भारतकोश
संग्रह पर लौटें

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished506 पृष्ठ
२३६* कूर्मपुराण *
सितान्तशिखरे चापि पारिजातवनं शुभम्।<br>तत्र शक्रस्य विपुलं भवनं रत्नमण्डितम्।<br>स्फाटिकस्तम्भसंयुक्तं हेमगोपुरसंयुतम्॥ ८ ॥<br><br>तत्राथ देवदेवस्य विष्णोर्विश्वामरेशितुः।<br>सुपुण्यं भवनं रम्यं सर्वरत्नोपशोभितम्॥ ९ ॥<br><br>तत्र नारायणः श्रीमान् लक्ष्म्या सह जगत्पतिः।<br>आस्ते सर्वामरश्रेष्ठः पूज्यमानः सनातनः॥ १० ॥<br>तथा च वसुधारे तु वसूनां रत्नमण्डितम्।<br>स्थानानामष्टकं पुण्यं दुरार्धर्षं सुरद्विषाम्॥ ११ ॥<br><br>रत्नधारे गिरिवरे सप्तर्षीणां महात्मनाम्।<br>सप्ताश्रमाणि पुण्यानि सिद्धावासयुतानि तु॥ १२ ॥<br><br>तत्र हैमं चतुर्द्वारं वज्रनीलादिमण्डितम्।<br>सुपुण्यं सुमहत् स्थानं ब्रह्मणोऽव्यक्तजन्मनः॥ १३ ॥<br>तत्र देवर्षयो विप्राः सिद्धा ब्रह्मर्षयोऽपरे।<br>उपासते सदा देवं पितामहमजं परम्॥ १४ ॥<br><br>स तैः सम्पूजितो नित्यं देव्या सह चतुर्मुखः।<br>आस्ते हिताय लोकानां शान्तानां परमा गतिः॥ १५ ॥<br>अथैकशृङ्गशिखरे महापद्मौरलंकृतम्।<br>स्वच्छामृतजलं पुण्यं सुगन्धं सुमहत् सरः॥ १६ ॥<br><br>जैगीषव्याश्रमं तत्र योगीन्द्रैरुपशोभितम्।<br>तत्रासौ भगवान् नित्यमास्ते शिष्यैः समावृतः।<br>प्रशान्तदोषैरक्षुद्रैर्ब्रह्मविद्भिर्महात्मभिः ॥ १७॥<br>शङ्खो मनोहरश्चैव कौशिकः कृष्ण एव च।<br>सुमना वेदनादश्च शिष्यास्तस्य प्रधानतः॥ १८ ॥<br>सर्वे योगरताः शान्ता भस्मोद्धूलितविग्रहाः।<br>उपासते महावीर्या ब्रह्मविद्यापरायणाः॥ १९ ॥<br>तेषामनुग्रहार्थाय यतीनां शान्तचेतसाम्।<br>सांनिध्यं कुरुते भूयो देव्या सह महेश्वरः॥ २०॥<br>अन्यानि चाश्रमाणि स्युस्तस्मिन् गिरिवरोत्तमे।<br>मुनीनां युक्तमनसां सरांसि सरितस्तथा॥ २१॥<br>तेषु योगरता विप्रा जापकाः संयतेन्द्रियाः।<br>ब्रह्मण्यासक्तमनसो रमन्ते ज्ञानतत्पराः॥ २२॥(हेमकूटके) अन्तिम शुभ्र शिखरपर पारिजात वृक्षोंका सुन्दर वन है। वहाँ स्फटिकोंसे बने हुए खम्भोंसे युक्त, स्वर्णसे बना गोपुरवाला इन्द्रका रत्नमण्डित एक विशाल भवन है। वहाँपर समस्त देवताओंके नियामक देवाधिदेव विष्णुका एक अत्यन्त पवित्र और रमणीय भवन है, जो सभी रत्नोंसे सुशोभित है। वहाँ संसारके स्वामी, सभी देवताओंमें श्रेष्ठ, पूज्यमान, सनातन श्रीमान् नारायण लक्ष्मीके साथ निवास करते हैं॥ ८-१०॥<br><br>इसी प्रकार वसुधार नामक पर्वतपर (आठ) वसुओंके रत्नोंसे मण्डित, देवताओंसे द्वेष करनेवाले असुरोंके लिये अपराजेय पवित्र आठ स्थान हैं। रत्नधार नामक श्रेष्ठ पर्वतपर सिद्धोंके आवाससे युक्त महात्मा सप्तर्षियोंके पवित्र सात आश्रम हैं। वहाँ अव्यक्तजन्मा ब्रह्माका सोनेसे बना हुआ चार द्वारोंवाला, हीरे एवं नील मणि आदिसे मण्डित अत्यन्त पवित्र विशाल स्थान है॥ ११-१३॥<br><br>हे विप्रो ! वहाँ देवर्षि, ब्रह्मर्षि, सिद्ध तथा दूसरे लोग अजन्मा परम पितामह देवकी सदा उपासना करते हैं। उनके द्वारा नित्य भलीभाँति पूजित शान्तचित्तवालोंके परम गतिरूप वे चतुर्मुख ब्रह्मा देवीके साथ लोकोंके कल्याणके लिये वहाँ रहते हैं॥ १४-१५॥<br><br>(उस हेमकूटके) एक ऊँचे शिखरपर महापद्मोंसे अलंकृत, सुगन्धित, स्वच्छ एवं अमृतके समान जलवाला एक पवित्र विशाल तालाब है। वहाँपर (महर्षि) जैगीषव्यका योगीन्द्रोंसे सुशोभित एक आश्रम है। शान्त दोषोंवाले महान् ब्रह्मविज्ञानी एवं महात्मारूप शिष्योंसे आवृत भगवान् (जैगीषव्य) वहाँ नित्य निवास करते हैं॥ १६-१७॥<br><br>शङ्ख, मनोहर, कौशिक, कृष्ण, सुमना तथा वेदनाद उनके प्रधान शिष्य हैं। योगपरायण, शान्त, भस्मसे उपलिप्त शरीरवाले, महावीर्य (उत्कृष्ट शक्तिसम्पन्न) तथा ब्रह्मविद्या-परायण वे सभी (भगवान्‌की) उपासना करते हैं। उन शान्तचित्त यतियोंपर अनुग्रह करनेके लिये महेश्वर देवीके साथ (उस स्थानपर) निवास करते हैं॥ १८-२०॥<br><br>उस उत्तम गिरिश्रेष्ठपर योगयुक्त मनवाले मुनियोंके अन्य कई आश्रम तथा सरोवर और नदियाँ हैं। उनमें योग-परायण, जप करनेवाले, संयत इन्द्रियोंवाले एवं ब्रह्मनिष्ठ मनवाले, ज्ञानतत्पर विप्रगण रमण करते हैं
  • अध्याय ४६ * | २३७ ---|--- आत्मन्यात्मानमाधाय शिखान्तान्तरमास्थितम्।<br>ध्यायन्ति देवमीशानं येन सर्वमिदं ततम्॥ २३॥ | (समाधिस्थ रहते हैं)। (वे) स्वयंमें आत्मनिष्ठ होकर शिखाके अन्तिम मूलभाग(ब्रह्मरन्ध्र)-में स्थित ईशान देवका ध्यान करते हैं, जिनसे इस सम्पूर्ण (जगत्)-का विस्तार हुआ है। सुमेघ (नामक पर्वत)-पर हजारों सुमेघे वासवस्थानं सहस्रादित्यसंनिभम्।<br>तत्रास्ते भगवानिन्द्रः शच्या सह सुरेश्वरः॥ २४॥ | सूर्योंके समान प्रकाशमान इन्द्रका एक स्थान है। देवताओंके राजा भगवान् इन्द्र शचीके साथ वहाँ निवास करते हैं। गजशैलपर दुर्गाका मणियोंसे बने तोरणवाला एक भवन है। साक्षात् महेश्वरी भगवती दुर्गा वहाँ गजशैले तु दुर्गाया भवनं मणितोरणम्।<br>आस्ते भगवती दुर्गा तत्र साक्षान्महेश्वरी॥ २५॥ | निवास करती हैं। योगामृतका पान करके अर्थात् योगको आत्मसात् कर लेनेके कारण साक्षात् योगेश्वरी और (ईश्वर अर्धनारीश्वर महेश्वरकी अर्धाङ्गिनी होनेके कारण) ईश्वरका साक्षात् आनन्द प्राप्तकर विविध उपास्यमाना विविधैः शक्तिभेदैरितस्ततः।<br>पीत्वा योगामृतं लब्ध्वा साक्षादानन्दमैश्वरम्॥ २६॥ | प्रकारकी शक्तियोंके रूपमें इतस्ततः उपासित होती रहती हैं॥ २१–२६॥ सुनीलस्य गिरेः शृङ्गे नानाधातुसमुज्ज्वले।<br>राक्षसानां पुराणि स्युः सरांसि शतशो द्विजाः॥ २७॥ | हे द्विजो! विविध धातुओंसे देदीप्यमान सुनील पर्वतके शिखरपर राक्षसोंके नगर तथा सैकड़ों सरोवर हैं। विप्रो! इसी प्रकार शतशृंग नामक महान् पर्वतपर तथा पुरशतं विप्रा शतशृङ्गे महाचले।<br>स्फाटिकस्तम्भसंयुक्तं यक्षाणाममितौजसाम्॥ २८॥ | स्फटिक स्तम्भोंसे बने हुए अमित तेजस्वी यक्षोंके सौ नगर हैं। श्वेतोदर पर्वतके शिखरपर महात्मा सुपर्ण श्वेतोदरगिरेः शृङ्गे सुपर्णस्य महात्मनः।<br>प्राकारगोपुरोपेतं मणितोरणमण्डितम्॥ २९॥ | (गरुड)-का अनेक प्राकार और गोपुरोंसे युक्त तथा मणियोंसे बने तोरणोंसे मण्डित पुर है। वहाँ साक्षात् स तत्र गरुडः श्रीमान् साक्षाद् विष्णुरिवापरः।<br>ध्यात्वास्ते तत् परं ज्योतिरात्मानं विष्णुमव्ययम्॥ ३०॥ | दूसरे विष्णुके समान वे श्रीमान् गरुड उन परम ज्योतिःस्वरूप आत्मरूप अव्यय विष्णुका ध्यान करते रहते हैं॥ २७–३०॥ अन्यच्च भवनं पुण्यं श्रीशृङ्गे मुनिपुंगवाः।<br>श्रीदेव्याः सर्वरत्नाढ्यं हैमं सुमणितोरणम्॥ ३१॥ | मुनिश्रेष्ठो! श्रीशृंगपर श्रीदेवीका दूसरा भी एक पवित्र भवन है, जो सभी रत्नोंसे पूर्ण तथा स्वर्णसे बना हुआ है और सुन्दर मणियोंसे बने तोरणवाला है। वहाँ तत्र सा परमा शक्तिर्विष्णोरतिमनोरमा।<br>अनन्तविभवा लक्ष्मीर्जगत्सम्मोहनोत्सुका॥ ३२॥ | विष्णुकी अति मनोरम परम शक्ति (वे लक्ष्मी) संसारके मूल कारण (विष्णु)-का चिन्तन करती हुई अध्यास्ते देवगन्धर्वसिद्धचारणवन्दिता।<br>विचिन्त्य जगतो योनिं स्वशक्तिकिरणोज्ज्वला॥ ३३॥ | विशेषरूपसे निवास करती हैं। वे लक्ष्मी अनन्त ऐश्वर्यवाली, संसारको मोहित करनेमें उत्सुक, देवताओं, गन्धर्वों, सिद्धों तथा चारणोंसे वन्दित हैं और अपनी तत्रैव देवदेवस्य विष्णोरायतनं महत्।<br>सरांसि तत्र चत्वारि विचित्रकमलाश्रया॥ ३४॥ | शक्तिकी किरणोंसे प्रकाशित हैं। वहीं देवाधिदेव विष्णुका विशाल भवन है तथा वहींपर विचित्र कमलोंवाले चार सरोवर हैं। इसी प्रकार सहस्रशिखर तथा सहस्रशिखरे विद्याधरपुराष्टकम्।<br>रत्नसोपानसंयुक्तं सरोभिश्चोपशोभितम्॥ ३५॥ | (पर्वत)-पर रत्नोंकी सीढ़ियोंसे बने हुए और सरोवरोंसे सुशोभित विद्याधरोंके आठ पुर हैं॥ ३१–३५॥

२३८ * कूर्मपुराण *


नद्यो विमलपानीयाश्चित्रनीलोत्पलाकराः।
कर्णिकारवनं दिव्यं तत्रास्ते शंकरोमया॥ ३६॥

पारियात्रे महाशैले महालक्ष्म्‍याः पुरं शुभम्।
रम्यप्रासादसंयुक्तं घण्टाचामरभूषितम्॥ ३७॥

नृत्यद्भिरप्सरःसङ्घैरितश्चेतश्च शोभितम्।
मृदङ्गमुरजोद्‍घुष्टं वीणावेणुनिनादितम्॥ ३८॥

