपे वनं गतः॥ ३३॥
हिमाह्वयं तु यस्यैतन्नाभेरासीन्महात्मनः।
तस्यार्षभोऽभवत् पुत्रो मरुदेव्यां महाद्युतिः॥ ३४॥
ऋषभाद् भरतो जज्ञे वीरः पुत्रशताग्रजः।
सोऽभिषिच्यर्षभः पुत्रं भरतं पृथिवीपतिः।
वानप्रस्थाश्रमं गत्वा तपस्तेपे यथाविधि॥ ३५॥
तपसा कर्षितोऽत्यर्थं कृशो धमनिसंततः।
ज्ञानयोगरतो भूत्वा महापाशुपतोऽभवत्॥ ३६॥
सुमतिर्भरतस्याभूत् पुत्रः परमधार्मिकः।
सुमतेस्तैजसस्तस्मादिन्द्रद्युम्नो व्यजायत॥ ३७॥
परमेष्ठी सुतस्तस्मात् प्रतीहारस्तदन्वयः।
प्रतिहर्तेति विख्यात उत्पन्नस्तस्य चात्मजः॥ ३८॥
भवस्तस्मादथोग्दीथः प्रस्तावस्तत्सुतोऽभवत्।
पृथुस्ततस्ततो रक्तो रक्तस्यापि गयः सुतः॥ ३९॥
नरो गयस्य तनयस्तस्य पुत्रो विराडभूत्।
तस्य पुत्रो महावीर्यो धीमांस्तस्मादजायत॥ ४०॥
महान्तोऽपि ततश्चाभूद् भौवनस्तत्सुतोऽभवत्।
त्वष्टा त्वष्टुश्च विरजो रजस्तस्याप्यभूत् सुतः॥ ४१॥

(अग्नीध्रने) नाभिको दक्षिण दिशामें स्थित हिम नामक वर्ष प्रदान किया। तदनन्तर किंपुरुषको हेमकूट नामक वर्ष दिया। पिता (अग्नीध्र)-ने हरिको तृतीय नैषध नामक वर्ष प्रदान किया और इलावृतको मेरुके मध्यमें स्थित इलावृत (नामक वर्ष) दिया। पिताने रम्यको नीलाचलयुक्त वर्ष प्रदान किया और जो उत्तरमें स्थित श्वेतवर्ष है, उसे हिरण्वान्‌को दिया। शृंगवान् पर्वतके उत्तरमें स्थित (उत्तरकुरु नामक) वर्ष कुरुको दिया और मेरुके पूर्वमें स्थित (भद्राश्व नामक) वर्ष भद्राश्वको दिया तथा गन्धमादन नामक वर्ष केतुमालको प्रदान किया॥ २९-३२॥

इन वर्षोंमें अपने पुत्रोंको अभिषिक्त कर राजा (अग्नीध्र) संसारके कष्टको जानकर तपस्या करनेके लिये वनमें चले गये। जिन महात्मा नाभिके पास हिम नामक वर्ष था, उन्हें मरुदेवीसे महान् द्युतिमान् ऋषभ नामक पुत्र हुआ। ऋषभको सौ पुत्रोंमें सबसे ज्येष्ठ भरत नामक वीर पुत्र उत्पन्न हुआ। भरत नामक पुत्रको पृथ्वीके अधिपति के रूपमें अभिषिक्त कर राजा ऋषभ वानप्रस्थाश्रमका आश्रय लेकर यथाविधि तप करने लगे। तपस्यासे अत्यन्त क्षीण होनेके कारण वे इतने कृश हो गये कि उनके शरीरकी नाड़ियाँ दीखती थीं। (तपःपूत वे) ज्ञानयोगपरायण होकर महापाशुपत* हो गये॥ ३३-३६॥

(उन) भरतको भी सुमति नामक परम धार्मिक पुत्र हुआ। सुमतिका पुत्र तैजस और उस (तैजस)-से इन्द्रद्युम्न उत्पन्न हुआ। उस इन्द्रद्युम्नका पुत्र परमेष्ठी हुआ और उस (परमेष्ठी)-का पुत्र प्रतीहार हुआ। उस प्रतीहारका जो पुत्र उत्पन्न हुआ, वह प्रतिहर्ताके नामसे विख्यात हुआ। उससे भव, भवसे उद्गीथ तथा उस (उद्गीथ)-से प्रस्ताव नामक पुत्रकी उत्पत्ति हुई। उस (प्रस्ताव)-से पृथु एवं पृथुसे रक्त उत्पन्न हुआ और रक्तको भी गय नामक पुत्र हुआ। गयका पुत्र नर और उसका पुत्र विराट् हुआ। उस (विराट्)-का पुत्र महावीर्य और उससे धीमान् (नामक पुत्र) उत्पन्न हुआ॥ ३७-४०॥

उस (धीमान्)-से महान्त नामक पुत्र हुआ और उसका पुत्र भौवन हुआ। उस (भौवन)-का त्वष्टा हुआ। उस (त्वष्टा)-से विरज तथा विरजसे रज नामक पुत्र उत्पन्न हुआ॥ ४१॥


* पाशुपत (पशुपति-महादेवको परम ध्येय माननेवाला) व्रत है। इसमें पूर्ण परिनिष्ठित परम विरक्त मनुष्य महापाशुपत कहा जाता है।