संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
- अध्याय ४८ * २४५
अड़तालीसवाँ अध्याय
पुष्करद्वीपकी स्थिति तथा विस्तारका वर्णन, संक्षेपमें अव्यक्तसे सृष्टिका प्रतिपादन
| सूत उवाच | **सूतजी बोले—**शाकद्वीपके दुगुने विस्तारमें क्षीरसागरके आश्रित पुष्कर नामक द्वीप स्थित है। हे विप्रेन्द्रो ! यहाँ मानसोत्तर नामक एक ही पर्वत है। यह साढे पचास हजार योजन ऊँचा है और चारों ओर विस्तारमें इसका परिमण्डल अर्थात् घेरा भी उतने ही परिमाणका है। इस द्वीपके ही पश्चिमकी ओर आधे भागमें मानसोत्तर नामसे एक ही महापर्वत अपनी विशेष स्थितिके कारण दो भागोंमें बँटा है। इस द्वीपमें दो शुभ एवं पवित्र जनपद कहे गये हैं। वे दोनों मानस पर्वतके अनु-मण्डल हैं। (ये) महावीत तथा धातकी खण्ड नामक वर्ष कहे गये हैं। पुष्करद्वीप (स्वादूदक समुद्र) स्वादिष्ट जलवाले समुद्रसे चारों ओरसे घिरा है। उस द्वीपमें देवताओंद्धारा पूजित न्यग्रोध (वट)-का एक महान् वृक्ष है ॥ १-५॥ |
|---|---|
| शाकद्वीपस्य विस्ताराद् द्विगुणेन व्यवस्थितः।<br>क्षीरार्णवं समाश्रित्य द्वीपः पुष्करसंवृतः॥ १ ॥<br>एक एवात्र विप्रेन्द्राः पर्वतो मानसोत्तरः।<br>योजनानां सहस्त्राणि सार्धं पञ्चाशदुच्छ्रितः।<br>तावदेव च विस्तीर्णः सर्वतः परिमण्डलः॥ २ ॥<br>स एव द्वीपः पश्चार्धे मानसोत्तरसंज्ञितः।<br>एक एव महासानुः संनिवेशाद् द्विधा कृतः॥ ३ ॥<br>तस्मिन् द्वीपे स्मृतौ द्वौ तु पुण्यौ जनपदौ शुभौ।<br>अपरौ मानसस्याथ पर्वतस्यानुमण्डलौ।<br>महावीतं स्मृतं वर्षं धातकीखण्डमेव च॥ ४ ॥<br>स्वादूदकेनोदधिना पुष्करः परिवारितः।<br>तस्मिन् द्वीपे महावृक्षो न्यग्रोधोऽमरपूजितः॥ ५ ॥ | |
| तस्मिन् निवसति ब्रह्मा विश्वात्मा विश्वभावनः।<br>तत्रैव मुनिशार्दूलाः शिवनारायणालयः॥ ६ ॥<br><br>वसत्यत्र महादेवो हरोऽर्धहरिरव्ययः।<br>सम्पूज्यमानो ब्रह्माद्यैः कुमाराद्यैश्च योगिभिः।<br>गन्धर्वैः किंनरैर्यक्षैरीश्वरः कृष्णपिङ्गलः॥ ७ ॥<br><br>स्वस्थास्तत्र प्रजाः सर्वा ब्रह्मणा सदृशत्विषः।<br>निरामया विशोकाश्च रागद्वेषविवर्जिताः॥ ८ ॥<br><br>सत्यानृते न तत्रास्तां नोत्तमाधममध्यमाः।<br>न वर्णाश्रमधर्माश्च न नद्यो न च पर्वताः॥ ९ ॥<br><br>परेण पुष्करस्याथ समावृत्य स्थितो महान्।<br>स्वादूदकसमुद्रस्तु समन्ताद् द्विजसत्तमाः॥ १० ॥ | उसी (द्वीप)-में विश्वभावन विश्वात्मा ब्रह्मा रहते हैं। मुनिश्रेष्ठो ! वहींपर शिवनारायणका मन्दिर है। यहाँ आधे भागमें हर (एवं आधेमें) अव्यय हरिके रूपमें (अर्थात् हरिहरात्मक रूपमें) महादेव निवास करते हैं। यहाँ ब्रह्मा आदि देवताओं, कुमार (सनत्कुमार) आदि योगियों, गन्धर्वों तथा किंनरों एवं यक्षोंद्वारा ईश्वर कृष्णपिङ्गल पूजित होते हैं। यहाँकी सारी प्रजा स्वस्थ है, ब्रह्माके समान प्रभावान् है और रोग, शोक, राग तथा द्वेषसे रहित है। वहाँ सत्य, असत्य, उत्तम, मध्यम, अधम (-का विभेद) नहीं है। न वर्णाश्रम धर्म है, न नदियाँ हैं और न पर्वत हैं। हे द्विजसत्तमो ! पुष्कर द्वीपके परे उसे चारों ओरसे घेरते हुए महान् स्वादूदक सागर स्थित है॥ ६-१०॥ |
| परेण तस्य महती दृश्यते लोकसंस्थितिः।<br>काञ्चनी द्विगुणा भूमिः सर्वा चैव शिलोपमा॥ ११ ॥<br><br>तस्याः परेण शैलस्तु मर्यादात्मात्ममण्डलः।<br>प्रकाशश्चाप्रकाशश्च लोकालोकः स उच्यते॥ १२ ॥<br><br>योजनानां सहस्राणि दश तस्योच्छ्रयः स्मृतः।<br>तावानेव च विस्तारो लोकालोको महागिरिः॥ १३ ॥ | उसके अनन्तर महती लोकस्थिति दिखलायी पड़ती है। वहाँकी द्विगुणित समस्त भूमि स्वर्णमयी और शिलाके समान है। उसके आगे सूर्यमण्डलकी मर्यादास्वरूप एक मर्यादा पर्वत है। (इसका एक भाग) प्रकाशित (तथा दूसरा) अप्रकाशित रहता है। इसीलिये वह लोकालोक (पर्वत) कहलाता है, लोकालोक नामक इस महान् पर्वतकी ऊँचाई दस हजार योजन कही गयी है और उतना ही इसका विस्तार (फैलाव) भी है॥ ११-१३॥ |
२४६ * कूर्मपुराण *
| समावृत्य तु तं शैलं सर्वतो वै तमः स्थितम्।<br>तमश्चाण्डकटाहेन समन्तात् परिवेष्टितम्॥ १४॥ | इस पर्वतको सभी ओरसे आवृतकर अन्धकार स्थित है और यह अन्धकार अण्डकटाह (चारों ओर विद्यमान ब्रह्माण्डरूपी कटाह)-के द्वारा चारों ओरसे परिवेष्टित है। यह अण्डकटाह ही सात महालोक और सात पातालके रूपमें प्रसिद्ध है। मैंने संक्षेपमें ब्रह्माण्डका यह विस्तार बतलाया। प्रधान, कारणरूप और अव्ययात्माके सर्वव्यापी होनेके कारण इस प्रकारके हजारों करोड़ ब्रह्माण्ड हैं, ऐसा समझना चाहिये॥ १४-१६॥ |
| एते सप्त महालोकाः पातालाः सप्त कीर्तिताः।<br>ब्रह्माण्डस्यैष विस्तारः संक्षेपेण मयोदितः॥ १५॥ | |
| अण्डानामीदृशानां तु कोट्यो ज्ञेयाः सहस्रशः।<br>सर्वगत्वात् प्रधानस्य कारणस्याव्ययात्मनः॥ १६॥ | |
| अण्डेष्वेतेषु सर्वेषु भुवनानि चतुर्दश।<br>तत्र तत्र चतुर्वक्त्रा रुद्रा नारायणादयः॥ १७॥ | इन सभी ब्रह्माण्डोंमें चौदह भुवन होते हैं, इन सभीमें चतुर्मुख ब्रह्मा, रुद्र तथा नारायण आदि होते हैं। हे विप्रो! (ब्रह्माण्डके) चारों ओर सात आवरण हैं, वे परिमाणमें क्रमशः एक दूसरेसे दस गुना अधिक हैं। यहाँ मनीषी लोग जाते हैं। अनन्त, अद्वितीय, अव्यक्त, अनादिनिधन, महत् और जगत्के प्रकृतिस्वरूप अक्षर (ब्रह्म) इन सभी (आवरणों)-का अतिक्रमण-कर विद्यमान रहते हैं। इनकी कोई संख्या नहीं होती, इसीलिये इन्हें अनन्त कहा जाता है। इन्हें ही अव्यक्त समझना चाहिये। ये ही ब्रह्म परम पद (अन्तिम प्राप्तव्य) हैं॥ १७-२०॥ |
| दशोत्तरमथैकैकमण्डावरणसप्तकम् ।<br>समन्तात् संस्थितं विप्रा यत्र यान्ति मनीषिणः॥ १८॥ | |
| अनन्तमेकमव्यक्तमनादिनिधनं महत्।<br>अतीत्य वर्तते सर्वं जगत् प्रकृतिरक्षरम्॥ १९॥ | |
| अनन्तत्वमनन्तस्य यतः संख्या न विद्यते।<br>तदव्यक्तमिति ज्ञेयं तद् ब्रह्म परमं पदम्॥ २०॥ | |
| अनन्त एष सर्वत्र सर्वस्थानेषु पठ्यते।<br>तस्य पूर्वं मयाप्युक्तं यत्तन्माहात्म्यमव्ययम्॥ २१॥ | ये अनन्त सर्वत्र सभी स्थानोंमें हैं, ऐसा कहा गया है। इनका जो अव्यय माहात्म्य है, मैंने भी पूर्वमें उसका वर्णन किया है। वही ये (परमात्मा) ही भूमि, रसातल, आकाश, वायु, अग्नि, सभी समुद्रों तथा स्वर्ग—सर्वत्र, सभी स्थानोंमें विद्यमान हैं, इसमें कोई संदेह नहीं। ये ही महाद्युतिमान् पुरुषोत्तम अन्धकार तथा (प्रकाशात्मा) सत्त्वमें विद्यमान होते हुए अपने अङ्गोंको अनेक रूपोंमें विभक्तकर क्रीडा करते हैं। महेश्वर अव्यक्तसे परे हैं। अण्ड अव्यक्तसे उत्पन्न होता है। अण्डसे ब्रह्मा उत्पन्न हैं और उन्होंने इस संसारकी सृष्टि की है॥ २१-२४॥ |
| गतः स एष सर्वत्र सर्वस्थानेषु वर्तते।<br>भूमौ रसातले चैव आकाशे पवनेऽनले।<br>अर्णवेषु च सर्वेषु दिवि चैव न संशयः॥ २२॥ | |
| तथा तमसि सत्त्वे च एष एव महाद्युतिः।<br>अनेकधा विभक्ताङ्गः क्रीडते पुरुषोत्तमः॥ २३॥ | |
| महेश्वरः परोऽव्यक्तादण्डमव्यक्तसम्भवम्।<br>अण्डाद् ब्रह्मा समुत्पन्नस्तेन सृष्टमिदं जगत्॥ २४॥ |
इति श्रीकृष्णद्वैपायने कूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे अष्टचत्वारिंशोऽध्यायः॥ ४८॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें अड़तालीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ४८॥
- अध्याय ४९ * | २४७ ---|---
उनचासवाँ अध्याय
स्वारोचिषसे वैवस्वत मन्वन्तरतकके देवता, सप्तर्षि, इन्द्र आदिका वर्णन, नारायणद्वारा ही विभिन्न मन्वन्तरोंमें सृष्टि आदिका प्रतिपादन, भगवान् विष्णुकी चार मूर्तियोंका विवेचन, विष्णुका माहात्म्य
