भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२२२* कूर्मपुराण *
हिमोद्वाहाश्च ता नाड्यो रश्मयस्त्रिशतं पुनः ।<br>रश्म्यो मेष्यश्च पौष्यश्च ह्लादिन्यो हिमसर्जनाः ।<br>चन्द्रास्ता नामतः सर्वा पीताभाः स्युर्गभस्तयः ॥ १३ ॥<br><br>शुक्राश्च ककुभश्चैव गावो विश्वभृतस्तथा ।<br>शुक्रास्ता नामतः सर्वास्त्रिविधा घर्मसर्जनाः ॥ १४ ॥नाडीस्वरूपिणी तीन सौ रश्मियाँ हिमकी सृष्टि करती हैं। मेषी, पौषी तथा ह्लादिनी नामकी रश्मियाँ हिमकी सृष्टि करनेवाली हैं। ये सभी रश्मियाँ पीत वर्णकी और चन्द्र नामवाली हैं। शुक्रा, ककुभ् और विश्वभृत् नामक सभी रश्मियोंका नाम शुक्रा है। ये तीनों प्रकारकी रश्मियाँ धूपकी सृष्टि करनेवाली हैं॥ १३-१४॥
समं बिभर्ति ताभिः स मनुष्यपितृदेवताः ।<br>मनुष्यानौषधेनेह स्वधया च पितॄनपि ।<br>अमृतेन सुरान् सर्वांस्त्रिभिस्त्रींस्तर्पयत्यसौ ॥ १५ ॥उनके द्वारा वे (सूर्य) समान-रूपसे मनुष्यों, पितरों तथा देवताओंका पोषण करते हैं। वे (इन किरणोंके माध्यमसे) मनुष्योंको औषधके द्वारा, पितरोंको स्वधाके द्वारा और देवताओंको अमृतके द्वारा—इस प्रकार तीनोंको तीन पदार्थोंद्वारा संतृप्त करते हैं॥ १५॥
वसन्ते ग्रैष्मिके चैव शतैः स तपति त्रिभिः ।<br>शरद्यपि च वर्षासु चतुर्भिः सम्प्रवर्षति ।<br>हेमन्ते शिशिरे चैव हिममुत्सृजति त्रिभिः ॥ १६ ॥<br><br>वरुणो माघमासे तु सूर्यः पूषा तु फाल्गुने ।<br>चैत्रे मासि भवेदंशो धाता वैशाखतापनः ॥ १७ ॥<br><br>ज्येष्ठामूले भवेदिन्द्रः आषाढे सविता रविः ।<br>विवस्वान् श्रावणे मासि प्रौष्ठपद्यां भगः स्मृतः ॥ १८ ॥<br><br>पर्जन्योऽश्वयुजि त्वष्टा कार्तिके मासि भास्करः ।<br>मार्गशीर्षे भवेन्मित्रः पौषे विष्णुः सनातनः ॥ १९ ॥वे (सूर्य) वसन्त एवं ग्रीष्म ऋतुमें तीन सौ किरणोंसे तपते हैं। शरद् और वर्षा ऋतुमें चार सौ रश्मियोंके द्वारा वर्षा करते हैं तथा हेमन्त एवं शिशिर ऋतुमें तीन सौ रश्मियोंसे हिम प्रदान करते हैं। माघमासमें सूर्यका नाम वरुण होता है, फाल्गुनमें वे पूषा कहलाते हैं। सूर्य चैत्र-मासमें अंश, वैशाखमें धाता, ज्येष्ठा-मूल अर्थात् ज्येष्ठ-मासमें इन्द्र, आषाढ़में सविता, श्रावणमें विवस्वान् तथा भाद्रपदमासमें भग कहे जाते हैं। (ये ही) सूर्य आश्विनमें पर्जन्य, कार्तिकमें त्वष्टा, मार्गशीर्षमें मित्र और पौषमें सनातन विष्णु कहलाते हैं॥ १६-१९॥
पञ्चरश्मिसहस्राणि वरुणस्यार्ककर्मणि ।<br>षड्भिः सहस्रैः पूषा तु देवोंऽशः सप्तभिस्तथा ॥ २० ॥<br><br>धाताष्टभिः सहस्रैस्तु नवभिस्तु शतक्रतुः ।<br>विवस्वान् दशभिः पाति पात्येकादशभिर्भगः ॥ २१ ॥<br><br>सप्तभिस्तपते मित्रस्त्वष्टा चैवाष्टभिस्तपेत् ।<br>अर्यमा दशभिः पाति पर्जन्यो नवभिस्तपेत् ।<br>षड्भी रश्मिसहस्रैस्तु विष्णुस्तपति विश्वसृक् ॥ २२ ॥वरुण (नामक सूर्य)-की पाँच हजार रश्मियाँ सूर्यका कार्य सम्पादित करती हैं। इसी प्रकार पूषा छः हजार, अंश देव सात हजार, धाता आठ हजार, शतक्रतु इन्द्र नौ हजार, विवस्वान् दस हजार और भग ग्यारह हजार रश्मियोंसे पालन करते हैं। मित्र नामक सूर्य सात हजार और त्वष्टा आठ हजार रश्मियोंसे तपते हैं। अर्यमा दस हजार रश्मियोंसे पालन करते हैं और पर्जन्य नौ हजार रश्मियोंसे ताप प्रदान करते हैं। विश्वकी सृष्टि करनेवाले विष्णु (नामक सूर्य) छः हजार रश्मियोंसे तपते हैं॥ २०-२२॥
वसन्ते कपिलः सूर्यो ग्रीष्मे काञ्चनसप्रभः ।<br>श्वेतो वर्षासु वर्णेन पाण्डुरः शरदि प्रभुः ।<br>हेमन्ते ताम्रवर्णः स्याच्छिशिरे लोहितो रविः ॥ २३ ॥<br><br>ओषधीषु बलं धत्ते स्वधामपि पितृष्वथ ।<br>सूर्योऽमरत्वममृते त्रयं त्रिषु नियच्छति ॥ २४ ॥प्रभु सूर्य वसन्त ऋतुमें कपिल (भूरे) वर्णके, ग्रीष्ममें स्वर्णके समान, वर्षांमें श्वेत, शरद्में पाण्डुर (सफेद-मिश्रित पीले) रंगके, हेमन्तमें ताँबेके समान वर्णवाले और शिशिरमें सूर्य लोहित (लाल) वर्णके होते हैं। सूर्य ओषधियोंमें बलका आधान करते हैं, पितरोंको स्वधा और देवताओंको अमरत्व—इस प्रकार तीनोंको तीन पदार्थ प्रदान करते हैं॥ २३-२४॥