गन्धर्वकिंनराकीर्णं संवृतं सिद्धपुंगवैः।
भास्वद्‍भित्तिसमाकीर्णं महाप्रासादसंकुलम्॥ ३९॥

गणेश्वराङ्गनाजुष्टं धार्मिकाणां सुदर्शनम्।
तत्र सा वसते देवी नित्यं योगपरायणा॥ ४०॥

महालक्ष्मीर्महादेवी त्रिशूलवरधारिणी।
त्रिनेत्रा सर्वशक्तीभिः संवृता सदसन्मया।
पश्यन्ति तत्र मुनयः सिद्धा ये ब्रह्मवादिनः॥ ४१॥

सुपार्श्वस्योत्तरे भागे सरस्वत्याः पुरोत्तमम्।
सरांसि सिद्धजुष्टानि देवभोग्यानि सत्तमाः॥ ४२॥

पाण्डुरस्य गिरेः शृङ्गे विचित्रद्रुमसंकुले।
गन्धर्वाणां पुरशतं दिव्यस्त्रीभिः समावृतम्॥ ४३॥

तेषु नित्यं मदोत्सिक्ता वरनार्यस्तथैव च।
क्रीडन्ति मुदिता नित्यं विलासैर्भोगतत्पराः॥ ४४॥

अञ्जनस्य गिरेः शृङ्गे नारीणां पुरमुत्तमम्।
वसन्ति तत्राप्सरसो रम्भाद्या रतिलालसाः॥ ४५॥

चित्रसेनादयो यत्र समायान्त्यर्थिनः सदा।
सा पुरी सर्वरत्नाढ्या नैकप्रस्रवणैर्युता॥ ४६॥

अनेकानि पुराणि स्युः कौमुदे चापि सुव्रताः।
रुद्राणां शान्तरजसामीश्वरार्पितचेतसाम्॥ ४७॥

तेषु रुद्रा महायोगा महेशान्तरचारिणः।
समासते परं ज्योतिरारूढाः स्थानमुत्तमम्॥ ४८॥


वहाँ स्वच्छ जलवाली नदियाँ तथा अनेक प्रकारके प्रफुल्लित नीलकमल हैं और कर्णिकारका* एक दिव्य वन है, उमाके साथ शंकर वहाँ विराजमान रहते हैं। पारियात्र नामक महाशैलपर महालक्ष्मीका सुन्दर पुर है, जो रमणीय प्रासादोंसे युक्त, घण्टा एवं चामरसे अलंकृत, इतस्ततः नृत्य करती हुई अप्सराओंके समूहसे सुशोभित, मृदंग एवं मुरजकी ध्वनिसे गुञ्जित, वीणा तथा वेणुकी झंकारसे निनादित, गन्धर्व तथा किंनरोंसे आकीर्ण, श्रेष्ठ सिद्धोंसे आवृत, चमकते हुए दीवालोंसे पूर्ण, बड़े-बड़े महलोंसे घनीभूत, गणेश्वरोंकी अङ्गनाओंसे सेवित और धार्मिक जनोंके द्वारा सरलतापूर्वक प्रत्यक्ष करने योग्य है। वहाँ योगपरायण, श्रेष्ठ त्रिशूल धारण करनेवाली, तीन नेत्रवाली, सभी शक्तियोंसे आवृत और सदसन्मयी देवी महालक्ष्मी महादेवी नित्य निवास करती हैं। वहाँ जो ब्रह्मवादी मुनि और सिद्ध हैं—वे उनका दर्शन करते हैं॥ ३६-४१॥

सुपार्श्वके उत्तरभागमें सरस्वतीका उत्तम पुर है। श्रेष्ठ जनो! वहाँ देवताओंके उपभोग करने योग्य तथा सिद्धोंसे सेवित अनेक सरोवर हैं। पाण्डुर पर्वतके शिखरपर अनेक प्रकारके वृक्षोंसे भरे हुए और दिव्य स्त्रियोंसे परिपूर्ण गन्धर्वोंके सौ पुर हैं। उनमें अनेक प्रकारके भोगोंमें तत्पर और काम-मदसे उन्मत्त श्रेष्ठ स्त्रियाँ तथा पुरुष अनेक प्रकारके विलासोंद्वारा भोगमें तत्पर रहते हैं और प्रसन्नतापूर्वक सदा क्रीडा (मनोविनोद) करते रहते हैं॥ ४२-४४॥

अञ्जनगिरिके शिखरपर स्त्रियोंका श्रेष्ठ पुर है, जिसमें रतिकी इच्छा करनेवाली रम्भा आदि अप्सराएँ निवास करती हैं। चित्रसेन आदि (गन्धर्व) जहाँ सदा अभिलाषीके रूपमें आया करते हैं, वह पुरी सभी रत्नोंसे परिपूर्ण तथा अनेक झरनोंसे सम्पन्न है॥ ४५-४६॥

हे सुव्रतो! कौमुद (पर्वत)-पर भी शान्त रजोगुणवाले (रजोगुणके कारण होनेवाली चंचलतासे रहित) तथा शंकरमें अर्पित चित्तवाले रुद्रोंके अनेक पुर हैं, उनमें परम ज्योति अर्थात् परब्रह्मका प्रत्यक्ष करनेवाले तथा महेशके अन्तरमें विचरण करनेवाले महायोगी रुद्रगण रहते हैं, यह स्थान बहुत उत्तम है॥ ४७-४८॥


* कर्णिकार—वृक्षविशेष, कठचम्पा या कर्णियार नामसे कई जगहोंमें प्रसिद्ध।

* अध्याय ४६ *२३९
पिञ्जरस्य गिरेः शृङ्गे गणेशानां पुरत्रयम्।<br>नन्दीश्वरस्य कपिले तत्रास्ते सुयशा यतिः॥ ४९॥<br><br>तथा च जारुधेः शृङ्गे देवदेवस्य धीमतः।<br>दीप्तमायतनं पुण्यं भास्करस्यामितौजसः॥ ५०॥<br><br>तस्यैवोत्तरदिग्भागे चन्द्रस्थानमनुत्तमम्।<br>रमते तत्र रम्योऽसौ भगवान् शीतदीधितिः॥ ५१॥<br><br>अन्यच्च भवनं दिव्यं हंसशैले महर्षयः।<br>सहस्रयोजनायामं सुवर्णमणितोरणम्॥ ५२॥<br><br>तत्रास्ते भगवान् ब्रह्मा सिद्धसङ्घैरभिष्टुतः।<br>सावित्र्या सह विश्वात्मा वासुदेवादिभिर्युतः॥ ५३॥<br><br>तस्य दक्षिणदिग्भागे सिद्धानां पुरमुत्तमम्।<br>सनन्दनादयो यत्र वसन्ति मुनिपुंगवाः॥ ५४॥<br><br>पञ्चशैलस्य शिखरे दानवानां पुरत्रयम्।<br>नातिदूरेण तस्याथ दैत्याचार्यस्य धीमतः॥ ५५॥<br><br>सुगन्धशैलशिखरे सरिद्भिरुपशोभितम्।<br>कर्दमस्याश्रमं पुण्यं तत्रास्ते भगवानृषिः॥ ५६॥<br><br>तस्यैव पूर्वदिग्भागे किञ्चिद् वै दक्षिणाश्रिते।<br>सनत्कुमारो भगवांस्तत्रास्ते ब्रह्मवित्तमः॥ ५७॥<br><br>सर्वेष्वेतेषु शैलेषु तथान्येषु मुनीश्वराः।<br>सरांसि विमला नद्यो देवानामाल्यानि च॥ ५८॥<br><br>सिद्धलिङ्गानि पुण्यानि मुनिभिः स्थापितानि तु।<br>वन्यान्याश्रमवर्याणि संख्यातुं नैव शक्नुयाम्॥ ५९॥<br><br>एष संक्षेपतः प्रोक्तो जम्बूद्वीपस्य विस्तरः।<br>न शक्यं विस्तराद् वक्तुं मया वर्षशतैरपि॥ ६०॥पिञ्जर गिरिके शिखरपर गणेशोंके तीन पुर तथा (वहीं) कपिल(शिखर)-पर नन्दीश्वरकी पुरी है, वहाँ उत्तम यशवाले यतिगण निवास करते हैं। इसी प्रकार जारुधि पर्वतके शिखरपर अमित तेजस्वी बुद्धिमान् देवाधिदेव भास्करका दीप्तियुक्त पवित्र भवन है। उसीके उत्तर दिग्भागमें चन्द्रमाका उत्तम स्थान है, वहाँ शीत किरणोंवाले ये रम्य भगवान् (चन्द्रमा) रहते हैं॥ ४९-५१॥<br><br>हे महर्षियो! हंसशैलपर एक दूसरा दिव्य भवन है, जो एक हजार योजन विस्तारवाला है और सुवर्ण तथा मणिसे निर्मित तोरणवाला है। वहाँ सिद्धोंके समूहसे सेवित और वासुदेव आदिसे युक्त विश्वात्मा भगवान् ब्रह्मा सावित्रीके साथ रहते हैं। उसके दक्षिण दिग्भागमें सिद्धोंका श्रेष्ठ पुर है, जहाँ सनन्दन आदि श्रेष्ठ मुनि रहते हैं॥ ५२-५४॥<br><br>पञ्चशैलके शिखरपर दानवोंके तीन पुर हैं। उसके समीप ही सुगन्ध शैलके शिखरपर दैत्योंके आचार्य बुद्धिमान् भगवान् कर्दम ऋषिका नदियोंसे सुशोभित एक पवित्र आश्रम है॥ ५५-५६॥<br><br>उसीके पूर्व दिग्भागमें कुछ दक्षिण दिशाकी ओर ब्रह्मज्ञानियोंमें श्रेष्ठ भगवान् सनत्कुमार रहते हैं। हे मुनीश्वरो! इन सभी शैलों तथा अन्य शैलोंमें भी अनेक सरोवर, स्वच्छ जलवाली नदियाँ और देवताओंके भवन हैं। वहाँ जो मुनियोंद्वारा स्थापित पवित्र सिद्ध लिङ्ग, वन तथा श्रेष्ठ आश्रम हैं, उनकी गणना मैं नहीं कर सकता। यह संक्षेपमें जम्बूद्वीपका विस्तार बतलाया गया, सैकड़ों वर्षोंमें भी मैं इसके विस्तारका वर्णन नहीं कर सकता॥ ५७-६०॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे षट्चत्वारिंशोऽध्यायः॥ ४६॥

इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें छियालीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ४६॥

२४० * कूर्मपुराण *

सैंतालीसवाँ अध्याय

प्लक्ष आदि महाद्वीपों, वहाँके पर्वतों, नदियों तथा निवासियोंका वर्णन, श्वेतद्वीपमें स्थित नारायणपुरका वर्णन, वहाँ वैकुण्ठमें रहनेवाले लक्ष्मीपति शेषशायी नारायणकी महिमाका ख्यापन

