संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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* अध्याय ४५ * २३३
| तत्र चन्द्रप्रभं शुभ्रं शुद्धस्फटिकनिर्मितम्।<br>विमानं वासुदेवस्य पारिजातवनाश्रितम्॥ ११॥<br><br>चतुर्द्वारमनौपम्यं चतुस्तोरणसंयुतम्।<br>प्राकारैर्दशभिर्युक्तं दुराधर्षं सुदुर्गमम्॥ १२॥<br><br>स्फाटिकैर्मण्डपैर्युक्तं देवराजगृहोपमम्।<br>स्वर्णस्तम्भसहस्रैश्च सर्वतः समलंकृतम्॥ १३॥<br><br>हेमसोपानसंयुक्तं नानारत्नोपशोभितम्।<br>दिव्यसिंहासनोपेतं सर्वशोभासमन्वितम्॥ १४॥<br><br>सरोभिः स्वादुपाानीयैर्नदीभिश्चोपशोभितम्।<br>नारायणपरैः शुद्धैर्वेदाध्ययनतत्परैः॥ १५॥<br><br>योगिभिश्च समाकीर्णं ध्यायद्भिः पुरुषं हरिम्।<br>स्तुवद्भिः सततं मन्त्रैर्नमस्यद्भिश्च माधवम्॥ १६॥<br><br>तत्र देवादिदेवस्य विष्णोरमिततेजसः।<br>राजानः सर्वकालं तु महिमानं प्रकुर्वते॥ १७॥<br><br>गायन्ति चैव नृत्यन्ति विलासिन्यो मनोरमाः।<br>स्त्रियो यौवनशालिन्यः सदा मण्डनतत्पराः॥ १८॥<br><br>इलावृते पद्मवर्णा जम्बूफलरसाशिनः।<br>त्रयोदश सहस्राणि वर्षाणां वै स्थिरायुषः॥ १९॥<br><br>भारते तु स्त्रियः पुंसो नानावर्णाः प्रकीर्तिताः।<br>नानादेवार्चने युक्ता नानाकर्माणि कुर्वते।<br>परमायुः स्मृतं तेषां शतं वर्षाणि सुव्रताः॥ २०॥<br><br>नानाहाराश्च जीवन्ति पुण्यपापनिमित्ततः।<br>नवयोजनसाहस्रं वर्षमेतत् प्रकीर्तितम्।<br>कर्मभूमिरियं विप्रा नराणामधिकारिणाम्॥ २१॥<br><br>महेन्द्रो मलयः सह्यः शुक्तिमानृक्षपर्वतः।<br>विन्ध्यश्च पारियात्रश्च सप्तात्र कुलपर्वताः॥ २२॥<br><br>इन्द्रद्युम्नः कशेरुमांस्ताम्रवर्णो गभस्तिमान्।<br>नागद्वीपस्तथा सौम्यो गन्धर्वस्त्वथ वारुणः॥ २३॥<br><br>अयं तु नवमस्तेषां द्वीपः सागरसंवृतः।<br>योजनानां सहस्रं तु द्वीपोऽयं दक्षिणोत्तरः॥ २४॥<br><br>पूर्वे किरातास्तस्यान्ते पश्चिमे यवनास्तथा।<br>ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्या मध्ये शूद्रास्तथैव च॥ २५॥ | वहाँ पारिजातके वनमें शुद्ध स्फटिकका बना हुआ चन्द्रमाकी शुभ्र कान्तिके समान कान्तिवाला वासुदेवका एक विमान है। चार द्वारों, चार तोरणोंसे समन्वित तथा दस प्राकारोंसे युक्त (वह विमान) अनुपम, दुराधर्ष और दुर्गम है। यह स्फटिकके मण्डपोंसे युक्त देवराजके भवनके समान है तथा सभी ओरसे हजारों स्वर्ण-स्तम्भोंसे अलंकृत है। इसमें सोनेकी सीढ़ियाँ हैं। यह दिव्य सिंहासनोंसे समन्वित, सभी प्रकारकी शोभाओंसे सम्पन्न तथा नाना प्रकारके रत्नोंसे सुशोभित है। स्वादिष्ट जलवाले सरोवरों और नदियोंसे शोभित है। वह स्थान नारायण-परायण, पवित्र, वेदाध्ययनमें तत्पर, पुरुष हरिका ध्यान करनेवाले लोगों तथा निरन्तर मन्त्रोंद्वारा माधवकी स्तुति करनेवाले और उन्हें नमस्कार करनेवाले योगियोंसे व्याप्त रहता है॥ ११-१६॥<br><br>वहाँ राजा लोग देवोंके आदिदेव अमित तेजस्वी विष्णुकी महिमाका सभी कालोंमें कीर्तन करते रहते हैं*। शृंगार करनेमें तत्पर युवावस्थावाली एवं विलासिनी मनोरम स्त्रियाँ यहाँ सदा नृत्य एवं गान करती रहती हैं। इलावृतवर्षमें कमलके समान वर्णवाले जामुनके फलके रसका सेवन करनेवाले तथा तेरह हजार वर्षकी स्थिर आयुवाले व्यक्ति निवास करते हैं। भारतवर्षके स्त्री और पुरुष अनेक वर्णके बताये गये हैं। ये विविध प्रकारके देवताओंकी आराधनामें निरत रहते हैं और अनेक प्रकारके कर्मोंको करते हैं। हे सुव्रतो! इनकी परम आयु सौ वर्षकी कही गयी है। अनेक प्रकारका आहार करनेवाले वे अपने पुण्य-पापके निमित्तसे जीवित रहते हैं। यह वर्ष नौ हजार योजन विस्तारवाला कहा गया है। हे विप्रो! यह अधिकारी पुरुषोंकी कर्मभूमि है॥ १७-२१॥<br><br>महेन्द्र, मलय, सह्य, शुक्तिमान्, ऋक्ष, विन्ध्य तथा पारियात्र—ये सात कुलपर्वत यहाँ हैं। इन्द्रद्युम्न, कशेरुमान्, ताम्रवर्ण, गभस्तिमान्, नागद्वीप, सौम्य, गन्धर्व तथा वारुण— (इन आठ द्वीपोंके अतिरिक्त) यह नवाँ द्वीप सागरसे घिरा हुआ है। यह द्वीप दक्षिणोत्तरमें एक हजार योजनमें फैला हुआ है। उसके पूर्वमें किरात, पश्चिममें यवन और मध्यमें ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र रहते हैं॥ २२-२५॥ |
* देवताओंके विमान एक अति श्रेष्ठ प्रासादके समान ही सभी सुविधाओंसे युक्त होते हैं—जैसे पुष्पक विमान, कपिलके द्वारा देवहूतिको दिया गया कामग विमान आदि।