भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२३६* कूर्मपुराण *
सितान्तशिखरे चापि पारिजातवनं शुभम्।<br>तत्र शक्रस्य विपुलं भवनं रत्नमण्डितम्।<br>स्फाटिकस्तम्भसंयुक्तं हेमगोपुरसंयुतम्॥ ८ ॥<br><br>तत्राथ देवदेवस्य विष्णोर्विश्वामरेशितुः।<br>सुपुण्यं भवनं रम्यं सर्वरत्नोपशोभितम्॥ ९ ॥<br><br>तत्र नारायणः श्रीमान् लक्ष्म्या सह जगत्पतिः।<br>आस्ते सर्वामरश्रेष्ठः पूज्यमानः सनातनः॥ १० ॥<br>तथा च वसुधारे तु वसूनां रत्नमण्डितम्।<br>स्थानानामष्टकं पुण्यं दुरार्धर्षं सुरद्विषाम्॥ ११ ॥<br><br>रत्नधारे गिरिवरे सप्तर्षीणां महात्मनाम्।<br>सप्ताश्रमाणि पुण्यानि सिद्धावासयुतानि तु॥ १२ ॥<br><br>तत्र हैमं चतुर्द्वारं वज्रनीलादिमण्डितम्।<br>सुपुण्यं सुमहत् स्थानं ब्रह्मणोऽव्यक्तजन्मनः॥ १३ ॥<br>तत्र देवर्षयो विप्राः सिद्धा ब्रह्मर्षयोऽपरे।<br>उपासते सदा देवं पितामहमजं परम्॥ १४ ॥<br><br>स तैः सम्पूजितो नित्यं देव्या सह चतुर्मुखः।<br>आस्ते हिताय लोकानां शान्तानां परमा गतिः॥ १५ ॥<br>अथैकशृङ्गशिखरे महापद्मौरलंकृतम्।<br>स्वच्छामृतजलं पुण्यं सुगन्धं सुमहत् सरः॥ १६ ॥<br><br>जैगीषव्याश्रमं तत्र योगीन्द्रैरुपशोभितम्।<br>तत्रासौ भगवान् नित्यमास्ते शिष्यैः समावृतः।<br>प्रशान्तदोषैरक्षुद्रैर्ब्रह्मविद्भिर्महात्मभिः ॥ १७॥<br>शङ्खो मनोहरश्चैव कौशिकः कृष्ण एव च।<br>सुमना वेदनादश्च शिष्यास्तस्य प्रधानतः॥ १८ ॥<br>सर्वे योगरताः शान्ता भस्मोद्धूलितविग्रहाः।<br>उपासते महावीर्या ब्रह्मविद्यापरायणाः॥ १९ ॥<br>तेषामनुग्रहार्थाय यतीनां शान्तचेतसाम्।<br>सांनिध्यं कुरुते भूयो देव्या सह महेश्वरः॥ २०॥<br>अन्यानि चाश्रमाणि स्युस्तस्मिन् गिरिवरोत्तमे।<br>मुनीनां युक्तमनसां सरांसि सरितस्तथा॥ २१॥<br>तेषु योगरता विप्रा जापकाः संयतेन्द्रियाः।<br>ब्रह्मण्यासक्तमनसो रमन्ते ज्ञानतत्पराः॥ २२॥(हेमकूटके) अन्तिम शुभ्र शिखरपर पारिजात वृक्षोंका सुन्दर वन है। वहाँ स्फटिकोंसे बने हुए खम्भोंसे युक्त, स्वर्णसे बना गोपुरवाला इन्द्रका रत्नमण्डित एक विशाल भवन है। वहाँपर समस्त देवताओंके नियामक देवाधिदेव विष्णुका एक अत्यन्त पवित्र और रमणीय भवन है, जो सभी रत्नोंसे सुशोभित है। वहाँ संसारके स्वामी, सभी देवताओंमें श्रेष्ठ, पूज्यमान, सनातन श्रीमान् नारायण लक्ष्मीके साथ निवास करते हैं॥ ८-१०॥<br><br>इसी प्रकार वसुधार नामक पर्वतपर (आठ) वसुओंके रत्नोंसे मण्डित, देवताओंसे द्वेष करनेवाले असुरोंके लिये अपराजेय पवित्र आठ स्थान हैं। रत्नधार नामक श्रेष्ठ पर्वतपर सिद्धोंके आवाससे युक्त महात्मा सप्तर्षियोंके पवित्र सात आश्रम हैं। वहाँ अव्यक्तजन्मा ब्रह्माका सोनेसे बना हुआ चार द्वारोंवाला, हीरे एवं नील मणि आदिसे मण्डित अत्यन्त पवित्र विशाल स्थान है॥ ११-१३॥<br><br>हे विप्रो ! वहाँ देवर्षि, ब्रह्मर्षि, सिद्ध तथा दूसरे लोग अजन्मा परम पितामह देवकी सदा उपासना करते हैं। उनके द्वारा नित्य भलीभाँति पूजित शान्तचित्तवालोंके परम गतिरूप वे चतुर्मुख ब्रह्मा देवीके साथ लोकोंके कल्याणके लिये वहाँ रहते हैं॥ १४-१५॥<br><br>(उस हेमकूटके) एक ऊँचे शिखरपर महापद्मोंसे अलंकृत, सुगन्धित, स्वच्छ एवं अमृतके समान जलवाला एक पवित्र विशाल तालाब है। वहाँपर (महर्षि) जैगीषव्यका योगीन्द्रोंसे सुशोभित एक आश्रम है। शान्त दोषोंवाले महान् ब्रह्मविज्ञानी एवं महात्मारूप शिष्योंसे आवृत भगवान् (जैगीषव्य) वहाँ नित्य निवास करते हैं॥ १६-१७॥<br><br>शङ्ख, मनोहर, कौशिक, कृष्ण, सुमना तथा वेदनाद उनके प्रधान शिष्य हैं। योगपरायण, शान्त, भस्मसे उपलिप्त शरीरवाले, महावीर्य (उत्कृष्ट शक्तिसम्पन्न) तथा ब्रह्मविद्या-परायण वे सभी (भगवान्‌की) उपासना करते हैं। उन शान्तचित्त यतियोंपर अनुग्रह करनेके लिये महेश्वर देवीके साथ (उस स्थानपर) निवास करते हैं॥ १८-२०॥<br><br>उस उत्तम गिरिश्रेष्ठपर योगयुक्त मनवाले मुनियोंके अन्य कई आश्रम तथा सरोवर और नदियाँ हैं। उनमें योग-परायण, जप करनेवाले, संयत इन्द्रियोंवाले एवं ब्रह्मनिष्ठ मनवाले, ज्ञानतत्पर विप्रगण रमण करते हैं