भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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  • अध्याय ४८ * २४५

अड़तालीसवाँ अध्याय

पुष्करद्वीपकी स्थिति तथा विस्तारका वर्णन, संक्षेपमें अव्यक्तसे सृष्टिका प्रतिपादन

सूत उवाच**सूतजी बोले—**शाकद्वीपके दुगुने विस्तारमें क्षीरसागरके आश्रित पुष्कर नामक द्वीप स्थित है। हे विप्रेन्द्रो ! यहाँ मानसोत्तर नामक एक ही पर्वत है। यह साढे पचास हजार योजन ऊँचा है और चारों ओर विस्तारमें इसका परिमण्डल अर्थात् घेरा भी उतने ही परिमाणका है। इस द्वीपके ही पश्चिमकी ओर आधे भागमें मानसोत्तर नामसे एक ही महापर्वत अपनी विशेष स्थितिके कारण दो भागोंमें बँटा है। इस द्वीपमें दो शुभ एवं पवित्र जनपद कहे गये हैं। वे दोनों मानस पर्वतके अनु-मण्डल हैं। (ये) महावीत तथा धातकी खण्ड नामक वर्ष कहे गये हैं। पुष्करद्वीप (स्वादूदक समुद्र) स्वादिष्ट जलवाले समुद्रसे चारों ओरसे घिरा है। उस द्वीपमें देवताओंद्धारा पूजित न्यग्रोध (वट)-का एक महान् वृक्ष है ॥ १-५॥
शाकद्वीपस्य विस्ताराद् द्विगुणेन व्यवस्थितः।<br>क्षीरार्णवं समाश्रित्य द्वीपः पुष्करसंवृतः॥ १ ॥<br>एक एवात्र विप्रेन्द्राः पर्वतो मानसोत्तरः।<br>योजनानां सहस्त्राणि सार्धं पञ्चाशदुच्छ्रितः।<br>तावदेव च विस्तीर्णः सर्वतः परिमण्डलः॥ २ ॥<br>स एव द्वीपः पश्चार्धे मानसोत्तरसंज्ञितः।<br>एक एव महासानुः संनिवेशाद् द्विधा कृतः॥ ३ ॥<br>तस्मिन् द्वीपे स्मृतौ द्वौ तु पुण्यौ जनपदौ शुभौ।<br>अपरौ मानसस्याथ पर्वतस्यानुमण्डलौ।<br>महावीतं स्मृतं वर्षं धातकीखण्डमेव च॥ ४ ॥<br>स्वादूदकेनोदधिना पुष्करः परिवारितः।<br>तस्मिन् द्वीपे महावृक्षो न्यग्रोधोऽमरपूजितः॥ ५ ॥
तस्मिन् निवसति ब्रह्मा विश्वात्मा विश्वभावनः।<br>तत्रैव मुनिशार्दूलाः शिवनारायणालयः॥ ६ ॥<br><br>वसत्यत्र महादेवो हरोऽर्धहरिरव्ययः।<br>सम्पूज्यमानो ब्रह्माद्यैः कुमाराद्यैश्च योगिभिः।<br>गन्धर्वैः किंनरैर्यक्षैरीश्वरः कृष्णपिङ्गलः॥ ७ ॥<br><br>स्वस्थास्तत्र प्रजाः सर्वा ब्रह्मणा सदृशत्विषः।<br>निरामया विशोकाश्च रागद्वेषविवर्जिताः॥ ८ ॥<br><br>सत्यानृते न तत्रास्तां नोत्तमाधममध्यमाः।<br>न वर्णाश्रमधर्माश्च न नद्यो न च पर्वताः॥ ९ ॥<br><br>परेण पुष्करस्याथ समावृत्य स्थितो महान्।<br>स्वादूदकसमुद्रस्तु समन्ताद् द्विजसत्तमाः॥ १० ॥उसी (द्वीप)-में विश्वभावन विश्वात्मा ब्रह्मा रहते हैं। मुनिश्रेष्ठो ! वहींपर शिवनारायणका मन्दिर है। यहाँ आधे भागमें हर (एवं आधेमें) अव्यय हरिके रूपमें (अर्थात् हरिहरात्मक रूपमें) महादेव निवास करते हैं। यहाँ ब्रह्मा आदि देवताओं, कुमार (सनत्कुमार) आदि योगियों, गन्धर्वों तथा किंनरों एवं यक्षोंद्वारा ईश्वर कृष्णपिङ्गल पूजित होते हैं। यहाँकी सारी प्रजा स्वस्थ है, ब्रह्माके समान प्रभावान् है और रोग, शोक, राग तथा द्वेषसे रहित है। वहाँ सत्य, असत्य, उत्तम, मध्यम, अधम (-का विभेद) नहीं है। न वर्णाश्रम धर्म है, न नदियाँ हैं और न पर्वत हैं। हे द्विजसत्तमो ! पुष्कर द्वीपके परे उसे चारों ओरसे घेरते हुए महान् स्वादूदक सागर स्थित है॥ ६-१०॥
परेण तस्य महती दृश्यते लोकसंस्थितिः।<br>काञ्चनी द्विगुणा भूमिः सर्वा चैव शिलोपमा॥ ११ ॥<br><br>तस्याः परेण शैलस्तु मर्यादात्मात्ममण्डलः।<br>प्रकाशश्चाप्रकाशश्च लोकालोकः स उच्यते॥ १२ ॥<br><br>योजनानां सहस्राणि दश तस्योच्छ्रयः स्मृतः।<br>तावानेव च विस्तारो लोकालोको महागिरिः॥ १३ ॥उसके अनन्तर महती लोकस्थिति दिखलायी पड़ती है। वहाँकी द्विगुणित समस्त भूमि स्वर्णमयी और शिलाके समान है। उसके आगे सूर्यमण्डलकी मर्यादास्वरूप एक मर्यादा पर्वत है। (इसका एक भाग) प्रकाशित (तथा दूसरा) अप्रकाशित रहता है। इसीलिये वह लोकालोक (पर्वत) कहलाता है, लोकालोक नामक इस महान् पर्वतकी ऊँचाई दस हजार योजन कही गयी है और उतना ही इसका विस्तार (फैलाव) भी है॥ ११-१३॥