संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- अध्याय ४२ * | २२५ ---|---
सूर्यकोटिप्रतीकाशं पुरं तस्य दुरासदम्।
न मे वर्णयितुं शक्यं ज्वालामालासमाकुलम्॥ ८ ॥
तत्र नारायणस्यापि भवनं ब्रह्मणः पुरे।
शेते तत्र हरिः श्रीमान् मायी मायामयः परः॥ ९ ॥
स विष्णुलोकः कथितः पुनरावृत्तिवर्जितः।
यान्ति तत्र महात्मानो ये प्रपन्ना जनार्दनम्॥ १० ॥
ऊर्ध्वं तद् ब्रह्मसदनात् पुरं ज्योतिर्मयं शुभम्।
वह्निना च परिक्षिप्तं तत्रास्ते भगवान् भवः॥ ११ ॥
देव्या सह महादेवश्चिन्त्यमानो मनीषिभिः।
योगिभिः शतसाहस्रैर्भूतै रुद्रैश्च संवृतः॥ १२ ॥
तत्र ते यान्ति नियता द्विजा वै ब्रह्मचारिणः।
महादेवपराः शान्तास्तापसा ब्रह्मवादिनः॥ १३ ॥
निर्ममा निरहंकाराः कामक्रोधविवर्जिताः।
द्रक्ष्यन्ति ब्रह्मणा युक्ता रुद्रलोकः स वै स्मृतः॥ १४॥
एते सप्त महालोकाः पृथिव्याः परिकीर्तिताः।
महातलादयश्चाधः पातालाः सन्ति वै द्विजाः॥ १५ ॥
महातलं च पातालं सर्वरत्नोपशोभितम्।
प्रासादैर्विविधैः शुभ्रैर्देवतायतनैर्युतम्॥ १६॥
अनन्तेन च संयुक्तं मुचुकुन्देन धीमता।
नृपेण बलिना चैव पातालस्वर्गवासिना॥ १७ ॥
शैलं रसातलं विप्राः शर्करं हि तलातलम्।
पीतं सुतलमित्युक्तं नितलं विद्रुमप्रभम्।
सितं हि वितलं प्रोक्तं तलं चैव सितेतरम्॥ १८॥
सुपर्णेन मुनिश्रेष्ठास्तथा वासुकिना शुभम्।
रसातलमिति ख्यातं तथान्यैश्च निषेवितम्॥ १९ ॥
विरोचनहिरण्याक्षतक्षकाद्यैश्च सेवितम्।
तलातलमिति ख्यातं सर्वशोभासमन्वितम्॥ २०॥
वैनतेयादिभिश्चैव कालनेमिपुरोगमैः।
पूर्वदेवैः समाकीर्णं सुतलं च तथापरैः॥ २१॥
नितलं यवनाद्यैश्च तारकाग्निमुखैस्तथा।
महान्तकाद्यैर्नागैश्च प्रह्लादेनासुरेण च॥ २२॥
वितलं चैव विख्यातं कम्बलाहीन्द्रसेवितम्।
महाजम्भेन वीरेण हयग्रीवेण वै तथा॥ २३॥
शंकुकर्णेन सम्भिन्नं तथा नमुचिपूर्वकैः।
तथान्यैर्विविधैर्नागैस्तलं चैव सुशोभनम्॥ २४॥
करोड़ों सूर्यके समान उन (ब्रह्मा)-का वह पुर अत्यन्त दुर्गम है। अग्निशिखाकी मालाओंसे समन्वित उस पुरका मैं वर्णन नहीं कर सकता। ब्रह्माके उस पुरमें नारायणका भी भवन है। वहाँ मायामय परम मायावान् श्रीमान् हरि शयन करते हैं। पुनरागमनसे रहित वह विष्णुलोक कहा गया है। जो जनार्दनके शरणागत हैं, वे महात्मा वहाँ जाते हैं। उस ब्रह्म-सदनसे ऊपर ज्योतिर्मय, अग्निसे व्याप्त कल्याणकारी पुर है। वहाँ सैकड़ों-हजारों योगियों, भूतों तथा रुद्रोंसे परिवृत, मनीषियोंके द्वारा ध्यान किये जाते हुए वे भगवान् भव महादेव देवी पार्वतीके साथ निवास करते हैं॥ ८-१२॥
वहाँ वे ही जाते हैं जो संयमी ब्राह्मण हैं, ब्रह्मचारी हैं, महादेवपरायण हैं, शान्त, तपस्वी और ब्रह्मवादी हैं, ममत्वरहित, अहंकारशून्य तथा काम-क्रोधसे रहित हैं। ब्रह्मज्ञानसम्पन्न ये (व्यक्ति इस लोकका) दर्शन करते हैं। उस लोकको रुद्रलोक कहा गया है॥ १३-१४॥
हे द्विजो! पृथ्वीके ये सात महालोक कहे गये हैं। (पृथ्वीके) अधोभागमें महातल आदि (सात) पाताल हैं। महातल नामक पाताल सभी रत्नोंसे सुशोभित और अनेक प्रकारके महलों और शुभ्र देवमन्दिरोंसे सम्पन्न है। वह (महातल) अनन्त (नाग), धीमान् मुचुकुन्द एवं पाताल-स्वर्गवासी राजा बलिसे युक्त है। हे विप्रो! रसातल शैलमय है, तलातल शर्करामय है। सुतल पीत वर्णका कहा गया है। नितल विद्रुम (मूँगे)-के समान वर्णवाला, वितल श्वेत वर्णका और तल कृष्ण वर्णका कहा गया है॥ १५-१८॥
हे मुनिश्रेष्ठो! शुभ रसातल गरुड, वासुकि (नाग) तथा अन्य (महात्माओं)-से सेवित कहा गया है। सभी शोभाओंसे युक्त तलातल विरोचन, हिरण्याक्ष तथा तक्षक आदिके द्वारा सेवित कहा गया है। सुतल वैनतेय आदि पक्षी, कालनेमि प्रभृति दूसरे श्रेष्ठ असुरोंसे समाकीर्ण है। तारक, अग्निमुख आदि यवन और महान् अन्तक आदि नागों तथा असुर प्रह्लादसे नितल नामक पाताल सेवित है। वितल नामक प्रसिद्ध पाताल कम्बल नामक नागराज, महाजम्भ और वीर हयग्रीवसे सेवित है। तल नामक पाताल शंकुकर्णसे युक्त तथा प्रधान नमुचि आदि दैत्यों और अन्य विविध प्रकारके नागोंसे सुशोभित है॥ १९-२४॥