संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| २४४ | * कूर्मपुराण * |
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| स्तनभारविनम्रैश्च मदघूर्णितलोचनैः।<br>नानावर्णविचित्राङ्गैर्नानाभोगरतिप्रियैः ॥ ५९॥ | विभूषित, स्तनके भारसे कुछ झुके हुए, मदके कारण चञ्चल नेत्रोंवाले, अनेक वर्णोंके अङ्गरागसे सुशोभित अङ्गोंवाले, नाना प्रकारके भोग और रतिमें अनुराग रखनेवालों और जहाँ-तहाँ नृत्य करते हुए अप्सरा-समूहोंसे सुशोभित हैं॥ ५४-५९॥ |
| प्रफुल्लकुसुमोद्यानैरितश्चेतश्च शोभितम्।<br>असंख्येयगुणं शुद्धमगम्यं त्रिदशैरपि॥ ६०॥ | प्रफुल्लित फूलोंवाले इधर-उधर विद्यमान सुन्दर उद्यानोंसे सुशोभित असंख्य गुणोंवाला वह पवित्र पुर देवताओंके लिये भी अगम्य है। अमित तेजस्वी लक्ष्मीपति (विष्णु) देवका वह पुर श्रीसे सम्पन्न और पवित्र है। उसके मध्यमें अत्यन्त तेजसे सम्पन्न, ऊँचे प्राकार तथा तोरणोंसे युक्त और योगियोंके लिये भी दुर्लभ विष्णुका दिव्य स्थान है। उसके मध्यमें कमलदलके समान द्युतिवाले, सम्पूर्ण जगत्के उत्पादक, भगवान् हरि शेषनागकी शय्यापर शयन करते हैं॥ ६०-६२॥ |
| श्रीमत्पवित्रं देवस्य श्रीपतेरमितौजसः।<br>तस्य मध्येऽतितेजस्कमुच्चप्राकारतोरणम्॥ ६१॥ | |
| स्थानं तद् वैष्णवं दिव्यं योगिनामपि दुर्लभम्।<br>तन्मध्ये भगवान्नेकः पुण्डरीकदलद्युतिः।<br>शेतेऽशेषजगत्सूतिः शेषाहिशयने हरिः॥ ६२॥ | |
| विचिन्त्यमानो योगीन्द्रैः सनन्दनपुरोगमैः।<br>स्वात्मानन्दामृतं पीत्वा परं तत् तमसः परम्॥ ६३॥ | स्वात्मानन्दरूपी अमृतका पान करते हुए सनन्दन आदि योगीन्द्रोंद्वारा तमोगुणसे अतीत श्रेष्ठ उन (श्रीहरि)-का चिन्तन किया जाता है। क्षीरसागरकी कन्या लक्ष्मी सुन्दर पीताम्बर धारण करनेवाले, अनन्त, महामायाके अधिपति तथा महान् भुजाओंवाले विष्णुके दोनों चरण नित्य पकड़े रहती हैं। जगत्की वन्दनीया हरिप्रिया वे देवी नारायणामृतका पानकर उन्हींमें मन लगाकर उनके चरणमूलमें नित्य विराजमान रहती हैं॥ ६३-६५॥ |
| सुपीतवसनोऽनन्तो महामायो महाभुजः।<br>क्षीरोदकन्यया नित्यं गृहीतचरणद्वयः॥ ६४॥ | |
| सा च देवी जगद्वन्द्या पादमूले हरिप्रिया।<br>समास्ते तन्मना नित्यं पीत्वा नारायणामृतम्॥ ६५॥ | |
| न तत्राधार्मिका यान्ति न च देवान्तराश्रयाः।<br>वैकुण्ठं नाम तत् स्थानं त्रिदशैरपि वन्दितम्॥ ६६॥ | वहाँ (श्वेतद्वीपके नारायणपुरमें) न अधार्मिक जा पाते हैं और न दूसरे देवका आश्रय ग्रहण करनेवाले। देवताओंसे भी वन्दित वह स्थान वैकुण्ठ नामसे प्रसिद्ध है। उसका सम्पूर्ण रूपसे वर्णन करनेमें मेरी बुद्धि समर्थ नहीं है। उस नारायणपुरका मैं इतना ही वर्णन कर सकता हूँ। परम ब्रह्म सनातन वासुदेव श्रीमान् नारायण अपनी मायाद्वारा संसारको मोहित करते हुए वहाँ शयन करते हैं। यह सब कुछ नारायणसे ही उत्पन्न है, उन्हींमें स्थित है और कल्पान्तमें उन्हींको प्राप्त होता है। वे ही परम गति हैं॥ ६६-६९॥ |
| न मेऽत्र भवति प्रज्ञा कृत्स्नशस्तन्निरूपणे।<br>एतावच्छक्यते वक्तुं नारायणपुरं हि तत्॥ ६७॥ | |
| स एव परमं ब्रह्म वासुदेवः सनातनः।<br>शेते नारायणः श्रीमान् मायया मोहयञ्जगत्॥ ६८॥ | |
| नारायणादिदं जातं तस्मिन्नेव व्यवस्थितम्।<br>तमेवाभ्येति कल्पान्ते स एव परमा गतिः॥ ६९॥ |
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४७ ॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें सैंतालीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ४७ ॥