भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२३४ * कूर्मपुराण *


| इज्याय युद्धवाणिज्यैरभिवर्तयन्त्यत्र मानवाः।<br>स्रवन्ते पावना नद्यः पर्वतेभ्यो विनिःसृताः ॥ २६ ॥<br>शतद्रुश्चन्द्रभागा च सरयूर्यमुना तथा।<br>इरावती वितस्ता च विपाशा देविका कुहूः ॥ २७॥<br>गोमती धूतपापा च बाहुदा च दृषद्वती।<br>कौशिकी लोहिता चैव हिमवत्पादनिःसृताः ॥ २८ ॥<br>वेदस्मृतिर्वेदवती व्रतघ्नी त्रिदिवा तथा।<br>पर्णाशा वन्दना चैव सदानीरा मनोरमा ॥ २९ ॥<br>चर्मण्वती तथा दूर्वा विदिशा वेत्रवत्यपि।<br>शिगुः स्वशिल्पापि तथा पारियात्राश्रयाः स्मृताः ॥ ३० ॥ | यहाँके मनुष्य यज्ञ, युद्ध और वाणिज्यद्वारा जीवन-निर्वाह करते हैं। (यहाँ) पर्वतोंसे निकली हुई पवित्र नदियाँ प्रवाहित होती हैं। शतद्रु, चन्द्रभागा, सरयू, यमुना, इरावती, वितस्ता, विपाशा, देविका, कुहू, गोमती, धूतपापा, बाहुदा, दृषद्वती, कौशिकी तथा लोहिता—ये सभी नदियाँ हिमालयकी तलहटीसे निकली हैं। वेदस्मृति, वेदवती, व्रतघ्नी, त्रिदिवा, पर्णाशा, वन्दना, सदानीरा, मनोरमा, चर्मण्वती, दूर्वा, विदिशा, वेत्रवती, शिगु तथा स्वशिल्पा—ये नदियाँ पारियात्र पर्वतका आश्रय लेनेवाली कही गयी हैं॥ २६-३०॥ | | नर्मदा सुरसा शोणा दशार्णा च महानदी।<br>मन्दाकिनी चित्रकूटा तामसी च पिशाचिका ॥ ३१ ॥<br>चित्रोत्पला विपाशा च मञ्जुला वालुवाहिनी।<br>ऋक्षवत्पादजा नद्यः सर्वपापहरा नृणाम् ॥ ३२ ॥<br>तापी पयोष्णी निर्विन्ध्या शीघ्रोदा च महानदी।<br>वेण्या वैतरणी चैव बलाका च कुमुद्वती ॥ ३३ ॥<br>तोया चैव महागौरी दुर्गा चान्तःशिला तथा।<br>विन्ध्यपादप्रसूतास्ता नद्यः पुण्यजलाः शुभाः ॥ ३४ ॥<br>गोदावरी भीमरथी कृष्णा वर्णा च मत्सरी।<br>तुङ्गभद्रा सुप्रयोगा कावेरी च द्विजोत्तमाः।<br>दक्षिणापथगा नद्यः सह्यपादविनिःसृताः ॥ ३५ ॥ | नर्मदा, सुरसा, शोणा, दशार्णा, महानदी, मन्दाकिनी, चित्रकूटा, तामसी, पिशाचिका, चित्रोत्पला, विपाशा, मञ्जुला तथा वालुवाहिनी नामक ये ऋक्षवान् पर्वतके नीचेके भागसे निकली हुई नदियाँ मनुष्योंके सभी पापोंका हरण करनेवाली हैं। तापी, पयोष्णी, निर्विन्ध्या, शीघ्रोदा, महानदी, वेण्या, वैतरणी, बलाका, कुमुद्वती, तोया, महागौरी, दुर्गा और अन्तःशिला नामकी ये नदियाँ विन्ध्यके निचले भागसे निकली हैं और शुभ हैं तथा पवित्र जलवाली हैं। हे द्विजोत्तमो! गोदावरी, भीमरथी, कृष्णा, वर्णा, मत्सरी, तुङ्गभद्रा, सुप्रयोगा तथा कावेरी—ये नदियाँ दक्षिणकी ओर जानेवाली तथा सह्यपर्वतके पादमूलसे निकली हैं॥ ३१-३५॥ | | ऋतुमाला ताम्रपर्णी पुष्पवत्युत्पलावती।<br>मलयाद्रिःसृता नद्यः सर्वाः शीतजलाः स्मृताः ॥ ३६ ॥<br><br>ऋषिकुल्या त्रिसामा च मन्दगा मन्दगामिनी।<br>रूपा पालासिनी चैव ऋषिका वंशकारिणी।<br>शुक्तिमत्पादसंजाताः सर्वपापहरा नृणाम् ॥ ३७ ॥ | ऋतुमाला, ताम्रपर्णी, पुष्पवती और उत्पलावती—मलय पर्वतसे निकली ये सभी नदियाँ शीतल जलवाली कही गयी हैं। ऋषिकुल्या, त्रिसामा, मन्दगा, मन्दगामिनी, रूपा, पालासिनी, ऋषिका तथा वंशकारिणी—ये नदियाँ शुक्तिमान् पर्वतके निम्न भागसे उत्पन्न हैं और मनुष्योंके सभी पापोंको हरण करनेवाली हैं॥ ३६-३७॥ | | आसां नद्युपनद्यश्च शतशो द्विजपुंगवाः।<br>सर्वपापहराः पुण्याः स्नानदानादिकर्मसु ॥ ३८ ॥<br>तास्विमे कुरुपाञ्चाला मध्यदेशादयो जनाः।<br>पूर्वदेशादिकाश्चैव कामरूपनिवासिनः ॥ ३९ ॥<br>पुण्ड्राः कलिङ्गा मगधा दाक्षिणात्याश्च कृत्स्नशः।<br>तथापरान्ताः सौराष्ट्राः शूद्राभीरास्तथार्बुदाः ॥ ४० ॥<br>मालका मालवाश्चैव पारियात्रनिवासिनः।<br>सौवीराः सैन्धवा हूणा शाल्वाः कल्पनिवासिनः ॥ ४१ ॥ | हे द्विजश्रेष्ठो! इन सभी (महानदियों)—की सैकड़ों नदियाँ और उपनदियाँ हैं, जो सभी पापोंको हरनेवाली तथा स्नान, दान आदि कर्मोंमें पवित्र हैं। उनमें ये कुरु, पाञ्चाल, मध्यदेश आदिके लोग, पूर्वके देशोंमें रहनेवाले, कामरूपके निवासी, पुण्ड्र, कलिङ्ग तथा मगध देशके लोग, समस्त दाक्षिणात्य तथा (इनके अतिरिक्त) सौराष्ट्रवासी, शूद्र, आभीर, अर्बुद (पर्वतीय जाति-विशेषके लोग), मालक, मालव, पारियात्रमें रहनेवाले, सौवीर, सैन्धव, हूण, शाल्व, कल्पनिवारी, |