ऋषय ऊचुः | ऋषियोंने कहा—(सूतजी!) आप हमें बीते हुए तथा आनेवाले जो मन्वन्तर हैं, उन्हें (बतलाइये) और द्वापर युगके व्यासोंको भी बतलायें। सूतजी! वेदकी शाखाओंका प्रणयन कैसे हुआ, धर्म (-की स्थापना)-के लिये कलियुगमें हुए देवाधिदेव बुद्धिमान् ईशान (व्यास)-के कितने अवतार हुए और कलियुगोंमें देवाधिदेव (व्यास)-के कितने शिष्य हुए—यह सब भी आप संक्षेपमें बतलायें॥ १-३॥ अतीतानागतानीह यानि मन्वन्तराणि तु। | तानि त्वं कथयास्माकं व्यासांश्च द्वापरे युगे॥ १ ॥ | वेदशाखाप्रणयनं देवदेवस्य धीमतः। | तथावतारान् धर्मार्थमीशानस्य कलौ युगे॥ २ ॥ | कियन्तो देवदेवस्य शिष्याः कलियुगेषु वै। | एतत् सर्वं समासेन सूत वक्तुमिहार्हसि॥ ३ ॥ | सूत उवाच | सूतजी बोले—पहले स्वायम्भुव मनु थे। तदनन्तर स्वारोचिष मनु हुए। पुनः उत्तम, तामस, रैवत तथा चाक्षुष मनु हुए। ये छः बीते हुए मनु हैं। इस समय सूर्यके पुत्र वैवस्वतका यह सातवाँ मन्वन्तर प्रवृत्त है। कल्पके आदिमें होनेवाले स्वायम्भुव मन्वन्तरका वर्णन मैंने किया। इसके अनन्तर स्वारोचिष मनुका वर्णन सुनो॥ ४-६॥ मनुः स्वायम्भुवः पूर्वं ततः स्वारोचिषो मनुः। | उत्तमस्तामसश्चैव रैवतश्चाक्षुषस्तथा॥ ४ ॥ | षडेते मनवोऽतीता साम्प्रतं तु रवेः सुतः। | वैवस्वतोऽयं यस्यैतत् सप्तमं वर्ततेऽन्तरम्॥ ५ ॥ | स्वायम्भुवं तु कथितं कल्पादावन्तरं मया। | अत ऊर्ध्वं निबोधध्वं मनोः स्वारोचिषस्य तु॥ ६ ॥ | पारावताश्च तुषिता देवाः स्वारोचिषेऽन्तरे। | स्वारोचिष मन्वन्तरमें पारावत तथा तुषित नामके देवता और असुरोंका विनाश करनेवाले विपश्चित् नामके देवेन्द्र हुए। ऊर्ज, स्तम्भ, प्राण, दान्त, वृषभ, तिमिर और अर्वरीवान्—ये सात सप्तर्षि हुए॥ ७-८॥ विपश्चिन्नाम देवेन्द्रो बभूवासुरसूदनः॥ ७ ॥ | ऊर्जस्तम्भस्तथा प्राणो दान्तोऽथ वृषभस्तथा। | तिमिरश्चार्वरीवांश्च सप्त सप्तर्षयोऽभवन्॥ ८ ॥ | चैत्रकिंपुरुषाद्याश्च सुताः स्वारोचिषस्य तु। | स्वारोचिषके चैत्र और किंपुरुष आदि पुत्र थे। इस प्रकार दूसरे मन्वन्तरको मैंने बतलाया, अब इसके परवर्ती (मन्वन्तर)-का वर्णन सुनिये। हे विप्रो! तीसरे मन्वन्तरमें उत्तम नामके मनु और शत्रुनाशक सुशान्ति नामवाले देवेन्द्र हुए। सुधामा, सत्य, शिव, प्रतर्दन और वशवर्ती—बारह-बारह देवताओंवाले—ये पाँच गण कहे गये हैं। रज, ऊर्ध्व, ऊर्ध्वबाहु, सबल, अनय, सुतपा और शुक्र—ये सात सप्तर्षि हुए॥ ९-१२॥ द्वितीयमेतदाख्यातमन्तरं शृणु चोत्तरम्॥ ९ ॥ | तृतीयेऽप्यन्तरे विप्रा उत्तमो नाम वै मनुः। | सुशान्तिस्तत्र देवेन्द्रो बभूवामित्रकर्षणः॥ १०॥ | सुधामानस्तथा सत्याः शिवाश्चाथ प्रतर्दनाः। | वशवर्तिनश्च पञ्चैते गणा द्वादशकाः स्मृताः॥ ११॥ | रजोर्ध्वश्चोर्ध्वबाहुश्च सबलश्रानयस्तथा। | सुतपाः शुक्र इत्येते सप्त सप्तर्षयोऽभवन्॥ १२॥ | तामसस्यान्तरे देवाः सुरा वाहरयस्तथा। | तामस मन्वन्तरमें सुर, वाहरि, सत्य तथा सुधी—ये सत्ताईस-सत्ताईसकी संख्यावाले गणदेवता थे। इसी प्रकार सौ यज्ञोंको करनेवाले शिबि नामक इन्द्र थे। वे शंकरके भक्त और महादेवकी आराधनामें रत रहते थे॥ १३-१४॥ सत्याश्च सुधियश्चैव सप्तविंशतिका गणाः॥ १३॥ | शिबिरिन्द्रस्तथैवासीच्छतयज्ञोपलक्षणः । | बभूव शंकरे भक्तो महादेवार्चने रतः॥ १४॥ |
२४८ * कूर्मपुराण *
| ज्योतिर्धर्मा पृथुः काव्यश्चैत्रोऽग्निर्वैनकस्तथा ।<br>पीवरस्त्वृषयो ह्येते सप्त तत्रापि चान्तरे ॥ १५ ॥<br>पञ्चमे चापि विप्रेन्द्रा रैवतो नाम नामतः ।<br>मनुर्वसुश्च तत्रेन्द्रो बभूवासुरमर्दनः ॥ १६ ॥<br>अमिताभा भूतरया वैकुण्ठाः स्वच्छमेधसः ।<br>एते देवगणास्तत्र चतुर्दश चतुर्दश ॥ १७ ॥<br>हिरण्यरोमा वेदश्रीरूर्ध्वबाहुस्तथैव च ।<br>वेदबाहुः सुधामा च पर्जन्यश्च महामुनिः ।<br>एते सप्तर्षयो विप्रास्तत्रासन् रैवतेऽन्तरे ॥ १८ ॥<br>स्वारोचिषश्चोत्तमश्च तामसो रैवतस्तथा ।<br>प्रियव्रतान्वया ह्येते चत्वारो मनवः स्मृताः ॥ १९ ॥ | उस मन्वन्तरमें भी ज्योतिर्धर्मा, पृथु, काव्य, चैत्र, अग्नि, वनक और पीवर नामक—ये सात ऋषि हुए। विप्रेन्द्रो! पाँचवें मन्वन्तरमें रैवत नामवाले मनु और असुरोंका मर्दन करनेवाले वसु नामवाले इन्द्र हुए। अमिताभ, भूतरय, वैकुण्ठ और स्वच्छमेधा—ये चौदह-चौदहकी संख्यावाले (चार) गणदेवता थे। हे विप्रो! रैवत मन्वन्तरमें हिरण्यरोमा, वेदश्री, ऊर्ध्वबाहु, वेदबाहु, सुधामा, पर्जन्य और महामुनि—ये सप्तर्षि हुए। स्वारोचिष, उत्तम, तामस तथा रैवत—ये चार मनु प्रियव्रतके वंशज कहे जाते हैं ॥ १५-१९ ॥ |
| षष्ठे मन्वन्तरे चासीच्चाक्षुषस्तु मनुर्द्विजाः ।<br>मनोजवस्तथैवेन्द्रो देवानपि निबोधत ॥ २० ॥<br>आद्याः प्रसूता भाव्याश्च पृथुगाश्च दिवौकसः ।<br>महानुभावा लेख्याश्च पञ्चैते ह्यष्टका गणाः ॥ २१ ॥<br>सुमेधा विरजाश्चैव हविष्मानुत्तमो मधुः ।<br>अतिनामा सहिष्णुश्च समासन्नृषयः शुभाः ॥ २२ ॥ | हे द्विजो! छठे मन्वन्तरके मनु चाक्षुष हैं। इस मन्वन्तरके इन्द्रका नाम मनोजव है। (अब) देवताओंको सुनो—आद्य, प्रसूत, भाव्य, पृथुग और लेख्य—ये पाँच महानुभाव आठ-आठकी संख्यावाले देवताओंके गण हैं। सुमेधा, विरजा, हविष्मान्, उत्तम, मधु, अतिनाम और सहिष्णु—ये सात कल्याणकारी ऋषि हैं ॥ २०-२२ ॥ |
| विवस्वतः सुतो विप्राः श्राद्धदेवो महाद्युतिः ।<br>मनुः स वर्तते धीमान् साम्प्रतं सप्तमेऽन्तरे ॥ २३ ॥ | विप्रो! विवस्वान्के पुत्र बुद्धिमान् एवं महान् तेजस्वी श्राद्धदेव इस समय सातवें मन्वन्तरके मनु हैं। आदित्य, |
| आदित्या वसवो रुद्रा देवास्तत्र मरुद्गणाः ।<br>पुरंदरस्तथैवेन्द्रो बभूव परवीरहा ॥ २४ ॥ | वसुगण, रुद्र तथा मरुद्गण इसमें देवता हैं। इसी प्रकार वीर शत्रुओंका नाश करनेवाले पुरन्दर नामवाले (इस मन्वन्तरके) इन्द्र हैं। वसिष्ठ, कश्यप, अत्रि, जमदग्नि, गौतम, विश्वामित्र |
| वसिष्ठः कश्यपश्चात्रिजमदग्निश्च गौतमः ।<br>विश्वामित्रो भरद्वाजः सप्त सप्तर्षयोऽभवन् ॥ २५ ॥ | तथा भरद्वाज—ये सात सप्तर्षि हैं। (इस मन्वन्तरमें) |
| विष्णुशक्तिरनौपम्या सत्त्वोद्रिक्ता स्थिता स्थितौ ।<br>तदंशभूता राजानः सर्वे च त्रिदिवौकसः ॥ २६ ॥ | विष्णुकी अनुपम सत्त्वगुणमयी शक्ति (सृष्टि)-की रक्षाके लिये स्थित है। सभी राजा और सभी देवगण इसी (विष्णुशक्ति)-के अंशसे उत्पन्न हैं। द्विजो! स्वायम्भुव |
| स्वायम्भुवेऽन्तरे पूर्वमाकृत्यां मानसः सुतः ।<br>रुचेः प्रजापतेर्यज्ञस्तदंशेनाभवद् द्विजाः ॥ २७ ॥ | मन्वन्तरमें सर्वप्रथम प्रजापति रुचिका आकूति (नामक पत्नी)-से यज्ञ नामक मानस पुत्र हुआ, यह विष्णुका अंश था। तदनन्तर पुनः वे ही देव (विष्णु) स्वारोचिष |
| ततः पुनरसौ देवः प्राप्ते स्वारोचिषेऽन्तरे ।<br>तुषितायां समुत्पन्नस्तुषितैः सह दैवतैः ॥ २८ ॥ | मन्वन्तरके आनेपर तुषितासे तुषित नामके देवताओंके साथ उत्पन्न हुए ॥ २३-२८ ॥ |
| औत्तमेऽप्यन्तरे विष्णुः सत्यैः सह सुरोत्तमैः ।<br>सत्यायामभवत् सत्यः सत्यरूपो जनार्दनः ॥ २९ ॥ | औत्तम मन्वन्तरमें सत्यरूप जनार्दन विष्णु सत्य नामक श्रेष्ठ देवताओंके साथ सत्य नामधारी सत्यासे उत्पन्न हुए और तामस नामक मन्वन्तर आनेपर |
| तामसस्यान्तरे चैव सम्प्राप्ते पुनरेव हि ।<br>हर्यायां हरिभिर्देवैर्हरिरेवाभवद्धरिः ॥ ३० ॥ | साक्षात् ये हरि ही हरि नामक देवताओंके साथ हर्यासे हरि इस नामसे उत्पन्न हुए ॥ २९-३० ॥ |
| * अध्याय ४९ * | २४९ |
|---|---|