सूत उवाचसूतजी बोले—
जम्बूद्वीपस्य विस्ताराद् द्विगुणेन समन्ततः।<br>संवेष्टयित्वा क्षारोदं प्लक्षद्वीपो व्यवस्थितः॥ १ ॥<br>प्लक्षद्वीपे च विप्रेन्द्राः समासन् कुलपर्वताः।<br>ऋज्वायताः सुपर्वाणः सिद्धसङ्घनिषेविताः॥ २ ॥<br>गोमेदः प्रथमस्तेषां द्वितीयश्चन्द्र उच्यते।<br>नारदो दुन्दुभिश्चैव सोमश्च ऋषभस्तथा।<br>वैभ्राजः सप्तमः प्रोक्तो ब्रह्मणोऽत्यन्तवल्लभः॥ ३ ॥<br>तत्र देवर्षिगन्धर्वैः सिद्धैश्च भगवानजः।<br>उपास्यते स विश्वात्मा साक्षी सर्वस्य विश्वसृक्॥ ४ ॥जम्बूद्वीपके विस्तारसे दुगुने विस्तारमें चारों ओरसे क्षार सागरको आवृतकर प्लक्षद्वीप स्थित है। श्रेष्ठ विप्रो! प्लक्षद्वीपमें सीधे विस्तारवाले, सुन्दर पर्वोंवाले तथा सिद्धोंके समूहोंसे सेवित सात कुलपर्वत हैं। उनमें गोमेद पहला है, दूसरा चन्द्र पर्वत कहलाता है। इसी प्रकार नारद, दुन्दुभि, सोम, ऋषभ तथा सातवाँ वैभ्राज नामक पर्वत कहा गया है, जो ब्रह्माको अत्यन्त प्रिय है। वहाँ देवर्षियों, गन्धर्वों तथा सिद्धोंके द्वारा सबके साक्षी, विश्वकी सृष्टि करनेवाले विश्वात्मा भगवान् अज (ब्रह्मा)-की उपासना की जाती है॥ १-४॥
तेषु पुण्या जनपदा नाधयो व्याधयो न च।<br>न तत्र पापकर्तारः पुरुषा वा कथञ्चन॥ ५ ॥उन (पर्वतों)-में पवित्र जनपद हैं। वहाँ न कोई आधि है, न कोई व्याधि। वहाँ रहनेवाले पुरुष किसी भी प्रकारका पाप नहीं करते हैं।
तेषां नद्यश्च सप्तैव वर्षाणां तु समुद्रगाः।<br>तासु ब्रह्मर्षयो नित्यं पितामहमुपासते॥ ६ ॥<br>अनुतप्ता शिखी चैव विपापा त्रिदिवा कृता।<br>अमृता सुकृता चैव नामतः परिकीर्तिताः॥ ७ ॥समुद्रकी ओर जानेवाली उन वर्षपर्वतोंकी सात नदियाँ हैं, उनमें ब्रह्मर्षि नित्य पितामहकी उपासना करते हैं। (वे नदियाँ) अनुतप्ता, शिखी, विपापा, त्रिदिवा, कृता, अमृता और सुकृता नामवाली कही गयी हैं॥ ५-७॥
क्षुद्रनद्यस्त्वसंख्याताः सरांसि सुबहून्यपि।<br>न चैतेषु युगावस्था पुरुषा वै चिरायुषः॥ ८ ॥<br>आर्यकाः कुरवाश्चैव विदशा भाविनस्तथा।<br>ब्रह्मक्षत्रियविट्शूद्रास्तस्मिन् द्वीपे प्रकीर्तिताः॥ ९ ॥इनके अतिरिक्त असंख्य छोटी-छोटी नदियाँ तथा बहुतसे सरोवर भी वहाँपर हैं। यहाँ (सत्य, त्रेता आदि रूपमें) युगोंकी व्यवस्था नहीं है और सभी पुरुष दीर्घायु होते हैं। इस द्वीपमें आर्यक, कुरव, विदश तथा भावी नामक ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र कहे गये हैं॥ ८-९॥
इज्यते भगवान् सोमो वर्णैस्तत्र निवासिभिः।<br>तेषां च सोमसायुज्यं सारूप्यं मुनिपुंगवाः॥ १०॥हे मुनिश्रेष्ठो! यहाँ रहनेवाले विभिन्न वर्णवालोंके द्वारा भगवान् सोमकी पूजा की जाती है, उन्हें सोमका सायुज्य और सारूप्य (नामक मोक्ष) प्राप्त होता है।
सर्वे धर्मपरा नित्यं नित्यं मुदितमानसाः।<br>पञ्चवर्षसहस्राणि जीवन्ति च निरामयाः॥ ११॥वहाँके सभी लोग नित्य धर्मपरायण और नित्य प्रसन्नचित्त रहते हैं तथा रोगरहित होकर पाँच हजार वर्षतक जीवित रहते हैं।
प्लक्षद्वीपप्रमाणं तु द्विगुणेन समन्ततः।<br>संवेष्ट्येक्षुरसाम्भोधिं शाल्मलिः संव्यवस्थितः॥ १२॥<br>सप्त वर्षाणि तत्रापि सप्तैव कुलपर्वताः।<br>ऋज्वायताः सुपर्वाणः सप्त नद्यश्च सुव्रताः॥ १३॥प्लक्षद्वीपके दुगुने प्रमाणमें चारों ओर इक्षुरसके समुद्रको आवेष्टितकर शाल्मलि नामक द्वीप स्थित है। वहाँ भी सात वर्ष और सात ही कुलपर्वत हैं, (वे पर्वत) सीधे फैले हुए और सुन्दर पर्वोंवाले हैं। हे सुव्रतो! (वहाँ) सात नदियाँ भी हैं॥ १०-१३॥
* अध्याय ४७ *२४१
कुमुदश्रोन्नताश्चैव तृतीयश्च बलाहकः।<br>द्रोणः कङ्कस्तु महिषः ककुद्मान् सप्त पर्वताः ॥ १४ ॥<br><br>योनी तोया वितृष्णा च चन्द्रा शुक्ला विमोचिनी।<br>निवृत्तिश्चेति ता नद्यः स्मृता पापहरा नृणाम् ॥ १५ ॥<br><br>न तेषु विद्यते लोभः क्रोधो वा द्विजसत्तमाः।<br>न चैवास्ति युगावस्था जना जीवन्त्यनामयाः ॥ १६ ॥<br><br>यजन्ति सततं तत्र वर्णा वायुं सनातनम्।<br>तेषां तस्याथ सायुज्यं सारूप्यं च सलोकता ॥ १७ ॥<br>कपिला ब्राह्मणाः प्रोक्ता राजानश्चारुणास्तथा।<br>पीता वैश्याः स्मृताः कृष्णा द्वीपेऽस्मिन् वृषला द्विजाः ॥ १८ ॥<br>शाल्मलस्य तु विस्ताराद् द्विगुणेन समन्ततः।<br>संवेष्ट्य तु सुरोदाब्धिं कुशद्वीपो व्यवस्थितः ॥ १९ ॥<br>विद्रुमश्चैव हेमश्च द्युतिमान् पुष्पवांस्तथा।<br>कुशेशयो हरिश्चाथ मन्दरः सप्त पर्वताः ॥ २० ॥<br>धुतपापा शिवा चैव पवित्रा सम्मता तथा।<br>विद्युदम्भा मही चेति नद्यस्तत्र जलावाहाः ॥ २१ ॥<br>अन्याश्च शतशो विप्रा नद्यो मणिजलाः शुभाः।<br>तासु ब्रह्माणमीशानं देवादद्याः पर्युपासते ॥ २२ ॥<br><br>ब्राह्मणा द्रविणो विप्राः क्षत्रियाः शुष्मिणस्तथा।<br>वैश्याः स्नेहास्तु मन्देहाः शूद्रास्तत्र प्रकीर्तिताः ॥ २३ ॥<br><br>सर्वे विज्ञानसम्पन्ना मैत्रादिगुणसंयुताः।<br>यथोक्तकारिणः सर्वे सर्वे भूतहिते रताः ॥ २४ ॥<br><br>यजन्ति विविधैर्यज्ञैर्ब्रह्माणं परमेष्ठिनम्।<br>तेषां च ब्रह्मसायुज्यं सारूप्यं च सलोकता ॥ २५ ॥<br><br>कुशद्वीपस्य विस्ताराद् द्विगुणेन समन्ततः।<br>क्रौञ्चद्वीपस्ततो विप्रा वेष्टयित्वा घृतोदधिम् ॥ २६ ॥<br>क्रौञ्चो वामनकश्चैव तृतीयश्चान्धकारकः।<br>देवावृच्च विविन्दश्च पुण्डरीकस्तथैव च।<br>नाम्ना च सप्तमः प्रोक्तः पर्वतो दुन्दुभिस्वनः ॥ २७ ॥<br>गौरी कुमुद्वती चैव संध्या रात्रिर्मनोजवा।<br>ख्यातिश्च पुण्डरीका च नद्यः प्राधान्यतः स्मृताः ॥ २८ ॥<br>पुष्कराः पुष्कला धन्यास्तिष्यास्तस्य क्रमेण वै।<br>ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्राश्चैव द्विजोत्तमाः ॥ २९ ॥कुमुद, उन्नत, तीसरा बलाहक, द्रोण, कङ्क, महिष तथा ककुद्मान्—ये सात (कुल) पर्वत हैं। योनी, तोया, वितृष्णा, चन्द्रा, शुक्ला, विमोचिनी तथा निवृत्ति—ये सात नदियाँ मनुष्योंका पाप हरण करनेवाली कही गयी हैं। हे द्विजश्रेष्ठो! उनमें (यहाँके निवासियोंमें) न लोभ है, न क्रोध है और न (यहाँ) युगकी व्यवस्था ही है। यहाँके सभी लोग रोगरहित होकर जीवित रहते हैं। यहाँके सभी वर्णोंके लोग निरन्तर सनातन वायुदेवका यजन करते हैं, इन्हें उन (वायुदेव)-का सायुज्य, सारूप्य तथा सालोक्य (नामक मोक्ष) प्राप्त होता है ॥ १४–१७ ॥<br><br>हे द्विजो! इस (शाल्मलि) द्वीपमें ब्राह्मण कपिल वर्णके और क्षत्रिय अरुण वर्णके कहे गये हैं। वैश्य पीतवर्णके तथा वृषल (शूद्र) कृष्ण वर्णके बतलाये गये हैं। शाल्मलद्वीपके दुगुने विस्तारमें चारों ओरसे सुरोदसागरको आवेष्टित कर कुशद्वीप स्थित है। विद्रुम, हेम, द्युतिमान्, पुष्पवान्, कुशेशय, हरि तथा मन्दर—ये सात (कुल) पर्वत हैं। यहाँ धुतपापा, शिवा, पवित्रा, संमता, विद्युदम्भा और मही (नामक) जलसे पूर्ण नदियाँ हैं ॥ १८–२१ ॥<br><br>हे विप्रो! यहाँ मणिके समान स्वच्छ जलवाली अन्य भी सैकड़ों नदियाँ हैं। इनमें देवता आदि ईशान ब्रह्माकी उपासना करते हैं। विप्रो! वहाँके ब्राह्मण द्रविण, क्षत्रिय शुष्मिण, वैश्य स्नेह तथा शूद्र मन्देह कहे गये हैं। यहाँके सभी लोग विशिष्ट ज्ञानसे सम्पन्न, मैत्री आदि गुणोंसे समन्वित, विहित कर्मोंको करनेवाले तथा सभी प्राणियोंके हित-चिन्तनमें लगे रहते हैं। ये विविध यज्ञोंद्वारा परमेष्ठी ब्रह्माका यजन करते हैं और उन्हें ब्रह्माका सायुज्य, सारूप्य तथा सालोक्य (मोक्ष) प्राप्त होता है ॥ २२–२५ ॥<br><br>हे विप्रो! कुशद्वीपके दुगुने विस्तारमें चारों ओर घृतसमुद्रको आवेष्टित करके क्रौञ्चद्वीप स्थित है। क्रौञ्च, वामनक, अन्धकारक, देवावृत्, विविन्द, पुण्डरीक तथा दुन्दुभिस्वन नामक सात पर्वत यहाँ कहे गये हैं। गौरी, कुमुद्वती, संध्या, रात्रि, मनोजवा, ख्याति तथा पुण्डरीक—ये प्रधान नदियाँ यहाँ कही गयी हैं। हे द्विजोत्तमो! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र—ये क्रमशः पुष्कर, पुष्कल, धन्य तथा तिष्य नामसे यहाँ कहे जाते हैं ॥ २६–२९ ॥

