भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished506 पृष्ठ

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  • अध्याय ४० * | २१९ ---|---

चालीसवाँ अध्याय

सूर्य-रथ तथा द्वादश आदित्योंके नाम, सूर्य-रथके अधिष्ठातृ देवता आदिका वर्णन, सूर्यकी महिमा

सूत उवाचसूतजीने कहा—वे (सूर्यदेव) (सभी) देवों, (द्वादश) आदित्यों, (अष्ट) वसुओं, गन्धर्वों, अप्सराओं, ग्रामणी*, सर्पों तथा राक्षसोंसहित उस रथपर अधिष्ठित रहते हैं। धाता, अर्यमा, मित्र, वरुण, इन्द्र, विवस्वान्, पूषा, पर्जन्य, अंशु, भग, त्वष्टा तथा विष्णु—ये बारह आदित्य हैं। ये क्रमशः वसन्त आदि ऋतुओंमें भानुको आप्यायित करते हैं। पुलस्त्य, पुलह, अत्रि, वसिष्ठ, अंगिरा, भृगु, भरद्वाज, गौतम, कश्यप, क्रतु, जमदग्नि तथा कौशिक—ये ब्रह्मवादी मुनि अनेक प्रकारके छन्दों (वैदिक मन्त्रों)-के द्वारा क्रमशः सूर्यदेवकी स्तुति करते हैं॥ १-५॥
स रथोऽधिष्ठितो देवैरादित्यैर्वसुभिस्तथा।<br>गन्धर्वैरप्सरोभिश्च ग्रामणीसर्पराक्षसैः॥ १ ॥<br>धातार्यमाथ मित्रश्च वरुणः शक्र एव च।<br>विवस्वानथ पूषा च पर्जन्यश्चांशुरेव च॥ २ ॥<br>भगस्त्वष्टा च विष्णुश्च द्वादशैते दिवाकराः।<br>आप्याययन्ति वै भानुं वसन्तादिषु वै क्रमात्॥ ३ ॥<br>पुलस्त्यः पुलहश्चात्रिर्वसिष्ठश्चाङ्गिरा भृगुः।<br>भरद्वाजो गौतमश्च कश्यपः क्रतुरेव च॥ ४ ॥<br>जमदग्निः कौशिकश्च मुनयो ब्रह्मवादिनः।<br>स्तुवन्ति देवं विविधैश्छन्दोभिस्ते यथाक्रमम्॥ ५ ॥
रथकृच्च रथौजाश्च रथचित्रः सुबाहुकः।<br>रथस्वनोऽथ वरुणः सुषेणः सेनजित् तथा॥ ६ ॥<br>तार्क्ष्यश्चारिष्टनेमिश्च रथजित् सत्यजित् तथा।<br>ग्रामण्यो देवदेवस्य कुर्वतेऽभीशुसंग्रहम्॥ ७ ॥<br>अथ हेतिः प्रहेतिश्च पौरुषेयो वधस्तथा।<br>सर्पो व्याघ्रस्तथापश्च वातो विद्युद् दिवाकरः॥ ८ ॥<br>ब्रह्मोपेतश्च विप्रेन्द्रा यज्ञोपेतस्तथैव च।<br>राक्षसप्रवरा ह्येते प्रयान्ति पुरतः क्रमात्॥ ९ ॥<br>वासुकिः कङ्कनीरश्च तक्षकः सर्पपुंगवः।<br>एलापत्रः शङ्खपालस्तथैरावतसंज्ञितः॥ १०॥<br>धनंजयो महापद्मस्तथा कर्कोटको द्विजाः।<br>कम्बलाश्वतरश्चैव वहन्त्येनं यथाक्रमम्॥ ११॥रथकृत्, रथौजा, रथचित्र, सुबाहुक, रथस्वन, वरुण, सुषेण, सेनजित्, तार्क्ष्य, अरिष्टनेमि, रथजित् और सत्यजित्—ये (बारह) ग्रामणी देवोंके देव सूर्यकी रश्मियोंका संग्रह करते हैं। हे विप्रेन्द्रो! हेति, प्रहेति, पौरुषेय, वध, सर्प, व्याघ्र, आप, वात, विद्युत्, दिवाकर, ब्रह्मोपेत और यज्ञोपेत—ये (बारह) श्रेष्ठ राक्षस क्रमसे सूर्यके आगे-आगे चलते हैं। हे द्विजो! वासुकि, कङ्कनीर, तक्षक, सर्पपुङ्गव, एलापत्र, शंखपाल, ऐरावत, धनंजय, महापद्म, कर्कोटक, कम्बल तथा अश्वतर—ये (बारह) नाग क्रमशः इन सूर्यदेवको वहन करते हैं॥ ६-११॥
तुम्बुरुर्नारदो हाहा हूहूर्विश्वावसुस्तथा।<br>उग्रसेनो वसुरुचिर्वावसुस्तथापरः॥ १२॥<br><br>चित्रसेनस्तथोर्णायुर्धृतराष्ट्रो द्विजोत्तमाः।<br>सूर्यवर्चा द्वादशैते गन्धर्वा गायतां वराः।<br>गायन्ति विविधैर्गानैर्भानुं षड्जादिभिः क्रमात्॥ १३॥<br><br>क्रतुस्थलाप्सरोवर्या तथान्या पुञ्जिकस्थला।<br>मेनका सहजन्या च प्रम्लोचा च द्विजोत्तमाः॥ १४॥द्विजोत्तमो! तुम्बुरु, नारद, हाहा, हूहू, विश्वावसु, उग्रसेन, वसुरुचि, अर्वावसु, चित्रसेन, ऊर्णायु, धृतराष्ट्र और सूर्यवर्चा—ये (बारह) श्रेष्ठ गायन करनेवाले गन्धर्व क्रमशः षड्ज आदि स्वरोंके द्वारा विविध प्रकारके गीतोंसे सूर्यके समीप गान करते रहते हैं। हे द्विजोत्तमो! अप्सराओंमें श्रेष्ठ अप्सरा—क्रतुस्थला, पुञ्जिक-स्थला, मेनका, सहजन्या, प्रम्लोचा,

* अग्रणी (नेता)।