| रैवतेऽप्यन्तरे चैव सम्भूत्यां मानसोऽभवत्।<br>सम्भूतौ मानसैः सार्धं देवैः सह महाद्युतिः॥ ३१ ॥<br><br>चाक्षुषेऽप्यन्तरे चैव वैकुण्ठः पुरुषोत्तमः।<br>विकुण्ठायामसो जज्ञे वैकुण्ठैर्देवैः सह॥ ३२॥<br><br>मन्वन्तरेऽत्र सम्प्राप्ते तथा वैवस्वतेऽन्तरे।<br>वामनः कश्यपाद् विष्णुरदित्यां सम्बभूव ह॥ ३३॥<br><br>त्रिभिः क्रमैरिमाँल्लोकाञ्जित्वा येन महात्मना।<br>पुरन्दराय त्रैलोक्यं दत्तं निहतकण्टकम्॥ ३४॥<br><br>इत्येतास्तनवस्तस्य सप्त मन्वन्तरेशु वै।<br>सप्त चैवाभवन् विप्रा याभिः संरक्षिताः प्रजाः॥ ३५ ॥<br><br>यस्माद् विष्टमिदं कृत्स्नं वामनेन महात्मना।<br>तस्मात् स वै स्मृतो विष्णुर्विशेर्धातोः प्रवेशनात्॥ ३६॥<br><br>एष सर्वं सृजत्यादौ पाति हन्ति च केशवः।<br>भूतान्तरात्मा भगवान् नारायण इति श्रुतिः॥ ३७॥<br><br>एकांशेन जगत् सर्वं व्याप्य नारायणः स्थितः।<br>चतुर्धा संस्थितो व्यापी सगुणो निर्गुणोऽपि च॥ ३८॥<br><br>एका भगवतो मूर्त्तिर्ज्ञानरूपा शिवामला।<br>वासुदेवाभिधाना सा गुणातीता सुनिष्कला॥ ३९॥<br><br>द्वितीया कालसंज्ञान्या तामसी शेषसंज्ञिता।<br>निहन्ति सकलं चान्ते वैष्णवी परमा तनुः॥ ४०॥<br><br>सत्त्वोद्रिक्ता तथैवान्या प्रद्युम्नेति च संज्ञिता।<br>जगत् स्थापयते सर्वं स विष्णुः प्रकृतिर्ध्रुवा॥ ४१॥<br><br>चतुर्थी वासुदेवस्य मूर्त्तिर्ब्राह्मीति संज्ञिता।<br>राजसी चानिरुद्धाख्या प्रद्युम्नः सृष्टिकारिका॥ ४२॥<br><br>यः स्वपित्यखिलं भूत्वा प्रद्युम्नेन सह प्रभुः।<br>नारायणाख्यो ब्रह्माऽसौ प्रजासर्गं करोति सः॥ ४३॥<br><br>या सा नारायणतनुः प्रद्युम्नाख्या मुनीश्वराः।<br>तया सम्मोहयेद् विश्वं सदेवासुरमानुषम्॥ ४४॥ | रैवत मन्वन्तरमें भी मानस नामक देवताओंके साथ महान् द्युतिमान् हरि सम्भूतिसे मानस नामसे उत्पन्न हुए। चाक्षुष मन्वन्तरमें भी वे पुरुषोत्तम वैकुण्ठ नामक देवताओंके साथ विकुण्ठासे वैकुण्ठ नामसे उत्पन्न हुए और वैवस्वत नामक मन्वन्तर आनेपर वे विष्णु कश्यप और अदितिसे वामन नामसे उत्पन्न हुए। इन्हीं महात्माने अपने तीन पगोंसे समस्त लोकोंको जीतकर पुरन्दर इन्द्रको निष्कण्टक त्रैलोक्य (-का राज्य) प्रदान किया॥ ३१-३४॥<br><br>हे विप्रो! सात मन्वन्तरोंमें ये ही सात उन (विष्णु)-के विग्रह हुए, जिनसे प्रजाओंकी रक्षा हुई। महात्मा वामनने इस सम्पूर्ण विश्वको व्याप्त किया था, इसीलिये 'विश्' धातुका प्रवेश अर्थ होनेके कारण वे (वामन) विष्णु कहलाये। ये केशव प्रारम्भमें समस्त प्रपञ्चकी सृष्टि करते हैं, उसकी रक्षा करते हैं और (अन्तमें) उसका संहार करते हैं। भगवान् नारायण सभी प्राणियोंकी अन्तरात्मा हैं—ऐसा वेदका कथन है॥ ३५-३७॥<br><br>ये नारायण अपने एक अंशसे सम्पूर्ण संसारको व्याप्तकर प्रतिष्ठित रहते हैं। ये निर्गुण होते हुए भी सगुण रूपसे चार भागोंमें विभक्त होकर सर्वत्र व्याप्त रहनेवाले हैं। (ये ही चार भाग भगवान् नारायणकी चार मूर्तियाँ हैं। इनमें) भगवान्की वासुदेव नामवाली पहली मूर्ति ज्ञानरूप, कल्याणकारिणी, निर्मल, गुणातीत और कलारहित है। दूसरी काल और शेष नामवाली वह तामसी मूर्ति विष्णुकी परम विग्रहरूपा मूर्ति है। यही अन्तमें सबका संहार करती है। इसी प्रकार सत्त्वगुणमयी प्रद्युम्न नामवाली अन्य (तीसरी) मूर्ति सम्पूर्ण जगत्की स्थापना (पालन) करती है, यही विष्णुकी ध्रुवा प्रकृति है। इन तीनों मूर्तियोंके अतिरिक्त वासुदेवकी ब्राह्मी तथा अनिरुद्ध नामवाली चौथी राजसी मूर्ति है, यह प्रद्युम्न नामक मूर्ति सृष्टि करनेवाली है॥ ३८-४२॥<br><br>जो प्रभु सम्पूर्ण (सृष्टि)-के रूपमें होकर प्रद्युम्नके साथ शयन करते हैं, नारायण नामवाले वे ही ब्रह्मा प्रजाकी सृष्टि करते हैं। मुनीश्वरो! वह जो प्रद्युम्न नामवाली नारायणकी मूर्ति है, उसके द्वारा वे (नारायण) देवता, असुर तथा मनुष्योंसे युक्त विश्वको मोहित करते हैं॥ ४३-४४॥ |
२. उत्तरविभाग (अध्याय १-११) — ईश्वरगीता (भगवान् शिवद्वारा आत्मज्ञानोपदेश)

* अध्याय ५० *
२५१
| त्र्यारुणिवैं पञ्चदशे षोडशे तु धनञ्जयः।<br>कृतञ्जयः सप्तदशे ह्यष्टादशे ऋतञ्जयः॥ ६ ॥<br><br>ततो व्यासो भरद्वाजस्तस्मादूर्ध्वं तु गौतमः।<br>राजश्रवाश्चैकविंशस्तस्माच्छुष्मायणः परः॥ ७ ॥<br><br>तृणबिन्दुस्त्रयोविंशे वाल्मीकिस्तत्परः स्मृतः।<br>पञ्चविंशे तथा शक्तिः षड्विंशे तु पराशरः ॥ ८ ॥<br>सप्तविंशे तथा व्यासो जातूकर्णो महामुनिः।<br>अष्टाविंशे पुनः प्राप्ते ह्यस्मिन् वै द्वापरे द्विजाः।<br>पाराशर्यसुतो व्यासः कृष्णद्वैपायनोऽभवत्॥ ९ ॥<br>स एव सर्ववेदानां पुराणानां प्रदर्शकः।<br>पाराशर्यो महायोगी कृष्णद्वैपायनो हरिः॥ १० ॥<br>आराध्य देवमीशानं दृष्ट्वा साम्बं त्रिलोचनम्।<br>तत्प्रसादादसौ व्यासं वेदानामक shape/रोत् प्रभुः॥ ११॥<br>अथ शिष्यान् प्रजग्राह
२५२ * कूर्मपुराण *
| सामवेदं सहस्रेण शाखानां प्रबिभेद सः।<br>अथर्वाणमथो वेदं बिभेद नवकेन तु॥ १९॥ | इसी प्रकार उन्होंने सामवेदको हजार शाखाओंमें विभक्त किया तथा अथर्ववेदको नौ भागों (शाखाओं)-में बाँटा॥ १९॥ |
| भेदैरष्टादशैर्व्यासः पुराणं कृतवान् प्रभुः।<br>सोऽयमेकश्चतुष्पादो वेदः पूर्वं पुरातनात्॥ २०॥ | प्रभु व्यासने पुराणसंहिताके अठारह भेद किये। पूर्वकालमें सभी दोषोंको दूर करनेवाला पुरातन वही चतुष्पाद प्रणवरूप एक वेद ब्रह्मासे आविर्भूत हुआ। |
| ओङ्कारो ब्रह्मणो जातः सर्वदोषविशोधनः।<br>वेदवेद्यो हि भगवान् वासुदेवः सनातनः॥ २१॥ | सनातन भगवान् वासुदेव वेदोंद्वारा जानने योग्य हैं। वेदोंद्वारा उन्हीं परम (पुरुष)-का गान किया जाता है। |
| स गीयते परो वेदे यो वेदेनं स वेदवित्।<br>एतत् परतरं ब्रह्म ज्योतिरानन्दमुत्तमम्॥ २२॥ | जो इन्हें (परम पुरुषको) जानता है, वही वेदको जाननेवाला है। ये ही परात्पर ब्रह्म, ज्योतिरूप और श्रेष्ठ आनन्द हैं। वेदवाक्योंद्वारा प्रतिपादित तत्त्व वासुदेव ही |
| वेदवाक्योदितं तत्त्वं वासुदेवः परं पदम्।<br>वेदवेद्यमिमं वेत्ति वेदं वेदपरो मुनिः॥ २३॥ | परमपद हैं। वेदपरायण मुनि वेदोंद्वारा जानने योग्य इन्हीं (वासुदेवरूप) वेदको जानते हैं॥ २०—२३॥ |
| अवेदं परमं वेत्ति वेदनिष्ठः सदेश्वरः।<br>स वेदवेद्यो भगवान् वेदमूर्तिमहेश्वरः।<br>स एव वेदो वेद्यश्च तमेवाश्रित्य मुच्यते॥ २४॥ | जो परम अवेद्यको जानते हैं तथा वेदनिष्ठ, सदेश्वर, वेदमूर्ति, महेश्वर हैं, वे भगवान् वेदोंद्वारा ज्ञात होने योग्य हैं। वे ही भगवान् वेद हैं, वे ही (वेदसे) जानने योग्य हैं और उन्हींका आश्रय ग्रहण करनेसे मुक्ति मिलती है। |
| इत्येदक्षरं वेद्यमोङ्कारं वेदमव्ययम्।<br>अवेद्यं च विजानाति पाराशर्यो महामुनिः॥ २५॥ | पराशरके पुत्र महामुनि वेदव्यास (ही) इस अविनाशी, जानने योग्य, प्रणवस्वरूप अव्यय वेद और अवेद्य अर्थात् ज्ञात न हो सकने योग्य (परमतत्त्व)-को भी जानते हैं॥ २४-२५॥ |
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे पञ्चाशोऽध्यायः॥ ५०॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें पचासवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ५०॥
- अध्याय ५१ * २५३
इक्यावनवाँ अध्याय
कलियुगमें महादेवके अवतारों तथा उनके शिष्योंका वर्णन, भविष्यमें होनेवाले सात मन्वन्तरोंका नाम-परिगणन, कूर्मपुराणके पूर्वविभागका उपसंहार
| सूत उवाच | **सूतजी बोले—**सुव्रतो! द्वापरमें (होनेवाले) वेदव्यासके अवतारोंको कहा गया, अब (आपलोग) कलियुगमें होनेवाले महादेवके अवतारोंको सुनें—वैवस्वत मन्वन्तरके पहले कलियुगमें विप्रोंके हितार्थ अतितेजस्वी देवाधिदेव (शंकर) श्वेत नामसे पर्वतोंमें श्रेष्ठ हिमालयके रमणीय छगल नामक शिखरपर अवतरित हुए। उनके शिष्य शिखायुक्त और अमित प्रभाववाले हुए। श्वेत, श्वेतशिख, श्वेतास्य तथा श्वेतलोहित—ये चार वेदके पारंगत महात्मा ब्राह्मण (प्रथम कलियुगमें) थे॥ १–४॥ |
| वेदव्यासावताराणि द्वापरे कथितानि तु।<br>महादेवावताराणि कलौ शृणुत सुव्रताः॥ १ ॥<br>आद्ये कलियुगे श्वेतो देवदेवो महाद्युतिः।<br>नाम्ना हिताय विप्राणामभूद् वैवस्वतेऽन्तरे॥ २ ॥<br>हिमवच्छिखरे रम्ये छगले पर्वतोत्तमे।<br>तस्य शिष्याः शिखायुक्ता बभूवुरमितप्रभाः॥ ३ ॥<br>श्वेतः श्वेतशिखश्चैव श्वेतास्यः श्वेतलोहितः।<br>चत्वारस्ते महात्मानो ब्राह्मणा वेदपारगाः॥ ४ ॥ | |
