भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२२०* कूर्मपुराण *
अनुम्लोचा घृताची च विश्वाची चोर्वशी तथा।<br>अन्या च पूर्वचित्तिः स्यादन्या चैव तिलोत्तमा॥ १५॥<br><br>ताण्डवैर्विविधैरेनं वसन्तादिषु वै क्रमात्।<br>तोषयन्ति महादेवं भानुमात्मानमव्ययम्॥ १६॥<br>एवं देवा वसन्त्यर्के द्वौ द्वौ मासौ क्रमेण तु।<br>सूर्यमाप्याययन्त्येते तेजसा तेजसां निधिम्॥ १७॥<br><br>ग्रथितैः स्वैर्वचोभिस्तु स्तुवन्ति मुनयो रविम्।<br>गन्धर्वाप्सरसश्चैनं नृत्यगेयैरुपासते॥ १८॥<br>ग्रामणीयक्षभूतानि कुर्वतेऽभीषुसंग्रहम्।<br>सर्पा वहन्ति देवेशं यातुधानाः प्रयान्ति च॥ १९॥<br><br>बालखिल्या नयन्त्यस्तं परिवार्योदयाद् रविम्।<br>एते तपन्ति वर्षन्ति भान्ति वान्ति सृजन्ति च।<br>भूतानामशुभं कर्म व्यपोहन्तीह कीर्तिताः॥ २०॥<br><br>एते सहैव सूर्येण भ्रमन्ति दिवि सानुगाः।<br>विमाने च स्थिता नित्यं कामगे वातरंहसि॥ २१॥<br><br>वर्षन्तश्च तपन्तश्च ह्लादयन्तश्च वै प्रजाः।<br>गोपयन्तीह भूतानि सर्वाणीवायुगक्षयात्॥ २२॥<br><br>एतेषामेव देवानां यथावीर्यं यथातपः।<br>यथायोगं यथासत्त्वं स एष तपति प्रभुः॥ २३॥<br>अहोरात्रव्यवस्थानकारणं स प्रजापतिः।<br>पितृदेवमनुष्यादीन् स सदाप्याययेद् रविः॥ २४॥<br><br>तत्र देवो महादेवो भास्वान् साक्षान्महेश्वरः।<br>भासते वेदविदुषां नीलग्रीवः सनातनः॥ २५॥<br><br>स एष देवो भगवान् परमेष्ठी प्रजापतिः।<br>स्थानं तद् विदुरादित्यं वेदज्ञा वेदविग्रहम्॥ २६॥अनुम्लोचा, घृताची, विश्वाची, उर्वशी, पूर्वचित्ति, अन्या और तिलोत्तमा—ये (बारह) अप्सराएँ क्रमशः वसन्त आदि ऋतुओंमें विविध ताण्डव आदि (नृत्यों)-के द्वारा इन अव्यय, आत्मस्वरूप महान् देवता भानुको संतुष्ट करती हैं॥ १२—१६॥<br><br>इस प्रकार ये देवता क्रमशः दो-दो महीनोंमें (वसन्त आदि ६ ऋतुओंमें) सूर्यमें प्रतिष्ठित रहते हुए तेजोनिधि सूर्यको अपने तेजसे आप्यायित करते हैं। मुनिगण स्वयंरचित स्तुतियोंसे सूर्यकी स्तुति करते रहते हैं और अप्सराएँ एवं गन्धर्व नृत्य तथा गीतोंके द्वारा इनकी उपासना करते हैं॥ १७-१८॥<br><br>ग्रामणी, यक्ष और भूतगण (सूर्यदेवसे) रश्मियोंका संग्रह करते हैं, सर्प देवताओंके ईश (सूर्य)-को वहन करते हैं और राक्षस (उनके आगे-आगे) चलते हैं। बालखिल्य नामक मुनिगण सूर्यको आवृतकर उदयाचलसे अस्ताचलतक ले जाते हैं। (पूर्वमें कहे गये) ये (द्वादश आदित्य) तपते, बरसते, प्रकाश करते, बहते एवं सृष्टि करते हैं। इनका कीर्तन करनेपर ये प्राणियोंके अशुभ कर्मोंको दूर करते हैं। ये नित्य कामचारी तथा वायुके समान गतिवाले विमानपर सूर्यके साथ अपने अनुचरोंसहित आकाशमें भ्रमण करते हैं। ये क्रमशः वर्षा, ताप एवं प्रजाको आनन्द प्रदान करते हुए प्रलयपर्यन्त सभी प्राणियोंकी रक्षा करते हैं। ये प्रभु सूर्य इन्हीं देवोंके वीर्य, तप, योग और सत्त्वके अनुसार (प्राणिमात्रको) ताप देते हैं॥ १९—२३॥<br><br>वे प्रजापति (सूर्य) दिन और रात्रिकी व्यवस्थाके कारण हैं। ये सूर्य पितरों, देवों तथा मनुष्य आदि सभीको सदा आप्यायित करते हैं। वेदज्ञोंके (आराध्य) सनातन, नीलग्रीव, महादेव साक्षात् देव महादेव महेश्वर ही सूर्यके रूपमें प्रकाशित होते हैं। वेदज्ञ लोग आदित्य (सूर्य)-को वेदका विग्रह (शरीर ही) मानते हैं और यही वेदविग्रह आदित्य, देव भगवान् परमेष्ठी प्रजापति हैं॥ २४—२६॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे चत्वारिंशोऽध्यायः॥ ४०॥

इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें चालीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ४०॥