संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२४ * कूर्मपुराण *
| शुक्रस्य भूमिजैरश्वैः स्यन्दनो दशभिर्वृतः ।<br>अष्टाभिश्चाथ भौमस्य रथो हैमः सुशोभनः ॥ ३९ ॥<br><br>बृहस्पतेरथाष्टाश्वः स्यन्दनो हेमनिर्मितः ।<br>रथस्तमोमयोऽष्टाश्वो मन्दस्यायसनिर्मितः ।<br>स्वर्भानोर्भास्करारेश्च तथा षड्भिर्हयैर्वृतः ॥ ४० ॥ | शुक्रका रथ भूमिसे उत्पन्न दस घोड़ोंसे और मंगलका स्वर्णमय अत्यन्त सुन्दर रथ आठ घोड़ोंसे युक्त रहता है। बृहस्पतिका भी आठ घोड़ोंवाला रथ स्वर्णसे निर्मित है। शनिका लोहेसे बना हुआ रथ तमोमय है और आठ घोड़ोंवाला है। सूर्यके शत्रु राहु और केतुके रथ छः-छः अश्वोंसे युक्त हैं ॥ ३९-४० ॥ | | एते महाग्रहाणां वै समाख्याता रथा नव ।<br>सर्वे ध्रुवे महाभागा निबद्धा वातरश्मिभिः ॥ ४१ ॥<br><br>ग्रहर्क्षताराधिष्ण्यानि ध्रुवे बद्धान्यशेषतः ।<br>भ्रमन्ति भ्रामयन्त्येनं सर्वाण्यनिलरश्मिभिः ॥ ४२ ॥ | इस प्रकार महाग्रहोंके नौ रथोंका वर्णन किया गया। ये सभी महाभाग (ग्रह) वायुकी रश्मियोंके द्वारा ध्रुवमें आबद्ध हैं। सभी ग्रह, नक्षत्र और तारागण भी ध्रुवमें पूर्णतः निबद्ध हैं। वायुकी रश्मियोंद्वारा परिचालित होकर ये सभी परिभ्रमण करते रहते हैं ॥ ४१-४२ ॥ |
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्साहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे एकचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४१ ॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें एकतालीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ४१ ॥
बयालीसवाँ अध्याय
महः आदि सात लोकों तथा सात पातालोंका और वहाँके निवासियोंका वर्णन, वैष्णवी तथा शाम्भवी शक्तियोंका वर्णन
| सूत उवाच | सूतजी बोले— |
|---|---|
| ध्रुवादूर्ध्वं महर्लोकः कोटियोजनविस्तृतः ।<br>कल्पाधिकारिणस्तत्र संस्थिता द्विजपुंगवाः ॥ १ ॥<br><br>जनलोको महर्लोकात् तथा कोटिद्वयात्मकः ।<br>सनन्दनादयस्तत्र संस्थिता ब्रह्मणः सुताः ॥ २ ॥<br><br>जनलोकात् तपोलोकः कोटित्रयसमन्वितः ।<br>वैराजास्तत्र वै देवाः स्थिता दाहविवर्जिताः ॥ ३ ॥<br><br>प्राजापत्यात् सत्यलोकः कोटिषट्केन संयुतः ।<br>अपुनर्मारकास्तत्र ब्रह्मलोकस्तु स स्मृतः ॥ ४ ॥<br><br>अत्र लोकगुरुर्ब्रह्मा विश्वात्मा विश्वतोमुखः ।<br>आस्ते स योगिभिर्नित्यं पीत्वा योगामृतं परम् ॥ ५ ॥ | हे द्विजश्रेष्ठो! ध्रुवके ऊपर एक करोड़ योजन विस्तारवाला महर्लोक है। वहाँ कल्पके अधिकारीगण निवास करते हैं। इसी प्रकार महर्लोकसे ऊपर दो करोड़ योजनवाला जनलोक है। वहाँ ब्रह्माके (मानस) पुत्र सनन्दन आदि रहते हैं। जनलोकसे ऊपर तपोलोक तीन करोड़ योजनका है। वहाँ दाहरहित* वैराज नामक देवता रहते हैं। प्रजापत्यलोक अर्थात् तपोलोकके ऊपर छः करोड़ योजनका सत्यलोक है। वहाँ अपुनर्मारक (जन्म-मरणसे रहित जन) रहते हैं। वह ब्रह्मलोक कहा गया है। यहाँ परम योगामृतका पान कर विश्वतोमुख विश्वात्मा लोकगुरु ब्रह्मा योगियोंके साथ नित्य निवास करते हैं ॥ १-५ ॥ |
| विशन्ति यतयः शान्ता नैष्ठिका ब्रह्मचारिणः ।<br>योगिनस्तापसाः सिद्धा जापकाः परमेष्ठिनम् ॥ ६ ॥<br><br>द्वारं तद्योगिनामेकं गच्छतां परमं पदम् ।<br>तत्र गत्वा न शोचन्ति स विष्णुः स च शंकरः ॥ ७ ॥ | शान्त स्वभाववाले यतिगण, नैष्ठिक ब्रह्मचारी, योगी, तपस्वी, सिद्ध तथा परमेष्ठीका जप करनेवाले यहाँ प्रवेश करते हैं। परमपदको प्राप्त करनेवाले योगियोंका वह एकमात्र द्वार है। वहाँ पहुँचकर (लोग) शोक नहीं करते। वही (यहाँ निवास करनेवाला) विष्णु है, शंकर है ॥ ६-७ ॥ |
* दाह-तापसे रहित (दैहिक, दैविक, भौतिक तापोंसे सर्वथा मुक्त)।