| सुभानो दमनश्चाथ सुहोत्रः कङ्कणस्तथा।<br>लोकाक्षिरथ योगीन्द्रो जैगीषव्यस्तु सप्तमे॥ ५ ॥ | सुभान, दमन, सुहोत्र, कङ्कण और योगीन्द्र लोकाक्षिके रूपमें क्रमशः दूसरेसे छठे कलियुगतक महादेवका अवतार हुआ तथा सातवें (कलियुग)-में जैगीषव्य नामसे महादेवका अवतार हुआ। आठवेंमें दधिवाह, नवेंमें प्रभु वृषभ, दसवेंमें भृगु और उसके आगे (ग्यारहवें कलियुगमें) उग्रके रूपमें महादेवका अवतार हुआ। बारहवेंमें अत्रि, तेरहवेंमें बली, चौदहवेंमें गौतम और उसके बाद (पंद्रहवें कलियुगमें) वेदशीर्षके रूपमें महादेव अवतरित हुए॥ ५–७॥ |
| अष्टमे दधिवाहः स्यान्नवमे वृषभः प्रभुः।<br>भृगुस्तु दशमे प्रोक्तस्तस्मादुग्रः परः स्मृतः॥ ६ ॥ | |
| द्वादशेऽत्रिः समाख्यातो बली चाथ त्रयोदशे।<br>चतुर्दशे गौतमस्तु वेदशीर्षा ततः परम्॥ ७ ॥ | |
| गोकर्णश्चाभवत् तस्माद् गुहावासः शिखण्ड्यथ।<br>जटामाल्यट्टहासश्च दारुको लाङ्गली क्रमात्॥ ८ ॥<br>श्वेतस्तथा परः शूली डिण्डी मुण्डी च वै क्रमात्।<br>सहिष्णुः सोमशर्मा च नकुलीशोऽन्तिमे प्रभुः॥ ९ ॥ | तदनन्तर क्रमशः गोकर्ण, गुहावास, शिखण्डी, जटामाली, अट्टहास, दारुक, लाङ्गली और इनके बाद श्वेत, शूली, डिण्डी, मुण्डी, सहिष्णु, सोमशर्मा तथा अन्तिम प्रभु नकुलीशके रूपमें महादेवका अवतार हुआ॥ ८–९॥ |
| वैवस्वतेऽन्तरे शम्भोरवतारास्त्रिशूलिनः।<br>अष्टाविंशतिराख्याता ह्यन्ते कलियुगे प्रभोः।<br>तीर्थे कायावतारे स्याद् देवेशो नकुलीश्वरः॥ १० ॥ | वैवस्वत मन्वन्तरमें त्रिशूल धारण करनेवाले प्रभु शम्भुके अट्ठाईस अवतार कहे गये हैं। अन्तिम कलियुगेमें कायावतार नामक तीर्थमें देवेश्वर नकुलीश्वरके रूपमें महादेवका अवतार होगा। मुनिपुंगवो! उस समय देवोंके आदिदेव (महादेव)-के तीव्र तपस्याके धनी चार शिष्य हुए। अन्य अवतारोंमें भी प्रत्येकके (चार) शिष्य हुए। वे सभी प्रसन्न मनवाले, इन्द्रियनिग्रही और ईश्वरकी भक्ति करनेवाले थे। उन श्रेष्ठ योग जाननेवाले योगियोंका मैं क्रमशः वर्णन करता हूँ—॥ १०–१२॥ |
| तत्र देवादिदेवस्य चत्वारः सुतपोधनाः।<br>शिष्या बभूवुश्चान्येषां प्रत्येकं मुनिपुंगवाः॥ ११ ॥ | |
| प्रसन्नमनसो दान्ता ऐश्वरीं भक्तिमाश्रिताः।<br>क्रमेण तान् प्रवक्ष्यामि योगिनो योगवित्तमान्॥ १२ ॥ |
२५४ * कूर्मपुराण *
| श्वेतः श्वेतशिखश्चैव श्वेतास्यः श्वेतलोहितः ।<br>दुन्दुभिः शतरूपश्च ऋचीकः केतुमांस्तथा ।<br>विकेशश्च विशोकश्च विशापः शापनाशनः ॥ १३ ॥<br><br>सुमुखो दुर्मुखश्चैव दुर्दम दुर्तिक्रमः ।<br>सनः सनातनश्चैव कुमारश्च सनन्दनः ॥ १४ ॥<br>दालभ्यश्च महायोगी धर्मात्मानो महौजसः ।<br>सुधामा विरजाश्चैव शङ्खपात्रज एव च ॥ १५ ॥ | श्वेत, श्वेतशिख, श्वेतास्य, श्वेतलोहित, दुन्दुभि, शतरूप, ऋचीक, केतुमान्, विकेश, विशोक, विशाप, शापनाशन, सुमुख, दुर्मुख, दुर्दम, दुरतिक्रम, सनक, सनातन, सनत्कुमार, सनन्दन, महायोगी दालभ्य, सुधामा, विरजा और शङ्खपात्रज—ये धर्मात्मा और महान् ओजस्वी थे ॥ १३—१५ ॥ |
| सारस्वतस्तथा मेघो घनवाहः सुवाहनः ।<br>कपिलश्चासुरिश्चैव वोढुः पञ्चशिखो मुनिः ॥ १६ ॥<br>पराशरश्च गर्गश्च भार्गवश्चाङ्गिरास्तथा ।<br>बलबन्धुर्निरामित्रः केतुशृङ्गतपोधनः ॥ १७ ॥<br>लम्बोदरश्च लम्बश्च लम्बाक्षो लम्बकेशकः ।<br>सर्वज्ञः समबुद्धिश्च साध्यः सत्यस्तथैव च ॥ १८ ॥<br>सुधामा काश्यपश्चैव वसिष्ठो विरजास्तथा ।<br>अत्रिरुग्रस्तथा चैव श्रवणोऽथ श्रविष्ठकः ॥ १९ ॥<br>कुणिश्च कुणिबाहुश्च कुशरीरः कुनेत्रकः ।<br>कश्यपो ह्युशना चैव च्यवनोऽथ बृहस्पतिः ॥ २० ॥<br>उतथ्यो वामदेवश्च महाकायो महानिलः ।<br>वाचश्रवाः सुपीकश्च श्यावाश्वः सपथीश्वरः ॥ २१ ॥ | (ऐसे ही) सारस्वत, मेघ, घनवाह, सुवाहन, कपिल, आसुरि, वोढु, मुनि, पञ्चशिख, पराशर, गर्ग, भार्गव, अङ्गिरा, बलबन्धु, निरामित्र, तपोधन, केतुशृंग, लम्बोदर, लम्ब, लम्बाक्ष, लम्बकेशक, सर्वज्ञ, समबुद्धि, साध्य, सत्य, सुधामा, काश्यप, वसिष्ठ, विरजा, अत्रि, उग्र, श्रवण, श्रविष्ठक, कुणि, कुणिबाहु, कुशरीर, कुनेत्रक, कश्यप, उशना, च्यवन, बृहस्पति, उतथ्य, वामदेव, महाकाय, महानिल, वाचश्रवा, सुपीक, श्यावाश्व और सपथीश्वर (नामक शिष्य महादेवके अवतारोंके थे) ॥ १६—२१ ॥ |
| हिरण्यनाभः कौशल्यो लोकाक्षिः कुथुमिस्तथा ।<br>सुमन्तुर्वर्चरी विद्वान् कबन्धः कुशिकन्धरः ॥ २२ ॥<br>प्लक्षो दार्भायणिश्चैव केतुमान् गौतमस्तथा ।<br>भल्लापी मधुपिङ्गश्च श्वेतकेतुस्तपोनिधिः ॥ २३ ॥<br>उशिजो बृहदुक्थश्च देवलः कपिरेव च ।<br>शालिहोत्रोऽग्निवेश्यश्च युवनाश्वः शरद्वसुः ॥ २४ ॥<br>छगलः कुण्डकर्णश्च कुम्भश्चैव प्रवाहकः ।<br>उलूको विद्युतश्चैव शाद्वलो ह्याश्वलायनः ॥ २५ ॥<br>अक्षपादः कुमारश्च उलूको वत्स एव च ।<br>कुशिकश्चैव गर्गश्च मित्रको ऋष्य एव च ॥ २६ ॥ | (इनके अतिरिक्त) हिरण्यनाभ, कौशल्य, लोकाक्षि, कुथुमि, सुमन्तु, वर्चरी, विद्वान् कबन्ध, कुशिकन्धर, प्लक्ष, दार्भायणि, केतुमान्, गौतम, भल्लापी, मधुपिङ्ग, तपोनिधि श्वेतकेतु, उशिज, बृहदुक्थ, देवल, कपि, शालिहोत्र, अग्निवेश्य, युवनाश्व, शरद्वसु, छगल, कुण्डकर्ण, कुम्भ, प्रवाहक, उलूक, विद्युत, शाद्वल, आश्वलायन, अक्षपाद, कुमार, उलूक, वत्स, कुशिक, गर्ग, मित्रक और ऋष्य (नामक शिष्य थे) ॥ २२—२६ ॥ |
| शिष्या एते महात्मानः सर्वावर्तेषु योगिनाम् ।<br>विमला ब्रह्मभूयिष्ठा ज्ञानयोगपरायणाः ॥ २७ ॥<br><br>कुर्वन्ति चावताराणि ब्राह्मणानां हिताय हि ।<br>योगेश्वराणामादेशाद् वेदसंस्थापनाय वै ॥ २८ ॥ | योगियोंके* समस्त अवतारोंकी आवृत्तिमें ये ही महात्मा शिष्य होते हैं। ये सभी शुद्ध, ब्रह्मभूयिष्ठ और ज्ञान-योगपरायण हैं। ब्राह्मणोंके कल्याणके लिये तथा वेदोंकी स्थापनाके लिये योगेश्वर(परब्रह्म)-के आदेशसे (ये महात्मा) अवतार धारण करते हैं ॥ २७-२८ ॥ |
* योगी-महादेव-विष्णु आदि। ये लोग परम योगी हैं।
- अध्याय ५१ * २५५
| ये ब्राह्मणाः संस्मरन्ति नमस्यन्ति च सर्वदा।<br>तर्पयन्त्यर्चयन्त्येतान् ब्रह्मविद्यामवाप्नुयुः॥ २९॥<br><br>इदं वैवस्वतं प्रोक्तमन्तरं विस्तरेण तु।<br>भविष्यति च सावर्णो दक्षसावर्ण एव च॥ ३०॥<br><br>दशमो ब्रह्मसावर्णो धर्मसावर्ण एव च।<br>द्वादशो रुद्रसावर्णो रोचमानस्त्रयोदशः।<br>भौत्यश्चतुर्दशः प्रोक्तो भविष्या मनवः क्रमात्॥ ३१॥ | जो ब्राह्मण सर्वदा इनका स्मरण करते हैं, इन्हें नमस्कार करते हैं, इनका तर्पण करते हैं और इनकी पूजा करते हैं, वे ब्रह्मविद्याको प्राप्त कर लेते हैं। वैवस्वत मन्वन्तरका विस्तारसे वर्णन किया। सावर्ण (आठवाँ) तथा (नवाँ) दक्षसावर्ण मन्वन्तर भविष्यमें होंगे। दसवाँ ब्रह्मसावर्ण, ग्यारहवाँ धर्मसावर्ण, बारहवाँ रुद्रसावर्ण तथा तेरहवाँ रोचमान मन्वन्तर है। चौदहवाँ भौत्य मन्वन्तर कहा गया है। ये मनु क्रमसे भविष्यमें होंगे॥ २९—३१॥ |
| अयं वः कथितो ह्यंशः पूर्वो नारायणेरितः।<br>भूतभव्यैर्वर्तमानैराख्यानैरुपबृंहितः ॥ ३२॥<br><br>यः पठेच्छृणुयाद् वापि श्रावयेद् वा द्विजोत्तमान्।<br>स सर्वपापनिर्मुक्तो ब्रह्मणा सह मोदते॥ ३३॥<br><br>पठेद् देवालये स्नात्वा नदीतीरेषु चैव हि।<br>नारायणं नमस्कृत्य भावेन पुरुषोत्तमम्॥ ३४॥<br><br>नमो देवादिदेवाय देवानां परमात्मने।<br>पुरुषाय पुराणाय विष्णवे कूर्मरूपिणे॥ ३५॥ | मैंने नारायणद्वारा कहे गये भूत, भविष्य तथा वर्तमानके आख्यानोंसे उपबृंहित इस पूर्वभागको आप लोगोंसे कहा। जो (ब्राह्मण) इसे पढ़ेगा, सुनेगा अथवा श्रेष्ठ द्विजोंको* सुनायेगा, वह सभी पापोंसे मुक्त होकर ब्रह्माके साथ आनन्द प्राप्त करेगा। स्नान करनेके अनन्तर नदियोंके किनारोंपर अथवा देवमन्दिरमें भक्तिभावसे पुरुषोत्तम नारायणको नमस्कार कर इसका पाठ करना चाहिये। देवोंके आदिदेव, देवोंके परमात्मा, पुराण पुरुष कूर्मरूपी विष्णुको नमस्कार है॥ ३२—३५॥ |
