भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 241, कुल 506 में से

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पृष्ठ 241
* अध्याय ४४ *२३१
तत्र भोगाभिलिप्सूनां भक्तानां परमेष्ठिनः।<br>निवासः कल्पितः पूर्वं देवदेवेन शूलिना ॥ २७ ॥<br><br>विष्णुपादाद् विनिष्क्रान्ता प्लावयित्वेन्दुमण्डलम्।<br>समन्ताद् ब्रह्मणः पुर्यां गङ्गा पतति वै दिवः ॥ २८ ॥<br>सा तत्र पतिता दिक्षु चतुर्धा ह्यभवद् द्विजाः।<br>सीता चालकनन्दा च सुचक्षुर्भद्रनामिका ॥ २९ ॥<br><br>पूर्वेण सीता शैलात् तु शैलं यात्यन्तरिक्षतः।<br>ततश्च पूर्ववर्षेण भद्राश्वेनैति चार्णवम् ॥ ३० ॥<br>तथैवालकनन्दा च दक्षिणादेत्य भारतम्।<br>प्रयाति सागरं भित्त्वा सप्तभेदा द्विजोत्तमाः ॥ ३१ ॥<br><br>सुचक्षुः पश्चिमगिरीनतीत्य सकलांस्तथा।<br>पश्चिमं केतुमालाख्यं वर्षं गत्वैति चार्णवम् ॥ ३२ ॥<br><br>भद्रा तथोत्तरगिरीनुत्तरांश्च तथा कुरून्।<br>अतीत्य चोत्तराम्भोधिं समभ्येति महर्षयः ॥ ३३ ॥<br><br>आनीलनिषधायामौ माल्यवान् गन्धमादनः।<br>तयोर्मध्यगतो मेरुः कर्णिकाकारसंस्थितः ॥ ३४ ॥<br><br>भारताः केतुमालाश्च भद्राश्वाः कुरवस्तथा।<br>पत्राणि लोकपद्मस्य मर्यादाशैलबाह्यतः ॥ ३५ ॥<br>जठरो देवकूटश्च मर्यादापर्वतावुभौ।<br>दक्षिणोत्तरमायामावानीलनिषधायतौ ॥ ३६ ॥<br><br>गन्धमादनकैलासौ पूर्वपश्चायतावुभौ।<br>अशीतियोजनायामावर्णवान्तर्व्यवस्थितौ ॥ ३७ ॥<br><br>निषधः पारियात्रश्च मर्यादापर्वताविमौ।<br>मेरोः पश्चिमदिग्भागे यथापूर्वौ तथा स्थितौ ॥ ३८ ॥<br><br>त्रिशृङ्गो जारुधिश्चैतदुत्तरे वर्षपर्वतौ।<br>पूर्वपश्चायतावेतौ अर्णवान्तर्व्यवस्थितौ ॥ ३९ ॥<br><br>मर्यादापर्वताः प्रोक्ता अष्टाविह मया द्विजाः।<br>जठराद्याः स्थिता मेरोश्चतुर्दिक्षु महर्षयः ॥ ४० ॥गणोंसे आवृत्त (शंकरदेव) उसमें रहते हैं। पूर्वकालमें देवोंके देव शूल धारण करनेवाले शंकरने वहाँपर परमेष्ठीके भोगाभिलाषी भक्तोंका निवास-स्थान बनाया था। विष्णुके चरणसे निकली हुई गङ्गा चन्द्रमण्डलको आप्लावित कर स्वर्गसे ब्रह्मपुरीके चारों ओर गिरती हैं ॥ २३–२८ ॥<br><br>द्विजो! वे वहाँ गिरकर सीता, अलकनन्दा, सुचक्षु एवं भद्रा नामसे चार भागोंमें (दिशाओंमें) विभक्त हो गयी हैं। अन्तरिक्षसे निकलकर सीता नामक गङ्गा एक शैलसे दूसरे शैलपर जाती हुई पूर्व दिशामें भद्राश्ववर्षमें प्रवाहित होती हुई समुद्रमें जाती हैं ॥ २९-३० ॥<br><br>हे द्विजोत्तमो! इसी प्रकार अलकनन्दा नामक गङ्गा दक्षिण दिशासे भारतवर्षमें आनेके बाद सात भागोंमें विभक्त होकर सागरमें जाती हैं। ऐसे ही सुचक्षु नामक गङ्गा पश्चिम दिशाके सभी पर्वतोंका अतिक्रमण करके पश्चिम दिशाके केतुमाल नामक वर्षमें प्रवाहित होकर समुद्रमें जाती हैं। महर्षियो! भद्रा नामक गङ्गा उत्तर दिशाके पर्वतों और उत्तरकुरुवर्षका अतिक्रमण कर उत्तर समुद्रमें मिलती हैं। माल्यवान् तथा गन्धमादन पर्वत नील तथा निषध पर्वतोंके समान विस्तारवाले हैं। उन दोनोंके मध्यमें कर्णिकाके आकारके समान मेरु (पर्वत) स्थित है। इन मर्यादापर्वतोंके बाहरकी ओर संसाररूपी कमलके पत्रोंके रूपमें भारतवर्ष, केतुमाल, भद्राश्व और कुरुवर्ष स्थित हैं ॥ ३१—३५ ॥<br><br>जठर एवं देवकूट नामक दो मर्यादापर्वत नील और निषध पर्वतोंतक दक्षिणोत्तर-दिशामें फैले हुए हैं। गन्धमादन और कैलास नामक दोनों पर्वत पूर्व-पश्चिममें फैले हुए हैं, (ये) अस्सी योजन विस्तारवाले हैं और समुद्रके अंदरतक स्थित हैं। निषध और पारियात्र नामक दो मर्यादापर्वत मेरुकी पश्चिम दिशामें पूर्वके पर्वतोंके समान स्थित हैं। इसी प्रकार उत्तरमें त्रिशृङ्ग और जारुधि नामक दो वर्षपर्वत हैं। ये पूर्व-पश्चिममें फैले हुए हैं तथा समुद्रके भीतरतक स्थित हैं ॥ ३६—३९ ॥<br><br>हे द्विजो! मैंने यहाँ इन आठ मर्यादापर्वतोंको बतलाया। हे महर्षियो! मेरुके चारों दिशाओंमें जठर आदि (वर्षपर्वत) स्थित हैं ॥ ४० ॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४४ ॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें चौवालीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ४४ ॥

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