संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२८ * कूर्मपुराण *
भद्राश्वः पूर्वतो मेरोः केतुमालश्च पश्चिमे।
वर्षे द्वे तु मुनिश्रेष्ठास्तयोर्मध्ये इलावृतम्॥ २१॥
वनं चैत्ररथं पूर्वे दक्षिणे गन्धमादनम्।
वैभ्राजं पश्चिमे विद्यादुत्तरे सवितुर्व॑नम्॥ २२॥
अरुणोदं महाभद्रमसितोदं च मानसम्।
सरांस्येतानि चत्वारि देवभोग्यानि सर्वदा॥ २३॥
सितान्तश्च कुमुद्रांश्च कुररी माल्यवांस्तथा।
वैकङ्को मणिशैलश्च ऋक्षवांश्चाचलोत्तमाः॥ २४॥
महानीलोऽथ रुचकः सबिन्दुर्मन्दरस्तथा।
वेणुमांश्चैव मेघश्च निषधो देवपर्वतः।
इत्येते देवरचिताः सिद्धावासाः प्रकीर्तिताः॥ २५॥
मेरुके पूर्वमें भद्राश्व, पश्चिममें केतुमाल नामक दो वर्ष हैं। मुनिश्रेष्ठो! उन दोनोंके मध्य इलावृत वर्ष है। पूर्वमें चैत्ररथ नामक वन, दक्षिणमें गन्धमादन, पश्चिममें वैभ्राज और उत्तरमें सवितृवन स्थित है। उन (वनों)- में अरुणोद, महाभद्र, असितोद और मानस नामक—ये चार सरोवर हैं। ये सदा देवताओंद्वारा उपभोग किये जाने योग्य हैं। सितान्त, कुमुद्वान्, कुररी, माल्यवान्, वैकङ्क, मणिशैल, ऋक्षवान्, महानील, रुचक, सबिन्दु, मन्दर, वेणुमान्, मेघ, निषध एवं देवपर्वत—इन सभी श्रेष्ठ पर्वतोंकी रचना देवताओंद्वारा हुई है और इन्हें सिद्धोंका आवास कहा जाता है॥ २१—२५॥
अरुणोदस्य सरसः पूर्वतः केसराचलः।
त्रिकूटशिखरश्चैव पतङ्गो रुचकस्तथा॥ २६॥
निषधो वसुधारश्च कलिङ्गस्त्रिशिखः शुभः।
समूलो वसुधारश्च कुरवश्चैव सानुमान्॥ २७॥
ताम्रातश्च विशालश्च कुमुदो वेणुपर्वतः।
एकशृङ्गो महाशैलो गजशैलः पिशाचकः॥ २८॥
पञ्चशैलोऽथ कैलासो हिमवांश्चाचलोत्तमः।
इत्येते देवचरिता उत्कटाः पर्वतोत्तमाः॥ २९॥
अरुणोद सरोवरके पूर्वमें केसराचल, त्रिकूट-शिखर, पतङ्ग, रुचक, निषध, वसुधार, कलिंग, शुभ त्रिशिख, समूल, वसुधार, कुरव, सानुमान्, ताम्रात, विशाल, कुमुद, वेणुपर्वत, एकशृंग, महाशैल, गजशैल, पिशाचक, पञ्चशैल, कैलास और पर्वतोंमें उत्तम हिमवान्—ये सभी देवताओंद्वारा सेवित अत्यन्त श्रेष्ठ पर्वत हैं॥ २६—२९॥
महाभद्रस्य सरसो दक्षिणे केसराचलः।
शिखिवासश्च वैदूर्यः कपिलो गन्धमादनः॥ ३०॥
जारुधिश्च सुगन्धिश्च श्रीशृङ्गश्चाचलोत्तमः।
सुपार्श्वश्च सुपक्षश्च कङ्कः कपिल एव च॥ ३१॥
पिञ्जरो भद्रशैलश्च सुरसश्च महाबलः।
अञ्जनो मधुमांस्तद्वत् कुमुदो मुकुटस्तथा॥ ३२॥
सहस्रशिखरश्चैव पाण्डुरः कृष्ण एव च।
पारिजातो महाशैलस्तथैव कपिलोदकः॥ ३३॥
सुषेणः पुण्डरीकश्च महामेघस्तथैव च।
एते पर्वतराजानः सिद्धगन्धर्वसेविताः॥ ३४॥
महाभद्र सरोवरके दक्षिणमें—केसराचल, शिखिवास, वैदूर्य, कपिल, गन्धमादन, जारुधि, सुगन्धि, उत्तम पर्वत श्रीशृंग, सुपार्श्व, सुपक्ष, कङ्क, कपिल, पिञ्जर, भद्रशैल, सुरस, महाबल, अञ्जन, मधुमान्, कुमुद, मुकुट, सहस्रशिखर, पाण्डुर, कृष्ण, पारिजात, महाशैल, कपिलोदक, सुषेण, पुण्डरीक और महामेघ—ये सभी पर्वतराज सिद्धों और गन्धर्वोंसे सेवित हैं॥ ३०—३४॥
असितोदस्य सरसः पश्चिमे केसराचलः।
शङ्खकूतोऽथ वृषभो हंसो नागस्तथा परः॥ ३५॥
कालाञ्जनः शुक्रशैलो नीलः कमल एव च।
पुष्पकश्च सुमेघश्च वाराहो विरजास्तथा।
मयूरः कपिलश्चैव महाकपिल एव च॥ ३६॥
इत्येते देवगन्धर्वसिद्धसङ्घनिषेविताः।
सरसो मानसस्येह उत्तरे केसराचलः॥ ३७॥
असितोद सरोवरके पश्चिममें केसराचल, शंखकूट, वृषभ, हंस, नाग, कालाञ्जन, शुक्रशैल, नील, कमल, पुष्पक, सुमेघ, वाराह, विरजा, मयूर, कपिल तथा महाकपिल—ये सभी (पर्वत) देव, गन्धर्व और सिद्धोंके समूहोंद्वारा सेवित हैं। मानसरोवरके उत्तरमें केसराचल नामक पर्वत है॥ ३५—३७॥