इति श्रीकूर्मपुराणे षत्साहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे एकपञ्चाशोऽध्यायः॥ ५१॥
॥ पूर्वविभागः समाप्तः ॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें इक्यावनवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ५१॥
॥ पूर्वविभाग समाप्त ॥
* द्विजोंको आगे करके पुराण-श्रवण करानेकी विधि है। पुराण-श्रवणका अधिकार अन्य वर्णोंको भी है। द्विज मुख्यरूपसे सात्त्विक वृत्तिके होते हैं तथा प्राणिमात्रका कल्याण ही इनका लक्ष्य होता है, इसीलिये इसकी प्रमुखता है।
( २५६ )
[ उपरिविभाग ]
पहला अध्याय
ईश्वर (शिव) तथा ऋषियोंके संवादमें ईश्वरगीताका उपक्रम
(ईश्वरगीता प्रारम्भ)
| ऋषय ऊचुः<br><br>भवता कथितः सम्यक् सर्गः स्वायम्भुवस्ततः।<br>ब्रह्माण्डस्यास्य विस्तारो मन्वन्तरविनिश्चयः॥ १ ॥<br><br>तत्रेश्वरेश्वरो देवो वर्णिभिर्धर्मतत्परैः।<br>ज्ञानयोगरतैर्नित्यमाराध्यः कथितस्त्वया॥ २ ॥<br><br>तद्गदाशेषसंसारदुःखनाशनमुत्तमम् ।<br>ज्ञानं ब्रह्मैकविषयं येन पश्येम तत्परम्॥ ३ ॥<br><br>त्वं हि नारायणात् साक्षात् कृष्णद्वैपायनात् प्रभो।<br>अवाप्ताखिलविज्ञानस्तत्त्वां पृच्छामहे पुनः॥ ४ ॥ | ऋषियोंने कहा—(सूतजी!) आपने स्वायम्भुव मन्वन्तरकी सृष्टि तदुपरान्त इस ब्रह्माण्डका विस्तार और (अन्य विभिन्न) मन्वन्तरोंके विषयमें भलीभाँति बतलाया तथा उन (मन्वन्तरों)-में धर्मपरायण ज्ञानयोगी वर्णधर्मके अनुयायियोंके नित्य आराध्य ईश्वरोंके ईश्वर देवका भी वर्णन आपने किया। इसीके साथ ही आपने सम्पूर्ण संसारके दुःखोंको नष्ट करनेवाले एकमात्र ब्रह्मविषयक उस उत्तम ज्ञानका भी वर्णन किया, जिसके द्वारा हम उस परम तत्त्वको देख सकते हैं। प्रभो! आपने साक्षात् नारायण कृष्णद्वैपायन (व्यासजी)-से सम्पूर्ण तत्त्वज्ञान प्राप्त किया है, इसलिये हम आपसे पुनः पूछते हैं॥ १-४॥ |
| श्रुत्वा मुनीनां तद् वाक्यं कृष्णद्वैपायनं प्रभुम्।<br>सूतः पौराणिकः स्मृत्वा भाषितुं ह्युपचक्रमे॥ ५ ॥<br><br>अथास्मिन्नन्तरे व्यासः कृष्णद्वैपायनः स्वयम्।<br>आजगाम मुनिश्रेष्ठा यत्र सत्रं समासते॥ ६ ॥<br><br>तं दृष्ट्वा वेदविद्वांसं कालमेघसमद्युतिम्।<br>व्यासं कमलपत्राक्षं प्रणेमुर्द्विजपुंगवाः॥ ७ ॥ | मुनियोंके उस वाक्यको सुनकर पौराणिक सूतजीने प्रभु कृष्ण-द्वैपायनका स्मरणकर कहना प्रारम्भ किया। इसी बीच कृष्ण-द्वैपायन व्यास स्वयं वहाँ पहुँच गये जहाँ श्रेष्ठ मुनिजन यज्ञ कर रहे थे। कृष्ण मेघके समान द्युतिवाले तथा कमलपत्रके समान नेत्रवाले उन वेदके विद्वान् व्यासजीको देखकर श्रेष्ठ द्विजोंने उन्हें प्रणाम किया॥ ५-७॥ |
| पपात दण्डवद् भूमौ दृष्ट्वासौ रोमहर्षणः।<br>प्रदक्षिणीकृत्य गुरुं प्राञ्जलिः पार्श्वगोऽभवत्॥ ८ ॥ | रोमहर्षण सूतजीने भी उन्हें देखकर भूमिपर गिरकर दण्डवत् प्रणाम किया और गुरुकी प्रदक्षिणाकर हाथ जोड़ते हुए उनके पार्श्वभागमें खड़े हो गये। महामुनि (व्यास)-के द्वारा आरोग्यके विषयमें प्रश्न पूछे जानेपर उसका यथोचित उत्तर देकर शौनक आदि महामुनियोंने व्यासजीको आश्वस्त किया तथा उनके योग्य आसन उन्हें प्रदान किया॥ ८-९॥ |
| पृष्टास्तेऽनामयं विप्राः शौनकाद्या महामुनिम्।<br>समाश्र्वास्यासनं तस्मै तद्योग्यं समकल्पयन्॥ ९ ॥ | |
| अथैतानब्रवीद् वाक्यं पराशरसुतः प्रभुः।<br>कच्चिन्न तपसो हानिः स्वाध्यायस्य श्रुतस्य च॥ १०॥ | तदनन्तर पराशरजीके पुत्र प्रभु (व्यास)-ने उनसे पूछा—क्या आप लोगोंके तप, स्वाध्याय तथा श्रवण किये गये वेदादिकी हानि तो नहीं हो रही है? |
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२५८ * कूर्मपुराण *
| ततः स सूतः स्वगुरुं प्रणम्याह महामुनिम्।<br>ज्ञानं तद् ब्रह्मविषयं मुनीनां वक्तुमर्हसि ॥ ११ ॥<br><br>इमे हि मुनयः शान्तास्तापसा धर्मतत्पराः।<br>शुश्रूषा जायते चैषां वक्तुमर्हसि तत्त्वतः ॥ १२ ॥<br><br>ज्ञानं विमुक्तिदं दिव्यं यन्मे साक्षात् त्वयोदितम्।<br>मुनीनां व्याहृतं पूर्वं विष्णुना कूर्मरूपिणा ॥ १३ ॥<br><br>श्रुत्वा सूतस्य वचनं मुनिः सत्यवतीसुतः।<br>प्रणम्य शिरसा रुद्रं वचः प्राह सुखावहम् ॥ १४ ॥<br><br>व्यास उवाच<br><br>वक्ष्ये देवो महादेवः पृष्टो योगीश्वरैः पुरा।<br>सनत्कुमारप्रमुखैः स्वयं यत् समभाषत ॥ १५ ॥<br><br>सनत्कुमारः सनकस्तथैव च सनन्दनः।<br>अङ्गिरा रुद्रसहितो भृगुः परमधर्मवित् ॥ १६ ॥<br><br>कणादः कपिलो योगी वामदेवो महामुनिः।<br>शुक्रो वसिष्ठो भगवान् सर्वे संयतमानसाः ॥ १७ ॥<br><br>परस्परं विचार्यैते संशयाविष्टचेतसः।<br>तप्तवन्तस्तपो घोरं पुण्ये बदरिकाश्रमे ॥ १८ ॥<br><br>अपश्यंस्ते महायोगमृषिं धर्मसुतं शुचिम्।<br>नारायणमनाद्यन्तं नरेण सहितं तदा ॥ १९ ॥<br><br>संस्तूय विविधैः स्तोत्रैः सर्वे वेदसमुद्भवैः।<br>प्रणेमुर्भक्तिसंयुक्ता योगिनो योगवित्तमम् ॥ २० ॥<br><br>विज्ञाय वाञ्छितं तेषां भगवानपि सर्ववित्।<br>प्राह गम्भीरया वाचा किमर्थं तप्यते तपः ॥ २१ ॥<br><br>अब्रुवन् हृष्टमनसो विश्वात्मानं सनातनम्।<br>साक्षान्नारायणं देवमागतं सिद्धिसूचकम् ॥ २२ ॥<br><br>वयं संशयमापन्नाः सर्वे वै ब्रह्मवादिनः।<br>भवन्तमेकं शरणं प्रपन्नाः पुरुषोत्तमम् ॥ २३ ॥<br><br>त्वं हि तद् वेत्थ परमं सर्वज्ञो भगवानृषिः।<br>नारायणः स्वयं साक्षात् पुराणोऽव्यक्तपूरुषः ॥ २४ ॥<br><br>नह्यान्यो विद्यते वेत्ता त्वामृते परमेश्वर।<br>शुश्रूषास्माकमखिलं संशयं छेत्तुमर्हसि ॥ २५ ॥<br><br>किं कारणमिदं कृत्स्नं कोऽनुसंसरते सदा।<br>कश्चिदात्मा च का मुक्तिः संसारः किंनिमित्तकः ॥ २६ ॥ | तब उन सूतने अपने गुरु महामुनि (व्यास)-को प्रणामकर कहा—आप ब्रह्मविषयक ज्ञान मुनियोंको बतलायें। ये मुनि शान्त, तपस्वी तथा धर्मपरायण हैं। इन्हें सुननेकी इच्छा है, आप (कृपया) यथार्थरूपसे ब्रह्मविषयक सर्वोच्च ज्ञानका उपदेश करें। मोक्ष प्रदान करनेवाले जिस दिव्य ज्ञानको आपने मुझे तथा पूर्वकालमें कूर्मरूप धारणकर विष्णुने मुनियोंको बतलाया था (इस समय आप उसी ज्ञानका उपदेश दें)। सूतके वचन सुनकर सत्यवतीके पुत्र मुनि (व्यास)-ने रुद्रको मस्तकद्वारा प्रणामकर सुखदायक वचन कहा— ॥ १०–१४ ॥<br><br>व्यासजी बोले—प्राचीन कालमें सनत्कुमार आदि प्रमुख योगीश्वरोंद्वारा पूछनेपर स्वयं प्रभु महादेवने जो कहा था, उसीको मैं कहता हूँ। सनत्कुमार, सनक, सनन्दन, अंगिरा, रुद्रसहित परम धर्मज्ञ भृगु, कणाद, कपिल, योगी महामुनि वामदेव, शुक्र तथा भगवान् वसिष्ठ—इन सभी संयमित चित्तवाले मुनियोंने संशयान्वित होनेपर परस्पर परामर्श करके पवित्र बदरिकाश्रममें घोर तप किया। तब उन लोगोंने आदि और अन्तसे रहित धर्मपुत्र महायोगी पवित्र नारायण नामक ऋषिका नरके साथ दर्शन किया। उन भक्तिसम्पन्न योगियोंने वेदोंमें वर्णित विविध स्तोत्रोंद्वारा स्तुति करके उन श्रेष्ठ योगीको प्रणाम किया सर्वज्ञ भगवान् (नारायण)-ने उनके अभीष्टको जानकर पुनः गम्भीर वाणीमें उनसे पूछा कि आपलोग किस प्रयोजनसे तपस्या कर रहे हैं? ॥ १५–२१ ॥<br><br>प्रसन्न मनवाले ऋषियोंने जिनका शुभ आगमन अभीष्ट-सिद्धिकी निश्चित सूचना देता है (ऐसे) उन विश्वात्मा, सनातन साक्षात् नारायणदेवसे कहा— ॥ २२ ॥<br><br>(भगवन्!) हम सभी ब्रह्मवादी संशयमें पड़ गये हैं। आप पुरुषोत्तम हैं, हम एकमात्र आपकी शरणमें आये हैं। आप उस परम तत्त्वको जाननेवाले हैं, सर्वज्ञ, भगवान्, ऋषि तथा स्वयं साक्षात् नारायण अव्यक्त पुराणपुरुष हैं। परमेश्वर! आपको छोड़कर अन्य कोई दूसरा जाननेवाला नहीं है, हमें सुननेकी इच्छा है, आप सम्पूर्ण संशयको दूर करनेमें समर्थ हैं। इस सम्पूर्ण (कार्यरूप जगत्)-का कारण क्या है? कौन नित्य गतिशील रहता है? आत्मा कौन है? मुक्ति क्या है और संसार (-की रचना)-का क्या प्रयोजन है? इस संसारका चलानेवाला शासक कौन हैं? |