२४२ * कूर्मपुराण *

अर्चयन्ति महादेवं यज्ञदानसमाधिभिः ।<br>व्रतोपवासैर्विविधैर्होमैः स्वाध्यायतर्पणैः ॥ ३० ॥<br><br>तेषां वै रुद्रसायुज्यं सारूप्यं चातिदुर्लभम् ।<br>सलोकता च सामीप्यं जायते तत्प्रसादतः ॥ ३१ ॥<br>क्रौञ्चद्वीपस्य विस्ताराद् द्विगुणेन समन्ततः ।<br>शाकद्वीपः स्थितो विप्रा आवृत्य दधिसागरम् ॥ ३२ ॥<br>उदयो रैवतश्चैव श्यामाकोऽस्तगिरिस्तथा ।<br>आम्बिकेयस्तथा रम्यः केशरी चेति पर्वताः ॥ ३३ ॥<br>सुकुमारी कुमारी च नलिनी रेणुका तथा ।<br>इक्षुका धेनुका चैव गभस्तिश्चेति निम्नगाः ॥ ३४ ॥<br>आसां पिबन्तः सलिलं जीवन्ते तत्र मानवाः ।<br>अनामया ह्यशोकाश्च रागद्वेषविवर्जिताः ॥ ३५ ॥<br>मगाश्च मगधाश्चैव मानवा मन्दगास्तथा ।<br>ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्राश्चात्र क्रमेण तु ॥ ३६ ॥<br>यजन्ति सततं देवं सर्वलोकैकसाक्षिणम् ।<br>व्रतोपवासैर्विविधैर्देवदेवं दिवाकरम् ॥ ३७ ॥<br>तेषां सूर्येण सायुज्यं सामीप्यं च सरूपता ।<br>सलोकता च विप्रेन्द्रा जायते तत्प्रसादतः ॥ ३८ ॥<br>शाकद्वीपं समावृत्य क्षीरोदः सागरः स्थितः ।<br>श्वेतद्वीपश्च तन्मध्ये नारायणपरायणाः ॥ ३९ ॥<br><br>तत्र पुण्या जनपदा नानाश्चर्यसमन्विताः ।<br>श्वेतास्तत्र नरा नित्यं जायन्ते विष्णुतत्पराः ॥ ४० ॥<br>नाधयो व्याधयस्तत्र जरामृत्युभयं न च ।<br>क्रोधलोभविनिर्मुक्ता मायामात्सर्यवर्जिताः ॥ ४१ ॥<br><br>नित्यपुष्टा निरातङ्का नित्यानन्दाश्च भोगिनः ।<br>नारायणपराः सर्वे नारायणपरायणाः ॥ ४२ ॥<br><br>केचिद् ध्यानपरा नित्यं योगिनः संयतेन्द्रियाः ।<br>केचिज्जपन्ति तप्यन्ति केचिद् विज्ञानिनोऽपरे ॥ ४३ ॥<br><br>अन्ये निर्बीजयोगेन ब्रह्मभावेन भाविताः ।<br>ध्यायन्ति तत् परं व्योम वासुदेवं परं पदम् ॥ ४४ ॥<br><br>एकान्तिनो निरालम्बा महाभागवताः परे ।<br>पश्यन्ति परमं ब्रह्म विष्ण्वाख्यं तमसः परम् ॥ ४५ ॥ये यज्ञ, दान, समाधि, व्रत, उपवास, विविध होम, स्वाध्याय एवं तर्पणद्वारा महादेवकी अर्चना करते हैं। इन्हें महादेवकी कृपासे उनका (रुद्रका) अति दुर्लभ सायुज्य, सारूप्य, सालोक्य तथा सामीप्य (मोक्ष) प्राप्त होता है ॥ ३०-३१ ॥<br><br>हे विप्रो! क्रौञ्चद्वीपके दुगुने विस्तारमें चारों ओरसे दधिसमुद्रको आवृतकर शाकद्वीप स्थित है। (यहाँ) उदय, रैवत, श्यामाक, अस्तगिरि, आम्बिकेय, रम्य तथा केशरी—ये पर्वत हैं। यहाँ सुकुमारी, कुमारी, नलिनी, रेणुका, इक्षुका, धेनुका और गभस्ति—ये नदियाँ हैं। इनका जल पीकर यहाँके मनुष्य (सुखमय) जीवन व्यतीत करते हैं। ये रोगरहित, शोकविहीन और राग-द्वेषसे मुक्त रहते हैं ॥ ३२—३५ ॥<br><br>ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र—ये क्रमशः मग, मगध, मानव तथा मन्दग कहलाते हैं। ये सभी लोकोंके एकमात्र साक्षी देवाधिदेव सूर्यदेवका विविध व्रत एवं उपवासोंद्वारा निरन्तर यजन करते हैं। हे विप्रेन्द्रो! सूर्यके अनुग्रहसे इन्हें उनकी सायुज्यता, सामीप्यता, सारूप्यता और सालोक्यता प्राप्त होती है ॥ ३६-३८ ॥<br><br>शाकद्वीपको आवृत करके क्षीरोद सागर स्थित है, उसके मध्यमें श्वेतद्वीप है। वहाँ नारायण-परायण लोग रहते हैं। वहाँ नाना आश्चर्योंसे समन्वित अनेक पवित्र जनपद हैं। वहाँके मनुष्य श्वेतवर्णके और नित्य विष्णुकी भक्तिमें तत्पर रहते हैं ॥ ३९-४० ॥<br><br>वहाँ न कोई आधि-व्याधि है, न वृद्धावस्था है तथा न मृत्युका भय ही है। सभी लोग नारायणके भक्त तथा क्रोध-लोभसे रहित, माया एवं मात्सर्यसे मुक्त, नित्य पुष्ट, आतङ्करहित, नित्य आनन्दयुक्त, भोग करनेवाले तथा नारायण-परायण रहते हैं। वहाँके कुछ निवासी जितेन्द्रिय एवं नित्य ध्यानपरायण योगी हैं, कोई जप करते हैं, कोई तप करते हैं और कुछ लोग विशिष्ट ज्ञान-सम्पन्न हैं। दूसरे निर्बीज योगके द्वारा ब्रह्मभावसे भावित होकर उन परम व्योमरूप, परमपद वासुदेवका ध्यान करते हैं। कुछ दूसरे अनन्यचेता, अन्य आश्रयरहित महाभागवत लोग तम (अज्ञान)-से परे विष्णु नामक परम ब्रह्मका दर्शन करते हैं ॥ ४१—४५ ॥
* अध्याय ४७ *२४३
सर्वे चतुर्भुजाकाराः शङ्खचक्रगदाधराः।<br>सुपीतवाससः सर्वे श्रीवत्साङ्कितवक्षसः॥ ४६॥ये सभी चार भुजाओंवाले, शंख, चक्र तथा गदा धारण करनेवाले, सुन्दर पीताम्बर धारण करनेवाले एवं श्रीवत्ससे अङ्कित वक्षःस्थलवाले हैं॥ ४६॥
अन्ये महेश्वरपरास्त्रिपुण्ड्राङ्कितमस्तकाः।<br>स्वयोगोद्भूतकिरणा महागरुडवाहनाः॥ ४७॥अन्य (कुछ) लोग महेश्वरके भक्त हैं। वे मस्तकपर त्रिपुण्ड्र धारण करते हैं। वे अपने योगसे उत्पन्न रश्मियोंसे लोकको प्रकाशित करते हैं और महागरुड उनके वाहन हैं। सभी शक्तियोंसे सम्पन्न, नित्य आनन्दसे पूर्ण, शुद्धान्तःकरण तथा विष्णुके अन्तरमें विचरण करनेवाले पुरुष वहाँ रहते हैं॥ ४७-४८॥
सर्वशक्तिसमायुक्ता नित्यानन्दाश्च निर्मलाः।<br>वसन्ति तत्र पुरुषा विष्णोरन्तरचारिणः॥ ४८॥<br>तत्र नारायणस्यान्यद् दुर्गमं दुरतिक्रमम्।<br>नारायणं नाम पुरं व्यासाद्यैरुपशोभितम्॥ ४९॥वहाँ व्यास आदिसे सुशोभित नारायणका दूसरा दुर्गम तथा दुर्लङ्घ्य नारायण नामक एक पुर है। वह पुर सोनेके परकोटेसे युक्त, स्फटिकके मण्डपोंसे समन्वित, हजारों प्रकारकी प्रभाओंसे अलंकृत, अत्यन्त सुन्दर और दुराधर्ष है तथा सोनेके प्रासादोंसे युक्त एवं अनेक बड़ी-बड़ी अट्टालिकाओंसे व्याप्त है। वह पुर स्वर्णसे बने हजारों विचित्र गोपुरों* और नाना प्रकारके रत्नोंसे सुशोभित है, साथ ही वह स्वच्छ आसनोंसे युक्त एवं विविध प्रकारसे अलंकृत है। वह पुर विविध प्रकारके उद्यानों और नदियोंसे शोभित है। सब ओरसे सरोवरोंसे युक्त और वीणा तथा वेणुकी ध्वनिसे निनादित है। विचित्र प्रकारकी अनेक पताकाओंसे शोभित है। सब ओरसे वीथियों और रत्नसे विभूषित सीढ़ियोंसे युक्त है॥ ४९-५३॥
हेमप्राकारसंयुक्तं स्फाटिकैर्मण्डपैर्युतम्।<br>प्रभासहस्रकलिलं दुराधर्षं सुशोभनम्।<br>हर्म्यप्राकारसंयुक्तमट्टालकसमाकुलम् ॥५०॥
हेमगोपुरसाहस्रैर्नानारत्नोपशोभितैः ।<br>शुभ्रास्तरणसंयुक्तं विचित्रैः समलंकृतम्॥ ५१॥
नन्दनैर्विविधाकारैः स्रवन्तीभिश्च शोभितम्।<br>सरोभिः सर्वतो युक्तं वीणावेणुनिनादितम्॥ ५२॥
पताकाभिर्विचित्राभिरनेकाभिश्च शोभितम्।<br>वीथीभिः सर्वतो युक्तं सोपानै रत्नभूषितैः॥ ५३॥
नारीशतसहस्राढ्यं दिव्यगेयसमन्वितम्।<br>हंसकारण्डवाकीर्णं चक्रवाकोपशोभितम्।<br>चतुर्द्वारमनौपम्यमगम्यं देवविद्विषाम्॥ ५४॥सैकड़ों, हजारों स्त्रियोंसे सम्पन्न तथा दिव्य गानसे समन्वित है। हंस एवं सारस पक्षियोंसे व्याप्त है, चक्रवाकोंसे सुशोभित है। उसमें अनुपमेय चार द्वार हैं तथा वह सुरद्वेषी असुरोंके लिये अगम्य है। (वह पुर) विविध प्रकारके गीतोंको जाननेवाले देवताओंके लिये भी दुर्लभ, नाना विलासोंसे सम्पन्न, कामके अभिलाषी, अतिकोमल, पूर्ण चन्द्रमाके समान मुखवाले, नूपुरकी ध्वनिसे युक्त, मन्द मुसकानवाले, सुन्दर बिम्बके समान ओठवाले, मुग्ध मृगशावकके समान नेत्रवाले, सम्पूर्ण ऐश्वर्योंसे सम्पन्न, अलंकृत, क्षीण कटिभागवाले, राजहंसके समान सुन्दर चालवाले, अच्छे वेषवाले, मधुर स्वरवाले, बोल-चालमें प्रवीण, दिव्य अलङ्कारोंसे
तत्र तत्राप्सरःसङ्घैर्नृत्यद्भिरुपशोभितम्।<br>नानागीतविधानज्ञैर्देवानापि दुर्लभैः॥ ५५॥
नानाविलाससम्पन्नैः कामुकैरतिकोमलैः।<br>प्रभूतचन्द्रवदनैर्नूपुरारावसंयुतैः ॥५६॥
ईषत्स्मितैः सुबिम्बोष्ठैर्बालमुग्धमृगेक्षणैः।<br>अशेषविभवोपेतैर्भूषितैस्तनुमध्यमैः ॥ ५७॥
सुराजहंसचलनैः सुवेषैर्मधुरस्वनैः।<br>संलापालापकुशलैर्दिव्याभरणभूषितैः ॥ ५८॥

* गोपुर—नगरका बड़ा फाटक अथवा फाटक मात्र।

२४४* कूर्मपुराण *
स्तनभारविनम्रैश्च मदघूर्णितलोचनैः।<br>नानावर्णविचित्राङ्गैर्नानाभोगरतिप्रियैः ॥ ५९॥विभूषित, स्तनके भारसे कुछ झुके हुए, मदके कारण चञ्चल नेत्रोंवाले, अनेक वर्णोंके अङ्गरागसे सुशोभित अङ्गोंवाले, नाना प्रकारके भोग और रतिमें अनुराग रखनेवालों और जहाँ-तहाँ नृत्य करते हुए अप्सरा-समूहोंसे सुशोभित हैं॥ ५४-५९॥
प्रफुल्लकुसुमोद्यानैरितश्चेतश्च शोभितम्।<br>असंख्येयगुणं शुद्धमगम्यं त्रिदशैरपि॥ ६०॥प्रफुल्लित फूलोंवाले इधर-उधर विद्यमान सुन्दर उद्यानोंसे सुशोभित असंख्य गुणोंवाला वह पवित्र पुर देवताओंके लिये भी अगम्य है। अमित तेजस्वी लक्ष्मीपति (विष्णु) देवका वह पुर श्रीसे सम्पन्न और पवित्र है। उसके मध्यमें अत्यन्त तेजसे सम्पन्न, ऊँचे प्राकार तथा तोरणोंसे युक्त और योगियोंके लिये भी दुर्लभ विष्णुका दिव्य स्थान है। उसके मध्यमें कमलदलके समान द्युतिवाले, सम्पूर्ण जगत्के उत्पादक, भगवान् हरि शेषनागकी शय्यापर शयन करते हैं॥ ६०-६२॥
श्रीमत्पवित्रं देवस्य श्रीपतेरमितौजसः।<br>तस्य मध्येऽतितेजस्कमुच्चप्राकारतोरणम्॥ ६१॥
स्थानं तद् वैष्णवं दिव्यं योगिनामपि दुर्लभम्।<br>तन्मध्ये भगवान्नेकः पुण्डरीकदलद्युतिः।<br>शेतेऽशेषजगत्सूतिः शेषाहिशयने हरिः॥ ६२॥
विचिन्त्यमानो योगीन्द्रैः सनन्दनपुरोगमैः।<br>स्वात्मानन्दामृतं पीत्वा परं तत् तमसः परम्॥ ६३॥स्वात्मानन्दरूपी अमृतका पान करते हुए सनन्दन आदि योगीन्द्रोंद्वारा तमोगुणसे अतीत श्रेष्ठ उन (श्रीहरि)-का चिन्तन किया जाता है। क्षीरसागरकी कन्या लक्ष्मी सुन्दर पीताम्बर धारण करनेवाले, अनन्त, महामायाके अधिपति तथा महान् भुजाओंवाले विष्णुके दोनों चरण नित्य पकड़े रहती हैं। जगत्की वन्दनीया हरिप्रिया वे देवी नारायणामृतका पानकर उन्हींमें मन लगाकर उनके चरणमूलमें नित्य विराजमान रहती हैं॥ ६३-६५॥
सुपीतवसनोऽनन्तो महामायो महाभुजः।<br>क्षीरोदकन्यया नित्यं गृहीतचरणद्वयः॥ ६४॥
सा च देवी जगद्वन्द्या पादमूले हरिप्रिया।<br>समास्ते तन्मना नित्यं पीत्वा नारायणामृतम्॥ ६५॥
न तत्राधार्मिका यान्ति न च देवान्तराश्रयाः।<br>वैकुण्ठं नाम तत् स्थानं त्रिदशैरपि वन्दितम्॥ ६६॥वहाँ (श्वेतद्वीपके नारायणपुरमें) न अधार्मिक जा पाते हैं और न दूसरे देवका आश्रय ग्रहण करनेवाले। देवताओंसे भी वन्दित वह स्थान वैकुण्ठ नामसे प्रसिद्ध है। उसका सम्पूर्ण रूपसे वर्णन करनेमें मेरी बुद्धि समर्थ नहीं है। उस नारायणपुरका मैं इतना ही वर्णन कर सकता हूँ। परम ब्रह्म सनातन वासुदेव श्रीमान् नारायण अपनी मायाद्वारा संसारको मोहित करते हुए वहाँ शयन करते हैं। यह सब कुछ नारायणसे ही उत्पन्न है, उन्हींमें स्थित है और कल्पान्तमें उन्हींको प्राप्त होता है। वे ही परम गति हैं॥ ६६-६९॥
न मेऽत्र भवति प्रज्ञा कृत्स्नशस्तन्निरूपणे।<br>एतावच्छक्यते वक्तुं नारायणपुरं हि तत्॥ ६७॥
स एव परमं ब्रह्म वासुदेवः सनातनः।<br>शेते नारायणः श्रीमान् मायया मोहयञ्जगत्॥ ६८॥
नारायणादिदं जातं तस्मिन्नेव व्यवस्थितम्।<br>तमेवाभ्येति कल्पान्ते स एव परमा गतिः॥ ६९॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४७ ॥

इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें सैंतालीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ४७ ॥

  • अध्याय ४८ * २४५

अड़तालीसवाँ अध्याय

पुष्करद्वीपकी स्थिति तथा विस्तारका वर्णन, संक्षेपमें अव्यक्तसे सृष्टिका प्रतिपादन

सूत उवाच**सूतजी बोले—**शाकद्वीपके दुगुने विस्तारमें क्षीरसागरके आश्रित पुष्कर नामक द्वीप स्थित है। हे विप्रेन्द्रो ! यहाँ मानसोत्तर नामक एक ही पर्वत है। यह साढे पचास हजार योजन ऊँचा है और चारों ओर विस्तारमें इसका परिमण्डल अर्थात् घेरा भी उतने ही परिमाणका है। इस द्वीपके ही पश्चिमकी ओर आधे भागमें मानसोत्तर नामसे एक ही महापर्वत अपनी विशेष स्थितिके कारण दो भागोंमें बँटा है। इस द्वीपमें दो शुभ एवं पवित्र जनपद कहे गये हैं। वे दोनों मानस पर्वतके अनु-मण्डल हैं। (ये) महावीत तथा धातकी खण्ड नामक वर्ष कहे गये हैं। पुष्करद्वीप (स्वादूदक समुद्र) स्वादिष्ट जलवाले समुद्रसे चारों ओरसे घिरा है। उस द्वीपमें देवताओंद्धारा पूजित न्यग्रोध (वट)-का एक महान् वृक्ष है ॥ १-५॥
शाकद्वीपस्य विस्ताराद् द्विगुणेन व्यवस्थितः।<br>क्षीरार्णवं समाश्रित्य द्वीपः पुष्करसंवृतः॥ १ ॥<br>एक एवात्र विप्रेन्द्राः पर्वतो मानसोत्तरः।<br>योजनानां सहस्त्राणि सार्धं पञ्चाशदुच्छ्रितः।<br>तावदेव च विस्तीर्णः सर्वतः परिमण्डलः॥ २ ॥<br>स एव द्वीपः पश्चार्धे मानसोत्तरसंज्ञितः।<br>एक एव महासानुः संनिवेशाद् द्विधा कृतः॥ ३ ॥<br>तस्मिन् द्वीपे स्मृतौ द्वौ तु पुण्यौ जनपदौ शुभौ।<br>अपरौ मानसस्याथ पर्वतस्यानुमण्डलौ।<br>महावीतं स्मृतं वर्षं धातकीखण्डमेव च॥ ४ ॥<br>स्वादूदकेनोदधिना पुष्करः परिवारितः।<br>तस्मिन् द्वीपे महावृक्षो न्यग्रोधोऽमरपूजितः॥ ५ ॥
तस्मिन् निवसति ब्रह्मा विश्वात्मा विश्वभावनः।<br>तत्रैव मुनिशार्दूलाः शिवनारायणालयः॥ ६ ॥<br><br>वसत्यत्र महादेवो हरोऽर्धहरिरव्ययः।<br>सम्पूज्यमानो ब्रह्माद्यैः कुमाराद्यैश्च योगिभिः।<br>गन्धर्वैः किंनरैर्यक्षैरीश्वरः कृष्णपिङ्गलः॥ ७ ॥<br><br>स्वस्थास्तत्र प्रजाः सर्वा ब्रह्मणा सदृशत्विषः।<br>निरामया विशोकाश्च रागद्वेषविवर्जिताः॥ ८ ॥<br><br>सत्यानृते न तत्रास्तां नोत्तमाधममध्यमाः।<br>न वर्णाश्रमधर्माश्च न नद्यो न च पर्वताः॥ ९ ॥<br><br>परेण पुष्करस्याथ समावृत्य स्थितो महान्।<br>स्वादूदकसमुद्रस्तु समन्ताद् द्विजसत्तमाः॥ १० ॥उसी (द्वीप)-में विश्वभावन विश्वात्मा ब्रह्मा रहते हैं। मुनिश्रेष्ठो ! वहींपर शिवनारायणका मन्दिर है। यहाँ आधे भागमें हर (एवं आधेमें) अव्यय हरिके रूपमें (अर्थात् हरिहरात्मक रूपमें) महादेव निवास करते हैं। यहाँ ब्रह्मा आदि देवताओं, कुमार (सनत्कुमार) आदि योगियों, गन्धर्वों तथा किंनरों एवं यक्षोंद्वारा ईश्वर कृष्णपिङ्गल पूजित होते हैं। यहाँकी सारी प्रजा स्वस्थ है, ब्रह्माके समान प्रभावान् है और रोग, शोक, राग तथा द्वेषसे रहित है। वहाँ सत्य, असत्य, उत्तम, मध्यम, अधम (-का विभेद) नहीं है। न वर्णाश्रम धर्म है, न नदियाँ हैं और न पर्वत हैं। हे द्विजसत्तमो ! पुष्कर द्वीपके परे उसे चारों ओरसे घेरते हुए महान् स्वादूदक सागर स्थित है॥ ६-१०॥
परेण तस्य महती दृश्यते लोकसंस्थितिः।<br>काञ्चनी द्विगुणा भूमिः सर्वा चैव शिलोपमा॥ ११ ॥<br><br>तस्याः परेण शैलस्तु मर्यादात्मात्ममण्डलः।<br>प्रकाशश्चाप्रकाशश्च लोकालोकः स उच्यते॥ १२ ॥<br><br>योजनानां सहस्राणि दश तस्योच्छ्रयः स्मृतः।<br>तावानेव च विस्तारो लोकालोको महागिरिः॥ १३ ॥उसके अनन्तर महती लोकस्थिति दिखलायी पड़ती है। वहाँकी द्विगुणित समस्त भूमि स्वर्णमयी और शिलाके समान है। उसके आगे सूर्यमण्डलकी मर्यादास्वरूप एक मर्यादा पर्वत है। (इसका एक भाग) प्रकाशित (तथा दूसरा) अप्रकाशित रहता है। इसीलिये वह लोकालोक (पर्वत) कहलाता है, लोकालोक नामक इस महान् पर्वतकी ऊँचाई दस हजार योजन कही गयी है और उतना ही इसका विस्तार (फैलाव) भी है॥ ११-१३॥

२४६ * कूर्मपुराण *

समावृत्य तु तं शैलं सर्वतो वै तमः स्थितम्।<br>तमश्चाण्डकटाहेन समन्तात् परिवेष्टितम्॥ १४॥इस पर्वतको सभी ओरसे आवृतकर अन्धकार स्थित है और यह अन्धकार अण्डकटाह (चारों ओर विद्यमान ब्रह्माण्डरूपी कटाह)-के द्वारा चारों ओरसे परिवेष्टित है। यह अण्डकटाह ही सात महालोक और सात पातालके रूपमें प्रसिद्ध है। मैंने संक्षेपमें ब्रह्माण्डका यह विस्तार बतलाया। प्रधान, कारणरूप और अव्ययात्माके सर्वव्यापी होनेके कारण इस प्रकारके हजारों करोड़ ब्रह्माण्ड हैं, ऐसा समझना चाहिये॥ १४-१६॥
एते सप्त महालोकाः पातालाः सप्त कीर्तिताः।<br>ब्रह्माण्डस्यैष विस्तारः संक्षेपेण मयोदितः॥ १५॥
अण्डानामीदृशानां तु कोट्यो ज्ञेयाः सहस्रशः।<br>सर्वगत्वात् प्रधानस्य कारणस्याव्ययात्मनः॥ १६॥
अण्डेष्वेतेषु सर्वेषु भुवनानि चतुर्दश।<br>तत्र तत्र चतुर्वक्त्रा रुद्रा नारायणादयः॥ १७॥इन सभी ब्रह्माण्डोंमें चौदह भुवन होते हैं, इन सभीमें चतुर्मुख ब्रह्मा, रुद्र तथा नारायण आदि होते हैं। हे विप्रो! (ब्रह्माण्डके) चारों ओर सात आवरण हैं, वे परिमाणमें क्रमशः एक दूसरेसे दस गुना अधिक हैं। यहाँ मनीषी लोग जाते हैं। अनन्त, अद्वितीय, अव्यक्त, अनादिनिधन, महत् और जगत्‌के प्रकृतिस्वरूप अक्षर (ब्रह्म) इन सभी (आवरणों)-का अतिक्रमण-कर विद्यमान रहते हैं। इनकी कोई संख्या नहीं होती, इसीलिये इन्हें अनन्त कहा जाता है। इन्हें ही अव्यक्त समझना चाहिये। ये ही ब्रह्म परम पद (अन्तिम प्राप्तव्य) हैं॥ १७-२०॥
दशोत्तरमथैकैकमण्डावरणसप्तकम् ।<br>समन्तात् संस्थितं विप्रा यत्र यान्ति मनीषिणः॥ १८॥
अनन्तमेकमव्यक्तमनादिनिधनं महत्।<br>अतीत्य वर्तते सर्वं जगत् प्रकृतिरक्षरम्॥ १९॥
अनन्तत्वमनन्तस्य यतः संख्या न विद्यते।<br>तदव्यक्तमिति ज्ञेयं तद् ब्रह्म परमं पदम्॥ २०॥
अनन्त एष सर्वत्र सर्वस्थानेषु पठ्यते।<br>तस्य पूर्वं मयाप्युक्तं यत्तन्माहात्म्यमव्ययम्॥ २१॥ये अनन्त सर्वत्र सभी स्थानोंमें हैं, ऐसा कहा गया है। इनका जो अव्यय माहात्म्य है, मैंने भी पूर्वमें उसका वर्णन किया है। वही ये (परमात्मा) ही भूमि, रसातल, आकाश, वायु, अग्नि, सभी समुद्रों तथा स्वर्ग—सर्वत्र, सभी स्थानोंमें विद्यमान हैं, इसमें कोई संदेह नहीं। ये ही महाद्युतिमान् पुरुषोत्तम अन्धकार तथा (प्रकाशात्मा) सत्त्वमें विद्यमान होते हुए अपने अङ्गोंको अनेक रूपोंमें विभक्तकर क्रीडा करते हैं। महेश्वर अव्यक्तसे परे हैं। अण्ड अव्यक्तसे उत्पन्न होता है। अण्डसे ब्रह्मा उत्पन्न हैं और उन्होंने इस संसारकी सृष्टि की है॥ २१-२४॥
गतः स एष सर्वत्र सर्वस्थानेषु वर्तते।<br>भूमौ रसातले चैव आकाशे पवनेऽनले।<br>अर्णवेषु च सर्वेषु दिवि चैव न संशयः॥ २२॥
तथा तमसि सत्त्वे च एष एव महाद्युतिः।<br>अनेकधा विभक्ताङ्गः क्रीडते पुरुषोत्तमः॥ २३॥
महेश्वरः परोऽव्यक्तादण्डमव्यक्तसम्भवम्।<br>अण्डाद् ब्रह्मा समुत्पन्नस्तेन सृष्टमिदं जगत्॥ २४॥

इति श्रीकृष्णद्वैपायने कूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे अष्टचत्वारिंशोऽध्यायः॥ ४८॥

इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें अड़तालीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ४८॥

  • अध्याय ४९ * | २४७ ---|---

उनचासवाँ अध्याय

स्वारोचिषसे वैवस्वत मन्वन्तरतकके देवता, सप्तर्षि, इन्द्र आदिका वर्णन, नारायणद्वारा ही विभिन्न मन्वन्तरोंमें सृष्टि आदिका प्रतिपादन, भगवान् विष्णुकी चार मूर्तियोंका विवेचन, विष्णुका माहात्म्य

