संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished506 पृष्ठ
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- अध्याय ४१ * | २२१ ---|---
एकतालीसवाँ अध्याय
सूर्यकी प्रधान सात रश्मियोंके नाम, इनके द्वारा ग्रहोंका आप्यायन, सूर्यकी अन्य हजारों नाडियोंका वर्णन तथा उनका कार्य, बारह महीनोंके बारह सूर्योंके नाम तथा छः ऋतुओंमें उनका वर्ण, आठ ग्रहोंका वर्णन, सोमके रथका वर्णन, देवोंद्वारा चन्द्रकलाओंका पान करना, पितरोंद्वारा अमावस्याको चन्द्रमाकी कलाका पान, बुध आदि ग्रहोंके रथका वर्णन
| सूत उवाच | सूतजी बोले— इस प्रकार ये महादेव कालात्मा |
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| एवमेष महादेवो देवदेवः पितामहः।<br>करोति नियतं कालं कालात्मा ह्यैश्वरी तनुः॥ १ ॥ | ऐश्वर्यमय विग्रहवाले देवाधिदेव पितामह (सूर्य) कालका नियमन करते हैं। विप्रो! सभी लोकोंको प्रकाशित |
| तस्य ये रश्मयो विप्राः सर्वलोकप्रदीपकाः।<br>तेषां श्रेष्ठाः पुनः सप्त रश्मयो ग्रहयोनयः॥ २ ॥ | करनेवाली उनकी जो रश्मियाँ हैं, उनमें भी ग्रहोंकी योनिरूप सात रश्मियाँ अत्यन्त श्रेष्ठ हैं॥ १-२॥ |
| सुषुम्नो हरिकेशश्च विश्वकर्मा तथैव च।<br>विश्वव्यचाः पुनश्चान्यः संयद्वसुरतः परः॥ ३ ॥ | सुषुम्न, हरिकेश, विश्वकर्मा, विश्वव्यचा, संयद्वसु, अर्वावसु तथा स्वराट्—ये सात रश्मियाँ कही गयी हैं। |
| अर्वावसुरीति ख्यातः स्वराडन्यः प्रकीर्तितः।<br>सुषुम्नः सूर्यरश्मिस्तु पुष्णाति शिशिरद्युतिम्॥ ४ ॥ | सुषुम्न नामक सूर्यकी रश्मि चन्द्रमाकी चाँदनीको पुष्ट करती है। यह सुषुम्न रश्मि तिरछे रूपसे ऊपरको जानेवाली |
| तिर्यगूर्ध्वप्रचारोऽसौ सुषुम्नः परिपठ्यते।<br>हरिकेशस्तु यः प्रोक्तो रश्मिर्नक्षत्रपोषकः॥ ५ ॥ | कही गयी है। हरिकेश नामक जो रश्मि कही गयी है, वह नक्षत्रोंका पोषण करनेवाली है। विश्वकर्मा नामक |
| विश्वकर्मा तथा रश्मिर्बुधं पुष्णाति सर्वदा।<br>विश्वव्यचास्तु यो रश्मिः शुक्रं पुष्णाति नित्यदा॥ ६ ॥ | रश्मि सदा बुध (ग्रह)-का पोषण करती है। विश्वव्यचा नामकी जो रश्मि है, वह नित्य शुक्र (ग्रह)-का पोषण |
| संयद्वसुरिति ख्यातः स पुष्णाति च लोहितम्।<br>बृहस्पतिं प्रपुष्णाति रश्मिरर्वावसुः प्रभोः।<br>शनैश्चरं प्रपुष्णाति सप्तमस्तु सुराट् तथा॥ ७ ॥ | करती है। संयद्वसु नामसे प्रसिद्ध रश्मि मंगलका पोषण करती है और प्रभु सूर्यकी अर्वावसु नामक रश्मि बृहस्पतिका पोषण करती है तथा सातवीं सुराट् (स्वराट्) नामक रश्मि शनैश्चरका पोषण करती है॥ ३—७॥ |
| एवं सूर्यप्रभावेण सर्वा नक्षत्रतारकाः।<br>वर्धन्ते वर्धिता नित्यं नित्यमाप्याययन्ति च॥ ८ ॥ | इस प्रकार सूर्यके प्रभावसे सभी नक्षत्र एवं तारे नित्य बढ़ते हैं तथा वृद्धि प्राप्तकर नित्य दूसरोंको आप्यायित करते हैं। द्युलोक एवं पृथ्वीसे सम्बद्ध समस्त |
| दिव्यानां पार्थिवानां च नैशानां चैव सर्वशः।<br>आदानान्नित्यमादित्यस्तेजसां तमसां प्रभुः॥ ९ ॥ | तेज-समूह और निशा-सम्बन्धी तम—अन्धकारका नित्य आदान अर्थात् ग्रहण करनेके कारण प्रभु (सूर्य)-को आदित्य कहा जाता है। हजारों नेत्रवाले वे अपनी हजारों |
| आदत्ते स तु नाडीनां सहस्रेण समंततः।<br>नादेयांश्चैव सामुद्रान् कूप्यांश्चैव सहस्रदृक्।<br>स्थावराज्जङ्गमांश्चैव यच्च कुल्यादिकं पयः॥ १०॥ | नाडियों (किरणों)-द्वारा चारों ओरके नदियों, समुद्रों, कूपों, स्थावर तथा जङ्गम और नहरों आदिके जलका ग्रहण करते हैं। उनकी हजारों रश्मियाँ शीत, वर्षा एवं |
| तस्य रश्मिसहस्रं तच्छीतवर्षोष्णनिस्स्रवम्।<br>तासां चतुःशतं नाड्यो वर्षन्ते चित्रमूर्तयः॥ ११॥ | उष्णताकी सृष्टि करनेवाली हैं और उनमें चार सौ विचित्र मूर्तिस्वरूपा रश्मियाँ वर्षा करती हैं वन्दना, |
| वन्दनाश्चैव याज्याश्च केतना भूतनास्तथा।<br>अमृता नाम ताः सर्वा रश्मयो वृष्टिसर्जनाः॥ १२॥ | याज्या, केतना और भूतना—ये अमृता नामवाली सभी रश्मियाँ वर्षा करनेवाली हैं॥ ८-१२॥ |