५. उत्तरविभाग (अध्याय १-११) — ईश्वरगीता (भगवान् शिवद्वारा आत्मज्ञान व पाशुपतयोग उपदेश)
| * अध्याय १ * | २५९ |
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| कः संसारयतीशानः को वा सर्वं प्रपश्यति।<br>किं तत् परतरं ब्रह्म सर्वं नो वक्तुमर्हसि ॥ २७॥<br>एवमुक्ते तु मुनयः प्रापश्यन् पुरुषोत्तमम्।<br>विहाय तापसं रूपं संस्थितं स्वेन तेजसा॥ २८॥<br><br>विभ्राजमानं विमलं प्रभामण्डलमण्डितम्।<br>श्रीवत्सवक्षसं देवं तप्तजाम्बूनदप्रभम्॥ २९॥<br><br>शङ्खचक्रगदापाणिं शार्ङ्गहस्तं श्रियावृतम्।<br>न दृष्टस्तत्क्षणादेव नरस्तस्यैव तेजसा॥ ३०॥<br>तदन्तरे महादेवः शशाङ्काङ्कितशेखरः।<br>प्रसादाभिमुखो रुद्रः प्रादुरासीन्महेश्वरः ॥ ३१॥<br>निरीक्ष्य ते जगन्नाथं त्रिनेत्रं चन्द्रभूषणम्।<br>तुष्टुवुर्हृष्टमनसो भक्त्या तं परमेश्वरम् ॥ ३२॥<br>जयेश्वर महादेव जय भूतपते शिव।<br>जयाशेषमुनीशान तपसाभिप्रपूजित ॥ ३३॥<br><br>सहस्रमूर्ते विश्वात्मन् जगद्यन्त्रप्रवर्तक।<br>जयानन्त जगज्जन्मत्राणसंहारकारण ॥ ३४॥<br><br>सहस्रचरणेशान शम्भो योगीन्द्रवन्दित।<br>जयाम्बिकापते देव नमस्ते परमेश्वर ॥ ३५॥<br>संस्तुतो भगवानीशस्त्र्यम्बको भक्तवत्सलः।<br>समालिङ्ग्य हृषीकेशं प्राह गम्भीरया गिरा ॥ ३६॥<br>किमर्थं पुण्डरीकाक्ष मुनीन्द्रा ब्रह्मवादिनः।<br>इमं समागता देशं किं वा कार्यं मयाच्युत ॥ ३७॥<br>आकर्ण्य भगवद्वाक्यं देवदेवो जनार्दनः।<br>प्राह देवो महादेवं प्रसादाभिमुखं स्थितम् ॥ ३८॥<br>इमे हि मुनयो देव तापसाः क्षीणकल्मषाः।<br>अभ्यागता मां शरणं सम्यग् दर्शनकाङ्क्षिणः ॥ ३९॥<br>यदि प्रसन्नो भगवान् मुनीनां भावितात्मनाम्।<br>संनिधौ मम तज्ज्ञानं दिव्यं वक्तुमिहार्हसि ॥ ४०॥<br>त्वं हि वेत्थ स्वमात्मानं न ह्यन्यो विद्यते शिव।<br>ततस्त्वमात्मनात्मानं मुनीन्द्रेभ्यः प्रदर्शय ॥ ४१॥<br>एवमुक्त्वा हृषीकेशः प्रोवाच मुनिपुङ्गवान्।<br>प्रदर्शयन् योगसिद्धिं निरीक्ष्य वृषभध्वजम् ॥ ४२॥<br>संदर्शनान्महेशस्य शंकरस्याथ शूलिनः।<br>कृतार्थं स्वयमात्मानं ज्ञातुमर्हथ तत्त्वतः॥ ४३॥ | अथवा सबका द्रष्टा कौन है ? परात्पर ब्रह्म क्या है ? यह सब आप हमें बतलायें ॥ २३-२७॥<br><br>ऐसा कहे जानेपर मुनियोंने तपस्वी-रूपका परित्याग किये हुए, अपने तेजद्वारा प्रतिष्ठित, प्रकाशमण्डलसे मण्डित, वक्षःस्थलमें श्रीवत्स धारण किये हुए, तप्त स्वर्णके समान आभावाले और हाथोंमें शंख, चक्र, गदा तथा शार्ङ्ग नामका धनुष धारण किये हुए लक्ष्मीसहित विमल एवं द्युतिमान् पुरुषोत्तम देवका दर्शन किया। उस समय उन्हींके तेजके कारण नर (ऋषि) नहीं दिखलायी पड़े ॥ २८-३०॥<br><br>उसी समय चन्द्रमासे अंकित मस्तकवाले महादेव महेश्वर रुद्र प्रसन्नतापूर्वक प्रकट हुए। चन्द्रभूषण जगन्नाथ त्रिलोचनका दर्शनकर प्रसन्न मनवाले वे सभी (मुनि) भक्तिपूर्वक उन परमेश्वरकी स्तुति करने लगे- ॥ ३१-३२॥<br><br>ईश्वरकी जय हो। भूतपति महादेव शिवकी जय हो। सभी मुनियोंके स्वामी तथा तपस्याद्वारा भलीभाँति प्रपूजित होनेवाले आपकी जय हो। सहस्रमूर्ति! विश्वात्मन् ! संसाररूपी यन्त्रके प्रवर्तक और संसारके जन्म, रक्षा और संहारके कारण हे अनन्त! आपकी जय हो। हजारों चरणवाले, ईशान, शम्भु, योगीन्द्रोंद्वारा वन्दित अम्बिकापति ! आपकी जय हो। परमेश्वरदेव ! आपको नमस्कार है॥ ३३-३५॥<br><br>इस प्रकार स्तुति किये जानेपर भक्तवत्सल भगवान् त्र्यम्बक ईशने हृषीकेशका आलिंगनकर गम्भीर वाणीमें कहा— हे अच्युत ! पुण्डरीकाक्ष ! ये ब्रह्मवादी मुनीन्द्र किस कारणसे इस स्थानपर आये हैं अथवा मुझे क्या करना है ? भगवान्के वाक्यको सुनकर देवाधिदेव जनार्दनदेवने कृपा करनेके लिये उद्यत सामने स्थित महादेवसे कहा-देव ! ये सभी मुनिगण तपस्वी और निष्पाप हैं, ये लोग भलीभाँति तत्त्वदर्शनकी इच्छासे मेरी शरणमें आये हैं। हे भगवन् ! यदि आप प्रसन्न हैं तो मेरे समीप इन भावनामय मुनियोंको वह दिव्य ज्ञान प्रदान करें ॥ ३६-४०॥<br><br>शिव ! केवल आप ही अपने-आपको जानते हैं दूसरा कोई आपको जाननेवाला नहीं है। अतः आप स्वयं इन मुनीन्द्रोंको अपना स्वरूप दिखलायें। ऐसा कहकर हृषीकेशने योगसिद्धियोंको दिखाते हुए वृषभध्वजकी ओर देखकर श्रेष्ठ मुनियोंसे कहा- (हे मुनिगणो!) त्रिशूल धारण करनेवाले शंकर महेशके दर्शनसे आपलोग अपने-आपको कृतार्थ समझें। आपलोग यथार्थरूपसे |
२६० * कूर्मपुराण *
| प्रष्टुमर्हथ विश्वेशं प्रत्यक्षं पुरतः स्थितम्।<br>ममैव संनिधावेष यथावद् वक्तुमीश्वरः॥ ४४ ॥<br><br>निशम्य विष्णुवचनं प्रणम्य वृषभध्वजम्।<br>सनत्कुमारप्रमुखाः पृच्छन्ति स्म महेश्वरम्॥ ४५ ॥<br><br>अथास्मिन्नन्तरे दिव्यमासनं विमलं शिवम्।<br>किमप्यचिन्त्यं गगनादीश्वरार्हं समुद्बभौ॥ ४६ ॥<br><br>तत्राससाद योगात्मा विष्णुना सह विश्वकृत्।<br>तेजसा पूरयन् विश्वं भाति देवो महेश्वरः॥ ४७ ॥<br><br>तं ते देवादिदेवेशं शंकरं ब्रह्मवादिनः।<br>विभ्राजमानं विमले तस्मिन् ददृशुरासने॥ ४८ ॥<br><br>यं प्रपश्यन्ति योगस्थाः स्वात्मन्यात्मानमीश्वरम्।<br>अनन्यतेजसं शान्तं शिवं ददृशिरे किल॥ ४९ ॥<br><br>यतः प्रसूतिर्भूतानां यत्रैतत् प्रविलीयते।<br>तमासनस्थं भूतानामीशं ददृशिरे किल॥ ५० ॥<br><br>यदन्तरा सर्वमेतद् यतोऽभिन्नमिदं जगत्।<br>स वासुदेवमासीनं तमीशं ददृशुः किल॥ ५१ ॥<br><br>प्रोवाच पृष्टो भगवान् मुनीनां परमेश्वरः।<br>निरीक्ष्य पुण्डरीकाक्षं स्वात्मयोगमनुत्तमम्॥ ५२ ॥<br><br>तच्छृणुध्वं यथान्यायमुच्यमानं मयानघाः।<br>प्रशान्तमानसाः सर्वे ज्ञानमीश्वरभाषितम्॥ ५३ ॥ | ज्ञान प्राप्त करने योग्य हैं, सामने प्रत्यक्ष स्थित विश्वेशसे (उस तत्त्वज्ञानके विषयमें) पूछें। मेरी संनिधिमें ये यथार्थरूपसे वर्णन करनेमें समर्थ हैं। विष्णुका (यह) वचन सुनकर तथा वृषभध्वजको प्रणामकर सनत्कुमार आदि (ऋषियों)-ने महेश्वरसे पूछा-॥ ४१-४५॥<br><br>इसी बीच आकाशसे ईश्वरके योग्य एक अचिन्त्य दिव्य निर्मल आसन प्रकट हुआ। विश्वकर्ता वे योगात्मा (महेश्वर) विष्णुसहित उस आसनपर बैठ गये। अपने तेजसे विश्वको पूरित करते हुए महेश्वर देव वहाँ सुशोभित हो रहे थे। उन ब्रह्मवादियोंने उन प्रकाशमान देवाधिदेव शंकरका उस निर्मल आसनपर सुशोभित होते हुए दर्शन किया। योगमें स्थित लोग अपनी आत्मामें जिन आत्मस्वरूप ईश्वरका दर्शन करते हैं, उन्हीं अनन्य तेजस्वी शान्तस्वरूप शिवको उन ब्रह्मवादियोंने देखा, जिनसे समस्त प्राणियोंकी उत्पत्ति होती है और जिनमें यह सब विलीन हो जाता है, उन प्राणियोंके ईशको ब्रह्मवादियोंने आसनपर विराजमान देखा। जिनके भीतर यह सम्पूर्ण संसार है और यह जगत् जिनसे अभिन्न है, उन परमेश्वरको वासुदेवके साथ आसनपर विराजमान देखा॥ ४६-५१॥<br><br>मुनियोंके पूछनेपर परमेश्वर (महेश्वर) भगवान् पुण्डरीकाक्ष (विष्णु)-की ओर देखकर अपने श्रेष्ठ योगका वर्णन करने लगे। शान्त मनवाले अनघ मुनियो! आप सभी लोग सुनें-मैं ईश्वरद्वारा कहे गये ज्ञानका वर्णन यथोचितरूपसे कर रहा हूँ॥ ५२-५३॥ |
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्साहस्र्यां संहितायामुपरिविभागे (ईश्वरगीतासु) प्रथमोऽध्यायः॥ १ ॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके उपरिविभागमें (ईश्वरगीताका) प्रथम अध्याय समाप्त हुआ॥ १ ॥
दूसरा अध्याय
आत्मतत्त्वके स्वरूपका निरूपण, सांख्य एवं योगके ज्ञानका अभेद, आत्मसाक्षात्कारके साधनोंका वर्णन
| ईश्वर उवाच | ईश्वरने कहा— |
|---|---|