ऋषय ऊचुः | ऋषियोंने कहा—(सूतजी!) आप हमें बीते हुए तथा आनेवाले जो मन्वन्तर हैं, उन्हें (बतलाइये) और द्वापर युगके व्यासोंको भी बतलायें। सूतजी! वेदकी शाखाओंका प्रणयन कैसे हुआ, धर्म (-की स्थापना)-के लिये कलियुगमें हुए देवाधिदेव बुद्धिमान् ईशान (व्यास)-के कितने अवतार हुए और कलियुगोंमें देवाधिदेव (व्यास)-के कितने शिष्य हुए—यह सब भी आप संक्षेपमें बतलायें॥ १-३॥ अतीतानागतानीह यानि मन्वन्तराणि तु। | तानि त्वं कथयास्माकं व्यासांश्च द्वापरे युगे॥ १ ॥ | वेदशाखाप्रणयनं देवदेवस्य धीमतः। | तथावतारान् धर्मार्थमीशानस्य कलौ युगे॥ २ ॥ | कियन्तो देवदेवस्य शिष्याः कलियुगेषु वै। | एतत् सर्वं समासेन सूत वक्तुमिहार्हसि॥ ३ ॥ | सूत उवाच | सूतजी बोले—पहले स्वायम्भुव मनु थे। तदनन्तर स्वारोचिष मनु हुए। पुनः उत्तम, तामस, रैवत तथा चाक्षुष मनु हुए। ये छः बीते हुए मनु हैं। इस समय सूर्यके पुत्र वैवस्वतका यह सातवाँ मन्वन्तर प्रवृत्त है। कल्पके आदिमें होनेवाले स्वायम्भुव मन्वन्तरका वर्णन मैंने किया। इसके अनन्तर स्वारोचिष मनुका वर्णन सुनो॥ ४-६॥ मनुः स्वायम्भुवः पूर्वं ततः स्वारोचिषो मनुः। | उत्तमस्तामसश्चैव रैवतश्चाक्षुषस्तथा॥ ४ ॥ | षडेते मनवोऽतीता साम्प्रतं तु रवेः सुतः। | वैवस्वतोऽयं यस्यैतत् सप्तमं वर्ततेऽन्तरम्॥ ५ ॥ | स्वायम्भुवं तु कथितं कल्पादावन्तरं मया। | अत ऊर्ध्वं निबोधध्वं मनोः स्वारोचिषस्य तु॥ ६ ॥ | पारावताश्च तुषिता देवाः स्वारोचिषेऽन्तरे। | स्वारोचिष मन्वन्तरमें पारावत तथा तुषित नामके देवता और असुरोंका विनाश करनेवाले विपश्चित् नामके देवेन्द्र हुए। ऊर्ज, स्तम्भ, प्राण, दान्त, वृषभ, तिमिर और अर्वरीवान्—ये सात सप्तर्षि हुए॥ ७-८॥ विपश्चिन्नाम देवेन्द्रो बभूवासुरसूदनः॥ ७ ॥ | ऊर्जस्तम्भस्तथा प्राणो दान्तोऽथ वृषभस्तथा। | तिमिरश्चार्वरीवांश्च सप्त सप्तर्षयोऽभवन्॥ ८ ॥ | चैत्रकिंपुरुषाद्याश्च सुताः स्वारोचिषस्य तु। | स्वारोचिषके चैत्र और किंपुरुष आदि पुत्र थे। इस प्रकार दूसरे मन्वन्तरको मैंने बतलाया, अब इसके परवर्ती (मन्वन्तर)-का वर्णन सुनिये। हे विप्रो! तीसरे मन्वन्तरमें उत्तम नामके मनु और शत्रुनाशक सुशान्ति नामवाले देवेन्द्र हुए। सुधामा, सत्य, शिव, प्रतर्दन और वशवर्ती—बारह-बारह देवताओंवाले—ये पाँच गण कहे गये हैं। रज, ऊर्ध्व, ऊर्ध्वबाहु, सबल, अनय, सुतपा और शुक्र—ये सात सप्तर्षि हुए॥ ९-१२॥ द्वितीयमेतदाख्यातमन्तरं शृणु चोत्तरम्॥ ९ ॥ | तृतीयेऽप्यन्तरे विप्रा उत्तमो नाम वै मनुः। | सुशान्तिस्तत्र देवेन्द्रो बभूवामित्रकर्षणः॥ १०॥ | सुधामानस्तथा सत्याः शिवाश्चाथ प्रतर्दनाः। | वशवर्तिनश्च पञ्चैते गणा द्वादशकाः स्मृताः॥ ११॥ | रजोर्ध्वश्चोर्ध्वबाहुश्च सबलश्रानयस्तथा। | सुतपाः शुक्र इत्येते सप्त सप्तर्षयोऽभवन्॥ १२॥ | तामसस्यान्तरे देवाः सुरा वाहरयस्तथा। | तामस मन्वन्तरमें सुर, वाहरि, सत्य तथा सुधी—ये सत्ताईस-सत्ताईसकी संख्यावाले गणदेवता थे। इसी प्रकार सौ यज्ञोंको करनेवाले शिबि नामक इन्द्र थे। वे शंकरके भक्त और महादेवकी आराधनामें रत रहते थे॥ १३-१४॥ सत्याश्च सुधियश्चैव सप्तविंशतिका गणाः॥ १३॥ | शिबिरिन्द्रस्तथैवासीच्छतयज्ञोपलक्षणः । | बभूव शंकरे भक्तो महादेवार्चने रतः॥ १४॥ |

२४८ * कूर्मपुराण *


ज्योतिर्धर्मा पृथुः काव्यश्चैत्रोऽग्निर्वैनकस्तथा ।<br>पीवरस्त्वृषयो ह्येते सप्त तत्रापि चान्तरे ॥ १५ ॥<br>पञ्चमे चापि विप्रेन्द्रा रैवतो नाम नामतः ।<br>मनुर्वसुश्च तत्रेन्द्रो बभूवासुरमर्दनः ॥ १६ ॥<br>अमिताभा भूतरया वैकुण्ठाः स्वच्छमेधसः ।<br>एते देवगणास्तत्र चतुर्दश चतुर्दश ॥ १७ ॥<br>हिरण्यरोमा वेदश्रीरूर्ध्वबाहुस्तथैव च ।<br>वेदबाहुः सुधामा च पर्जन्यश्च महामुनिः ।<br>एते सप्तर्षयो विप्रास्तत्रासन् रैवतेऽन्तरे ॥ १८ ॥<br>स्वारोचिषश्चोत्तमश्च तामसो रैवतस्तथा ।<br>प्रियव्रतान्वया ह्येते चत्वारो मनवः स्मृताः ॥ १९ ॥उस मन्वन्तरमें भी ज्योतिर्धर्मा, पृथु, काव्य, चैत्र, अग्नि, वनक और पीवर नामक—ये सात ऋषि हुए। विप्रेन्द्रो! पाँचवें मन्वन्तरमें रैवत नामवाले मनु और असुरोंका मर्दन करनेवाले वसु नामवाले इन्द्र हुए। अमिताभ, भूतरय, वैकुण्ठ और स्वच्छमेधा—ये चौदह-चौदहकी संख्यावाले (चार) गणदेवता थे। हे विप्रो! रैवत मन्वन्तरमें हिरण्यरोमा, वेदश्री, ऊर्ध्वबाहु, वेदबाहु, सुधामा, पर्जन्य और महामुनि—ये सप्तर्षि हुए। स्वारोचिष, उत्तम, तामस तथा रैवत—ये चार मनु प्रियव्रतके वंशज कहे जाते हैं ॥ १५-१९ ॥
षष्ठे मन्वन्तरे चासीच्चाक्षुषस्तु मनुर्द्विजाः ।<br>मनोजवस्तथैवेन्द्रो देवानपि निबोधत ॥ २० ॥<br>आद्याः प्रसूता भाव्याश्च पृथुगाश्च दिवौकसः ।<br>महानुभावा लेख्याश्च पञ्चैते ह्यष्टका गणाः ॥ २१ ॥<br>सुमेधा विरजाश्चैव हविष्मानुत्तमो मधुः ।<br>अतिनामा सहिष्णुश्च समासन्नृषयः शुभाः ॥ २२ ॥हे द्विजो! छठे मन्वन्तरके मनु चाक्षुष हैं। इस मन्वन्तरके इन्द्रका नाम मनोजव है। (अब) देवताओंको सुनो—आद्य, प्रसूत, भाव्य, पृथुग और लेख्य—ये पाँच महानुभाव आठ-आठकी संख्यावाले देवताओंके गण हैं। सुमेधा, विरजा, हविष्मान्, उत्तम, मधु, अतिनाम और सहिष्णु—ये सात कल्याणकारी ऋषि हैं ॥ २०-२२ ॥
विवस्वतः सुतो विप्राः श्राद्धदेवो महाद्युतिः ।<br>मनुः स वर्तते धीमान् साम्प्रतं सप्तमेऽन्तरे ॥ २३ ॥विप्रो! विवस्वान्के पुत्र बुद्धिमान् एवं महान् तेजस्वी श्राद्धदेव इस समय सातवें मन्वन्तरके मनु हैं। आदित्य,
आदित्या वसवो रुद्रा देवास्तत्र मरुद्गणाः ।<br>पुरंदरस्तथैवेन्द्रो बभूव परवीरहा ॥ २४ ॥वसुगण, रुद्र तथा मरुद्गण इसमें देवता हैं। इसी प्रकार वीर शत्रुओंका नाश करनेवाले पुरन्दर नामवाले (इस मन्वन्तरके) इन्द्र हैं। वसिष्ठ, कश्यप, अत्रि, जमदग्नि, गौतम, विश्वामित्र
वसिष्ठः कश्यपश्चात्रिजमदग्निश्च गौतमः ।<br>विश्वामित्रो भरद्वाजः सप्त सप्तर्षयोऽभवन् ॥ २५ ॥तथा भरद्वाज—ये सात सप्तर्षि हैं। (इस मन्वन्तरमें)
विष्णुशक्तिरनौपम्या सत्त्वोद्रिक्ता स्थिता स्थितौ ।<br>तदंशभूता राजानः सर्वे च त्रिदिवौकसः ॥ २६ ॥विष्णुकी अनुपम सत्त्वगुणमयी शक्ति (सृष्टि)-की रक्षाके लिये स्थित है। सभी राजा और सभी देवगण इसी (विष्णुशक्ति)-के अंशसे उत्पन्न हैं। द्विजो! स्वायम्भुव
स्वायम्भुवेऽन्तरे पूर्वमाकृत्यां मानसः सुतः ।<br>रुचेः प्रजापतेर्यज्ञस्तदंशेनाभवद् द्विजाः ॥ २७ ॥मन्वन्तरमें सर्वप्रथम प्रजापति रुचिका आकूति (नामक पत्नी)-से यज्ञ नामक मानस पुत्र हुआ, यह विष्णुका अंश था। तदनन्तर पुनः वे ही देव (विष्णु) स्वारोचिष
ततः पुनरसौ देवः प्राप्ते स्वारोचिषेऽन्तरे ।<br>तुषितायां समुत्पन्नस्तुषितैः सह दैवतैः ॥ २८ ॥मन्वन्तरके आनेपर तुषितासे तुषित नामके देवताओंके साथ उत्पन्न हुए ॥ २३-२८ ॥
औत्तमेऽप्यन्तरे विष्णुः सत्यैः सह सुरोत्तमैः ।<br>सत्यायामभवत् सत्यः सत्यरूपो जनार्दनः ॥ २९ ॥औत्तम मन्वन्तरमें सत्यरूप जनार्दन विष्णु सत्य नामक श्रेष्ठ देवताओंके साथ सत्य नामधारी सत्यासे उत्पन्न हुए और तामस नामक मन्वन्तर आनेपर
तामसस्यान्तरे चैव सम्प्राप्ते पुनरेव हि ।<br>हर्यायां हरिभिर्देवैर्हरिरेवाभवद्धरिः ॥ ३० ॥साक्षात् ये हरि ही हरि नामक देवताओंके साथ हर्यासे हरि इस नामसे उत्पन्न हुए ॥ २९-३० ॥
* अध्याय ४९ *२४९
रैवतेऽप्यन्तरे चैव सम्भूत्यां मानसोऽभवत्।<br>सम्भूतौ मानसैः सार्धं देवैः सह महाद्युतिः॥ ३१ ॥<br><br>चाक्षुषेऽप्यन्तरे चैव वैकुण्ठः पुरुषोत्तमः।<br>विकुण्ठायामसो जज्ञे वैकुण्ठैर्देवैः सह॥ ३२॥<br><br>मन्वन्तरेऽत्र सम्प्राप्ते तथा वैवस्वतेऽन्तरे।<br>वामनः कश्यपाद् विष्णुरदित्यां सम्बभूव ह॥ ३३॥<br><br>त्रिभिः क्रमैरिमाँल्लोकाञ्जित्वा येन महात्मना।<br>पुरन्दराय त्रैलोक्यं दत्तं निहतकण्टकम्॥ ३४॥<br><br>इत्येतास्तनवस्तस्य सप्त मन्वन्तरेशु वै।<br>सप्त चैवाभवन् विप्रा याभिः संरक्षिताः प्रजाः॥ ३५ ॥<br><br>यस्माद् विष्टमिदं कृत्स्नं वामनेन महात्मना।<br>तस्मात् स वै स्मृतो विष्णुर्विशेर्धातोः प्रवेशनात्॥ ३६॥<br><br>एष सर्वं सृजत्यादौ पाति हन्ति च केशवः।<br>भूतान्तरात्मा भगवान् नारायण इति श्रुतिः॥ ३७॥<br><br>एकांशेन जगत् सर्वं व्याप्य नारायणः स्थितः।<br>चतुर्धा संस्थितो व्यापी सगुणो निर्गुणोऽपि च॥ ३८॥<br><br>एका भगवतो मूर्त्तिर्ज्ञानरूपा शिवामला।<br>वासुदेवाभिधाना सा गुणातीता सुनिष्कला॥ ३९॥<br><br>द्वितीया कालसंज्ञान्या तामसी शेषसंज्ञिता।<br>निहन्ति सकलं चान्ते वैष्णवी परमा तनुः॥ ४०॥<br><br>सत्त्वोद्रिक्ता तथैवान्या प्रद्युम्नेति च संज्ञिता।<br>जगत् स्थापयते सर्वं स विष्णुः प्रकृतिर्ध्रुवा॥ ४१॥<br><br>चतुर्थी वासुदेवस्य मूर्त्तिर्ब्राह्मीति संज्ञिता।<br>राजसी चानिरुद्धाख्या प्रद्युम्नः सृष्टिकारिका॥ ४२॥<br><br>यः स्वपित्यखिलं भूत्वा प्रद्युम्नेन सह प्रभुः।<br>नारायणाख्यो ब्रह्माऽसौ प्रजासर्गं करोति सः॥ ४३॥<br><br>या सा नारायणतनुः प्रद्युम्नाख्या मुनीश्वराः।<br>तया सम्मोहयेद् विश्वं सदेवासुरमानुषम्॥ ४४॥रैवत मन्वन्तरमें भी मानस नामक देवताओंके साथ महान् द्युतिमान् हरि सम्भूतिसे मानस नामसे उत्पन्न हुए। चाक्षुष मन्वन्तरमें भी वे पुरुषोत्तम वैकुण्ठ नामक देवताओंके साथ विकुण्ठासे वैकुण्ठ नामसे उत्पन्न हुए और वैवस्वत नामक मन्वन्तर आनेपर वे विष्णु कश्यप और अदितिसे वामन नामसे उत्पन्न हुए। इन्हीं महात्माने अपने तीन पगोंसे समस्त लोकोंको जीतकर पुरन्दर इन्द्रको निष्कण्टक त्रैलोक्य (-का राज्य) प्रदान किया॥ ३१-३४॥<br><br>हे विप्रो! सात मन्वन्तरोंमें ये ही सात उन (विष्णु)-के विग्रह हुए, जिनसे प्रजाओंकी रक्षा हुई। महात्मा वामनने इस सम्पूर्ण विश्वको व्याप्त किया था, इसीलिये 'विश्' धातुका प्रवेश अर्थ होनेके कारण वे (वामन) विष्णु कहलाये। ये केशव प्रारम्भमें समस्त प्रपञ्चकी सृष्टि करते हैं, उसकी रक्षा करते हैं और (अन्तमें) उसका संहार करते हैं। भगवान् नारायण सभी प्राणियोंकी अन्तरात्मा हैं—ऐसा वेदका कथन है॥ ३५-३७॥<br><br>ये नारायण अपने एक अंशसे सम्पूर्ण संसारको व्याप्तकर प्रतिष्ठित रहते हैं। ये निर्गुण होते हुए भी सगुण रूपसे चार भागोंमें विभक्त होकर सर्वत्र व्याप्त रहनेवाले हैं। (ये ही चार भाग भगवान् नारायणकी चार मूर्तियाँ हैं। इनमें) भगवान्की वासुदेव नामवाली पहली मूर्ति ज्ञानरूप, कल्याणकारिणी, निर्मल, गुणातीत और कलारहित है। दूसरी काल और शेष नामवाली वह तामसी मूर्ति विष्णुकी परम विग्रहरूपा मूर्ति है। यही अन्तमें सबका संहार करती है। इसी प्रकार सत्त्वगुणमयी प्रद्युम्न नामवाली अन्य (तीसरी) मूर्ति सम्पूर्ण जगत्की स्थापना (पालन) करती है, यही विष्णुकी ध्रुवा प्रकृति है। इन तीनों मूर्तियोंके अतिरिक्त वासुदेवकी ब्राह्मी तथा अनिरुद्ध नामवाली चौथी राजसी मूर्ति है, यह प्रद्युम्न नामक मूर्ति सृष्टि करनेवाली है॥ ३८-४२॥<br><br>जो प्रभु सम्पूर्ण (सृष्टि)-के रूपमें होकर प्रद्युम्नके साथ शयन करते हैं, नारायण नामवाले वे ही ब्रह्मा प्रजाकी सृष्टि करते हैं। मुनीश्वरो! वह जो प्रद्युम्न नामवाली नारायणकी मूर्ति है, उसके द्वारा वे (नारायण) देवता, असुर तथा मनुष्योंसे युक्त विश्वको मोहित करते हैं॥ ४३-४४॥

