संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| २३० | * कूर्मपुराण * |
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| तस्य दक्षिणदिग्भागे वह्नेरमिततेजसः।<br>तेजोवती नाम पुरी दिव्याश्चर्यसमन्विता॥ १३॥<br><br>तत्रास्ते भगवान् वह्निर्भ्राजमानः स्वतेजसा।<br>जपिनां होमिनां स्थानं दानवानां दुरासदम्॥ १४॥ | उसके दक्षिण दिशामें अमित तेजस्वी अग्निकी दिव्य आश्चर्योंसे युक्त तेजोवती नामकी पुरी स्थित है। भगवान् वह्नि अपने तेजसे प्रकाशित होते हुए वहाँ रहते हैं। जप करनेवालों तथा होम करनेवालोंका वह स्थान दानवोंके लिये दुष्प्राप्य है॥ १३-१४॥ | | दक्षिणे पर्वतवरे यमस्यापि महापुरी।<br>नाम्ना संयमनी दिव्या सिद्धगन्धर्वसेविता॥ १५॥<br><br>तत्र वैवस्वतं देवं देवाद्याः पर्युपासते।<br>स्थानं तत् सत्यसंधानां लोके पुण्यकृतां नृणाम्॥ १६॥<br><br>तस्यास्तु पश्चिमे भागे निर्ऋतेस्तु महात्मनः।<br>रक्षोवती नाम पुरी राक्षसैः सर्वतो वृता॥ १७॥<br><br>तत्र तं निर्ऋतिं देवं राक्षसाः पर्युपासते।<br>गच्छन्ति तां धर्मरता ये वै तामसवृत्तयः॥ १८॥<br><br>पश्चिमे पर्वतवरे वरुणस्य महापुरी।<br>नाम्ना शुद्धवती पुण्या सर्वकामर्द्धिसंयुता॥ १९॥ | श्रेष्ठ (मेरु) पर्वतपर दक्षिण भागमें यमराजकी भी सिद्धों तथा गन्धर्वोंसे सेवित संयमनी नामक दिव्य महापुरी है। वहाँ देवादिगण विवस्वान्¹ (सूर्य) देवकी उपासना करते रहते हैं। वह स्थान संसारमें पुण्य करनेवाले सत्यव्रती मनुष्योंका है। उसके पश्चिम भागमें महात्मा निर्ऋतिकी रक्षोवती नामक पुरी है, जो चारों ओरसे राक्षसोंसे घिरी है। वहाँ राक्षस निर्ऋतिदेवकी उपासना करते हैं तथा जो तमोगुणी जीविकावाले होते हुए भी धार्मिक होते हैं, वे उसी पुरीमें जाते हैं। पश्चिममें इस श्रेष्ठ पर्वतपर सभी प्रकारकी कामनाओंकी समृद्धिसे समन्वित वरुणकी शुद्धवती नामकी पुण्य महापुरी है॥ १५-१९॥ | | तत्राप्सरोगणैः सिद्धैः सेव्यमानोऽमराधिपः।<br>आस्ते स वरुणो राजा तत्र गच्छन्ति येऽम्बुदाः।<br>तीर्थयात्रापरा नित्यं ये च लोकेऽघमर्षणः॥ २०॥ | यहाँ अप्सराओं तथा सिद्धोंसे सेवित अमराधिप राजा वरुण रहते हैं। यहाँ वे ही मनुष्य जाते हैं, जो संसारमें नित्य जलदान करते हैं, तीर्थयात्रा-परायण रहते हैं और जो अघमर्षण किया करते हैं॥ २०॥ | | तस्या उत्तरदिग्भागे वायोरपि महापुरी।<br>नाम्ना गन्धवती पुण्या तत्रास्तेऽसौ प्रभञ्जनः॥ २१॥<br><br>अप्सरोगणगन्धर्वैः सेव्यमानोऽमरप्रभुः।<br>प्राणायामपरा मर्त्या स्थानं तद् यान्ति शाश्वतम्॥ २२॥ | उस (शुद्धवती पुरी)-के उत्तरभागमें वायु देवताकी भी गन्धवती नामवाली पवित्र महापुरी स्थित है। वहाँ प्रभञ्जन (वायुदेवता) निवास करते हैं। देवोंके स्वामी इन वायुदेवताकी अप्सराओंके समूह और गन्धर्व सेवा करते रहते हैं। जो प्राणायाम-परायण मनुष्य हैं, वे इस शाश्वत स्थानमें जाते हैं॥ २१-२२॥ | | तस्याः पूर्वेण दिग्भागे सोमस्य परमा पुरी।<br>नाम्ना कान्तिमती शुभ्रा तत्र सोमो विराजते॥ २३॥<br><br>तत्र ये भोगनिरता स्वधर्मं पर्युपासते।<br>तेषां तद् रचितं स्थानं नानाभोगसमन्वितम्॥ २४॥<br><br>तस्याश्च पूर्वदिग्भागे शंकरस्य महापुरी।<br>नाम्ना यशोवती पुण्या सर्वेषां सुदुरासदा॥ २५॥<br><br>तत्रेशानस्य भवनं रुद्रविष्णुतनोः शुभम्।<br>गणेश्वरस्य विपुलं तत्रास्ते स गणैर्वृतः॥ २६॥ | उसके पूर्व दिशामें सोम (चन्द्रमा)-की कान्तिमती नामवाली शुभ श्रेष्ठ पुरी है, वहाँ चन्द्रमा विराजमान रहते हैं, जो भोगपरायण रहते हुए अपने धर्मका पालन करते हैं उन्हींके लिये वहाँपर अनेक प्रकारके भोगोंसे युक्त स्थान बना² है। उसके पूर्वकी ओर (भगवान् शंकरकी यशोवती नामक पवित्र महापुरी है, जो सभीके लिये दुर्लभ है, वहाँ रुद्र एवं विष्णुमय शरीरवाले गणाधिपति ईशान (शंकर)-का विशाल भवन है |
१-विवस्वान्—विव=रश्मि=किरणसे युक्त सूर्य।
२-कुछ लोग ऐसे होते हैं जो धर्मनिष्ठ होते हैं, पर जन्म-जन्मान्तरके संस्कारवश उनमें मृत्युके समय भोगवासना शेष रह जाती है, ऐसे लोग चन्द्रलोकको प्राप्त करते हैं।