| अवाच्यमेतद् विज्ञानमात्मगुह्यं सनातनम्।<br>यन्न देवा विजानन्ति यतन्तोऽपि द्विजातयः॥ १ ॥<br><br>इदं ज्ञानं समाश्रित्य ब्रह्मभूता द्विजोत्तमाः।<br>न संसारं प्रपद्यन्ते पूर्वेऽपि ब्रह्मवादिनः॥ २ ॥ | द्विजो! देवता लोग प्रयत्न करनेपर भी जिसे नहीं जान पाते हैं, मेरा यह विज्ञान अत्यन्त गुह्य है, सनातन है एवं बतलाने योग्य (भी) नहीं है। इस ज्ञानका आश्रय ग्रहणकर श्रेष्ठ द्विजगणोंने ब्रह्मभावको प्राप्त किया है। (इस ज्ञानके कारण) पूर्वकालमें भी ब्रह्मवादियोंको पुनः संसारमें आना नहीं पड़ा (अर्थात् इस ज्ञानसे ब्रह्मभाव अवश्य प्राप्त होता है और ब्रह्मभाव |
| * अध्याय २ * | २६१ |
|---|---|
| गुह्याद् गुह्यतमं साक्षाद् गोपनीयं प्रयत्नतः।<br>वक्ष्ये भक्तिमतामद्य युष्माकं ब्रह्मवादिनाम्॥ ३॥ | प्राप्त करनेके अनन्तर पुनः संसारमें आगमन नहीं होता)।<br>यह ज्ञान गुह्यसे भी गुह्यतम है, इस साक्षात् ज्ञानको<br>प्रयत्नपूर्वक गोपनीय रखना चाहिये। आप भक्तिसम्पन्न<br>ब्रह्मवादियोंको आज मैं यह ज्ञान बतलाऊँगा॥ १-३॥ |
| आत्मा यः केवलः स्वस्थः शान्तः सूक्ष्मः सनातनः।<br>अस्ति सर्वान्तरः साक्षाच्चिन्मात्रस्तमसः परः॥ ४॥ | जो आत्मा अद्वितीय, स्वस्थ, शान्त, सूक्ष्म, सनातन,<br>सभीका अन्तरतम साक्षात् चिन्मात्र और तमोगुणसे परे<br>है, वही (आत्मा) अन्तर्यामी है, पुरुष है, वही प्राण है,<br>वही महेश्वर है, वही काल तथा अग्नि है और वही<br>अव्यक्त है—ऐसा श्रुतिका कथन है॥ ४-५॥ |
| सोऽन्तर्यामी स पुरुषः स प्राणः स महेश्वरः।<br>स कालोऽग्निस्तदव्यक्तं स एवेदमिति श्रुतिः॥ ५॥<br>अस्माद् विजायते विश्वमत्रैव प्रविलीयते।<br>स मायी मायया बद्धः करोति विविधास्तनूः॥ ६॥ | इसीसे संसार उत्पन्न होता है और इसीमें विलीन हो<br>जाता है। वह मायाका नियामक मायासे आबद्ध होकर<br>अपनी इच्छासे मायाको अङ्गीकार कर विविध शरीरोंको<br>उत्पन्न करता है। यह प्रभु आत्मा न तो गतिशील है और<br>न गतिप्रेरक है। न यह पृथ्वी है, न जल है, न तेज है, न<br>वायु है और न आकाश ही है॥ ६-७॥ |
| न चाप्ययं संसरति न च संसारयेत् प्रभुः।<br>नायं पृथ्वी न सलिलं न तेजः पवनो नभः॥ ७॥<br>न प्राणो न मनोऽव्यक्तं न शब्दः स्पर्श एव च।<br>न रूपरसगन्धाश्च नाहं कर्ता न वागपि॥ ८ ॥ | यह न प्राण है, न मन है, न अव्यक्त है, न शब्द है, न<br>स्पर्श है, न रूप, न रस और न गन्ध ही है। न अभिमानी*<br>है, न वाणी ही है। द्विजोत्तमो ! यह न हाथ, न पैर, न पायु<br>(शौचेन्द्रिय) और न उपस्थ (मूत्रेन्द्रिय), न कर्ता, न भोक्ता<br>तथा प्रकृति-पुरुष भी नहीं है। माया भी नहीं है, प्राण भी<br>नहीं है, अपितु परमार्थतः चैतन्यमात्र है॥ ८-९॥ |
| न पाणिपादौ नो पायुर्न चोपस्थं द्विजोत्तमाः।<br>न कर्ता न च भोक्ता वा न च प्रकृतिपूरुषौ।<br>न माया नैव च प्राणश्चैतन्यं परमार्थतः॥ ९ ॥ | जिस प्रकार प्रकाश और अन्धकारका कोई सम्बन्ध<br>नहीं हो सकता, उसी प्रकार (सांसारिक) प्रपञ्च और परमात्माका<br>भी कोई ऐक्य (अभेद आदि) सम्बन्ध नहीं हो सकता॥ १०॥ |
| यथा प्रकाशतमसोः सम्बन्धो नोपपद्यते।<br>तद्वदैक्यं न सम्बन्धः प्रपञ्चपरमात्मनोः॥ १०॥ | जिस प्रकार संसारमें धूप और छाया एक-दूसरेसे<br>विलक्षण हैं, वैसे ही पुरुष तथा प्रपञ्च भी तत्त्वतः<br>एक-दूसरेसे भिन्न हैं। यदि आत्मा स्वभावसे मलिन,<br>अस्वस्थ तथा विकारयुक्त होता तो उसकी मुक्ति सैकड़ों<br>जन्मोंमें भी नहीं होती। योगयुक्त मुनिजन परमार्थतः<br>अपने विकाररहित, दुःखशून्य, आनन्दस्वरूप, अव्यय<br>आत्माका दर्शन करते हैं॥ ११-१३॥ |
| छायातपौ यथा लोके परस्परविलक्षणौ।<br>तद्वत् प्रपञ्चपुरुषौ विभिन्नौ परमार्थतः॥ ११॥<br>यद्यात्मा मलिनोऽस्वस्थो विकारी स्यात् स्वभावतः।<br>नहि तस्य भवेन्मुक्तिर्जन्मान्तरशतैरपि॥ १२॥<br>पश्यन्ति मुनयो युक्ताः स्वात्मानं परमार्थतः।<br>विकारहीनं निर्दुःखमानन्दात्मानमव्ययम्॥ १३॥ | मैं कर्ता हूँ, सुखी, दुःखी, कृश एवं स्थूल हूँ—<br>इस प्रकारकी जो बुद्धि है, वह मनुष्योंके द्वारा अहंकारके<br>कारण ही अपनी आत्मामें आरोपित है। वेदके विद्वान्<br>लोग (आत्माको) साक्षी, प्रकृतिसे परे, भोक्ता, अक्षर,<br>शुद्ध तथा सर्वत्र सम रूपसे व्याप्त बतलाते हैं। अतएव |
| अहं कर्ता सुखी दुःखी कृशः स्थूलेति या मतिः।<br>सा चाहंकारकर्तृत्वादात्मन्यारोप्यते जनैः॥ १४॥<br>वदन्ति वेदविद्वांसः साक्षिणं प्रकृतेः परम्।<br>भोक्तारमक्षरं शुद्धं सर्वत्र समवस्थितम्॥ १५॥ |
* 'अहम्' इस शब्दका प्रयोक्ता नहीं है, न 'अहम्' यह शब्द ही है।
२६२ * कूर्मपुराण *
तस्मादज्ञानमूलो हि संसारः सर्वदेहिनाम्।
अज्ञानादन्यथा ज्ञानं तच्च प्रकृतिसङ्गतम् ॥ १६ ॥
नित्योदितः स्वयं ज्योतिः सर्वगः पुरुषः परः।
अहंकाराविवेकेन कर्ताहमिति मन्यते॥ १७॥
पश्यन्ति ऋषयोऽव्यक्तं नित्यं सदसदात्मकम्।
प्रधानं प्रकृतिं बुद्ध्वा कारणं ब्रह्मवादिनः ॥ १८ ॥
तेनायं संगतो ह्यात्मा कूटस्थोऽपि निरञ्जनः।
स्वात्मानमक्षरं ब्रह्म नावबुद्ध्येत तत्त्वतः ॥ १९ ॥
अनात्मन्यात्मविज्ञानं तस्माद् दुःखं तथेतरम्।
रागद्वेषादयो दोषाः सर्वे भ्रान्तिनिबन्धनाः॥ २०॥
कर्मण्यस्य भवेद् दोषः पुण्यापुण्यमिति स्थितिः।
तद्वशादेव सर्वेषां सर्वदेहसमुद्भवः॥ २१॥
नित्यः सर्वत्रगो ह्यात्मा कूटस्थो दोषवर्जितः।
एकः स भिद्यते शक्त्या मायया न स्वभावतः॥ २२॥
तस्मादद्वैतमेवाहुर्मुनयः परमार्थतः।
भेदो व्यक्तस्वभावेन सा च मायात्मसंश्रया॥ २३॥
यथा हि धूमसम्पर्कान्नाकाशो मलिनो भवेत्।
अन्तःकरणजैर्भावैरात्मा तद्वन्न लिप्यते ॥ २४ ॥
यथा स्वप्रभया भाति केवलः स्फटिकोऽमलः।
उपाधिहीनो विमलस्तथैवात्मा प्रकाशते ॥ २५ ॥
ज्ञानस्वरूपमेवाहुर्जगदेतद् विचक्षणाः।
अर्थस्वरूपमेवाज्ञाः पश्यन्त्यन्ये कुदृष्टयः॥ २६॥
कूटस्थो निर्गुणो व्यापी चैतन्यात्मा स्वभावतः।
दृश्यते ह्यर्थरूपेण पुरुषैर्भ्रान्तदृष्टिभिः ॥ २७॥
यह संसार सभी प्राणियोंके अज्ञानके कारण ही है। अज्ञानसे अन्यथा (विपरीत) ज्ञान होता है अर्थात् अज्ञानका नाश ज्ञानसे ही होता है और यह प्रकृतिसंगत (प्राणियोंके मूल स्वभावके सर्वथा अनुकूल शाश्वत शान्तिरूप) होता है॥ १४—१६॥
अहंकारसे उत्पन्न अविवेकके कारण स्वयं ज्योतिरूप, नित्य प्रकाशयुक्त सर्वव्यापी परम पुरुष अपनेको 'मैं कर्ता हूँ' ऐसा मानता है। ब्रह्मवादी ऋषिगण प्रधान, प्रकृति और कारणको समझकर सत् एवं असत्-स्वरूप, अव्यक्त नित्यतत्त्वका साक्षात्कार करते हैं। कूटस्थ एवं निरञ्जन होते हुए भी यह आत्मा उस (प्रधान, प्रकृति आदि)-से संगत होकर स्वात्मस्वरूप अक्षर ब्रह्मका यथार्थरूपसे ज्ञान नहीं कर पाता॥ १७—१९॥
अनात्मतत्त्वमें आत्मविषयक विज्ञानसे ही दुःख होता है तथा इसी प्रकारकी भ्रान्तिके कारण ही राग, द्वेष आदि सभी दोष उत्पन्न होते हैं। इसके (भ्रान्त पुरुषके) कर्ममें ही दोष होता है, इसी कारण पाप-पुण्यकी स्थिति बनती है और उन कर्मोंके अनुसार ही सभी प्रकारके देहकी उत्पत्ति होती है। यह आत्मा नित्य, सर्वव्यापी, कूटस्थ और दोषोंसे रहित है। यह अद्वितीय आत्मा मायारूप शक्तिके कारण भिन्न-भिन्न प्रतीत होता है, स्वभावतः इसमें भेद नहीं है॥ २०—२२॥
इसी कारण मुनिजन आत्माको परमार्थतः अद्वैत ही कहते हैं। व्यक्त (महत्तत्त्व, अहंतत्त्व आदि)-के स्वभावसे जो भेद दिखलायी पड़ता है और यह भेद मूलतः माया (प्रकृति)-के कारण ही है तथा यह आत्मा (पुरुष)-के आश्रित होकर ही सब कुछ करती है। जैसे धुएँके सम्पर्कसे आकाश मलिन नहीं होता, वैसे ही अन्तःकरणसे उत्पन्न होनेवाले भावोंसे आत्मा लिप्त नहीं होता। जैसे अद्वितीय शुद्ध स्फटिक अपनी आभासे प्रकाशित होता है, वैसे ही उपाधियोंसे रहित निर्मल आत्मा (अपने ही प्रकाशसे) प्रकाशित होता है। विद्वान् लोग इस संसारको ज्ञानस्वरूप ही कहते हैं, परंतु दूसरे कुत्सित दृष्टि रखनेवाले अज्ञानी लोग इसे अर्थस्वरूप (विषयस्वरूप) मानते हैं॥ २३—२६॥
भ्रान्त दृष्टिवाले पुरुषोंके द्वारा स्वभावतः कूटस्थ, निर्गुण, सर्वव्यापी और चैतन्य आत्मा अर्थरूपसे ही देखा जाता है। जिस प्रकार शुद्ध स्फटिक गुञ्जा आदि