२. उत्तरविभाग (अध्याय १-११) — ईश्वरगीता (भगवान् शिवद्वारा आत्मज्ञानोपदेश)

<!-- Image plate or blank: Page 260 -->

Page 260

* अध्याय ५० *
२५१

| त्र्यारुणिवैं पञ्चदशे षोडशे तु धनञ्जयः।<br>कृतञ्जयः सप्तदशे ह्यष्टादशे ऋतञ्जयः॥ ६ ॥<br><br>ततो व्यासो भरद्वाजस्तस्मादूर्ध्वं तु गौतमः।<br>राजश्रवाश्चैकविंशस्तस्माच्छुष्मायणः परः॥ ७ ॥<br><br>तृणबिन्दुस्त्रयोविंशे वाल्मीकिस्तत्परः स्मृतः।<br>पञ्चविंशे तथा शक्तिः षड्विंशे तु पराशरः ॥ ८ ॥<br>सप्तविंशे तथा व्यासो जातूकर्णो महामुनिः।<br>अष्टाविंशे पुनः प्राप्ते ह्यस्मिन् वै द्वापरे द्विजाः।<br>पाराशर्यसुतो व्यासः कृष्णद्वैपायनोऽभवत्॥ ९ ॥<br>स एव सर्ववेदानां पुराणानां प्रदर्शकः।<br>पाराशर्यो महायोगी कृष्णद्वैपायनो हरिः॥ १० ॥<br>आराध्य देवमीशानं दृष्ट्वा साम्बं त्रिलोचनम्।<br>तत्प्रसादादसौ व्यासं वेदानामक shape/रोत् प्रभुः॥ ११॥<br>अथ शिष्यान् प्रजग्राह

२५२ * कूर्मपुराण *


सामवेदं सहस्रेण शाखानां प्रबिभेद सः।<br>अथर्वाणमथो वेदं बिभेद नवकेन तु॥ १९॥इसी प्रकार उन्होंने सामवेदको हजार शाखाओंमें विभक्त किया तथा अथर्ववेदको नौ भागों (शाखाओं)-में बाँटा॥ १९॥
भेदैरष्टादशैर्व्यासः पुराणं कृतवान् प्रभुः।<br>सोऽयमेकश्चतुष्पादो वेदः पूर्वं पुरातनात्॥ २०॥प्रभु व्यासने पुराणसंहिताके अठारह भेद किये। पूर्वकालमें सभी दोषोंको दूर करनेवाला पुरातन वही चतुष्पाद प्रणवरूप एक वेद ब्रह्मासे आविर्भूत हुआ।
ओङ्कारो ब्रह्मणो जातः सर्वदोषविशोधनः।<br>वेदवेद्यो हि भगवान् वासुदेवः सनातनः॥ २१॥सनातन भगवान् वासुदेव वेदोंद्वारा जानने योग्य हैं। वेदोंद्वारा उन्हीं परम (पुरुष)-का गान किया जाता है।
स गीयते परो वेदे यो वेदेनं स वेदवित्।<br>एतत् परतरं ब्रह्म ज्योतिरानन्दमुत्तमम्॥ २२॥जो इन्हें (परम पुरुषको) जानता है, वही वेदको जाननेवाला है। ये ही परात्पर ब्रह्म, ज्योतिरूप और श्रेष्ठ आनन्द हैं। वेदवाक्योंद्वारा प्रतिपादित तत्त्व वासुदेव ही
वेदवाक्योदितं तत्त्वं वासुदेवः परं पदम्।<br>वेदवेद्यमिमं वेत्ति वेदं वेदपरो मुनिः॥ २३॥परमपद हैं। वेदपरायण मुनि वेदोंद्वारा जानने योग्य इन्हीं (वासुदेवरूप) वेदको जानते हैं॥ २०—२३॥
अवेदं परमं वेत्ति वेदनिष्ठः सदेश्वरः।<br>स वेदवेद्यो भगवान् वेदमूर्तिमहेश्वरः।<br>स एव वेदो वेद्यश्च तमेवाश्रित्य मुच्यते॥ २४॥जो परम अवेद्यको जानते हैं तथा वेदनिष्ठ, सदेश्वर, वेदमूर्ति, महेश्वर हैं, वे भगवान् वेदोंद्वारा ज्ञात होने योग्य हैं। वे ही भगवान् वेद हैं, वे ही (वेदसे) जानने योग्य हैं और उन्हींका आश्रय ग्रहण करनेसे मुक्ति मिलती है।
इत्येदक्षरं वेद्यमोङ्कारं वेदमव्ययम्।<br>अवेद्यं च विजानाति पाराशर्यो महामुनिः॥ २५॥पराशरके पुत्र महामुनि वेदव्यास (ही) इस अविनाशी, जानने योग्य, प्रणवस्वरूप अव्यय वेद और अवेद्य अर्थात् ज्ञात न हो सकने योग्य (परमतत्त्व)-को भी जानते हैं॥ २४-२५॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे पञ्चाशोऽध्यायः॥ ५०॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें पचासवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ५०॥


  • अध्याय ५१ * २५३

इक्‍यावनवाँ अध्याय

कलियुगमें महादेवके अवतारों तथा उनके शिष्योंका वर्णन, भविष्यमें होनेवाले सात मन्वन्तरोंका नाम-परिगणन, कूर्मपुराणके पूर्वविभागका उपसंहार

