संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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- अध्याय ४१ * २२३
| अन्ये चाष्टौ ग्रहा ज्ञेयाः सूर्येणाधिष्ठिता द्विजाः।<br>चन्द्रमाः सोमपुत्रश्च शुक्रश्चैव बृहस्पतिः।<br>भौमो मन्दस्तथा राहुः केतुमानपि चाष्टमः॥ २५॥ | हे द्विजो! अन्य आठ ग्रहोंको सूर्यसे अधिष्ठित जानना चाहिये। चन्द्रमा, चन्द्रमाका पुत्र बुध, शुक्र, बृहस्पति, मंगल, शनि, राहु तथा केतु नामक आठवाँ ग्रह है। वातरश्मियोंके द्वारा ध्रुवमें आबद्ध वे सभी ग्रह (अपनी कक्षामें) भ्रमण करते हुए यथास्थान सूर्यकी परिक्रमा करते हैं। द्विजो! वायुचक्रसे प्रेरित (ग्रहगण) अलातचक्रके समान भ्रमण करते हैं। चूँकि वायु उनका वहन करती है, इसलिये उसे 'प्रवह' कहा जाता है। सोमका रथ तीन चक्रोंवाला है। उसके वाम और दक्षिण भागमें कुन्द पुष्पके समान वर्णवाले दस अश्व जुते हैं, इसी रथसे निशाकर चन्द्रमा सूर्यके समान (अपनी) कक्षामें स्थित होकर नक्षत्रोंके मध्य परिभ्रमण करता है। हे विप्रेन्द्रो! चन्द्रमाकी रश्मियोंकी क्रमशः ह्रास और वृद्धि होती रहती है। दिनके क्रमानुसार शुक्लपक्षमें चन्द्रमाके परभागमें स्थित सूर्य सोम (चन्द्र)-को निरन्तर आपूरित करता है॥ २५–३०॥ |
| सर्वे ध्रुवे निबद्धा वै ग्रहास्ते वातरश्मिभिः।<br>भ्राम्यमाणा यथायोगं भ्रमन्त्यनुदिवाकरम्॥ २६॥ | |
| अलातचक्रवद् यान्ति वातचक्रेरिता द्विजाः।<br>यस्माद् वहति तान् वायुः प्रवहस्तेन स स्मृतः॥ २७॥ | |
| रथस्त्रिचक्रः सोमस्य कुन्दाभास्तस्य वाजिनः।<br>वामदक्षिणतो युक्ता दश तेन निशाकरः॥ २८॥ | |
| वीथ्याश्रयाणि चरति नक्षत्राणि रविर्यथा।<br>ह्रासवृद्धी च विप्रेन्द्रा ध्रुवाधाराणि सर्वदा॥ २९॥ | |
| स सोमः शुक्लपक्षे तु भास्करे परतः स्थिते।<br>आपूर्यते परस्यान्तः सततं दिवसक्रमात्॥ ३०॥ | |
| क्षीणायितं सुरैः सोममाप्याययति नित्यदा।<br>एकेन रश्मिना विप्राः सुषुम्नाख्येन भास्करः॥ ३१॥ | हे विप्रो! देवताओं द्वारा (अमृत) पान किये जानेके कारण क्षीण हुए चन्द्रमाको सूर्य सुषुम्न नामक एक रश्मि (किरण)-से नित्य आप्यायित करते हैं। सूर्यके तेजसे चन्द्रमाका यह (क्षीण) शरीर पुष्ट होता है, अतएव दिनके क्रमानुसार पूर्णिमाको वह चन्द्रमा सम्पूर्ण रूपसे दिखायी देता है। हे विप्रो! देवता उस अमृतस्वरूप सम्पूर्ण सोमका आधे महीनेतक पान करते हैं, क्योंकि वे (देवता) अमृतका भोजन करनेवाले होते हैं। तदनन्तर पंद्रहवें भागके किंचित् कलात्मक भाग शेष बचनेपर अपराह्नमें पितृगण उस अन्तिम भागका सेवन करते हैं। पितृगण चन्द्रमाकी अवशिष्ट अमृतस्वरूपिणी अमृतमयी तथा पवित्र सुधा नामक कलाका दो लव (कालविशेष)-तक पान करते हैं॥ ३१–३५॥ |
| एषा सूर्यस्य वीर्येण सोमस्याप्यायिता तनुः।<br>पौर्णमास्यां स दृश्येत सम्पूर्णो दिवसक्रमात्॥ ३२॥ | |
| सम्पूर्णमर्धमासेन तं सोमममृतात्मकम्।<br>पिबन्ति देवता विप्रा यतस्तेऽमृतभोजनाः॥ ३३॥ | |
| ततः पञ्चदशे भागे किंचिच्छिष्टे कलात्मके।<br>अपराह्ने पितृगणा जघन्यं पर्युपासते॥ ३४॥ | |
| पिबन्ति द्विकलं कालं शिष्टा तस्य कला तु या।<br>सुधामृतमयीं पुण्यां तामिन्दोरमृतात्मिकाम्॥ ३५॥ | |
| निःसृतं तदमावास्यां गभस्तिभ्यः स्वधामृतम्।<br>मासतृप्तिमवाप्याग्र्यां पितरः सन्ति निर्वृताः॥ ३६॥ | अमावस्याके दिन (चन्द्रमाकी) किरणोंसे निकलनेवाले स्वधा नामक अमृतका पान करनेसे पितर महीनेभरके लिये तृप्ति प्राप्त कर स्वस्थ हो जाते हैं। देवताओंके द्वारा (चन्द्रमाके) अमृतका पान किये जानेपर सोमका विनाश नहीं होता। श्रेष्ठ जनो! इस प्रकार सूर्यके कारण चन्द्रमाके क्षय एवं वृद्धिका क्रम चलता है। सोमके पुत्र (बुध)-के रथमें वायुके समान वेगवाले जलसे उत्पन्न आठ घोड़े जुते रहते हैं। वह बुध उसी रथसे सर्वत्र गमन करता है॥ ३६–३८॥ |
| न सोमस्य विनाशः स्यात् सुधा देवैस्तु पीयते।<br>एवं सूर्यनिमित्तस्य क्षयो वृद्धिश्च सत्तमाः॥ ३७॥ | |
| सोमपुत्रस्य चाष्टाभिर्वाजिभिर्वायुवेगिभिः।<br>वारिजैः स्यन्दनो युक्तस्तेनासौ याति सर्वतः॥ ३८॥ |