संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished506 पृष्ठ
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- अध्याय ५१ * २५५
| ये ब्राह्मणाः संस्मरन्ति नमस्यन्ति च सर्वदा।<br>तर्पयन्त्यर्चयन्त्येतान् ब्रह्मविद्यामवाप्नुयुः॥ २९॥<br><br>इदं वैवस्वतं प्रोक्तमन्तरं विस्तरेण तु।<br>भविष्यति च सावर्णो दक्षसावर्ण एव च॥ ३०॥<br><br>दशमो ब्रह्मसावर्णो धर्मसावर्ण एव च।<br>द्वादशो रुद्रसावर्णो रोचमानस्त्रयोदशः।<br>भौत्यश्चतुर्दशः प्रोक्तो भविष्या मनवः क्रमात्॥ ३१॥ | जो ब्राह्मण सर्वदा इनका स्मरण करते हैं, इन्हें नमस्कार करते हैं, इनका तर्पण करते हैं और इनकी पूजा करते हैं, वे ब्रह्मविद्याको प्राप्त कर लेते हैं। वैवस्वत मन्वन्तरका विस्तारसे वर्णन किया। सावर्ण (आठवाँ) तथा (नवाँ) दक्षसावर्ण मन्वन्तर भविष्यमें होंगे। दसवाँ ब्रह्मसावर्ण, ग्यारहवाँ धर्मसावर्ण, बारहवाँ रुद्रसावर्ण तथा तेरहवाँ रोचमान मन्वन्तर है। चौदहवाँ भौत्य मन्वन्तर कहा गया है। ये मनु क्रमसे भविष्यमें होंगे॥ २९—३१॥ |
| अयं वः कथितो ह्यंशः पूर्वो नारायणेरितः।<br>भूतभव्यैर्वर्तमानैराख्यानैरुपबृंहितः ॥ ३२॥<br><br>यः पठेच्छृणुयाद् वापि श्रावयेद् वा द्विजोत्तमान्।<br>स सर्वपापनिर्मुक्तो ब्रह्मणा सह मोदते॥ ३३॥<br><br>पठेद् देवालये स्नात्वा नदीतीरेषु चैव हि।<br>नारायणं नमस्कृत्य भावेन पुरुषोत्तमम्॥ ३४॥<br><br>नमो देवादिदेवाय देवानां परमात्मने।<br>पुरुषाय पुराणाय विष्णवे कूर्मरूपिणे॥ ३५॥ | मैंने नारायणद्वारा कहे गये भूत, भविष्य तथा वर्तमानके आख्यानोंसे उपबृंहित इस पूर्वभागको आप लोगोंसे कहा। जो (ब्राह्मण) इसे पढ़ेगा, सुनेगा अथवा श्रेष्ठ द्विजोंको* सुनायेगा, वह सभी पापोंसे मुक्त होकर ब्रह्माके साथ आनन्द प्राप्त करेगा। स्नान करनेके अनन्तर नदियोंके किनारोंपर अथवा देवमन्दिरमें भक्तिभावसे पुरुषोत्तम नारायणको नमस्कार कर इसका पाठ करना चाहिये। देवोंके आदिदेव, देवोंके परमात्मा, पुराण पुरुष कूर्मरूपी विष्णुको नमस्कार है॥ ३२—३५॥ |
इति श्रीकूर्मपुराणे षत्साहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे एकपञ्चाशोऽध्यायः॥ ५१॥
॥ पूर्वविभागः समाप्तः ॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें इक्यावनवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ५१॥
॥ पूर्वविभाग समाप्त ॥
* द्विजोंको आगे करके पुराण-श्रवण करानेकी विधि है। पुराण-श्रवणका अधिकार अन्य वर्णोंको भी है। द्विज मुख्यरूपसे सात्त्विक वृत्तिके होते हैं तथा प्राणिमात्रका कल्याण ही इनका लक्ष्य होता है, इसीलिये इसकी प्रमुखता है।