संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished506 पृष्ठ
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| * अध्याय ४३ * | २२७ |
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| मूल संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| चतुरशीतिसाहस्रो योजनैस्तस्य चोच्छ्रयः।<br>प्रविष्टः षोडशाधस्ताद् द्वात्रिंशन्मूर्ध्नि विस्तृतः॥ ७ ॥<br>मूले षोडशसाहस्रो विस्तारस्तस्य सर्वतः।<br><br>भूपद्मस्यास्य शैलोऽसौ कर्णिकात्वेन संस्थितः॥ ८ ॥<br><br>हिमवान् हेमकूटश्च निषधश्चास्य दक्षिणे।<br>नीलः श्वेतश्च शृङ्गी च उत्तरे वर्षपर्वताः॥ ९ ॥<br><br>लक्षप्रमाणौ द्वौ मध्ये दशहीनास्तथा परे।<br>सहस्रद्वितयोच्छायास्तावद्विस्तारिणश्च ते॥ १० ॥<br>भारतं दक्षिणं वर्षं ततः किंपुरुषं स्मृतम्।<br>हरिवर्षं तथैवान्यन्मेरोर्दक्षिणतो द्विजाः॥ ११ ॥<br><br>रम्यकं चोत्तरं वर्षं तस्यैवानुहिरण्मयम्।<br>उत्तराः कुरवश्चैव यथैते भरतास्तथा॥ १२ ॥<br>नवसाहस्रमेकैकमेतेषां द्विजसत्तमाः।<br>इलावृतं च तन्मध्ये तन्मध्ये मेरुरुच्छ्रितः॥ १३ ॥<br><br>मेरोश्चतुर्दिशं तत्र नवसाहस्रविस्तृतम्।<br>इलावृतं महाभागाश्चत्वारस्तत्र पर्वताः।<br>विष्कम्भा रचिता मेरोर्योजनायुतमुच्छ्रिताः॥ १४ ॥<br><br>पूर्वेण मन्दरो नाम दक्षिणे गन्धमादनः।<br>विपुलः पश्चिमे पार्श्वे सुपार्श्वश्चोत्तरे स्मृतः॥ १५ ॥<br>कदम्बस्तेषु जम्बूश्च पिप्पलो वट एव च।<br>जम्बूद्वीपस्य सा जम्बूर्नामहेतुर्महर्षयः॥ १६ ॥<br><br>महागजप्रमाणानि जम्ब्वास्तस्याः फलानि च।<br>पतन्ति भूभृतः पृष्ठे शीर्यमाणानि सर्वतः॥ १७ ॥<br><br>रसेन तस्याः प्रख्याता तत्र जम्बूनदीति वै।<br>सरित् प्रवर्तते चापि पीयते तत्र वासिभिः॥ १८ ॥<br><br>न स्वेदो न च दौर्गन्ध्यं न जरा नेन्द्रियक्षयः।<br>तत्पानात् सुस्थमनसां नराणां तत्र जायते॥ १९ ॥<br><br>तीरमृत् तत्र सम्प्राप्य वायुना सुविशोषिता।<br>जाम्बूनदाख्यं भवति सुवर्णं सिद्धभूषणम्॥ २० ॥ | उसकी ऊँचाई चौरासी हजार योजन है। नीचेकी ओर यह सोलह योजनतक प्रविष्ट है और ऊपरकी ओर बत्तीस योजन विस्तृत है। उस पर्वतके मूलमें सभी ओर सोलह हजार योजनका विस्तार है। यह पर्वत इस पृथ्वीरूप कमलकी कर्णिकाके रूपमें अवस्थित है। इसके दक्षिणमें हिमवान्, हेमकूट तथा निषध और उत्तरमें नील, श्वेत एवं शृंगी नामक वर्षपर्वत हैं। इनमें दो (हिमवान् एवं हेमकूट वर्षपर्वत) एक लाख योजन परिमाणवाले हैं और अन्य (वर्षपर्वत) दस योजन कम विस्तारवाले हैं। इनकी ऊँचाई दो हजार योजनकी है और उनका विस्तार भी उतना ही है॥ ७–१०॥<br><br>हे द्विजो! मेरुके दक्षिण भागमें प्रथम भारतवर्ष, तदनन्तर किंपुरुषवर्ष और फिर हरिवर्ष तथा अन्य भी वैसे ही स्थित हैं। उसके उत्तरमें रम्यक, हिरण्मय एवं उत्तरकुरुवर्ष स्थित है। ये सभी भारतवर्षके समान हैं॥ ११–१२॥<br><br>द्विजश्रेष्ठो! इनमेंसे प्रत्येक नौ हजार योजनका है। इनके मध्यमें इलावृतवर्ष है और इसके मध्यमें उन्नत मेरु पर्वत है। हे महाभागो! वहाँ मेरुके चारों ओर नौ हजार योजनका इलावृत नामक वर्ष है। वहाँ चार पर्वत हैं। मेरुके व्यासके रूपमें विरचित इनकी ऊँचाई दस हजार योजन है। इसके पूर्वमें मन्दर, दक्षिणमें गन्धमादन, पश्चिम पार्श्वमें विपुल और उत्तरमें सुपार्श्व नामक पर्वत कहा गया है॥ १३–१५॥<br><br>उसमें (सुपार्श्व पर्वतमें) कदम्ब, जम्बू, पीपल और वट वृक्ष हैं। हे महर्षियो! यही जम्बूवृक्ष जम्बूद्वीप नाम पड़नेका कारण है। उस जम्बूवृक्षके फल महान् हाथीके प्रमाणवाले होते हैं। पर्वतके पृष्ठपर गिरनेसे वे विशीर्ण हो जाते हैं। वहाँ उनके रससे प्रवाहित होनेवाली नदी जम्बूनदीके नामसे विख्यात है। वहाँके निवासी उस रसका पान किया करते हैं। वहाँ उस रस (जल)-का पान करनेसे स्वस्थ मनवाले मनुष्योंको न स्वेद (पसीना) होता है, न उनमें दुर्गन्ध होती है, न वृद्धावस्था आती है और न ही उनकी इन्द्रियाँ क्षीण होती हैं। उस (जम्बू नदी)-के तटपर स्थित मिट्टीके रसका वायु शोषण कर लेता है, जिससे जाम्बूनद नामक सुवर्ण होता है, सिद्धगण उसीका आभूषण धारण करते हैं॥ १६–२०॥ |