संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- अध्याय ४४ * | २२९ ---|---
एतेषां शैलमुख्यानामन्तरेषु यथाक्रमम्।|इन प्रधान शैलोंके मध्य क्रमानुसार घाटियाँ, सरोवर सन्ति चैवान्तरद्रोण्यः सरांसि च वनानि च॥ ३८॥|और अनेक वन हैं। वहाँ प्रसन्न, रजोगुणरहित और सभी वसन्ति तत्र मुनयः सिद्धाश्च ब्रह्मभाविताः।|दुःखोंसे विनिर्मुक्त ब्रह्मवादी मुनि और सिद्ध निवास प्रसन्नाः शान्तरजसः सर्वदुःखविवर्जिताः॥ ३९॥|करते हैं॥ ३८-३९॥
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः॥ ४३॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें तैंतालीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ४३॥
चौवालीसवाँ अध्याय
ब्रह्मा, शंकर, इन्द्र, अग्नि, वरुण आदि देवताओंकी पुरियोंका तथा वहाँके निवासियोंका वर्णन, गङ्गाकी चार धाराओं और आठ मर्यादापर्वतोंका वर्णन
सूत उवाच|**सूतजी बोले—**देवाधिदेव ब्रह्माकी मेरु पर्वतके चतुर्दशसहस्राणि योजनानां महापुरी।|ऊपर चौदह हजार योजन विस्तारवाली महापुरी विख्यात मेरोरुपरि विख्याता देवदेवस्य वेधसः॥ १॥|है। वहाँ विश्वभावन विश्वात्मा भगवान् ब्रह्मा रहते हैं। तत्रास्ते भगवान् ब्रह्मा विश्वात्मा विश्वभावनः।|योगीन्द्र, मुनीन्द्र, उपेन्द्र (विष्णु) और शंकर उनकी उपास्यमानो योगीन्द्रैर्मुनीन्द्रोपेन्द्रशंकरैः॥ २॥|उपासना करते रहते हैं। वहाँ भगवान् सनत्कुमार नित्य तत्र देवेश्वरेशानं विश्वात्मानं प्रजापतिम्।|ही ईशान देवेश्वर विश्वात्मा प्रजापतिकी उपासना करते सनत्कुमारो भगवानुपास्ते नित्यमेव हि॥ ३॥|हैं। वे (सनत्कुमार) योगात्मा सिद्ध, ऋषि, गन्धर्व तथा स सिद्धैर्ऋषिगन्धर्वैः पूज्यमानः सुरैरपि।|देवताओंसे पूजित होते हुए परम अमृतका पान करते समास्ते योगयुक्तात्मा पीत्वा तत्परमामृतम्॥ ४॥|हैं और वहाँ निवास करते हैं॥ १-४॥ तत्र देवादिदेवस्य शम्भोरमिततेजसः।|वहाँ देवोंके आदिदेव अमित तेजस्वी शंकरका शुभ्र दीप्तमायतनं शुभ्रं पुरस्ताद् ब्रह्मणः स्थितम्॥ ५॥|एवं दीप्तियुक्त मन्दिर है, जो ब्रह्माके (आयतनके) सामने ||स्थित है। (यह मन्दिर) दिव्य कान्तिसे सुसम्पन्न, चार दिव्यकान्तिसमायुक्तं चतुर्द्वारं सुशोभनम्।|द्वारोंसे युक्त, अत्यन्त सुन्दर, महर्षियोंसे पूर्ण और ब्रह्मज्ञानियोंद्वारा महर्षिगणसंकीर्णं ब्रह्मविद्भिर्निषेवितम्॥ ६॥|सेवित है। चन्द्रमा, सूर्य एवं अग्निस্বরূপ (तीन) नेत्रोंवाले देव्या सह महादेवः शशाङ्कार्काग्निलोचनः।|प्रमथेश्वर विश्वेश महादेव देवी (पार्वती) एवं प्रमथगणोंके रमते तत्र विश्वेशः प्रमथैः प्रमथेश्वरः॥ ७॥|साथ वहाँ रमण करते हैं॥ ५-७॥ तत्र वेदविदः शान्ता मुनयो ब्रह्मचारिणः।|वहाँ वेदज्ञ शान्तचित्त मुनि, ब्रह्मचारी, तपस्वी और पूजयन्ति महादेवं तापसाः सत्यवादिनः॥ ८॥|सत्यवादी लोग महादेवकी पूजा करते हैं। इन ब्रह्मवादी तेषां साक्षान्महादेवो मुनीनां ब्रह्मवादिनाम्।|मुनियोंकी पूजाको पार्वतीके साथ साक्षात् परमेश्वर गृह्णाति पूजां शिरसा पार्वत्या परमेश्वरः॥ ९॥|महादेव सिरसे आदरपूर्वक स्वीकार करते हैं। वहीं श्रेष्ठ तत्रैव पर्वतवरे शक्रस्य परमा पुरी।|पर्वत (मेरु)-पर पूर्वकी ओर इन्द्रकी सभी शोभाओंसे नाम्नाऽमरावती पूर्वे सर्वशोभासमन्विता॥ १०॥|समन्वित अमरावती नामकी श्रेष्ठ पुरी है॥ ८-१०॥ तमिन्द्रमप्सरःसङ्घा गन्धर्वा गीततत्पराः।|अप्सराओंका समूह, गान-परायण गन्धर्व तथा हजारों उपासते सहस्राक्षं देवास्तत्र सहस्रशः॥ ११॥|देवता हजार नेत्रोंवाले इन्द्रकी वहाँ उपासना करते हैं। जो ये धार्मिका वेदविदो यागहोमपरायणाः।|धार्मिक हैं, वेदज्ञ हैं, यज्ञ एवं होमपरायण हैं, उनका वह तेषां तत् परमं स्थानं देवानामपि दुर्लभम्॥ १२॥|परम स्थान देवताओंके लिये भी दुर्लभ है॥ ११-१२॥