संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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२४६ * कूर्मपुराण *
| समावृत्य तु तं शैलं सर्वतो वै तमः स्थितम्।<br>तमश्चाण्डकटाहेन समन्तात् परिवेष्टितम्॥ १४॥ | इस पर्वतको सभी ओरसे आवृतकर अन्धकार स्थित है और यह अन्धकार अण्डकटाह (चारों ओर विद्यमान ब्रह्माण्डरूपी कटाह)-के द्वारा चारों ओरसे परिवेष्टित है। यह अण्डकटाह ही सात महालोक और सात पातालके रूपमें प्रसिद्ध है। मैंने संक्षेपमें ब्रह्माण्डका यह विस्तार बतलाया। प्रधान, कारणरूप और अव्ययात्माके सर्वव्यापी होनेके कारण इस प्रकारके हजारों करोड़ ब्रह्माण्ड हैं, ऐसा समझना चाहिये॥ १४-१६॥ |
| एते सप्त महालोकाः पातालाः सप्त कीर्तिताः।<br>ब्रह्माण्डस्यैष विस्तारः संक्षेपेण मयोदितः॥ १५॥ | |
| अण्डानामीदृशानां तु कोट्यो ज्ञेयाः सहस्रशः।<br>सर्वगत्वात् प्रधानस्य कारणस्याव्ययात्मनः॥ १६॥ | |
| अण्डेष्वेतेषु सर्वेषु भुवनानि चतुर्दश।<br>तत्र तत्र चतुर्वक्त्रा रुद्रा नारायणादयः॥ १७॥ | इन सभी ब्रह्माण्डोंमें चौदह भुवन होते हैं, इन सभीमें चतुर्मुख ब्रह्मा, रुद्र तथा नारायण आदि होते हैं। हे विप्रो! (ब्रह्माण्डके) चारों ओर सात आवरण हैं, वे परिमाणमें क्रमशः एक दूसरेसे दस गुना अधिक हैं। यहाँ मनीषी लोग जाते हैं। अनन्त, अद्वितीय, अव्यक्त, अनादिनिधन, महत् और जगत्के प्रकृतिस्वरूप अक्षर (ब्रह्म) इन सभी (आवरणों)-का अतिक्रमण-कर विद्यमान रहते हैं। इनकी कोई संख्या नहीं होती, इसीलिये इन्हें अनन्त कहा जाता है। इन्हें ही अव्यक्त समझना चाहिये। ये ही ब्रह्म परम पद (अन्तिम प्राप्तव्य) हैं॥ १७-२०॥ |
| दशोत्तरमथैकैकमण्डावरणसप्तकम् ।<br>समन्तात् संस्थितं विप्रा यत्र यान्ति मनीषिणः॥ १८॥ | |
| अनन्तमेकमव्यक्तमनादिनिधनं महत्।<br>अतीत्य वर्तते सर्वं जगत् प्रकृतिरक्षरम्॥ १९॥ | |
| अनन्तत्वमनन्तस्य यतः संख्या न विद्यते।<br>तदव्यक्तमिति ज्ञेयं तद् ब्रह्म परमं पदम्॥ २०॥ | |
| अनन्त एष सर्वत्र सर्वस्थानेषु पठ्यते।<br>तस्य पूर्वं मयाप्युक्तं यत्तन्माहात्म्यमव्ययम्॥ २१॥ | ये अनन्त सर्वत्र सभी स्थानोंमें हैं, ऐसा कहा गया है। इनका जो अव्यय माहात्म्य है, मैंने भी पूर्वमें उसका वर्णन किया है। वही ये (परमात्मा) ही भूमि, रसातल, आकाश, वायु, अग्नि, सभी समुद्रों तथा स्वर्ग—सर्वत्र, सभी स्थानोंमें विद्यमान हैं, इसमें कोई संदेह नहीं। ये ही महाद्युतिमान् पुरुषोत्तम अन्धकार तथा (प्रकाशात्मा) सत्त्वमें विद्यमान होते हुए अपने अङ्गोंको अनेक रूपोंमें विभक्तकर क्रीडा करते हैं। महेश्वर अव्यक्तसे परे हैं। अण्ड अव्यक्तसे उत्पन्न होता है। अण्डसे ब्रह्मा उत्पन्न हैं और उन्होंने इस संसारकी सृष्टि की है॥ २१-२४॥ |
| गतः स एष सर्वत्र सर्वस्थानेषु वर्तते।<br>भूमौ रसातले चैव आकाशे पवनेऽनले।<br>अर्णवेषु च सर्वेषु दिवि चैव न संशयः॥ २२॥ | |
| तथा तमसि सत्त्वे च एष एव महाद्युतिः।<br>अनेकधा विभक्ताङ्गः क्रीडते पुरुषोत्तमः॥ २३॥ | |
| महेश्वरः परोऽव्यक्तादण्डमव्यक्तसम्भवम्।<br>अण्डाद् ब्रह्मा समुत्पन्नस्तेन सृष्टमिदं जगत्॥ २४॥ |
इति श्रीकृष्णद्वैपायने कूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे अष्टचत्वारिंशोऽध्यायः॥ ४८॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें अड़तालीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ४८॥