सूत उवाच**सूतजी बोले—**सुव्रतो! द्वापरमें (होनेवाले) वेदव्यासके अवतारोंको कहा गया, अब (आपलोग) कलियुगमें होनेवाले महादेवके अवतारोंको सुनें—वैवस्वत मन्वन्तरके पहले कलियुगमें विप्रोंके हितार्थ अतितेजस्वी देवाधिदेव (शंकर) श्वेत नामसे पर्वतोंमें श्रेष्ठ हिमालयके रमणीय छगल नामक शिखरपर अवतरित हुए। उनके शिष्य शिखायुक्त और अमित प्रभाववाले हुए। श्वेत, श्वेतशिख, श्वेतास्य तथा श्वेतलोहित—ये चार वेदके पारंगत महात्मा ब्राह्मण (प्रथम कलियुगमें) थे॥ १–४॥
वेदव्यासावताराणि द्वापरे कथितानि तु।<br>महादेवावताराणि कलौ शृणुत सुव्रताः॥ १ ॥<br>आद्ये कलियुगे श्वेतो देवदेवो महाद्युतिः।<br>नाम्ना हिताय विप्राणामभूद् वैवस्वतेऽन्तरे॥ २ ॥<br>हिमवच्छिखरे रम्ये छगले पर्वतोत्तमे।<br>तस्य शिष्याः शिखायुक्ता बभूवुरमितप्रभाः॥ ३ ॥<br>श्वेतः श्वेतशिखश्चैव श्वेतास्यः श्वेतलोहितः।<br>चत्वारस्ते महात्मानो ब्राह्मणा वेदपारगाः॥ ४ ॥
सुभानो दमनश्चाथ सुहोत्रः कङ्कणस्तथा।<br>लोकाक्षिरथ योगीन्द्रो जैगीषव्यस्तु सप्तमे॥ ५ ॥सुभान, दमन, सुहोत्र, कङ्कण और योगीन्द्र लोकाक्षिके रूपमें क्रमशः दूसरेसे छठे कलियुगतक महादेवका अवतार हुआ तथा सातवें (कलियुग)-में जैगीषव्य नामसे महादेवका अवतार हुआ। आठवेंमें दधिवाह, नवेंमें प्रभु वृषभ, दसवेंमें भृगु और उसके आगे (ग्यारहवें कलियुगमें) उग्रके रूपमें महादेवका अवतार हुआ। बारहवेंमें अत्रि, तेरहवेंमें बली, चौदहवेंमें गौतम और उसके बाद (पंद्रहवें कलियुगमें) वेदशीर्षके रूपमें महादेव अवतरित हुए॥ ५–७॥
अष्टमे दधिवाहः स्यान्नवमे वृषभः प्रभुः।<br>भृगुस्तु दशमे प्रोक्तस्तस्मादुग्रः परः स्मृतः॥ ६ ॥
द्वादशेऽत्रिः समाख्यातो बली चाथ त्रयोदशे।<br>चतुर्दशे गौतमस्तु वेदशीर्षा ततः परम्॥ ७ ॥
गोकर्णश्चाभवत् तस्माद् गुहावासः शिखण्ड्यथ।<br>जटामाल्यट्टहासश्च दारुको लाङ्गली क्रमात्॥ ८ ॥<br>श्वेतस्तथा परः शूली डिण्डी मुण्डी च वै क्रमात्।<br>सहिष्णुः सोमशर्मा च नकुलीशोऽन्तिमे प्रभुः॥ ९ ॥तदनन्तर क्रमशः गोकर्ण, गुहावास, शिखण्डी, जटामाली, अट्टहास, दारुक, लाङ्गली और इनके बाद श्वेत, शूली, डिण्डी, मुण्डी, सहिष्णु, सोमशर्मा तथा अन्तिम प्रभु नकुलीशके रूपमें महादेवका अवतार हुआ॥ ८–९॥
वैवस्वतेऽन्तरे शम्भोरवतारास्त्रिशूलिनः।<br>अष्टाविंशतिराख्याता ह्यन्ते कलियुगे प्रभोः।<br>तीर्थे कायावतारे स्याद् देवेशो नकुलीश्वरः॥ १० ॥वैवस्वत मन्वन्तरमें त्रिशूल धारण करनेवाले प्रभु शम्भुके अट्ठाईस अवतार कहे गये हैं। अन्तिम कलियुगेमें कायावतार नामक तीर्थमें देवेश्वर नकुलीश्वरके रूपमें महादेवका अवतार होगा। मुनिपुंगवो! उस समय देवोंके आदिदेव (महादेव)-के तीव्र तपस्याके धनी चार शिष्य हुए। अन्य अवतारोंमें भी प्रत्येकके (चार) शिष्य हुए। वे सभी प्रसन्न मनवाले, इन्द्रियनिग्रही और ईश्वरकी भक्ति करनेवाले थे। उन श्रेष्ठ योग जाननेवाले योगियोंका मैं क्रमशः वर्णन करता हूँ—॥ १०–१२॥
तत्र देवादिदेवस्य चत्वारः सुतपोधनाः।<br>शिष्या बभूवुश्चान्येषां प्रत्येकं मुनिपुंगवाः॥ ११ ॥
प्रसन्नमनसो दान्ता ऐश्वरीं भक्तिमाश्रिताः।<br>क्रमेण तान् प्रवक्ष्यामि योगिनो योगवित्तमान्॥ १२ ॥

२५४ * कूर्मपुराण *

श्वेतः श्वेतशिखश्चैव श्वेतास्यः श्वेतलोहितः ।<br>दुन्दुभिः शतरूपश्च ऋचीकः केतुमांस्तथा ।<br>विकेशश्च विशोकश्च विशापः शापनाशनः ॥ १३ ॥<br><br>सुमुखो दुर्मुखश्चैव दुर्दम दुर्तिक्रमः ।<br>सनः सनातनश्चैव कुमारश्च सनन्दनः ॥ १४ ॥<br>दालभ्यश्च महायोगी धर्मात्मानो महौजसः ।<br>सुधामा विरजाश्चैव शङ्खपात्रज एव च ॥ १५ ॥श्वेत, श्वेतशिख, श्वेतास्य, श्वेतलोहित, दुन्दुभि, शतरूप, ऋचीक, केतुमान्, विकेश, विशोक, विशाप, शापनाशन, सुमुख, दुर्मुख, दुर्दम, दुरतिक्रम, सनक, सनातन, सनत्कुमार, सनन्दन, महायोगी दालभ्य, सुधामा, विरजा और शङ्खपात्रज—ये धर्मात्मा और महान् ओजस्वी थे ॥ १३—१५ ॥
सारस्वतस्तथा मेघो घनवाहः सुवाहनः ।<br>कपिलश्चासुरिश्चैव वोढुः पञ्चशिखो मुनिः ॥ १६ ॥<br>पराशरश्च गर्गश्च भार्गवश्चाङ्गिरास्तथा ।<br>बलबन्धुर्निरामित्रः केतुशृङ्गतपोधनः ॥ १७ ॥<br>लम्बोदरश्च लम्बश्च लम्बाक्षो लम्बकेशकः ।<br>सर्वज्ञः समबुद्धिश्च साध्यः सत्यस्तथैव च ॥ १८ ॥<br>सुधामा काश्यपश्चैव वसिष्ठो विरजास्तथा ।<br>अत्रिरुग्रस्तथा चैव श्रवणोऽथ श्रविष्ठकः ॥ १९ ॥<br>कुणिश्च कुणिबाहुश्च कुशरीरः कुनेत्रकः ।<br>कश्यपो ह्युशना चैव च्यवनोऽथ बृहस्पतिः ॥ २० ॥<br>उतथ्यो वामदेवश्च महाकायो महानिलः ।<br>वाचश्रवाः सुपीकश्च श्यावाश्वः सपथीश्वरः ॥ २१ ॥(ऐसे ही) सारस्वत, मेघ, घनवाह, सुवाहन, कपिल, आसुरि, वोढु, मुनि, पञ्चशिख, पराशर, गर्ग, भार्गव, अङ्गिरा, बलबन्धु, निरामित्र, तपोधन, केतुशृंग, लम्बोदर, लम्ब, लम्बाक्ष, लम्बकेशक, सर्वज्ञ, समबुद्धि, साध्य, सत्य, सुधामा, काश्यप, वसिष्ठ, विरजा, अत्रि, उग्र, श्रवण, श्रविष्ठक, कुणि, कुणिबाहु, कुशरीर, कुनेत्रक, कश्यप, उशना, च्यवन, बृहस्पति, उतथ्य, वामदेव, महाकाय, महानिल, वाचश्रवा, सुपीक, श्यावाश्व और सपथीश्वर (नामक शिष्य महादेवके अवतारोंके थे) ॥ १६—२१ ॥
हिरण्यनाभः कौशल्यो लोकाक्षिः कुथुमिस्तथा ।<br>सुमन्तुर्वर्चरी विद्वान् कबन्धः कुशिकन्धरः ॥ २२ ॥<br>प्लक्षो दार्भायणिश्चैव केतुमान् गौतमस्तथा ।<br>भल्लापी मधुपिङ्गश्च श्वेतकेतुस्तपोनिधिः ॥ २३ ॥<br>उशिजो बृहदुक्थश्च देवलः कपिरेव च ।<br>शालिहोत्रोऽग्निवेश्यश्च युवनाश्वः शरद्वसुः ॥ २४ ॥<br>छगलः कुण्डकर्णश्च कुम्भश्चैव प्रवाहकः ।<br>उलूको विद्युतश्चैव शाद्वलो ह्याश्वलायनः ॥ २५ ॥<br>अक्षपादः कुमारश्च उलूको वत्स एव च ।<br>कुशिकश्चैव गर्गश्च मित्रको ऋष्य एव च ॥ २६ ॥(इनके अतिरिक्त) हिरण्यनाभ, कौशल्य, लोकाक्षि, कुथुमि, सुमन्तु, वर्चरी, विद्वान् कबन्ध, कुशिकन्धर, प्लक्ष, दार्भायणि, केतुमान्, गौतम, भल्लापी, मधुपिङ्ग, तपोनिधि श्वेतकेतु, उशिज, बृहदुक्थ, देवल, कपि, शालिहोत्र, अग्निवेश्य, युवनाश्व, शरद्वसु, छगल, कुण्डकर्ण, कुम्भ, प्रवाहक, उलूक, विद्युत, शाद्वल, आश्वलायन, अक्षपाद, कुमार, उलूक, वत्स, कुशिक, गर्ग, मित्रक और ऋष्य (नामक शिष्य थे) ॥ २२—२६ ॥
शिष्या एते महात्मानः सर्वावर्तेषु योगिनाम् ।<br>विमला ब्रह्मभूयिष्ठा ज्ञानयोगपरायणाः ॥ २७ ॥<br><br>कुर्वन्ति चावताराणि ब्राह्मणानां हिताय हि ।<br>योगेश्वराणामादेशाद् वेदसंस्थापनाय वै ॥ २८ ॥योगियोंके* समस्त अवतारोंकी आवृत्तिमें ये ही महात्मा शिष्य होते हैं। ये सभी शुद्ध, ब्रह्मभूयिष्ठ और ज्ञान-योगपरायण हैं। ब्राह्मणोंके कल्याणके लिये तथा वेदोंकी स्थापनाके लिये योगेश्वर(परब्रह्म)-के आदेशसे (ये महात्मा) अवतार धारण करते हैं ॥ २७-२८ ॥

* योगी-महादेव-विष्णु आदि। ये लोग परम योगी हैं।

  • अध्याय ५१ * २५५

ये ब्राह्मणाः संस्मरन्ति नमस्यन्ति च सर्वदा।<br>तर्पयन्त्यर्चयन्त्येतान् ब्रह्मविद्यामवाप्नुयुः॥ २९॥<br><br>इदं वैवस्वतं प्रोक्तमन्तरं विस्तरेण तु।<br>भविष्यति च सावर्णो दक्षसावर्ण एव च॥ ३०॥<br><br>दशमो ब्रह्मसावर्णो धर्मसावर्ण एव च।<br>द्वादशो रुद्रसावर्णो रोचमानस्त्रयोदशः।<br>भौत्यश्चतुर्दशः प्रोक्तो भविष्या मनवः क्रमात्॥ ३१॥जो ब्राह्मण सर्वदा इनका स्मरण करते हैं, इन्हें नमस्कार करते हैं, इनका तर्पण करते हैं और इनकी पूजा करते हैं, वे ब्रह्मविद्याको प्राप्त कर लेते हैं। वैवस्वत मन्वन्तरका विस्तारसे वर्णन किया। सावर्ण (आठवाँ) तथा (नवाँ) दक्षसावर्ण मन्वन्तर भविष्यमें होंगे। दसवाँ ब्रह्मसावर्ण, ग्यारहवाँ धर्मसावर्ण, बारहवाँ रुद्रसावर्ण तथा तेरहवाँ रोचमान मन्वन्तर है। चौदहवाँ भौत्य मन्वन्तर कहा गया है। ये मनु क्रमसे भविष्यमें होंगे॥ २९—३१॥
अयं वः कथितो ह्यंशः पूर्वो नारायणेरितः।<br>भूतभव्यैर्वर्तमानैराख्यानैरुपबृंहितः ॥ ३२॥<br><br>यः पठेच्छृणुयाद् वापि श्रावयेद् वा द्विजोत्तमान्।<br>स सर्वपापनिर्मुक्तो ब्रह्मणा सह मोदते॥ ३३॥<br><br>पठेद् देवालये स्नात्वा नदीतीरेषु चैव हि।<br>नारायणं नमस्कृत्य भावेन पुरुषोत्तमम्॥ ३४॥<br><br>नमो देवादिदेवाय देवानां परमात्मने।<br>पुरुषाय पुराणाय विष्णवे कूर्मरूपिणे॥ ३५॥मैंने नारायणद्वारा कहे गये भूत, भविष्य तथा वर्तमानके आख्यानोंसे उपबृंहित इस पूर्वभागको आप लोगोंसे कहा। जो (ब्राह्मण) इसे पढ़ेगा, सुनेगा अथवा श्रेष्ठ द्विजोंको* सुनायेगा, वह सभी पापोंसे मुक्त होकर ब्रह्माके साथ आनन्द प्राप्त करेगा। स्नान करनेके अनन्तर नदियोंके किनारोंपर अथवा देवमन्दिरमें भक्तिभावसे पुरुषोत्तम नारायणको नमस्कार कर इसका पाठ करना चाहिये। देवोंके आदिदेव, देवोंके परमात्मा, पुराण पुरुष कूर्मरूपी विष्णुको नमस्कार है॥ ३२—३५॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षत्साहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे एकपञ्चाशोऽध्यायः॥ ५१॥

॥ पूर्वविभागः समाप्तः ॥

इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें इक्यावनवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ५१॥

॥ पूर्वविभाग समाप्त ॥


* द्विजोंको आगे करके पुराण-श्रवण करानेकी विधि है। पुराण-श्रवणका अधिकार अन्य वर्णोंको भी है। द्विज मुख्यरूपसे सात्त्विक वृत्तिके होते हैं तथा प्राणिमात्रका कल्याण ही इनका लक्ष्य होता है, इसीलिये इसकी प्रमुखता है।