संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२३२ * कूर्मपुराण *
पैंतालीसवाँ अध्याय
केतुमाल, भद्राश्व, रम्यकवर्ष तथा वहाँके निवासियोंका वर्णन, हरिवर्षमें स्थित विष्णुके विमानका वर्णन, जम्बूद्वीपके वर्णनमें भारतवर्षके कुलपर्वतों, महानदियों, जनपदों और वहाँके निवासियोंका वर्णन, भारतवर्षमें चार युगोंकी स्थितिका प्रतिपादन
सूत उवाच
केतुमाले नराः कालाः सर्वे पनसभाजनाः।
स्त्रियश्चोत्पलपत्राभा जीवन्ति च वर्षायुतम्॥ १ ॥
भद्राश्वे पुरुषाः शुक्लाः स्त्रियश्चन्द्रांशुसंनिभाः।
दश वर्षसहस्राणि जीवन्ते आम्रभोजनाः॥ २ ॥
रम्यके पुरुषा नार्यो रमन्ते रजतप्रभाः।
दशवर्षसहस्राणि शतानि दश पञ्च च।
जीवन्ति चैव सत्त्वस्था न्यग्रोधफलभोजनाः॥ ३ ॥
हिरण्मये हिरण्याभाः सर्वे च लकुचाशनाः।
एकादशसहस्राणि शतानि दश पञ्च च।
जीवन्ति पुरुषा नार्यो देवलोकस्थिता इव॥ ४ ॥
त्रयोदशसहस्राणि शतानि दश पञ्च च।
जीवन्ति कुरुवर्षे तु श्यामाङ्गाः क्षीरभोजनाः॥ ५ ॥
सर्वे ते मैथुनाजाताः नित्यं सुखनिषेविनः।
चन्द्रद्वीपे महादेवं यजन्ति सततं शिवम्॥ ६ ॥
तथा किम्पुरुषे विप्रा मानवा हेमसन्निभाः।
दशवर्षसहस्राणि जीवन्ति प्लक्षभोजनाः॥ ७ ॥
यजन्ति सततं देवं चतुर्मूर्तिं चतुर्मुखम्।
ध्याने मनः समाधाय सादरं भक्तिसंयुताः॥ ८ ॥
तथा च हरिवर्षे तु महारजतसंनिभाः।
दशवर्षसहस्राणि जीवन्तीक्षुरसाशिनः॥ ९ ॥
तत्र नारायणं देवं विश्वयोनिं सनातनम्।
उपासते सदा विष्णुं मानवा विष्णुभाविताः॥ १०॥
सूतजीने कहा—केतुमालवर्षके पुरुष कृष्णवर्णके होते हैं और सभी पनस (कटहल)-का भोजन करनेवाले होते हैं। वहाँकी स्त्रियाँ कमलपत्रके समान वर्णवाली होती हैं। ये सभी दस हजार वर्षतक जीवित रहते हैं।
भद्राश्ववर्षके पुरुष शुक्ल वर्णके होते हैं और स्त्रियाँ चन्द्रमाकी किरणों (चाँदनी)-के समान वर्णवाली होती हैं। ये सब आमका आहार करते हैं तथा दस हजार वर्षतक जीवित रहते हैं। रम्यकवर्षके पुरुष और स्त्रियाँ—सभी चाँदीकी प्रभाके समान दिखायी देते हैं। ये सत्त्वभावमें स्थित रहनेवाले होते हैं तथा वटवृक्षके फलका भोजन करते हैं और ग्यारह हजार पाँच सौ वर्षोतक जीवित रहते हैं। हिरण्मयवर्षमें सोनेकी आभावाले निवास करते हैं, सभी लकुच (बड़हरके फल)-का भोजन करते हैं और बारह हजार पाँच सौ वर्षतक सभी स्त्री-पुरुष उसी प्रकार जीवित रहते हैं, जैसे कि देवलोकमें स्थित हों॥ १–४॥
कुरुवर्षमें दुग्धाहार करनेवाले श्यामवर्णके (स्त्री-पुरुष) चौदह हजार पाँच सौ वर्षतक जीवित रहते हैं। वे सभी मैथुनसे उत्पन्न होते हैं, नित्य सुखोपभोगी होते हैं और चन्द्रद्वीपमें महादेव शिवकी निरन्तर उपासना करते हैं। हे विप्रो! इसी प्रकार किंपुरुषवर्षके मनुष्य स्वर्ण-वर्णके समान होते हैं। पाकड़ वृक्षके फलोंका भोजन करनेवाले ये दस हजार वर्षतक जीवित रहते हैं। ये भक्तियुक्त होकर आदरसहित मनको ध्यानमें समाधिस्थकर चतुर्मूर्ति चतुर्मुख देव (ब्रह्मा)-की निरन्तर उपासना करते रहते हैं। इसी प्रकार हरिवर्षमें रहनेवाले महारजत* (स्वर्ण)-के समान आभावाले होते हैं। वे दस हजार वर्षतक जीवित रहते हैं। ईखके रसका भोजन करते हैं। यहाँ ये मनुष्य विष्णुकी भावनासे भावित होकर विश्वयोनि नारायणदेव विष्णुकी सदा उपासना करते हैं॥ ५–१०॥
* महारजत शब्द स्वर्णका पर्याय है। (अमरकोश २।९।९५)