भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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* अध्याय ४६ *२३५
मद्रा रामास्तथाम्बष्ठाः पारसीकास्तथैव च।<br>आसां पिबन्ति सलिलं वसन्ति सरितां सदा॥ ४२ ॥मद्र, राम, अम्बष्ठ तथा पारसी लोग इन नदियोंके किनारे रहते हैं और इन (नदियों)-का जल पीते हैं॥ ३८–४२॥
चत्वारि भारते वर्षे युगानि कवयोऽब्रुवन्।<br>कृतं त्रेता द्वापरं च कलिश्चान्यत्र न क्वचित् ॥ ४३ ॥कवियों (मनीषियों)-ने भारतवर्षमें—कृत (सत्य), त्रेता, द्वापर तथा कलि—इन चार युगोंको बताया है। ये (युग) अन्यत्र कहीं नहीं होते ॥ ४३ ॥
यानि किंपुरुषाद्यानि वर्षाण्यष्टौ महर्षयः।<br>न तेषु शोको नायासो नोद्वेगः क्षुद्भयं न च॥ ४४॥<br><br>स्वस्थाः प्रजा निरातङ्काः सर्वदुःखविवर्जिताः।<br>रमन्ति विविधैर्भावैः सर्वाश्च स्थिरयौवनाः ॥ ४५ ॥हे महर्षियो! किंपुरुष आदि जो आठ वर्ष हैं, उनमें न शोक है, न परिश्रम है, न उद्वेग है और न भूखका भय है। (वहाँ) सारी प्रजा स्वस्थ, आतङ्करहित तथा सभी प्रकारके दुःखोंसे मुक्त रहती है। सभी स्थिर यौवनवाले होते हैं और अनेक प्रकारके भावोंसे रमण करते रहते हैं॥ ४४-४५॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षट्साहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४५ ॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें पैंतालीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ४५ ॥


छियालीसवाँ अध्याय

विभिन्न पर्वतोंपर स्थित देवताओंके पुरोंका वर्णन तथा वहाँके निवासियों, नदियों, सरोवरों और भवनोंका वर्णन, जम्बूद्वीपके वर्णनका उपसंहार

सूत उवाचसूतजी बोले—
हेमकूटगिरेः शृङ्गे महाकूटैः सुशोभनम्।<br>स्फाटिकं देवदेवस्य विमानं परमेष्ठिनः ॥ १॥<br>अथ देवादिदेवस्य भूतेशस्य त्रिशूलिनः।<br>देवाः सिद्धगणा यक्षाः पूजां नित्यं प्रकुर्वते ॥ २॥<br>स देवो गिरिशः सार्धं महादेव्या महेश्वरः।<br>भूतैः परिवृतो नित्यं भाति तत्र पिनाकधृक् ॥ ३॥हेमकूट पर्वतके शिखरपर बड़े-बड़े गुंबदोंसे सुशोभित स्फटिकसे बना हुआ देवाधिदेव परमेष्ठी (शिव)-का एक विमान है। वहाँ देवता, सिद्धगण तथा यक्ष देवोंके आदिदेव भूतेश त्रिशूलीकी नित्य पूजा करते हैं। वे पिनाक धारण करनेवाले गिरिश महेश्वर महादेवीके साथ भूतगणोंसे आवृत होते हुए नित्य वहाँ सुशोभित होते हैं॥ १–३॥
विभक्तचारुशिखरः कैलासो यत्र पर्वतः।<br>निवासः कोटियक्षाणां कुबेरस्य च धीमतः।<br>तत्रापि देवदेवस्य भवस्यायतनं महत् ॥ ४॥<br>मन्दाकिनी तत्र दिव्या रम्या सुविमलोदका।<br>नदी नानाविधैः पद्मैरनेकैः समलंकृता ॥ ५॥<br>देवदानवगन्धर्वयक्षराक्षसकिंनरैः ।<br>उपस्पृष्टजला नित्यं सुपुण्या सुमनोरमा ॥ ६॥जहाँ अलग-अलग सुन्दर शिखरोंवाला कैलास पर्वत है तथा जहाँ करोड़ों यक्षों तथा बुद्धिमान् कुबेरका निवास है, वहींपर देवाधिदेव शंकरका विशाल मन्दिर है। वहाँ नाना प्रकारके अनेक कमलोंसे अलंकृत अत्यन्त स्वच्छ जलवाली दिव्य एवं रमणीय मन्दाकिनी नदी है। देवता, दानव, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस और किंनर उस अत्यन्त पवित्र तथा मनोरम नदीके जलका नित्य स्पर्श (स्नान, आचमन आदि) करते हैं॥ ४-६॥
अन्याश्च नद्यः शतशः स्वर्णपद्मैरलंकृताः।<br>तासां कूलेषु देवस्य स्थानानि परमेष्ठिनः।<br>देवर्षिगणजुष्टानि तथा नारायणस्य च ॥ ७॥अन्य भी स्वर्णकमलोंसे सुशोभित वहाँ सैकड़ों नदियाँ हैं। इनके तटोंपर देवताओं तथा ऋषिगणोंसे सेवित परमेष्ठी देव और नारायणके मन्दिर हैं॥ ७॥