| * अध्याय २ * | २६३ |
|---|
| यथा संलक्ष्यते रक्तः केवलः स्फटिको जनैः ।<br>रक्तिकाद्युपधानेन तद्वत् परमपूरुषः ॥ २८ ॥ | उपाधिके कारण लोगोंको लाल वर्णका-सा दिखलायी पड़ता है, वैसे ही परम पुरुष भी (मायाके द्वारा नाम-रूपात्मक उपाधियुक्त प्रतीत होनेके कारण अनेक रूपोंमें दिखलायी पड़ता) है। इस कारण मोक्षके अभिलाषियोंको अक्षर, शुद्ध, नित्य, सर्वव्यापी तथा अव्यय उस आत्माका श्रवण, मनन तथा उपासना करनी चाहिये। (जिससे माया (अज्ञान)-की निवृत्ति हो तथा शुद्ध आत्मतत्त्वका ज्ञान प्राप्त हो) योगीके मनमें जब सर्वत्र व्याप्त रहनेवाला चैतन्य सदा प्रकाशित होता है, तब वह योगी बिना किसी व्यवधानके आत्मभाव प्राप्त कर लेता है ॥ २७-३० ॥ |
| तस्मादात्माक्षरः शुद्धो नित्यः सर्वगतोऽव्ययः ।<br>उपासितव्यो मन्तव्यः श्रोतव्यश्च मुमुक्षुभिः ॥ २९ ॥ | |
| यदा मनसि चैतन्यं भाति सर्वत्रगं सदा ।<br>योगिनोऽव्यवधानेन तदा सम्पद्यते स्वयंम् ॥ ३० ॥ | |
| यदा सर्वाणि भूतानि स्वात्मन्येवाभिपश्यति ।<br>सर्वभूतेषु चात्मानं ब्रह्म सम्पद्यते तदा ॥ ३१ ॥ | (योगी) जब सभी प्राणियोंको अपनी आत्मामें अच्छी प्रकार स्थित देख लेता है और सभी प्राणियोंमें अपनेको स्थित देखता है, तब उसे ब्रह्मभावकी प्राप्ति हो जाती है। जब (योगी) समाधिकी अवस्थामें किसी भी प्राणीको (अपनेसे भिन्न) नहीं देखता (अर्थात् समस्त प्रपञ्चमें आत्मदर्शन करता है), तब वह उस परतत्त्वसे एकात्मभाव प्राप्त कर लेता है और अद्वितीय हो जाता है। उसके हृदयमें स्थित सभी कामनाएँ जब समाप्त हो जाती हैं तब वह पण्डित अमृतस्वरूप होकर (परम) कल्याण प्राप्त कर लेता है। (योगी) जब प्राणियोंके पार्थक्यको एक तत्त्वमें स्थित देखता है और उसी (तत्त्व)-से उनका विस्तार होना समझता है, तब उसे ब्रह्मकी प्राप्ति हो जाती है। जब वह परमार्थतः (सर्वत्र) केवल अद्वितीय आत्माको ही देखता है और सम्पूर्ण जगत्को मायामात्र समझता है, तब वह मुक्त हो जाता है ॥ ३१-३५ ॥ |
| यदा सर्वाणि भूतानि समाधिस्थो न पश्यति ।<br>एकीभूतः परेणासौ तदा भवति केवलः ॥ ३२ ॥ | |
| यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि स्थिताः ।<br>तदासावमृतीभूतः क्षेमं गच्छति पण्डितः ॥ ३३ ॥ | |
| यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति ।<br>तत एव च विस्तारं ब्रह्म सम्पद्यते तदा ॥ ३४ ॥ | |
| यदा पश्यति चात्मानं केवलं परमार्थतः ।<br>मायामात्रं जगत् कृत्स्नं तदा भवति निर्वृतः ॥ ३५ ॥ | |
| यदा जन्मजरादुःखव्याधीनामेकभेषजम् ।<br>केवलं ब्रह्मविज्ञानं जायतेऽसौ तदा शिवः ॥ ३६ ॥ | जब योगीको जन्म, जरा, दुःख और समस्त व्याधियोंके एकमात्र औषध अद्वितीय ब्रह्मका ज्ञान हो जाता है, तब वह शिवरूप हो जाता है। जिस प्रकार संसारमें नद एवं नदियाँ सागरके साथ एकरूपताको प्राप्त करती हैं, उसी प्रकार यह आत्मा (जीवात्मा) निष्कल अक्षर (ब्रह्म)-के साथ एकत्व प्राप्त करता है ॥ ३६-३७ ॥ |
| यथा नदीनदा लोके सागरेणैकतां ययुः ।<br>तद्वदात्माक्षरेणासौ निष्कलेनैकतां व्रजेत् ॥ ३७ ॥ | |
| तस्माद् विज्ञानमेवास्ति न प्रपञ्चो न संसृतिः ।<br>अज्ञानेनावृतं लोको विज्ञानं तेन मुह्यति ॥ ३८ ॥ | इसलिये विज्ञानका ही अस्तित्व है, प्रपञ्च और संसरणशील संसारका अस्तित्व नहीं है। विज्ञान अज्ञानसे आवृत रहता है, इसीसे संसार (जीव) मोहमें पड़ता है। ज्ञान निर्मल, सूक्ष्म, निर्विकल्पक और अव्यय है, अज्ञानके अतिरिक्त जो कुछ है, वह विज्ञान है—ऐसा मेरा मत है। यह आप लोगोंको सांख्य नामक परमोत्तम ज्ञान बतलाया। यह सम्पूर्ण वेदान्तका सार है। इसमें चित्तकी एकाग्रता ही योग है ॥ ३८-४० ॥ |
| तज्ज्ञानं निर्मलं सूक्ष्मं निर्विकल्पं यदव्ययम् ।<br>अज्ञानमितरत् सर्वं विज्ञानमिति मे मतम् ॥ ३९ ॥ | |
| एतद् वः परमं सांख्यं भाषितं ज्ञानमुत्तमम् ।<br>सर्ववेदान्तसारं हि योगस्तत्रैकचित्तता ॥ ४० ॥ |
२६४ * कूर्मपुराण *
| योगात् सञ्जायते ज्ञानं ज्ञानाद् योगः प्रवर्तते ।<br>योगज्ञानाभियुक्तस्य नावाप्यं विद्यते क्वचित् ॥ ४१ ॥<br><br>यदेव योगिनो यान्ति सांख्यैस्तदधिगम्यते ।<br>एकं सांख्यं च योगं च यः पश्यति स तत्त्ववित् ॥ ४२ ॥ | योगसे ज्ञान उत्पन्न होता है और ज्ञानसे योग प्रवर्तित (स्थिर) होता है। योग तथा ज्ञानसम्पन्न (पुरुष)-के लिये कुछ भी प्राप्त करना शेष नहीं रह जाता। योगी जिसे प्राप्त करते हैं, सांख्यवेत्ताओंके द्वारा भी वही प्राप्त किया जाता है। जो सांख्य और योगको एक ही समझता है, वह तत्त्वज्ञानी होता है ॥ ४१-४२ ॥ |
| अन्ये च योगिनो विप्रा ऐश्वर्यासक्तचेतसः ।<br>मज्जन्ति तत्र तत्रैव न त्वात्मैषामिति श्रुतिः ॥ ४३ ॥<br><br>यत्तत् सर्वगतं दिव्यमैश्वर्यमचलं महत् ।<br>ज्ञानयोगाभियुक्तस्तु देहान्ते तदवाप्नुयात् ॥ ४४ ॥<br><br>एष आत्माहमव्यक्तो मायावी परमेश्वरः ।<br>कीर्तितः सर्ववेदेषु सर्वात्मा सर्वतोमुखः ॥ ४५ ॥ | विप्रो! ऐश्वर्य (आठ प्रकारकी सिद्धियों एवं अन्य वैभव आदि)-में आसक्तचित्त अन्य योगीजन उसीमें डूबे रहते हैं, अतएव उन्हें आत्मतत्त्व प्राप्त नहीं होता—ऐसा श्रुतिवचन है। जो सर्वव्यापी, दिव्य ऐश्वर्यरूप, अचल और महत् (सर्वश्रेष्ठ) है, उसे ज्ञान और योगसम्पन्न पुरुष देहान्त होनेपर प्राप्त करते हैं। सम्पूर्ण वेदोंमें सर्वात्मा, सर्वतोमुखके रूपमें प्रतिपादित, अव्यक्त, मायावी (मायाका अधिष्ठाता) तथा परमेश्वरस्वरूप मैं ही यह आत्मा हूँ ॥ ४३-४५ ॥ |
| सर्वकामः सर्वरसः सर्वगन्धोऽजरोऽमरः ।<br>सर्वतः पाणिपादोऽहमन्तर्यामी सनातनः ॥ ४६ ॥<br><br>अपाणिपादो जवनो ग्रहीता हृदि संस्थितः ।<br>अचक्षुरपि पश्यामि तथाकर्णः शृणोम्यहम् ॥ ४७ ॥<br><br>वेदाहं सर्वमेवेदं न मां जानाति कश्चन ।<br>प्राहुर्महान्तं पुरुषं मामेकं तत्त्वदर्शिनः ॥ ४८ ॥<br><br>पश्यन्ति ऋषयो हेतुमात्मनः सूक्ष्मदर्शिनः ।<br>निर्गुणामलरूपस्य यत्तदैश्वर्यमुत्तमम् ॥ ४९ ॥<br><br>यन्न देवा विजानन्ति मोहिता मम मायया ।<br>वक्ष्ये समाहिता यूयं शृणुध्वं ब्रह्मवादिनः ॥ ५० ॥ | मैं अन्तर्यामी, सनातन, सर्वकाम, सर्वरस, सर्वगन्ध, अजर, अमर और सभी ओर हाथ-पैरवाला हूँ। हाथ और पैरके बिना भी मैं गति करने एवं ग्रहण करनेवाला हूँ। (सभी प्राणियोंके) हृदयमें स्थित हूँ। बिना नेत्रोंके भी देखता हूँ और बिना कानोंके भी मैं सुनता हूँ। मैं इस समस्त प्रपञ्चको जानता हूँ, परंतु मुझे कोई नहीं जानता। तत्त्वदर्शी लोग मुझे अद्वितीय महान् पुरुष कहते हैं। सूक्ष्मदर्शी ऋषि गुणरहित और विशुद्धरूप आत्माके हेतुस्वरूप उस श्रेष्ठ ऐश्वर्य (सर्वोत्कृष्ट ज्ञान)-का दर्शन (साक्षात्कार) करते हैं। ब्रह्मवादियो! मेरी मायासे मोहित होनेके कारण देवता भी जिस (तत्त्व)-को नहीं जानते उसे मैं कहता हूँ, आप लोग ध्यान लगाकर सुनें— ॥ ४६-५० ॥ |
| नाहं प्रशास्ता सर्वस्य मायातीतः स्वभावतः ।<br>प्रेरयामि तथापीदं कारणं सूरयो विदुः ॥ ५१ ॥ | मायातीत मैं स्वभावतः सबका अनुशास्ता नहीं हूँ, तथापि इस जगत्को मैं प्रेरित करता हूँ, विद्वान् लोग इसका कारण जानते हैं (वह कारण अहैतुकी कृपा ही है।)। |
| यन्मे गुह्यतमं देहं सर्वगं तत्त्वदर्शिनः ।<br>प्रविष्टा मम सायुज्यं लभन्ते योगिनोऽव्ययम् ॥ ५२ ॥ | मेरा जो अत्यन्त गुह्यतम तथा सर्वव्यापी देह है, तत्त्वदर्शी योगीजन उसमें प्रविष्ट होते हैं और मेरे अविनाशी सायुज्य (नामक मोक्ष)-को प्राप्त करते हैं। |
| तेषां हि वशमापन्ना माया मे विश्वरूपिणी ।<br>लभन्ते परमां शुद्धिं निर्वाणं ते मया सह ॥ ५३ ॥ | मेरी विश्वरूपिणी माया उनके वशमें रहती है। वे मेरे साथ (मेरा सायुज्य प्राप्तकर) परम शुद्धि और निर्वाणको प्राप्त करते हैं। |