भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२२६ * कूर्मपुराण *


तेषामधस्तान्नरका मायाद्याः परिकीर्तिताः।
पापिनस्तेषु पच्यन्ते न ते वर्णयितुं क्षमाः॥ २५॥

पातालानामधश्चास्ते शेषाख्या वैष्णवी तनुः।
कालाग्निरुद्रो योगात्मा नारसिंहोऽपि माधवः ॥ २६॥

योऽनन्तः पठ्यते देवो नागरूपी जनार्दनः।
तदाधारमिदं सर्वं स कालाग्निमपाश्रितः ॥ २७॥

तमाविश्य महायोगी कालस्तद्वदनोत्थितः।
विषज्वालामयोऽन्तेऽसौ जगत् संहरति स्वयम्॥ २८॥

सहस्रमायोऽप्रतिमः संहर्ता शंकरोद्भवः।
तामसी शाम्भवी मूर्तिः कालो लोकप्रकालनः॥ २९॥

उन (पातालों)-के नीचे माया आदि नरक कहे गये हैं, उनमें पापी लोग यातना पाते हैं। उनका वर्णन नहीं किया जा सकता। पाताललोकके नीचे शेष नामवाली वैष्णवी मूर्ति विद्यमान है। जिसे कालाग्नि रुद्र, योगात्मा, नारसिंह, माधव, अनन्त, देव और नागरूपी जनार्दन भी कहा जाता है। यह सब उन्हींके आधारपर (टिका) है और वे कालाग्निके आश्रित हैं। उनमें प्रविष्ट होकर और उनके मुखसे प्रकट हुई विषकी ज्वालारूप होकर महायोगी काल स्वयं अन्तमें जगत्‌का संहार करते हैं॥ २५–२८॥

हजारों मायावाला एवं शंकरसे उत्पन्न अद्वितीय (काल) संहार करनेवाला है। वह शम्भुकी तामसी मूर्ति है। काल ही लोकोंका संहार करता है॥ २९॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे द्विचत्वारिंशोऽध्यायः॥ ४२॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें बयालीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ४२॥


तैंतालीसवाँ अध्याय

सात महाद्वीपों और सात महासागरोंका परिमाण, जम्बूद्वीप तथा मेरुपर्वतकी स्थिति, भारत तथा किंपुरुष आदि वर्षोंका वर्णन, वर्षपर्वतोंकी स्थिति, जम्बूद्वीपके नाम पड़नेका कारण, जम्बूद्वीपके नदी एवं पर्वतोंका और वहाँके निवासियोंका वर्णन

सूत उवाच

एतद् ब्रह्माण्डमाख्यातं चतुर्दशविधं महत्।
अतः परं प्रवक्ष्यामि भूर्लोकस्यास्य निर्णयम्॥ १॥

जम्बुद्वीपः प्रधानोऽयं प्लक्षः शाल्मल एव च।
कुशः क्रौञ्चश्च शाकश्च पुष्करश्चैव सप्तमः॥ २॥

एते सप्त महाद्वीपाः समुद्रैः सप्तभिर्वृताः।
द्वीपाद् द्वीपो महानुक्तः सागरादपि सागरः ॥ ३॥

क्षारोदेक्षुरसोदश्च सुरोदश्च घृतोदकः।
दध्योदः क्षीरसलिलः स्वादूदश्चेति सागराः ॥ ४॥

पञ्चाशत्कोटिविस्तीर्णा ससमुद्रा धरा स्मृता।
द्वीपेश्च सप्तभिर्युक्ता योजनानां समासतः॥ ५॥

जम्बूद्वीपः समस्तानां द्वीपानां मध्यतः शुभः।
तस्य मध्ये महामेरुर्विश्रुतः कनकप्रभः ॥ ६॥

सूतजी बोले— इस चौदह (सात पाताल तथा सात ऊर्ध्वलोक) प्रकारके महान् ब्रह्माण्डका वर्णन किया गया। इसके बाद इस भूलोकके निर्णयको कहूँगा। (भूलोकमें) जम्बूद्वीप प्रधान है। (इसके अतिरिक्त) प्लक्ष, शाल्मल, कुश, क्रौञ्च, शाक तथा सातवाँ पुष्कर द्वीप है। ये सातों महाद्वीप सात समुद्रोंसे घिरे हैं, एक द्वीपसे दूसरा द्वीप तथा एक सागरसे दूसरा सागर महान् कहा गया है। क्षारोदक, इक्षुरसोदक, सुरोदक, घृतोदक, दध्योदक, क्षीरोदक तथा स्वादूदक—ये (सात) महासागर हैं। संक्षेपमें समुद्रसहित यह पृथ्वी पचास करोड़ योजन विस्तारवाली कही जाती है। यह सात द्वीपोंसे परिवेष्टित है समस्त द्वीपोंके मध्यमें शुभ जम्बूद्वीप स्थित है। उसके बीचमें स्वर्णके समान आभावाला महामेरु कहा गया है॥ १–६॥

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